गुरुवार, 14 मार्च 2013

पुस्तक समीक्षा - मन पखेरू उड़ चला फिर : ज़िंदगी की खूबसूरत कविता को भरपूर जीने की ख्वाहिश

ज़िंदगी की खूबसूरत कविता को भरपूर जीने की ख्वाहिश

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(सुनीता शानू के कविता संग्रह “मन पखेरू उड़ चला फिर” पर केन्द्रित)

 

कविता बेचैनी से उपजती है। जितनी घनीभूत बेचैनी होगी उतनी सार्थक कविता भी होगी। यह बेचैनी संवेदनशील व्यक्ति को ही हो सकती है, और संवेदनशील होना मनुष्य की पहली और अनिवार्य शर्त है। इसी लिये धूमिल ने कविता को “भाषा में आदमी होने की तमीज़” कहा है। कविता, गहन पीड़ादायक अनुभवों से गुज़र रहे रचनाकार की सृजनात्मक चीत्कार है। इस प्रकार प्रत्येक रचनाकार दृष्टा होता है क्योंकि वेदना की शक्ति दृष्टि देती है। जो यातना में होता है वह दृष्टा हो सकता है ( अज्ञेयः शेखरः एक जीवनी) । इस वेदना को अपनी “सेंसिबिलिटी” से जितनी शिद्दत से महसूस किया जायेगा उतनी ही पारदर्शी और दूरदर्शी दृष्टि से संपन्न कविता प्रस्फ़ुटित होगी।

सुश्री सुनीता शानू की कविताओं को पढ़ते-गुनते हुए शीतल जल के छींटों-सा ताज़गी भरा अहसास छू-छूकर गुज़रता है। इस जीवंत और स्फ़ूर्त शीतल जल के अंतस में भी गहन पीड़ाएं हैं- पत्थरों से टकराने की पीड़ा, अपने मूलबिंदु से बिछड़ने की पीड़ा, अनजानों के बीच रहने की उत्कंठित पीड़ा, अज्ञात लक्ष्य की ओर बढ़ते जाने की विवश-पीड़ा; किंतु इन सब पीड़ाओं के साथ जीवन देने की, सुख देने की लालसा; पीड़ा के चीत्कार को मधुर गान में परिवर्तित कर देती है। सुनीता जी की सभी कवितायें इन्ही पीड़ाओं के चीत्कारों और जिजीविषा के मधुरतम गान का संतुलित समुच्चय है। ये कवितायें, इसीलिये समकालिक से आगे बढ़ कर सर्वकालिक हो जाती हैं और मानवीय सरोकारों की सशक्त पैरवी करती हैं। इसी क्रम में उनकी “उसने कहा”, ”मैं रूठ पाऊँ, “सुबह का भूला”, “मलाल”, “इंतजार”, “मुखौटे के पीछे”, खबर: दुनिया बदलने की”, “ए कामवाली- !” जैसी कविताएं विशेष दृष्ट्व्य हैं।

सुनीता का रचना संसार बहुत व्यापक है। उनकी कवितायें उनके जैसी ही मुखर है और अपने पाठकों व श्रोताओं से सक्रिय व सीधा संवाद करती हैं । कविताओं की यह बहिर्मुखी प्रवृत्ति एक ओर उन्हें ऎकान्तिक अवसाद से बचाती है और दूसरी ओर अपनी कहन को बिना किसी लाग-लपेट के अपने पाठकों को सीधा संप्रेषित कर देती है ।

सुनीता की कविता जीवंतता की, गति की और अजस्र ऊर्जा की दस्तावेज है। इस संग्रह का पहला ही गीत “ मन पखेरु उड़ चला फिर...” इस जीवन्तता की सघनता और गति की दिशा निर्धारित करता है। यह गीत इस संग्रह का शीर्षक गीत है, जिसमें डूबते-उतराते सुनीता की रचना धर्मिता के विविध आयामों का विहगावलोकन किया जा सकता है। इस गीत में “मन पखेरु” जहां एक ओर आसमान की ऊँचाइयाँ नापने को बेचैन है तो वहीं दूसरी ओर हृदय की गहराइयों में दबी मलिनता की ग्रंथियाँ खोलने को आतुर है । एक साथ बहिर्यात्रा और अंतर्यात्रा का ऎसा संगम विरल ही देखने को मिलता है।

