मंगलवार, 12 मार्च 2013

सुनील जाधव की कविता - एक बूढ़ा आदमी ...

एक बूढ़ा आदमी ...

एक बूढ़ा आदमी

सड़क किनारे

रात में मध्यम रौशनी

के नीचे बैठा था

एक हाथ जमीन पर टेक

फटे वस्त्रों से लेस

गर्दन नीची कर

जोर-जोर से भूखे पेट

भीतर तक खास था |

खांसी से लड़खड़ाता वह

कभी नीचे तो कभी ऊपर

करके गर्दन

लाचार –मजबूर विवश चेहरे से

हाथ फैला कर

आशा भरी नजरों से

हर आने जानेवाले को देख

निशब्द

भीख मांग रहा था |

लोग अपने कार्यों में मग्न

कभी उसे देख तो

कभी अनदेख

मंजिल की और चले जा रहे थे

कोई दयावान उसके

फैली हुई हथेली पर

रुपये का एक सिक्का

रख अपने आप को

धन्य मान रहे थे |

सब्जीवाला सब्जी बेच रहा था

गाड़िया सड़कों पे दौड़ रही थी

सड़क वही थी

सड़क का किनारा भी वही था

खांसने वाला वह

भूखा बूढ़ा

मैले कुचैले

फटे वस्त्रों से लेस

वह आदमी भी वही था |

--

अल्प परिचय -

सुनील जाधव ,नांदेड [महाराष्ट्र ]

रचनाएँ :- मैं बंजारा हूँ [कविता] ,मैं भी इन्सान हूँ [कहानी ],भ्रूण [एकांकी],सच का एक टुकड़ा [ अनुवादित नाटक ] ,रौशनी की और बढ़ते कदम [कविता ]

एक पल [कविता] ,हिंदी साहित्य विविध आयाम [शोध ] ,नागार्जुन के काव्य में व्यंग्य [शोध],आदि 

विदेश यात्रा :- ताशकंद ,यू.ए.इ....

लेखन :- कविता ,कहानी ,एकांकी ,अनुवाद ,समीक्षा ,शोध ,सम्पादकीय  आदि

3 blogger-facebook:

  1. आदरनीय रविशंकर जी नमस्ते ,

    मेरी रचना को रचनाकार के योग्य समझा , के लिए शुक्रिया ..|

    उत्तर देंहटाएं
  2. भाई सुनील जाधव ने एक मराठी भाषीहोते हुएभी बहुत सरल शब्दों में कविता की है भूखा बुडामैले कुचले वस्त्र एक वास्तविक चित्र उत्तम रचना के लिए साधू वाद

    उत्तर देंहटाएं
  3. प्रोत्साहन के लिए शुक्रिया रामू जी ..

    उत्तर देंहटाएं

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