शनिवार, 30 मार्च 2013

अली सरदार जाफ़री के ड्रामाई नज़्मों की किताब 'नयी दुनिया को सलाम' से मुहब्बत भरे कुछ नज़्में

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धुंधली तस्वीर
(अँधेरे से दो शक्लें उभरती हैं- जावेद दूल्हा बना हुआ और मरियम दुल्हन) ।

निहाँ अब्र में १ चाँद कब तक रहेगा
भला इश्क से हुस्न कब तक छुपेगा
तू शर्माई जाती है मेरी नजर से
हिजाब' और गुल को नसीम-ए-सहर से
तू क्या मेरी फित्रत की महरम' नहीं है?
तू क्या मेरे बचपन की मरियम नहीं है?
गुजारी जो रातें तिरी आरजू में
सिमट आई हैं काकुल-ए-मुश्कनूजू में
जो पलकें हया से झुकी जा रही हैं
वो कुछ और दिल में चुभी जा रही हैं
तिरे रुख पे' हुस्न-ओ-मुहबत का हाला
यही है मेरी जिन्दगी का उजाला
ये शपफ़ाफ़ आँखें, ये आँखों के डोरे
छलक जाएँ जैसे गुलाबी कटोरे
जो हाथों को रंग-ए-हिना मिल गया है
हथेली पे' गोया कँवल खिल गया है
मुहब्बत की रातों की कंदील तू है
जवानी के ख्वाबों की तकमील' तू है
यह इक आँच सी तेरी नीची नजर में'
तिरे हुस्न से रौशनी मेरे घर में
तकल्लुम से नग्मों की दुनिया जगा दे
तबस्तुम' से फूलों को हँसना सिखा दे
(मरियम जरा मुस्कुराती है )
तिरी मुस्कुराहट में क्या दिलकशी है
यह फूलों पे सोई हुई चाँदनी है
मगर रूह की प्यास क्यूँकर बुझेगी '
समन्दर से क्या सिर्फ शबनम मिलेगी '
मुहब्बत है, नग्मा है, मै है, सुबू है
मिरें वास्ते जो भी कुछ है वो तू है
तिरी खामुशी कह रही है फसाना
तजाहुल है तेरा बड़ा आरिफ़ाना

हमारे दिलों की है हसरत पुरानी

हमारी शराब-ए-मुहब्बत पुरानी

वो गुजरी हुई शाम है याद अब तक
वो है मेरे सीने में आबाद अब तक
दिन आहिस्ता-आहिस्ता ढलने लगा था
फजाओं में सोना पिघलने लगा था
धुंधलके की परछाइयाँ नाचती थीं
हर इक सिम्त अँगड़ाइयाँ नाच ती थीं
उफुक पर किरन ख्वाब सा बुन रही थी
दुपट्टे को अपने शफ़क़ चुन रही थी
तिरी रूह-ओ-दिल पर थे बादल से छाए
खड़ी थी मिरे पास गर्दन झुकाए
मगर नकहतें अपनी बरसा रही थी
तिरे पैरहन से महक आ रही थी

तिरे सर से आँचल जो ढलका हुआ था
मिरे खून में साज सा बज रहा था
उसी रात की तर्ह पलकें झुकी थीं
धड़कता था दिल और नब्जें रुकी थीं।
किया प्यार सूरज ने झुक कर जमी को
सजाया सितारों से शब ने जबीं को
फिसल कर सियह जुल्फ शानों पर आई
तिरे रुख पे इक शम्अ सी झिलमिलाई
मुझे तूने देखा निगाहें उठाकर
कहा फिर इशारों में कुछ मुस्कुराकर
समझ कर निगाहों का पैगाम हमने
मुहब्बत का पहला पिया जाम हमने
इसी जाम ने हमको सरशार रक्खा
हमारी तमन्ना को बेदार रक्खा
जुदाई में भी सब्र करना सिखाया
हमें आग पर से गजरना सिखाया
मुरादों की माँगी हुई रात है यह
कि बिछडे हुओं की मुलाकात है यह


(मरियम जावेद की तरफ़ मुहब्बत भरी नजरों से देखती है और फिर पलकें झुका
लेती है । उसकी आँखों से दो चमकते हुए आँसू टपक पड़ते हैं और चंपई रुख्सारों
पर चाँदनी की दो लकीरें-सी खिंच जाती हैं । )

मरियम-

मिरी सारी दौलत मुहब्बत के आँसू

जावेद –

मुहब्बत के आँसू, मसर्रत के आँसू
ये आँसू है टूटे दिलों के सहारे
ये तकदीर-ए-आदम' के रौशन सितारे
तिरी सारी हस्ती तिरी चश्म-ए-नम' में
मिरे घर की बरकत है तेरे कदम में
हर इक रंज-ओ-राहत' की साथी है औरत
जहन्नुम को जन्नत बनाती है औरत
जबीं पर तजल्ली' की अंजुम फिशानी'
नजर मे जुलेख़ा की हँसती जवानी
वो गमख्वार भी और दिलदार भी है
वो है साज भी, नग्मा भी, नग्मासार भी
गुलिस्ताँ भी, गुल भी, नसीम-ए-सहर भी

मरियम-

मुझे भी तो है याद वो रात अब तक
है मुट्ठी में मेरी वो लम्हात अब तक
कली की तरह जो खिले जा रहे थे
जो घुलकर लहू में मिले जा रहे थे
तमन्नाएँ लहराती वीं ख्वाब बनकर
बरसते थे जुगनू अँधेरे से छनकर
हिजाब उठ गए थे जमान-ओ-मकाँ के'
दरीचे थे वा लल्लत-ए-जाविदाँ के
रगों मे मिरी दौड़ते थे शरारे
मिरे गिर्द थे रक्स में चाँद तारे
वो रात आई थी एक तूफान बनकर
समन्दर के सीने का हैजान' बनकर
मुहब्बत की कैफ़ आफ़रीं'' रात थी वो
जवानी की सबसे हसीं रात थी वो

जावेद-

वो रात आज तक हुस्न बरसा रही है
वो रात आज की रात लहरा रही है

2 blogger-facebook:

  1. बहुत अच्छा. आपका धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  2. बहुत सुन्दर | आदाब |

    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |
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