रविवार, 24 मार्च 2013

अलका गुप्ता की कविता - लाड़ली मेरी!

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आ....अंग लग जा ओ लाड़ली मेरी !

अंतहीन दर्द जो मैं जिए जा रही हूँ |

देवियाँ पत्थरों  की पूजी जाती हैं जहाँ |

गर्त में पड़ी जी रही अब तक वहाँ |

स्वार्थ की दुनियाँ ये धकिया रही है |

आनंद नहीं दुनियाँ को तेरी आमद का बेटी !

क्यूँ व्यर्थ अकिंचन को यहाँ मैं ला रही हूँ |

अंगुलियाँ घोटती गर्दन तेरी ....नजर आ रही हैं |

थामना ना अंचल को...... ओ अंगजा मेरी !

आँख भर देख लेती ....बस एक बार .....

हा !!! दुनिया मगर अंकुश लगा रही है |

आ.... अंग लग जा ओ लाड़ली मेरी !

------------अलका गुप्ता -------------- 

w/o श्री अनिल गुप्ता
166 - A & B ,आनंदपुरी ,
     - मेरठ सिटी -  (up)

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