मंगलवार, 26 मार्च 2013

दिनेश पालीवाल का आलेख - जीवन एक अंतहीन झूठों का सिलसिला है!

जीवन एक अंतहीन झूठों का सिलसिला है!

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(डॉ दिनेश पालीवाल )

जीवन पर लेखक, कवि, दार्शनिक और धर्मगुरू अपनी-अपनी तरह विचार करते रहते हैं। सामान्‍य आदमी से लेकर बुद्धिजीवी भी विचारते हैं। जहां तक मेरा प्रश्‍न है, मैं कुछ अलग तरह सोचता हूं। मुझे लगता है जीवन अंतहीन झूठों का सिलसिला है। हम हर वक्‍त न केवल दूसरों से झूठ बोलते हैं, बल्‍कि स्‍वयं अपने आप से भी झूठ बोलते हैं। अपने आप को भी धोखा देते रहते हैं। अपनों से ले कर सारे संसार को तो धोखा देते ही हैं, ठगते और छलते ही हैं, अपने आप को भी तमाम तरह की गलतफहमियों में बनाए रखते हैं।

जीवन जीने के लिए निरंतर सही-गलत समझौते करते हैं। दूसरे से झूठ बोलते हैं। दूसरा भी हम से झूठ बोलता रहता है। हम जानते हैं कि वह झूठ बोल रहा है, पर ढोंग करके उसे जताते रहते हैं कि वह सच कह रहा है। मन ही मन हम उस के झूठ पर हंसते रहते हैं और सोचते रहते हैं कि साला हरामी हमें उल्‍लू बना रहा है या उल्‍लू समझ रहा है पर हम हैं नहीं! उसकी हां में हां मिलाते रहते हैं। गलत और झूठी बात को सच मानने का दिखावा उसके सामने करते रहते हैं। कितना छल है हमारे व्‍यवहार में!

हम सब नंगे पैदा होते हैं। बड़े और सभ्‍य होने के दिखावे में वस्‍त्र जरूर पहन लेते हैं पर अपने वस्‍त्रों के बीच भी अपने भीतर की नंगई हम छिपा नहीं पाते। और कोई भले न जाने पर हम तो जानते ही हैं कि हम हर किसी के साथ नंगई करते हैं।

हमारी आत्‍मा में कितना झूठ भरा है, कितना छल, कपट और अनाचार भरा है, हम से ज्‍यादा इसे कौन जानता है? फरेब और धोखा देना हमारी फितरत में है। और जब हम किसी को ठग लेते हैं तो मन ही मन खुश होते हैं कि साले को उल्‍टे उस्‍तरे से मूड़ लिया! किस कदर बनाया कि वह जान भी नहीं पाया और अपना उल्‍लू सीधा कर लिया। जबकि वह जानता है, उसे ठगा जा रहा है पर दिखावे के लिए वह चुप रहता है और अपने आप को ठगा लेता है!

मेरे भीतर हमेशा सच-झूठ, सही-गलत, नैतिक-अनैतिक, उचित-अनुचित का व्‍दंव्‍द चलता रहता है। धर्म-अधर्म, पाप-पुण्‍य का भेदिया संघर्ष चलता रहता है। हमेशा एक कशमकश में मन फंसा रहता है कि उसके साथ जो गलत कर रहा हूं, या जो वह मेरे साथ गलत कर रहा है, उसका नतीजा कौन भुगतेगा? मैं स्‍वयं या वह? या कोई और? और भुगतेगा भी या नहीं? लोगों के गलत व्‍यवहार, झूठे वायदे, फरेबी मंसूबे मुझे बहुत तकलीफ पहुंचाते हैं। असमंजस में डालते हैं कि इसके साथ मैं क्‍या और कैसा व्‍यवहार करूं? अपने आचरण पर जितना सोचता हूं, उससे कम उसके आचरण और कपटपूर्ण व्‍यवहार के बारे में नहीं सोचता। उसके चेहरे की एक-एक शिकन पढ़ने की कोशिश करता हूं और अपने चेहरे पर कोई न कोई फरेबी मुखौटा लगा लेता हूं कि वह मेरे चेहरे की शिकनों से मेरे कपट को न पकड़ पाए! कितने गलत होते हैं हम खुद और कितने गलत होते हैं लोग! गलतियों के बीच कितनी गलत जिंदगी जीते रहते हैं हम सब ताजिंदगी!

धर्म की मोटी-मोटी पोथियां, धर्मगुरुओं की लंबी-चौड़ी उपदेश भरी बातें, नसीहतें, मां-बाप और हमारे अध्‍यापकों की शिक्षाएं, सीखें, दूसरी तरफ हमारे दैनिक और व्‍यावहारिक झूठ, फरेब, छल, कपट, दुराव-छिपाव, दुविधा और संशय, जीवन को कितना जटिल और कठिन बनाते रहते हैं नित्‍यप्रति! क्‍या हम कभी जीवन की इन विडंबनाओं के बारे में सोचते हैं कभी? शायद नहीं

--डॉ दिनेश पालीवाल

३१ जनवरी १९४५ को जनपद इटावा (उ.प्र.) के ग्राम सरसई नावर में जन्मे डॉ
दिनेश पालीवाल जी सेवानिवृत्ति के बाद इटावा में रहकर स्वतंत्र लेखन
कार्य कर रहे हैं। आप गहन मानवीय संवेदना के सुप्रिसिद्ध कथाकार हैं ।
आपकी ५०० से अधिक कहानियां, १५० से अधिक बालकथाएं, उपन्यास, सामाजिक
व्यंग, आलेख आदि प्रितिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित होते रहे हैं।
दुश्मन, दूसरा आदमी , पराए शहर में, भीतर का सच, ढलते सूरज का अँधेरा ,
अखंडित इन्द्रधनुष, गूंगे हाशिए, तोताचश्म, बिजूखा, कुछ बेमतलब लोग,
बूढ़े वृक्ष का दर्द, यह भी सच है, दुनिया की सबसे खूबसूरत लड़की, रुका
हुआ फैसला, एक अच्छी सी लड़की(सभी कहानी संग्रह) और जो हो रहा है, पत्थर
प्रश्नों के बीच, सबसे खतरनाक आदमी, वे हम और वह, कमीना, हीरोइन की खोज,
उसके साथ सफ़र, एक ख़त एक कहानी, बिखरा हुआ घोंसला (सभी उपन्यास) अभी तक
आपकी प्रकाशित कृतियाँ हैं। आपको कई सम्मानों से अलंकृत किया जा चुका है।
संपर्क: राधाकृष्ण भवन, चौगुर्जी, इटावा (उ.प्र.)। संपर्कभाष:
०९४११२३८५५५। ई-मेल: paliwaldc@gmail.com

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