गुरुवार, 28 मार्च 2013

कृष्ण बिहारी का संस्मरण : श्रीलाल शुक्ल के आखिरी दिनों में - कितना ठहर गया था जीवन

दो-ढाई माह पहले 17 अगस्त की सुबह श्रीलाल शुक्ल के दरवाजे पर लगभग सवा दस बजे मैं उनसे बिना पहले से समय तय किए मिलने पहुंचा था। राजेश तिवारी ने अपनी कार से मुझे उनके घर के सामने छोड़ा साथ में महेन्द्र भीष्म भी थे लेकिन उन्हें और राजेश को अपने काम पर जाना था उन्होंने अपनी राह पकड़ी। मैं कुछ देर गेट पर खड़ा रहा।

इससे पहले की मुलाकात में श्रीलाल जी ने कहा था,

' रात को ठीक से नींद नहीं आती इसलिए सुबह फिर सो जाता हूँ। मिलने जुलने के लिए बारह बजे का समय उपयुक्त रहता है। '

मैं तो बारह बजे से खासा पहले पहुंचा था। संकोच था कि कहीं उनकी नींद में खलल न बनूं। पिछले कई वर्षों से उनके पास देर तक बैठ पाना कई कारणों से संभव नहीं हो पाता था इसलिए मैं मन बनाकर जाता था कि दर्शन करके उलटे पांव वापस हो लूंगा।

कितना कठिन होता है वह वक्त जब आप किसी के साथ होना चाहते हैं- वह भी नहीं चाहता कि आप जाएं- और न जाने कितनी पाबंदियां आपको अपने प्रिय से अलग कर देती हैं इससे दारुण कष्ट कोई और नहीं होता। मैं श्रीलाल जी से अपनी दो मुलाकातों का जिक्र करना चाहूंगा। पहली और आखिरी। बीच में हुई मुलाकातों का विवरण फिर कभी।

वर्षों पहले का कोई दिन समय वही लगभग दस, साढ़े दस बजे के बीच मैं ऑटो से उनके घर के सामने उतरा था टेलीफोन में समय लेकर पहुंचा था। श्रीलाल जी तब अपनी अवस्था के हिसाब ले स्वस्थ ही नहीं, बहुत स्वस्थ थे। मैं उनके घर के ड़ाइंग रूम में पहुंचा। सामने राग दरबारी का अमर गायक' जिसकी किताब मेरी जवानी में मेरे लिए गीता थी। आज भी है। मैंने उसे जितनी बार पढ़ा उतनी बार हंसा उतनी बार रोया। यह

सन 1980 की बात होगी उसके बाद न जाने कितनी बार मैंने रेलवे स्टेशन से सस्ता संस्करण खरीदा और मित्रों को भेंट कर दिया। पिछली बार की खरीदी प्रति खुर्शीद भाई को दी है।

अपने से इकतीस वर्ष छोटे रचनाकार से मिलते हुए उनका पहला वाक्य था. आप उपन्यास क्यों नहीं लिख रहे हैं ?

‘लिखूंगा’

' लंबी कहानी अंतत: पारदर्शी ' अभी पढ़ी है उपन्यास लिखें। आप में उपन्यास लिखने की प्रतिभा है, हाँ, क्या लेंगे ''

' चाय. काली चाय बिना चीनी की। '

' कहानियों में तो शराब की खूब बातें करते हैं- सुनो पीते हैं इसी बहाने में भी पी लूंगा।

बस दो मिनट से भी कम में उन्होंने मेरे मन में हर प्रकार का संकोच दूर कर दिया। अब मेरे सामने बहुत कुछ था। मेरा नायक। उसकी इच्छा और अपने शराबी होने का बौनापन। दिन के ग्यारह भी नहीं बजे थे कि शुक्ल जी ने अपने एक सहायक को दो बोतल बियर लाने भेज दिया यह अलग बात है कि जव बियर आई तो वह नहीं पी गई। हमने व्हिस्की पी और बहुत सी बातें कीं। हिंदुस्तान की, अरब दुनिया की, हिंदी साहित्य की न जाने कितने नामवर लोगों की। श्रीलाल जी की मुस्कराहट में गरिमा और उनकी हँसी में चुंबकीय आत्मीयता दिखी। जब मैं उनके घर में निकलने को हुआ, तब भी उनका मन मुझे विदा करने का नहीं था। उस दिन मेरे पास कैमरा नहीं था। उस दिन के फोटो ही नहीं लिए गए तो कहाँ से हों और अब वह मुलाकात जो आखिरी. आखिरी हो गई

17 अगस्त, 2011, सुबह का वक्त। समय सवा दस बजे के आस-पास मैं उनके बिस्तर के पास बाईं तरफ एक कुर्सी पर बैठा।

'कब आए?' उन्होंने पूछा। मैं कैसे कहता कि कल वापस जा रहा हूँ। आए हुए तो एक महीना हो गया एक महीने में ही पत्नी की आंखों के दो ऑपरेशन हुए और मैं शटल की तरह लखनऊ आता जाता रहा। मैं चुप रहा और श्रीलाल जी ही बोले, यह आखिरी मुलाकात है। मैं भर आया. ' ऐसा मत कहें आप। मगर वे बोलते रहे धीरे धीरे. बहुत धीरे धीरे, बहुत कुछ - ' बड़े भाई गांव में हैं, चल फिर लेते हैं तो समझो स्वस्थ हैं. भवानी शंकर आते हैं. जानते हो, जहां-जहाँ मेरी पोस्टिंग हुइ वहां भाई की भी हुई। यह मालूम होता कि एक समय ऐसा भी आएगा कि हम इतने अकेले पड़ जाएंगे, तो हम तीनों भाइयों ने पासपास मकान बनवा लिए होते, कम से कम ऐसे वक्त में हम साथ होते। अखिलेश आते हैं. अब मैं कुछ पढ़ नहीं पाता। केवल अखिलेश की कहानी बड़ी मुश्किल से पढी है. डिक्टेट करके ही कुछ लिखवाता हूं। बोलते बोलते थक जाना हूं। अब भी थक गया। अब तो बाथरूम तक भी नहीं जा पाता दुनिया इसी एक कमरे की हो गई है।

सचमुच, श्रीलाल जी थक गए थे मेरा नायक हारे. यह मुझे मंजूर नहीं था। भीतर बेचैनी भर गई थी इस बीच मेरी काली चाय आ गई थी। मैंने लंब लंबे घूंट भरे, श्रीलाल जी के पांव छुए और कमरे से बाहर हो गया। लेकिन मैं झटके में कमरे से ही बाहर आ पाया। उनके घर से बाहर निकलते समय लगा कि सब कुछ ठहर गया है।

कृष्ण बिहारी

(आउटलुक से साभार)

2 blogger-facebook:

  1. मन को छूता हुआ संस्मरण ।श्री शुक्लजी को अनेक प्रणाम ।

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  2. श्रीलाल शुक्ल जी हिंदी व्यंग्य के लिए मील का पत्थर हैं. उन्हें हार्दिक श्रद्धांजलि.

    उत्तर देंहटाएं

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