गुरुवार, 21 मार्च 2013

रंग बरसे - विजय वर्मा की होलिआना कविता

रंग के पर्व होली पर रचनाकार पर भी रंग का बुखार चढ़ गया है. यह पूरा सप्ताह होलियाना मूड की रचनाओं से रंगीन बना रहेगा. आप सभी  अपनी रंगीन रचनाओं के साथ इस रंग पर्व में शामिल होने के लिए सादर आमंत्रित हैं.

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होलिआना  कविता

     [मेले में चार दोस्त]

  मेले में भाग्य-मशीन देखकर

  आ गया उन सबको बहुत जोश,

  सिक्का डाला ,टिकट निकाला

  जैसे ही पढ़ा तो उड गए होश.

         [ 1  ]

  तुम्हारी आँखों को बे-वजह

  झपकने का बुरा रोग है,

  मार्किट में किसी बाला  से

  पीट  जाने का अदभूत योग .

बचाव ;बीवी के हाथों बेलन का

           नित्य पारण किया करो .

           जब घर से निकलो तो एक 

           काला बुर्का धारण किया करो.

        [ 2  ]     

         तेरे दिन-दिन बढती रईसी से 

         तेरे सारे पडोशी कुढ़ रहे है.

         जिस-जिस से लिया था क़र्ज़

         स्साले! सब तुझको ढूंढ रहे है.

सुझाव ;लेते हो हरदम क़र्ज़ तो

        शराफ़त से चुकता किया करो,

        नहीं तो गाली जूते खाकर

        पापों को भुगता किया करो.  

       [3  ]

      शहर से बाहर जाने की अभी

      करो मत तुम तैयारी .

     गाय-बकरी की हो गयी गणना

      अब बस गधों की है बारी .

विशेष ;बैशाखनंदन बनकर कबतक

             मन ही मन रहोगे खुश .

           तुझ जैसों के कारण ही तो

           अब महँगे हुए  घास औ फूस .

           [ 4 ]

           अपनी चालाकी पर तुम

           इतना भी मत बौडाओ 

           प्रतिदिन छत पर जाकर

            नज़रे मत  इधरउधर दौड़ाओ .

चेतावनी ;मोहल्ले की साड़ी ललनाओं पर

               क्या तेरा हक़ हो गया है ?

               अरे मरदूद !जालिम सिंह को

               तुझ पर बहुत शक हो गया है.
--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

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