रविवार, 31 मार्च 2013

सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री, मुरसलीन साकी, नीरा सिन्‍हा, सुधीर कुमार सोनी, उमेश मौर्य, विजय वर्मा की रचनाएँ


 

सुरेन्द्र अग्निहोत्री

सब्र खोने का वक्‍त आ गया है
कुल जमा तस्‍वीर धुंधली है
कहने का लब्‍बोलुबाब यही है
देश फेल हो रहा है?
देश के अन्‍दर से
नये देश फूट रहे हैं
जो देश के लिए नहीं
अपनी राजनीति चमकाते हैं
सत्‍ता की खातिर
झूठ को सच मनवाते हैं
और लगता है
हमने मान लिया है
देश नहीं क्षेत्रीयता की बारी है
सपनोको तोडने की तैयारी है
थेाड़े बेसब्र रहे और हम
तब तक जोड़ घटाव करे
दोराहे पर रहे देश!
हम हाथ पर हाथ धरे
जो वो चाहे करे
हमें सिर्फ चुप करे।

-सुरेन्‍द्र अग्‍निहोत्री
ए-305, ओ.सी.आर.
बिधान सभा मार्ग;लखनऊ
मो0ः 9415508695

 

0000

मुरसलीन साकी

मुझे गिला नहीं तेरी जफाओं का।

मैं आशिक हूँ तेरी निगाहों का॥

मुझे शोहरत यूँ ही नहीं मिल गई।

ये असर है तेरी दुआओं का॥

खबर हम को नहीं है गुलशन की।

कुसूर इसमें है क्‍या बहारों का॥

हसद से जल गये हैं दिल खुद ही।

असर दिखता नहीं शरारों का॥

फकत रहमत से अपनी कर अता।

सलीका हम को नहीं दुआओं का॥

 

0000

आमद थी उनकी इसलिये गुलशन संवारा था।

क्‍या मिल गया है तुम को मेरा ख्‍वाब तोड़ कर॥

हमने तो इन्‍तजार में सदियां गुजार दीं।

वो जा रहे हैं देखिये इक शब गुजार कर॥

मैं अब भी उसी राह पे मिल जाऊंगा तुम्‍हें।

जहां तुम चले गये थे मेरा साथ छोड़ कर॥

शायद कभी खयाल मेरा आये इसलिये।

जलते चराग आ गया राहों में छोड़ कर॥

उसने मेरे खतों का दिया इस तरह जवाब।

कांटे ही खत में रख दिये फूलों को छोड़ कर॥

0000

 

ये खौफ जदा शहर ये गमनाक हवायें।

हर सू है कत्‍लेआम अदावत की सदायें॥

अब नफरतों ने अपने तरीके बदल लिये।

अस्‍मत जनी है तो कहीं खून की धारें॥

वीरान हुआ शहर लगी आग हसद की।

ऐसी फजा में आयेंगी क्‍या खाक बहारें॥

हाकिम तो सो रहें हैं हसी महलों में अपने।

हम खौफ जदा है कि कहां रात गुजारें॥

कितने हसीन होते हैं से जख्‍म दिलों के।

मिल जायें कहीं राह में उनको भी दिखायें॥

 

मुरसलीन साकी

लखीमपुर-खीरी उ0प्र0

मो0 9044663196

पिन- 262701

0000

नीरा सिन्हा

आत्‍महंता होते युवा

अति संवेदनशील आज के युवा

खूद को गुनहगार समझने लगे

पिता के अकांक्षा को नही कर सके पूरा

तो खूद को सजा देने लगे

क्‍लर्क पिता ने पुत्र के कंधे पर

अपनी दमित अकांक्षा को दिया लाद

पुत्र बनना चाहता था चित्रकार

अफसर बनने का पिता ने बनाया दबाव

पिता की अकांक्षा को कर नही सका पूरा

मुजरिम खूद को समझ लिया

अवसाद में घिर कर भरी जवानी में

पंखे से झूल कर आत्‍महत्‍या कर लिया

फैशनेबल भाषा

भाषा बन गयी है फैशन

युवा कॉलेज की लड़की को

कहता है आइटम

परीक्षा में प्रश्‍नों के उतर

एसएमएस की भाषा में देता है

पवन पुत्र हनुमान को

सोर्टकट में हाय हनु कहता है

विद्या की देवी की पूजा में

मुन्‍नी बदनाम हुई गाने पर

पीकर थीरकता है

माँ औ बहनों को सजी-धजी देखकर

सेक्‍सी लग रही हो

कहता है !

