मंगलवार, 26 मार्च 2013

विजय शिंदे का आलेख - साहित्य, लेखक और समीक्षक

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साहित्य, लेखक और समिक्षक

डॉ.विजय शिंदे

प्रकृति, समाज और उनमें स्थित प्रत्येक वस्तु लेखक के प्रेरणा स्थल होते हैं। लेखक ना भी कहे लिखने के लिए मजबूर होता है। समय-समय पर उसके मन पटल पर विभिन्न चित्र-कृतियां बनती है और बिगड़ती है। प्रत्येक चीज "मुझ पर कुछ लिखो। मेरा यह दुःख है। देख लो, उस पर कुछ लिखना संभव है या नहीं....।" कहती है, और लेखक लिखने लगता है। दिल भर आया, लिख डाला। लिखते जाता है और लिखते जाता है।

लेखक के आस-पास जो घटनाएं घटित होती है, उसे जो दिखाई देता है और जिसका वह अनुभव करता है वहीं लिखता है। ऐसा भी आरोप होता है कि लेखक काल्पनिक घटनाओं का चित्रण करता है। एकाध व्यक्ति जहर पी कर मर जाती है, उसी का वर्णन लेखक करता है। क्या यह घटना लेखक अनुभव से लिखता है?.... सामान्य लोग, समीक्षक उसे कटघरे में खड़ा करके यही प्रश्न पूछते हैं। बेचारा लेखक इसका उत्तर किस तरह दें। भावुक मन का, चुप बैठता है। इस तरह की टेढी-मेढी चाल चलना, कुटिल राजनीति करना उसकी सोच के बाहर होता है। उसने जहर पीने का अनुभव न भी किया हो, उसकी मृत्यु न भी हुई हो, फिर भी वह उसका वर्णन साहित्य में करता है। ....क्यों? ....क्योंकि उसके पास तीसरी आंख होती है। उसकी सहायता से वह परकाया प्रवेश करता है। लेखक बार-बार मरता है, बार-बार जीवित होता है और बार-बार लिखता है। मरते हुए व्यक्ति को देख कर उसके कलेजे पर खरोंचें उठने लगती हैं। कलेजे में एक टीस-सी पैदा होकर दर्द होने लगता है।

मरने वाले व्यक्ति के चेहरे पर उठने वाली वेदनाएं उसके हृदय में घर करने लगती हैं। बेचैनी बढ़ने लगती हैं। उस व्यक्ति के साथ वह सहवेदना अनुभव करने लगता है। लेखक असल में जीवित होता है फिर भी उस व्यक्ति के साथ मर जाता है.... और जब सामान्य स्थिति में लौटता है तब उसके सामने लिखे हुए कागज हवा के झोंकों पर फड़फडा रहे होते हैं। साहित्य मस्तिष्क या विचारों के बलबूते पर लिखी जाने वाली चीज नहीं है। एकाध व्यक्ति तेज दिमाग वाली है तो वह साहित्य लिख भी सकती है ऐसा है नहीं। वह सिर्फ तेज दिमाग वाली ही होती है। उसके पास साहित्य लेखन के लिए अनुकूल हृदय नामक चीज शायद ही होती है। और जिसके पास हृदय और पेट नहीं है वह लिख नहीं सकता। कई बार ऐसा भी होता है कि व्यक्ति दिमाग वाली भी होती है और लिख भी सकती है। ऐसा क्यों? क्योंकि उसके पास दिमाग के साथ हृदय और पेट भी होता है। साहित्य पेट से हृदय, हृदय से मस्तिष्क, मस्तिष्क से आंखें, आंखों से होंठों, होंठों से उंगलियां, उंगलियों से कलम और कलम से कागज पर उतरने वाली चीज है। लेखक से जो नवनिर्मित होती है उसका उद्गम हृदय और पेट से होता है। और समीक्षक जो लिखता है.... हां लिखता है, विचार करता है वह मस्तिष्क से। उसके लेखन की प्रक्रिया अधूरी होती है। इसीलिए वे कठोर होते हैं और लेखक संवेदनशील।

समीक्षकों की एकांगी मानसिकता लेखक पर हमला बोल देती है- "लेखक ने जिस अपराधी, क्रूर पात्रों का वर्णन किया है, वह कैसे? क्या उन पात्रों का चित्रण करते वक्त लेखक स्वयं अपराधी होता है?" ....बेचारा लेखक! सोचने लगता है। अंदर ही अंदर छटपटाने लगता है। अनजाने में उससे अपराध हो जाते हैं। एकाध व्यक्ति का क्रूरता से खून होता है। एकाध स्त्री पर बलात्कार हो जाता है।.... यह सब कब और कैसे हो गया? उसकी समझ में नहीं आता है। लेकिन उससे हो जाता है। लेखक अपना अपराध कबूल भी करता है। जब वह लिखता है तब उसका अपने-आप पर वश नहीं होता है। पात्र जैसे व्यवहार करते हैं, वैसे ही वह लिखते जाता है। पात्रों से जो अपराध हो जाते हैं वे उसके ही होते हैं, उसे वह ईमानदारी से स्वीकार लेता है। अनेक पात्र उसके मन और हृदय में विकृत हरकतें करते हैं। ....लेकिन पूरी कथा की सहायता से वह जो बताना चाहता है वह शुद्ध और पवित्र होता है। लेखक समाज के सामने एक उदाहरण रखना चाहता है कि ऐसा करने पर ऐसा होता है। अतः वह कृति करें या न करें समाज के प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर है, वह समाज के सामने पवित्र भावना से भली-बुरी चीजें रखता है। उसका हृदय पाक होता है। अपराधी पात्रों के साथ वह अपराधी होता है। लेकिन सबसे अंत में जब लेखक अपना साहित्य लेकर समाज के सामने खड़ा होता है तब निष्पाप, निरपराधी होता है।

डॉ.विजय शिंदे

देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद (महाराष्ट्र)

ई-मेल drvtshinde@gmail.com

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  1. लेखक लिखते समय पहले स्वयम ही जीता है फिर कुछ कहता है .

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    1. बिल्कुल सार्थक कथनी पर समीक्षक उस पर ऐसी छुरी चलाता है मानो कसाई हो। समीक्षक को समीक्षा करते समतुल्य रूप से करनी चाहिए। आपने जैसे कहा वैसे समीक्षक अगर ध्यान रखेंगे तो साहित्यकारों का सच्चे मायने में सम्मान होगा। और भारतीय लेखक सम्मान का ही भूखा होता है पैसों का नहीं। अमरिता जी आप मेरे विचारों से साधर्म रखती है। धन्यवाद।

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  2. लेखक समाज के सामने एक उदाहरण रखना चाहता है कि ऐसा करने पर ऐसा होता है। अतः वह कृति करें या न करें समाज के प्रत्येक व्यक्ति पर निर्भर है, वह समाज के सामने पवित्र भावना से भली-बुरी चीजें रखता है। उसका हृदय पाक होता है। poori tarah se sahmat hoon .......iski wajah se lekhak ko kaiyon ka kopbhajan bhi banna padta hai .......vijay jee ....

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    1. मैं जो स्पष्ट करना चाह रहा था उसे आपने सही तरिके से पकड लिया है। रही बात कोपभाजन की। लेखक कोपभाजन का शिकार तो होता है पर उतना सहन करने की उनमें क्षमता होती है। लिखते वक्त अपना लेखन प्रकाशित होने पर क्या होगा और उस समय अपनी भूमिका क्या रहेगी यह भी लेखक शुरू में सोच लेता है। अगर सोचा नहीं जा रहा है तो सोचना जरूरी है।

      हटाएं

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