गुरुवार, 28 मार्च 2013

चंद्रकांत देवताले की कविता - औरत

चंद्रकांत देवताले

 

औरत


वह औरत
आकाश पृथ्‍वी के बीच
कबसे कपड़े पछीट रही है?

पछीट रही है शताब्‍दियों से
धूप के तार पर सुखा रही है

वह औरत आकाश और धूप और हवा से
वंचित घुप्‍प की गुहा में
कितना आटा गूँथ रही है?
गूँथ रही है टनों आटा
असंख्‍य रोटियाँ
सूरज की पीठ पर पका रही है

एक औरत
दिशाओं के सूप में खेतों को
फटक रही है

एक औरत
वक़्‍त की नदी में
दोपहर के पत्‍थर से
शताब्‍दियाँ हो गयीं
एड़ी घिस रही है

एक औरत अनंत पृथ्‍वी को
अपने स्‍तनों में समेटे
दूध के झरने बहा रही है

एक औरत अपने सिर पर
घास का गठ्‌ठर रखे
कबसे धरती को नापती ही जा रही है

एक औरत अँधेरे में
खर्राटे भरते हुए आदमी के पास
निर्वसन जागती
शताब्‍दियों से सोयी है।

एक औरत का धड़
भीड़ में भटक रहा है
उसके हाथ अपना चेहरा ढूँढ रहे हैं
उसके पाँव
जाने कब से सबसे
अपना पता पूछ रहे हैं।

 

उस औरत का दुःख

कैंसर पीड़ित उस जवान औरत को
लतिया कर ससम्‍मान ज़िलाबदर कर दिया
लफंगों के न्‍याय ने
और न्‍यायमूर्तियों ने भरी सभा में इसे प्रक्रिया कहा

उसकी बूढ़ी माँ का ख़ून जमकर पत्‍थर हो गया
फिर बहता क्‍या सबूत के वास्‍ते
दमाग्रस्‍त बूढ़े बाप ने शाप दिया ईश्‍वर को
कुएँ में फेंक दीं पीतल की मूर्त्तियाँ

महाजनों द्वारा निन्‍दित हुई यह ईश-अवज्ञा
बहुत बहस हुई किन्‍तु किस मुद्‌दे पर
लफंगों के न्‍याय, माँ के पत्‍थर हुए खून
या बूढ़े बाप द्वारा ईश्‍वर को दी गई सज़ा
बहुत बहस हुई पर, किस चीज़ पर
कुछ भी नतीजा नहीं निकला

और ज़िलाबदर उस औरत का दुःख
नेपथ्‍य में पड़ा रहा
किसी टूटे साज़ की तरह

बाई! दरद ले


तेरे पास और नसीब में जो नहीं था
और थे जो पत्‍थर तोड़ने वाले दिन
उस सबके बाद
इस वक़्‍त तेरे बदन में
धरती की हलचल है
घास की ज़मीन पर लेटी,
तू एक भरी-पूरी औरत
आँखों को मींच कर
काया को चट्‌टान क्‍यों बना रही है

बाई! तुझे दरद लेना है
ज़िन्‍दगी-भर पहाड़ ढोए तूने
मुश्‍किल नहीं है तेरे लिए,
दर्द लेना

जल्‍दी कर होश में आ
वरना उसके सिर पर जोर पडे़गा
पता नहीं कितनी देर बाद रोए
या न भी रोए

फटी आँख से मत देख
भूल जा ज़ोर-जबर्दस्‍ती की रात
अँध्‍ोरे के हमले को भूल जा बाई
याद कर खेत और पानी का रिश्‍ता
सब कुछ सहते रहने के बाद भी
कितना दरद लेती है धरती
किस-किस हिस्‍से में कहाँ-कहाँ
तभी तो जनम लेती हैं फसलें
नहीं लेती तो सूख जाती सारी हरियाली
कोयला हो जाते जंगल
पत्‍थर हो जाता कोख तक का पानी

याद मत कर अपने दुःखों को
आने को बेचैन है धरती पर जीव
आकाश पाताल में भी अट नहीं सकता
इतना है औरत जात का दुःख
धरती का सारा पानी भी
धो नहीं सकता

इतने हैं आँसुओं के सूखे धब्‍बे
सीता ने कहा था-फट जा धरती
न जाने कब से चल रही है ये कहानी
फिर भी रुकी नहीं है दुनिया

बाई ! दरद ले
सुन बहते पानी की आवाज़
हाँ ! ऐसे ही देख ऊपर हरी पत्तियाँ
सुन उसके रोने की आवाज़
जो अभी होने को है
ज़िन्‍दा हो जाएगी तेरी देह
झरने लगेगा दूध
दो नन्‍हे होंठों के लिए
बाई ! दरद ले

कोई नहीं उसके साथ


क्‍या दुःख कविता में धुँधला हो जाता है
या कभी-कभी चमकीला भी
जीवन में पछाड़े खाती उस औरत का
तार-तार होता विलाप
पराए शब्‍दों में जाकर क्‍या से क्‍या हो जाएगा
कहना कितना मुश्‍किल है

तहस-नहस कर दी गई उसकी झोपड़ी
चिथड़ों-बरतन भांडों समेत
बेदखल कर दी गई जो विधवा
डरते-कंपते अधनंगे तीनों बच्‍चे खड़े
तकते उसे जैसे वह कोई खौफनाक दृश्‍य

तीसरे जो भी बाँचेंगे
विस्‍थापन की यह हिंसा
दिखाई देगा क्‍या उन्‍हें
ऐसे ही किसी हड़कम्‍प में ध्‍वस्‍त होता हुआ अपना घर
बीसवीं के पटाक्षेप के बाद भी धरती पर
कितनी जगह है खाली बसने-बसाने के लिये
फिर भी पुश्‍तैनी कब्‍जों को छोड़
घास-पात को निशाना बनाता है
हत्‍यारों का अंधा बुलडोजर
बसाने के बदले उजाड़ने की इस क्रूरता को
रचते हुए कितना कुछ टूट रहा है भीतर ही भीतर
और आसपास की दुनिया में कोई फर्क़ नहीं पड़ रहा
कुछ नहीं हुआ जैसे चुप नदी नर्मदा
सुबह और पहाड़ चुप
वैसे ही मुँह बंद लोगों की परछाइयाँ

विपदा के सिवा कोई नहीं है
फिलवक़्‍त उस औरत के साथ
जबकि पूरा देश है चारों तरफ
हजारों शब्‍द हैं आँसू पोंछने
और कमजोरों के साथ खड़े होने के बारे में
पर एक भी शब्‍द उसके साथ
ऐसा कुछ नहीं कर रहा।

--

(शब्द संगत / रचना समय से साभार)

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