रंग बरसे : गिरिराज भंडारी की अपनी तो होली हो ली

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अपनी तो होली हो ली
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महंगी मिठाई,महँगा है रंग 
है पिचकारी संग- संग
महंगी है भांग की गोली
अपनी तो होली हो ली

पानी की भी किल्लत है
केवल गुलाल में ज़िल्लत है
सब  आँखें रोना रो ली
अपनी तो होली हो ली

कुछ घटक दलों की टक्कर में 
हाथी-सायकल के चक्कर में
सरकार हमें है भूली
अपनी तो होली हो ली

सिर जनता सौ-सौ बार धुनें 
अब कौन पुकारे कौन सुने
मुंह से छीन गई बोली
अपनी तो होली हो ली

हैं नौकरियों में  मित्र  दूर
कुछ हम हैं,तो वो भी मजबूर 
हम खोज रहे हमजोली
अपनी तो होली हो ली

        गिरिराज भंडारी ,
       1  A /सड़क 3 5/सेक्टर 4 , भिलाई  

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3 टिप्पणियाँ "रंग बरसे : गिरिराज भंडारी की अपनी तो होली हो ली"

  1. सुंदर अभिव्यक्ति है , वर्तमान समस्याओं का कविता पर रंग चढ़ा हुआ है, यही तो युग की सही अभिव्यक्ति है !!!! । इसी रंग ने होली के रंग को भंग कर दिया है ।
    डॉ . मोहसिन ख़ान
    अलीबाग (महाराष्ट्र)

    उत्तर देंहटाएं
  2. बस होली तो होली हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  3. मोह्सिन भाई और सावन भाई आपको कविता आई, आपको हौसला अफ्ज़ाई के लिये शुक्रिया ।

    उत्तर देंहटाएं

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