“पंछी” या “पखेरु” सुनीता का प्रिय प्रतीक है । पंछी या पखेरु; जीवंतता को, गति को, अज्रस ऊर्जा को, जिजीविषा को और उन्मुक्तता और उत्सवप्रियता के विविध बिम्बों को उनकी रचनाओं में रुपायित करता है । इस संग्रह की कुल बारह कविताओं में “पखेरु” ने उड़ान भरी है । ये कविताएं हैं- “मन पखेरु फिर उड़ चला”, “आज होली रे”, “किस पर करूँ विश्वास”,”सुबह का भूला”, “डोर”, “ओढ़ा दी चुनर”, “गीतिका: ये कौन है”, “गीतिका: प्यार में अक्सर”, ”मन पखेरु”, ”प्रेम बंधन”, “मैं अपना घर ढूँढती हूँ”, और ”पंछी तुम कैसे गाते हो” । इन कविताओं में सुनीता के पंछियों- पखेरुओं ने जीवन के मौलिक बिम्ब गढ़े हैं । एक सफ़ल, सार्थक और सक्षम प्रतीक की खोज, सुनीता की बहुत बड़ी उपलब्धि है।

सुनीता की रचनाओं का मूल स्वर “प्रेम” है। वे प्रेम के विविध आयामों की अनुगायिका हैं। प्रेम को उन्होंने व्यष्टि से समष्टि और अणु से ब्रह्माण्ड तक पहुंचाया । ऎहिक और दैविक प्रेम का चित्रण करने में वे बहुत सफ़ल रही हैं। उनके प्रेम का कैनवास बहुत व्यापक है, जिसमें बचपन के घरौंदे, कच्ची इमली, नीम, पीपल, बरगद, अमलतास, से लेकर माँ, पिता, पुत्र, पति और मित्रों को भी बहुत आत्मीयता और निश्छलता के साथ विषय बनाया गया है । प्रकृति के प्रति उनके प्रेम ने “अमलतास” जैसी महत्वपूर्ण कविता दी है, तो प्रेम के आध्यात्मिक और पारलौकिक आयाम ने उन्हें “दर्द का रिश्ता” कविता रचने के लिये प्रेरित किया है । पूरी बेबाकी और ईमानदारी के साथ उन्होने प्रेम के ऎहिक, ऎन्द्रिक और सांसारिक स्थूल स्वरूप पर भी कलम चलाई जिससे “प्रिय बिन जीना कैसा जीना”, “तुम्हारी चाहत”, “श्याम सलोना”, जैसी कविताएं निः सृत हुई। प्रेम का वियोग पक्ष भी उनकी कविताओं में बड़ी समर्थ ध्वनि के साथ गुंजित हुआ है।

प्रस्तुत संग्रह “मन पखेरु उड़ चला फिर” सुनीता शानू का पहला काव्य संग्रह है। इसे पढ़ते हुए यह सुखद आश्चर्य होता है कि यह संग्रह किसी अन्य रचनाकार के पहले संग्रह में आने वाली भाव, भाषा, शिल्प, संयोजन, बिम्ब व प्रतीक विधान, अनुभूति, सम्प्रेषण आदि की बड़ी और गंभीर त्रुटियों से लगभग पूरी तरह से मुक्त है। वास्तव में वे समकालिक दौर की बेहद सतर्क और चिंतनशील रचनाकार हैं। उनकी काव्यधारा में प्रेम की शीतल फुहारें हैं तो समकालीन विद्रूपों के खिलाफ विद्रोह के तीखे तेवर भी दिखाई देते हैं। उनकी सृजनात्मक प्रवृत्तियाँ सुपरिचित पोलिश कवयित्री विस्लावा शिम्बोर्स्का की याद दिलाती है । शिम्बोर्स्का की भांति सुनीता जी की रचनाओं में बड़ी-बड़ी थोथी व सैद्धान्तिक बातों का अभाव और मर्मस्पर्शी शब्द चित्रों का बाहुल्य है। जो खामोश ज्वालामुखी शिम्बोर्स्का की रचनाओं में धधकता है, उसकी गहरी आँच सुनीता की रचनाओं में भी मिलती है। जहाँ एक ओर शिम्बोर्स्का अपनी कविता “डिस्कवरी” में कहती है-

