शुक्रवार, 29 मार्च 2013

कत्‍यायनी की कविता - हाकी खेलती लड़कियाँ

कत्‍यायनी

हाकी खेलती लड़कियाँ

आज शुक्रवार का दिन है

और इस छोटे से शहर की ये लड़कियाँ

खेल रही हैं हाकी।

खुश हैं लड़कियाँ

फिलहाल

खेल रही हैं हाकी।

कोई डर नहीं।

बॉल के साथ दौड़ती हुई

हाथों में साधे स्‍टिक

वे हरी घास पर तैरती हैं,

चूल्‍हे की आँच से

मूसल की धमक से

दौड़ती हुई

बहुत

दूर आ जाती हैं।

वहाँ इंतजार कर रहे हैं

उन्‍हें देखने आये हुए वर पक्ष के लोग,

वहाँ अम्‍मा बैठी राह तकती हैं

कि बेटियाँ आयें तो

संतोषी माता की कथा सुनायें

और

वे

अपना व्रत तोड़ें,

वहाँ बाबूजी प्रतीक्षा कर रहे हैं

दफ्‍तर से लौटकर

पकौड़ी और चाय की,

वहाँ भाई घूम-घूमकर लौट आ रहा है

चौराहे से

जहाँ खड़े हैं मुहल्‍ले के शोहदे

रोज की तरह

और इधर

लड़कियाँ हैं

कि

हाकी

खेल रही हैं।

लड़कियाँ

पेनाल्‍टी कार्नर मार रही हैं

लड़कियाँ पास दे रही हैं

लड़कियाँ ‘गोऽल-गोऽल' चिल्‍लाती हुई

बीच मैदान की ओर भाग रही हैं

लड़कियाँ एक-दूसरे पर ढह रही हैं

एक-दूसरे को चूम रही हैं

और हँस रही हैं।

लड़कियाँ फाउल खेल रही हैं

लड़कियों को चेतावनी दी जा रही है

और वे हँस रही हैं

कि

यह जिन्‍दगी नहीं है

इस बात से निश्‍चिन्‍त हैं लड़कियाँ

हँस रही हैं

रेफ�री की चेतावनी पर।

लड़कियाँ बारिश के बाद की नम घास पर

फिसल रही हैं

और गिर रही हैं

और उठ रही हैं

वे लहरा रही हैं

चमक रही हैं

और मैदान के अलग-अलग कोनों में

रह-रहकर उमड़-घुमड़ रही हैं।

वे चीख़ रही हैं, सीटी मार रही हैं

और बिना रुके

भाग रही हैं

एक छोर से दूसरे छोर तक।

उनकी पुष्‍ट टाँगें चमक रही हैं

नृत्‍य की लयबद्ध गति के साथ

और लड़कियाँ हैं कि

निर्द्वन्‍द्व

निश्‍चिन्‍त हैं

बिना यह सोचे कि

मुँह दिखायी की रस्‍म करते समय

सास क्‍या सोचेगी।

इसी तरह खेलती रहती लड़कियाँ

निस्‍संकोच-निर्भीक

दौड़ती-भागती और हँसती रहतीं

इसी तरह

और हम देखते रहते उन्‍हें।

पर शाम है कि होगी ही

रेफरी है कि बाज नहीं आयेगा

सीटी बजाने से

और स्‍टिक लटकाए हाथों में

एक भीषण जंग से निपटने की

तैयारी करती लड़कियाँ

लौटेंगी घर।

अगर ऐसा न हो तो

समय रुक जायेगा

इन्‍द्र-मरुत-वरुण सब कुपित हो जायेंगे

वज्रपात हो जायेगा, चक्रवात आ जायेगा

घर पर बैठे

देखने आये वर-पक्ष के लोग

पैर पटकते चले जायेंगे

बाबूजी घुस आयेंगे गरजते हुए मैदान में

भाई दौड़ता हुआ आयेगा

और झोंटा पकड़कर घसीट ले जायेगा

अम्‍मा कोसेगी-

‘किस घड़ी में पैदा किया था

ऐसी कुलच्‍छनी बेटी!'

बाबूजी चीखेंगे-‘सब तुम्‍हारा बिगाड़ा हुआ है!'

घर

फिर

एक अँधेरे में

डूब जायेगा

सब सो जायेंगे

लड़कियाँ घूरेंगी अँधेरे में

खटिया पर चित्त लेटी हुई

अम्‍मा की लम्‍बी साँसें सुनती

इन्‍तजार करती हुई

कि अभी वे आकर उनका सिर सहलायेंगी

सो जायेंगी लड़कियाँ

और

सपने में

दौड़ती हुई

बॉल के पीछे

स्‍टिक को साधे हुए हाथों में

पृथ्‍वी के

छोर पर पहुँच जायेंगी

और

‘गोल-गोल' चिल्‍लाती हुई

एक-दूसरे को चूमती हुई

लिपटकर

धरती पर

गिर जायेंगी!

--

(शब्द संगत / रचना समय से साभार)

2 blogger-facebook:

  1. लडकियां घर के बहार रहें और चिंता न हो ऐसा कैसे हो सकता हैं । मगर हम भूल जाते हैं नारी की आजादी दो ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. कत्यायनी जी कविता स्त्री विमर्श को लेकर आ रही है। अपने मन मुताबिक जिना और सपनों को 'गोल' में परवर्तित करना अब महिलाएं सीख चुकी है। अपने भावनाओं को पूरा करना उनका हक है, समय बदल रहा है और सारा महिला जगत् एक निश्चित मुकाम तक पहुंचने की तैयारी में लगा है।

    उत्तर देंहटाएं

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