रविवार, 10 मार्च 2013

देवेन्द्र पाठक महरूम की ग़ज़ल

बारूद की सड़क है या क़हर की नदी है.

इंसानियत का मरघट ये बीसवीँ सदी है.

 

हर सिम्त ख़ूँ- खराबा, वहशत, दगा- दलाली;

दहशत ओ बेबसी से हर ज़ां लदी फदी है.

 

ख़ुदगर्ज़ ओहदे हैँ गुमराह है अगुआई;

अंजाम नेक़ियोँ का मिलता यहाँ बदी है.

 

शक़-शुब्हा,बदख़याली, आलम-ए-बदख़याली;

जीना है कमयक़ीँ अब मरने की ही जल्दी है.

 

वो पेड़ उखड़ने को 'महरूम' तयशुदा है;

अपनी जड़ेँ ज़मीँ से जिसने भी छोड दी है.

2 blogger-facebook:

  1. वो पेड़ उखड़ने को 'महरूम' तयशुदा है;

    अपनी जड़ेँ ज़मीँ से जिसने भी छोड दी है.

    आगे पढ़ें: रचनाकार: देवेन्द्र पाठक महरूम की ग़ज़ल http://www.rachanakar.org/2013/03/blog-post_9677.html#ixzz2NAFIncPL
    bahut khub

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  2. पूरी की पूरी गज़ल लाजवाब है, क्या कहने !!

    उत्तर देंहटाएं

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