गुरुवार, 14 मार्च 2013

बृजेश नीरज की कविताएँ

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1

जीता जागता इंसान

उकता गया हूं

वही चेहरे देख देख

सुबह शाम

वही सपाट चेहरे

भावहीन

किसी रोबोट की तरह

बस चलायमान

कभी दर्द नहीं छलकता

इनकी आंखों में

कभी कभी

मुंह थोड़ा फैल जाता है

उबासी लेते हुए

कभी कभी लगता है

जैसे मुस्करा रहे हैं

ये न बोलते हैं

न सोचते हैं

बस चलायमान हैं

किसी साफ्टवेयर से संचालित

कभी सोचता हूं

कब तक देखना होगा

इन मशीनी चेहरों को

क्या कभी

कोई सुबह

कोई शाम

कोई किरन

कोई हवा

भर पायेगी इनमें भी

जीवन के अंश

कि अचानक

ठहाके मार के हंस पड़ें

ये

चीख पड़ें

जब चोट लगे इन्हें

कभी तो हो ऐसा

काश

आदमी फिर से बन जाए

एक जीता जागता इंसान!

- बृजेश नीरज

 

2

अटक गया विचार

माथे पर सलवटें;

आसमान पर जैसे

बादल का टुकड़ा थम गया हो;

समुद्र में

लहरें चलते रूक गयीं हों,

कोई ख्याल आकर अटक गया।

धकियाने की कोशिश बेकार,

सिर झटकने से भी

निशान नहीं जाते।

सावन के बादलों की तरह

घुमड़कर अटक जाता है

वहीं

उसी जगह

उसी बिन्दु पर।

काफी वजनी है;

सिर भारी हो चला

आंखें थक गईं,

पलकें बोझल।

सहा नहीं जाता

इस विचार का वजन।

आदत नहीं रही

इतना बोझ उठाने की;

अब तो घर का राशन भी

भार में इतना नहीं होता कि

आदत बनी रहे।

बहुत देर तक अटका रहा;

वह कोई तनख्वाह तो नहीं

झट खतम हो जाए।

अभी भी अटका है वहीं

सिर को भारी करता।

बहुत देर से कुछ नहीं सोचा।

सोचते हैं भी कहां

सोचते तो क्यों अटकता।

इस न सोचने,

न बोलने के कारण ही

अटक गयी है जिंदगी।

तालाब में फेंकी गई पालीथीन की तरह

तैर रहा है विचार

दिमाग में

सोच की अवरूद्ध धारा में मंडराता।

अब मजबूर हूं सोचने को

कैसे बहे धारा अविरल

फिर न अटके

सिर बोझिल करने वाला

कोई विचार।

- बृजेश नीरज

2 blogger-facebook:

  1. ठहाके मार के हंस पड़ें
    ये
    चीख पड़ें
    जब चोट लगे इन्हें
    कभी तो हो ऐसा
    काश
    आदमी फिर से बन जाए
    एक जीता जागता इंसान!
    आगे पढ़ें: रचनाकार: बृजेश नीरज की कविताएँ

    बहुत अच्छी लगी, लगभग ऐसी ही स्थिति है ज्यादातर के साथ ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. मुझे स्थान देने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद!

    उत्तर देंहटाएं

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