मंगलवार, 26 मार्च 2013

एस. के. पाण्डेय के दोहे

दोहे(१२)


सुख सागर उर में बसत तदपि दीन सब लोग ।
यसकेपी अचरज महा देखत यह संयोग ।।

हेम घड़ा घर में पड़ा नहीं जान पहिचान ।
जिमि डोलत घर-घर महा मूरख अति धनवान ।।

तिमि सबके उर राम हैं बिना जान पहिचान ।
यसकेपी सब जग दुखी मूरख महा समान ।।

निज उर अंतर राम से योगिन को पहिचान ।
याते रहते चैन से करत नहीं कछु कान ।।

नदी उमगि जल लै चली सागर पहुँची जाय ।
यसकेपी सागर लखत नदी गई हेराय ।।

सागर के जल बहुत है नदी पास है थोर ।
सागर कहूँ न जात है नदी जाय सब ओर ।।

सागर ऐसा एक है देखत नदी की ओर ।
यसकेपी न मिलि सकैं नदियाँ बंधन तोर ।।

कलियुग जग हर्षित चला लै अपुनो हथियार ।
यसकेपी हरने लगा बुधि बल धरम बिचार ।।

मूढ़ बने ज्ञानी सभी ज्ञानी हो गए मूढ़ ।
यसकेपी देखत खड़े दर-दर पे बहु ऊढ़ ।।

शुभ मत सब खोजन लगे यसकेपी तब ठोर ।
जाँय कहाँ सब जग भरे अशुभ मते चहु ओर ।।

कुतर्क कुमति कि बहि चली यसकेपी बड़ि वायु ।
सुमति पलायन करि चली क्षीण सकल भे आयु ।।

सदाचार नहि कहुँ मिले बारिस में ज्यों धूरि ।
अनाचारि कुबिचारि की होय प्रशंसा भूरि ।।

यसकेपी होने लगा जग ऐसा प्रचार ।
झूँठे मत साचे भये लोगन तजे विचार ।।

राम नाम यक साच है बाकी सब बकवास ।
मूल मंत्र ज्ञानिन मते मूरख को परिहास ।।
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डॉ. एस. के. पाण्डेय,
समशापुर (उ.प्र.) ।

ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो 
URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/
   
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