घर एक संग्राहालय

भौतिक वस्‍तुओं का बनता

जा रहा है घर एक संग्राहालय

जिंदगी की संगीत का

जिसमें नही है कोई ताल औ लय

खो गयी है जिंदगी

चीजों के ढेर में

बिन सोचे-समझे चीजों

को खरीदने के फेर में

नीरा सिन्‍हा

मो. 9931584588

00000

 

सुधीर कुमार सोनी

        ''निश्चिंतता से जीने के कुछ पल''
निश्चिंतता
ठहर नहीं पाती है मेरे पास
अकारण ही
मैं ढूंढता हूँ
निश्चिंतता से जीने के कुछ पल
बावजूद इसके
की समय के सम्पूर्ण अंग में
विस्फोटक लेप चढ़ा हुआ है
देखता हूँ
कितनी निश्चिन्त होकर
घास के शीश पर बैठी है
ओस की बूंद
बिना किसी भय के
बुन   रही है मकड़ी अपना जाल
कि पृथ्वी के इस भाग में
कम्पन नहीं होगा अभी
आबादी से दूर सही
चिड़ियों ने ढूंढ लिया है
अपने घोंसले के लिए ठिकाना
बहुमंजिले भवन को
जीभ दिखाती
बकरी ढूंढ रही है चारा
चल रही है कतार में चीटियाँ
बेखबर
की समय उतावला है
पहुँचने के लिए
इक्कसवीं सदी के द्वार पर
वह नौजवान
जो प्रतियोगिताओं को
लगातार लाँघने की कोशिश में है
निश्चिंतता की कसौटी पर
खरा उतर पायेगा
क्या पता
घास के शीश पर बैठी
ओस की बूंद
उस पर ठहाका लगाये


     ''सुबह ''
सूरज की किरणों की
पलके खुलने के पहले
पंछियों की पलकें खुल जाती हैं
ग्वाले का हाथ
अपने पशुओं के थन के पास
पहुँच जाता है
सुबह होने का आभास होते ही
दुनिया की खबरों को
घर-घर तक पहुँचाने का सिलसिला
शुरू होता है
सुबह होने के पहले
चौराहों के ठेलों और गुमटियों में
केतली में घुलने लगती है
चाय की कडुवाहट
सुबह होने के पहले 
सुबह
धीरे-धीरे
तैरता जाता है शोरगुल हवा में
घुलता जाता है जहर
क्षमा
तुमसे सुबह
इससे पहले कि
तुमसे छीन जाए
तुम्हारी
शीतलता
मधुरता
और सहजता

0000

उमेश मौर्य

॥ सीखो॥

 

न केवल अपनें स्‍वजनो पे,

गैरों पे भी रोना सीखो।

महलों के बाहर की दुनियॉ,

खुली हवा में सोना सीखो।

कॉटे बोये, कॉटे काटे,

फूल प्रेम के बोना सीखो।

एक अलग दुनियाँ मस्‍ती की,

चीत्‍कारों मे जीना सीखो।

जीवन तो निकलेगा यू भी,

अॉसू पोंछ के जीना सीखो।

दुख से भरी अमीरी कैसी,

मस्‍त फकीरी सोना सीखो।

लघु, अतिलघु प्रश्‍नों में उलझे,

खुले विचार में उड़ना सीखो।

पग-पग लिए मशीनी कुबड़ी,

पैदल भी तो चलना सीखो।

ऊॅच नीच और जाति पाति से,

अब हे आर्य निकलना सीखो।

पश्‍चिम में अब देख न भारत,

अपना भाग्‍य बदलना सीखो।

जख्‍मी जापानी घोड़ों से,

अपनें दम पे जीना सीखो

 

उमेश मौर्य

सुलतानपुर, उत्‍तर प्रदेश, भारत

 

0000

विजय वर्मा    

 

  ग़ज़ल

बा-रहम थें जो,वो अब बे-रहम है .

इसे मानने में भला कैसी शरम है .

मौसमे-जहाँ का भरोसा नहीं रहा

सुबह खुशनुमा थी ,शाम गरम है

आमरण -उपवास फिर होगा पुरअसर

मुगालतें न पाल,यह मात्र भरम है .

अहले-कू-ए-सियासत के एक सा मिजाज़

कोई थोड़े शख्त,कोई थोड़े नरम है .

अब ये कौन सा दौर आया है मुल्क में

आबाद है मयखानें ,वीरां दैरो-हरम है . 

चाँद  खुद बाहरी समर्थन पे टिका है

रौशनी तभी है जब जुगनुओं की रहम है .

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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