मंगलवार, 26 मार्च 2013

पद्मा मिश्रा की - कविता -- एक माँ का पत्र - दहेज़ लोभियों के नाम


''मैं भी बिटिया अपने घर की
जिसको सपनों ने सींचा था,
माँ के आंचल में कविता सी ,
मैं स्नेह भरी वर्तिका बनी ,''
पर जब मैं भी माँ कहलाई ,
अपनी बिटिया को सौंपा था,
कुछ सपने -,खुशियाँ- कर्मठता,
जो जीवन का श्रृंगार बनी .
अब बिटिया की बांह गहे ,
कर चुकी विदा उस देहरी पर ,
सौंपा था उस पावन निधि को ,
जीवन साथी संग सुख- पथ पर
अब उसकी काली आँखों में ,
आंसू पाकर मन रोता है ,
मैं माली हूँ उस बगिया की ,
वह सुमन सुरभि क्यों खोता है ?
भर गई दहेजों की झोली
लालच के फंदों में उलझी ,
लुट गईं कामनाएं मन की ,
स्वारथ की आंधी में डोलीं ,
तुम भी बेटी के पिता रहे ,
पर बहू आज क्यों रोती है ?
गाड़ी भर कर दहेज़ लाई ,
खुशियों को आज तरसती है .
तुमको जैसे बेटी प्यारी ,
वह भी बेटी थी लाड भरी ,
अपने आंगन की कली रही,
दुनिया थी वह अनुराग भरी ,
माँ की पीड़ा अभिशापों के ,
उद्गार उन्हें भी देती है ,
जो स्वार्थ भाव से भरे हुए ,
कटुतामय रिश्ते बोते हैं .
जो रही भाल का तिलक उसे ,
देते फांसी के फंदे क्यों ?
जो घर आंगन का मान बनी ,
उससे नफरत के धंधे क्यों ?
फिर क्यों दहेज़ की बेदी पर ,
बेटियां जलाई जाती है ,
मुट्ठी भर सिक्कों की खातिर,
छत से फिंकवाई जाती हैं ?
''मैं उम्र समय की सीमा पर ,
अधखिली कली -कैसे कह दूँ ?
मुझको अपमानित करने का
यह '''मांग पत्र'' कैसे सह लूँ ?''
तुम हत भागी हो दीन -हीन,
तुमने बेटी की ,कदर न की,
वह कुल की वधू -सुहागन?या .
आंसू में डूबी खुशियों की ?
कोमल सपनों को रौंद रौंद ,
तुमने अपने भंडार भरे ,
तुम पतित नराधम आतंकी ,
अब ईश तुम्हारा न्याय करे ,
वह क्यों माने यह ''मांग -पत्र ''
वह बेटी है व्यापार नहीं ,
[जो अठारह में बिक़े नहीं -,
-उसको सोलह में बिकवा दो ]
निर्मम दुनियां में बेटी को ,
क्या जीने का अधिकार नहीं ?
अपने सपनों को सच करने का ,
अधिकार उसे ही चुनने दो ,
कैसी होगी उसकी दुनियां ,
निर्णय उसको ही करने दो .
---एक माँ

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