गुरुवार, 14 मार्च 2013

रचना सिन्हा की कविताएँ - चाहत

चाहत 1

चाहा तुझे टूट कर अपनी जिन्‍दगी से ज्‍यादा

अपने हर जज्‍बात को नीलाम कर दिया

अपने हर एहसास की कीमत लगा दी।

और तू है जिसे आज भी गिला है मुझसे

ना तुझे मेरी आंसुओं की परवाह है

ना मुझे खुशी कि बूंद मिलें इसकी तमन्‍ना

तू खुश रहे हमेशा ये दुआ दिल से दिए जाती हूं,मैं,

हूं तो मोम तेरी जुदाई की आग में पिघल रही हूं,

जाने कब खत्‍म हो जाए नामों निशान मेरा,

पर मत करना फिक्र मर कर भी मेरे दिल में प्‍यार सलामत रहेगा तेरा,

तू तो अपने ख्‍वाबों-ख्‍यालों की दुनिया में खेल रहा है,

और मैं तेरे प्‍यार की भुल-भुलैया में उलझी हूं,

तेरी बाहों में जिन्‍दगी गुजरे चाहा था, खुदा से,

चैन से मर सकूं इस काबिल भी ना छोड़ा तूने,

तेरी हर एक आरजू पूरी हो यही आखिरी चाहत है, मेरी

 

चाहत 2

नाराजगी नहीं है तुझसे कुछ चाहतें रह गई अधूरी,

रहे खुश हमेशा तू यही आखिरी दुआ है मेरी।

मेरी मुहब्‍बत के अफसाने बहुत हैं,

इस टूटे दिल के फसाने बहुत हैं.

वादा था मुहब्‍बत को यादगार बनाने का,

अब तो यादों से नहीं मुहब्‍बत से डर लगता है,

माना तुझसे काई वास्‍ता नहीं मेरा,

पर आज भी तन्‍हाई से डरती हूं,

तेरे साथ मेरी मुस्‍कुराहट भी चली गई है,

पर हंसती हूं, मैं इस दर्द को छुपाने के लिए,

कभी तो इतना टूट जाती हूं, कि जिन्‍दगी बोझ लगने लगता है,

जाने कौन सी घड़ी थी, जो एहसासे मुहब्‍बत ने पनाह ली थी, मेरे दिल में,

चाहे सब मिल जाए तुझे इस जहान में,

ताउम्र तरसेगा तू सच्‍चे मुहब्‍बत के एहसास के लिए।

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