रंग बरसे : संजय वर्मा "दृष्टि" की होली कविताएँ

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रंग के पर्व होली पर रचनाकार पर भी रंग का बुखार चढ़ गया है. यह पूरा सप्ताह होलियाना मूड की रचनाओं से रंगीन बना रहेगा. आप सभी  अपनी रंगीन रचनाओं के साथ इस रंग पर्व में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित हैं.

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फागुन

पहाडों पर टेसू ने रंग बिखेरे फागुन में 

हर कदम पर बज  रहे  ढोल फागुन में

ढोल की थाप पे थिरकते पैर फागुन में

महुआ लगे झूमने गीत सुनाये फागुन में

बिन पानी खिल जाते टेसू फागुन में 

पानी संग मिल रंग लाते टेसू फागुन में 

रंगों के खेल हो जाते शुरू  फागुन में 

दुश्मनी छोड़ दोस्ती के मेल होते फागुन में 

शरमाते जाते है सब मौसम फागुन में 

मांग ले जाते प्रेमी कुछ प्यार फागुन में 

हर चेहरे पर आ जाती खुशहाली फागुन में 

भगोरिया के नृत्य लुभा जाते फागुन में 

बांसुरी ,घुंघरू के संग गीत सुनती फागुन में 

ताड़ों के पेड़ों से बन जाते रिश्ते फागुन में 

शकर के हर-कंगन बन जाते मेहमां फागुन में 

पहाड़ों की सचाई हमसे होती रूबरू फागुन में 

 

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टेसू

खिले टेसू 

ऐसे लगते मानों 

खेल रहे हो पहाड़ों से होली । 

सुबह का सूरज 

गोरी के गाल 

जैसे बता रहे हो 

खेली है हमने भी होली 

संग टेसू के । 

प्रकृति के रंगों की छटा

जो मौसम से अपने आप 

आ जाती है धरती पर 

फीके हो जाते है हमारे 

निर्मित कृत्रिम रंग । 

डर  लगने लगता है 

कोई काट न ले वृक्षों को

ढंक न ले प्रदूषण सूरज को । 

उपाय ऐसा सोचे 

प्रकृति के संग हम 

खेल सके होली । 

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बात नहीं होती

रंगों की कोई जात नहीं होती 

भाई-चारे के देश में दुश्मनी की बात नहीं होती 

ये खेल है प्रेम की होली का

मिलकर रहते इसलिए टकराव की बात नहीं होती

रंगे चेहरों से दर्पण की बात नहीं होती 

वृक्ष भी रंगे टेसू से मगर पहाड़ों से बात नहीं होती 

ये खेल है प्रेम की होली का 

बिना रंगे तो प्रकृति भी खास नहीं होती 

पानी न गिरे तो नदियाँ खास नहीं होती 

सूरज बिना इन्द्रधनुष की औकात नहीं होती 

ये खेल है प्रेम की होली का 

फुल न खिले तो खुशबुओं की बात नहीं होती 

सोये बिना सपनों की बात नहीं होती 

दिल मिले बिना प्रेम में उजास नहीं होती 

ये खेल है प्रेम की होली का 

साथी न हो तो सजने की बात नहीं होती 

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संजय वर्मा "दृष्टि "

1 २ ३ , शहीद भगत सिंग मार्ग 

मनावर जिला -धार (म. प्र. )    

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