मोतीलाल की कविता - चाह

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खोजता फिरता हूँ मैं यहाँ
शाम का सौन्दर्यपन
सुबह का ओस भींगा सवेरा ।

नहीं मिलती मुझे यहाँ
पीपल की छाँव
जीवन दायिनी स्वच्छंद हवा
न सरसों के पीले फूलों से अटा खेत
न चरवाहे की सुरीली तान
न बजती ही है
बैलों के गले में बंधी घंटियाँ ।

गायब हो गयी है यहाँ
पनघट की पनीहारनियाँ
आंगन के तुलसी में जल ढालती माँ
और गाय का रंभाना ।

तलाशने पर भी नहीं मिलते यहाँ
पड़ोसियों के रिश्ते के सुख
व अखाड़े की मधुर शाम ।

सबकुछ टूट गये हैं
यहाँ इस शहर में
और धकेला जाता हूँ बार-बार
कंक्रीट के इस जंगल में ।


* मोतीलाल/राउरकेला
* 9931346271

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1 टिप्पणी "मोतीलाल की कविता - चाह"

  1. बेनामी8:44 pm

    हर जगह का अपना एक अलग रंग है, अलग प्रकृति

    उत्तर देंहटाएं

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