डॉक्टरचंद जैन "अंकुर" की कविता - भावांजलि

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"अंकुर" की भावांजलि
कविता के हर शब्दों में रहता मेरा कवि मन
जीवन के हर छन्दों में नृत्य करे मेरी कविता
हल से धरती के सीने पर
अंकुर का गीत लिखे मेरी कविता
मिट्टी की खुशबू लिखते है गीत ग्राम में ,खलिहानों तक
मेहनतकश मजदूरों के हाथों से
करघों के गति-रथ पर चढ़कर
जब धरती का रज कण उड़ता है

 
पवन संग अम्बर के तल पर
मोहन की बंशी भी मीठा तान भरे
प्रकृति के हर कोनों पर
सूरज की रक्तिम आभा भी रंग भरे
अम्बर के मस्तक पर
शब्दों के वस्त्रों को ओढ़े
भावों में जीता है कवि -मन
वीरों के रक्त आज भी लिखते हैं
देशप्रेम की गीत भूमि पर
हिमगिरी की चोटी पर
संगीनों संग नृत्य करे मेरी कविता


कवि तो जीता है
मानवता के अंकुर में छिपकर
रणचंडी माँ काली सा 
विकराल रूप है मेरी कविता
रक्तबीज का  दंभ- मृत्यु है
दानवता का संहारक है
कवि का मन करता है लेsssss प
मृत्यु पर मस्ती में शिव चन्दन का (भस्म)
जीवन -मृत्यु तो इक सरिता है
पर हर पल कवि ही जीता है
माँ कवि -धारा रहे अमर
श्रद्धा से" अंकुर "भावांजलि देता है


डॉक्टरचंद जैन "अंकुर" (रायपुर, छत्तीसगढ़ )

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1 टिप्पणी "डॉक्टरचंद जैन "अंकुर" की कविता - भावांजलि"

  1. आपकी यह बेहतरीन रचना बुधवार 20/03/2013 को http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जाएगी. कृपया अवलोकन करे एवं आपके सुझावों को अंकित करें, लिंक में आपका स्वागत है . धन्यवाद!

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