मैं शामिल होने से इंकार करने में विश्वास करती हूँ

मैं बर्बाद जीवन में विश्वास करती हूँ

मैं कर्म में खर्च हुए समय में विश्वास करती हूँ

मेरी आस्था अडिग है-

-अंधी और निर्लिप्त।

वहीं सुनीता शानू अपनी कविता “जीना चाहती थी मैं” में पूछती है-

“दीमक भी पूरा नहीं चाटती

ज़िंदगी दरख्त की

फिर तुमने क्यों सोच लिया

कि मैं वजह बन जाऊँगी

तुम्हारी साँसों की घुटन

तुम्हारी परेशानी की

और तुम्हें तलाश करनी पड़ेगी वजहें

गोरख पांडॆ की डायरी या फिर

परवीन शाकिर के चुप हो जाने की।

ये सच है मैं जीना चाहती थी

तुमसे माँगी थी चंद सांसें-

वो भी उधार।“

सुनीता ने अपनी कविताओं में उस दुनिया को प्रस्तुत किया है जो सामान्य जन की दुनिया है। इस दुनिया में प्रेम है, संघर्ष है, भूख है, अभाव है और इन सबके साथ आत्मीय उत्सव-धर्मिता है। उनकी कवितायें सामान्य जन के सरोकारों से जुड़े प्रश्न सीधी-सरल भाषा में पूरी सादगी के साथ उठाती हैं। उनकी कविताओं में हर्ष-उल्लास, उम्मीद-हताशा, जीवन, मृत्यु, यथार्थ, संशय, प्रकृति, आस्था जैसे भावों के साथ मानवीय संवेदनाओं का आश्वस्त करता हुआ उष्ण स्पर्श भी है। वे जीवन के जयघोष का उत्सव मनाती हैं किन्तु इस उत्सव में वे अपनी जिम्मेदारियों के प्रति भी पूर्णतः सचेत हैं। उनकी समग्र चिंताएँ मानव-मात्र के लिए हैं।

“स्त्रीविमर्श” समकालीन वाङमय में महत्वपूर्ण प्रवृत्ति के रुप में तेजी से उभरा है हालाकिं इसकी जड़ें बहुत गहरे तक और बहुत दूर तक फैली हुई है। एक जागरूक रचनाकार के रुप में सुनीता ने भी स्त्रीविमर्श पर अपने मौलिक तर्कों और मान्यताओं के साथ चिंतन किया है। निष्कर्षतः स्त्री विमर्श पर उनका सुस्पष्ट, सुचिंतित मौलिक दर्शन उनकी कविताओं में निरायास ही उतर आया है। वे स्त्री के स्त्रीत्व की गरिमा से गौरवान्वित है किंतु स्त्रीविमर्श के नाम पर स्त्री को तमाशा बनाने के खिलाफ हैं। उनके दृष्टिकोण, उनकी कविताओं- “तो फिर प्यार कहाँ हैं”, “तुम ऎसे तो न थे”, “मेरे मालिक”, “डोर”, “चिह्न”, “कन्यादान”, “माँ”, “तुम कैसी हो”, “मैं तनहा नहीं हूँ”, “श्याम सलोना”, “गरीब की बेटी”, “तुम्हारे लिये”, “ऎ कामवाली”, आदि कविताओं में परिलक्षित होता है।

