संजय वर्मा दृष्टि की मालवी कविताएँ

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बेटी की पाती


माय मके ,
मती ब्याजों वां
जां से वार -तेवार पे
तमारा पास अई नी सकूँ |
      *
मती ब्याजों वां
जां घरवालों निकम्मों
ने दारू-कुट्टियो हो
      *
मती ब्याजों वां
जां दायजा का लालची
लोग होण रेवे
     *
मती ब्याजों वां
जां बऊ होण के मारे-कुटे
ने घणो दुःख दे
     *
मती ब्याजों वां
जां रोऊँ तो दुखड़ा का आंसू
कोई बी नी पोंछे
      *
मती ब्याजों वां
जां बेटी की तरे बऊ के
लाड नी करे
      *
मती ब्याजों वां
जां रिश्तेदार कोई
दूर तक नी रेवे
       *
मती ब्याजों वां
जां म्हारी सरीकी भणी थकी
की कदर नी होवे
       *
मती ब्याजों वां
जां से माय -बाप होण की
पूछ कदर नी होवे
       *
मती ब्याजों वां
जां पे आखा घर को काम
म्हारे एकली पे ज थोपे
       * 
मती ब्याजों वां
जां पे खुशिया होण पे
घणी रोक लगावे
        *
मती ब्याजों वां
जां का मनक होण
भ्रूण -हत्या करे
       *

वृक्ष की तटस्थता

हे  ईश्वर

मुझे अगले जन्म में

वृक्ष बनाना

ताकि लोगों को

औषधियाँ ,फल -फूल

और जीने की प्राणवायु दे सकूँ ।

जब भी वृक्षों को देखता हूँ

मुझे जलन सी होने लगती है

क्योकि इंसानों में तो

अनैतिकता घुसपैठ कर गई है ।

इन्सान -इन्सान को

वहशी होकर काटने लगा है

वह वृक्षों पर भी स्वार्थ के

हाथ आजमाने लगा है ।

ईश्वर ने

तुम्हें पूजे जाने का आशीर्वाद दिया

बूढ़े होने पर तुम

इंसानों को चिताओं पर

गोदी में ले लेते हो

शायद ये तुम्हारा कर्तव्य है ।

इंसान चाहे जितने हरे

वृक्ष -परिवार उजाड़े

किंतु तुम सदैव इंसानों को कुछ

देते ही हो ।

ऐसा ही दानवीर

मैं अगले जन्म में बनना चाहता हूँ

उब चुका हूँ

धूर्त इंसानों के बीच

स्वार्थी बहुरूपिये रूप से

लेकिन वृक्ष तुम तो आज भी तटस्थ हो

प्राणियों की सेवा करने में ।

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बिटिया बचाओ

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छोरा का लालच में बेटी के मति मारों |

बेटियाँ तो होवे है समाज को सच्चो सहारों ||

भ्रूण -हत्या करनोतो जघन्य अपराध होवे |

इकी सजा मिले तो मनक जदी घणो रोवें ||

अपन सब मिलके बेटी  होण के बचावंगा |

समाज में रिश्ता होण को सुख पावंगा ||

कन्यादान योजना में मिलेगो अब मकान|

या खुश खबरी सुनी के मनक हुयो हेरान ||

बेटी बिना रिश्तों जोडवा सारु घणा तरसांगा |

छोरा होण के ली के ब्याव सारु दर-दर भट्कांगा ||

बिटियाँ बचावा सारु सबके या बात समझाओं |

भ्रूण -हत्या करनो पाप है यो सन्देश फैलाओ ||

 

( उड़ती अफवाहें )

अफवाहें भी उड़ती/उड़ाई जाती हैं

जैसे जुगनुओं ने मिलकर

जंगल में आग लगाई

तो कोई उठे कोहरे को

उठी आग का धुंआ बता रहा |

तरुणा लिए शाखों पर उग रहे

आमों के बोरों के बीच

छुप कर बैठी कोयल

जैसे पुकार कर कह रही हो

बुझा लो उड़ती अफ़वाहों की आग

मेरी मिठास सी कुहू -कुहू पर ना जाओ

ध्यान दो उडती अफ़वाहों पर
लगा दो मिलकर अफ़वाहों पर अंकुश |
सच तो ये है की अफ़वाहों से

उम्मीदों के दीये नहीं जला करते

बल्कि उम्मीदों पर पानी फिर जाता है

बे वजह उड़ाई जा रही अफ़वाहों से

अब ख्व्वाबों मे भी नहीं डरेगी दुनिया |
क्योंकि अफ़वाहों की उम्र नहीं होती

भले ही चाहे वो ख्व्वाब में बनी रहे

इसलिए ख्व्वाब कभी अफवाह नहीं बनते

और यदि ऐसा होता तो अफवाहें

मंदिर.मस्जिद ,गुरूद्वारे ,गिरजाघर से

अपनी जिन्दगी की भीख

भला क्यों मांगती ?

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संजय वर्मा "दृष्टि"

१२५,शहीद भगत सिंग मार्ग

मनावर (धार)

454446

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2 टिप्पणियाँ "संजय वर्मा दृष्टि की मालवी कविताएँ"

  1. बेटी का मा से निवेदन व्यक्त करता है आज समाज में बहुवोपर होने वाले अत्याचारों को बहुवो पर अत्याचार करने वालो को बहु और बेटी दोनों ही नहीं मिलेगी

    उत्तर देंहटाएं
  2. shri ramuji namaskar ye hi sach hai ki bhavishya me bahu-beti ki kami hogi yadi atyachar/
    bhrun hatya par roak nahi lgai to

    उत्तर देंहटाएं

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