इसी क्रम में मै इस संग्रह की रचना “जन गीत: कोई शिल्पकार यहाँ आएगा” का उल्लेख अलग से तथा विशेष रूप से करना चाहूँगा। यह असाधारण लंबी कविता पूरी मानव सभ्यता के प्रागैतिहासिक काल से वर्तमान तक के दौरान स्त्रीविमर्श की गहरी पड़ताल करती है और सारे विद्रूपों, विसंगतियों, प्रताड़नाओं और संघर्षों का संयत चित्रण करते हुए नई आस्था और विश्वास स्थापित करती है। इस रचना के लिये केवल यही कहा जा सकता है कि ऎसी रचनाएं “लिखी” नही जाती, “लिख” जाती है। यह कविता संदेश देती है कि हम पूर्वजों की गलतियों को मिटा नही सकते पर किसी न किसी तरीके से उनका प्रायश्चित करके उन्हें हलका अवश्य कर सकते हैं। पारंपरिक स्त्री विमर्श के पक्षधर तथा स्त्रीवादी इस कविता की मान्यताओं और स्थापनाओं से नाइत्तफ़ाकी रख सकते है किंतु इस रचना के सिध्द व्यवहारिक दर्शन को नकारा नही जा सकता। इस संदर्भ में मुझे नथानियल हाथर्न की कालजयी औपन्यासिक कृति “द स्कारलैट लैटर” याद आती है जो सन 1850 में प्रकाशित हुई थी और आज 162 वर्ष बीत जाने के बाद भी प्रासंगिक बनी हुई है। इस उपन्यास में “बाइबिल”, “पिलग्रिम्स प्रोसेस” आदि पौराणिक व पुरा-ऎतिहासिक ग्रंथो का प्रभाव है। स्त्री विमर्श की प्रारम्भिक रचनाओं में, अनेक असहमतियों के बावजूद, इसका सम्मानीय स्थान है। सुनीता के जनगीत “कोई शिल्पकार यहाँ आएगा” में भी “रामायण”, “महाभारत” जैसे धर्मग्रंथों को आधार बनाकर स्त्री पर यथार्थपरक विमर्श किया गया है। हाथर्न के उपन्यास “द स्कारलेट लैटर” पर कई फिल्में बन चुकी है और सुनीता का यह जनगीत भी संवेदन शील फिल्मकारों के लिये आधारभूमि उपलब्ध कराता है।

सुनीता की कविताओं का यह पहला संग्रह उनके लिये तो महत्वपूर्ण है ही साथ ही समग्र हिंदी कविता संसार के लिये भी महत्वपूर्ण है। इस संग्रह में भविष्य की एक दृष्टा और जीवंत कवयित्री की पदचाप सुनाई दे रही है। ये संभावनाओं के स्वर पूर्णतः जीवंत हो सकें और अनंत आसमान को नापने की इच्छा रखने वाला पखेरु अपने लक्ष्य को प्राप्त करे, यही कामना है। ज़िंदगी की खूबसूरत कविता को भरपूर जीने की ख्वाहिश करने वाले सुनीता शानू के “मन पखेरु” की यह पहली उड़ान सधी हुई, संतुलित तथा आत्म विश्वास से भरी हुई है। यह आशा की जानी चाहिये कि अपनी इस उड़ान में तथा भविष्य में होने वाली उड़ानों में यह मन पखेरु जीवन के आसमान की नई-नई बुलंदियों तक पहुंचेगा और नए रहस्यों का अन्वेषण करेगा। फिलहाल सुनीता जी के लिये प्रख्यात शायर डॉ बशीर बद्र का ये शेर मुलाहिज़ा फरमाएं...

चमक रही है परों में उड़ान की खुश्बू।

बुला रही है बहुत आसमान की खुश्बू।

कृति का नाम : मन पखेरू उड़ चला फिर

विधा : कविता

रचनाकार : सुनीता शानू

प्रकाशक : हिन्द युग्म, नई दिल्ली

पृष्ठ : 127; मूल्य : 195 रु।

समीक्षा -

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आनंदकृष्ण, भोपाल (म॰प्र॰)

मोबाइल : 9425800818

E-mail : anandkrishan@yahoo.com

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