कामिनी कामायनी की कविता - उदास बरगद

उदास बरगद ।

आज फिर उदास था बरगद ,/

झुकी हुई थी डालियाँ ,/

कुम्हलाए से पत्ते /,

चाहता था कुछ दर्द बांटना ।

देखे थे उसने भी ,/

न जाने कितने वसंत ,/

कुछ याद नहीं /,

मगर पतझड़ के बाद ही तो ,

आया था ख्वाबों को ,

हकीकत के करीब लाने के लिए ,

उजड़े चमन को सजाने ,नए तरीके से ,

हर बार ,दबे पाव /

,सहलाने कितनों के घाव /

पेड़ यह जानता था ,

इसलिए /

जब जब जीर्ण शीर्ण होकर /

पत्थरों से /पालों से /

आहत होकर झरते थे उसके प्राण /

उसकी खुशियाँ /

उसकी हंसी /

हो जाता था गुमसुम वह /

कुछ महीनों के लिए /

जानता था फिर से आएंगे बहारों के साथ /

इसलिए तो /ठूंठ बन कर भी /जीवित रहकर /

जोहता था अनंग का बाट/

वह भी तो जी नहीं सकता था बिना उसके /

मचल उठता था वह भी /

झूलने /उसकी बाहों में /

वह प्रतीक्षा रत आँखें /

हरी भरी होकर /क्षणमात्र में/

युग युग के लिए परितृप्त /

निहारकर /निहाल हो उठती थी वसंत को ।

मगर /

इसबार /

बहुत देर से आया है ऋतुराज /

इसलिए बहुत उदास है वह /

और खामोश भी /

डरता है /

बेचैन मौसम /

कहीं लूट न ले मदनोत्सव । .

2 नारी ।

पथराई हुई आंखें /

दरवाजे से बाहर /

सड़क को उदास देखकर /

अब कोई सवाल नहीं पूछती ।

खामोश है दोनों /

सड़क और आँखें /

सिमटती जा रही है एक दूसरे में/

सड़क में आँखें /आँखों में सड़क /

सड़कों को क्या पता /

हिरनियाँ वहाँ से कब /निर्भय /

कुलांचे भरती /हंसती हुई जाएंगी /

आँखों को भी खबर कहाँ है /

कि बाहर गए हुए की/चिंता छोड़ /

वापस कब /अपने कामों मे/

वह लग जाएंगी ।

3 बेरंग

ये क्या कर दिया तुमने /

हर एक के /अस्तित्व /निखारने के लिए /

सारे के सारे रंग को /

एक दूसरे से अलग /

निकालकर /बर्बाद कर दी /

उनकी इंद्रधनुषी /सतरंगी दुनिया ।

4 कोलाहल ।

ये अजीब सा शोर /आज फिर /

आसमान में /भरने लगा है /

सुबह से ही /हवाएँ कुछ बोझिल सी हो चली हैं /

ठिठकती /रुक रुक कर बढ़ती हैं आगे /

लगाए पत्तों में कान /

जानने को वह भी बेकरार /कि आखिर /

कौन सी क्रांति आने वाली है यहाँ /

चारों ओर उमड़ रही है भीड़ /

हाथ में झंडे हैं सबके /

मगर /गर्दन के ऊपर /

सिर नदारत ।

5 तरक्की ।

उसने हवा महल बनाकर कहा/

देखो ,हमने कितनी तरक्की कर ली है /

धरती भी भला कोई रहने की जगह है /

हम तो इसके ऊपर /चाँद तारों के कुछ करीब रहेंगे /

वो हमारे हेलिकॉप्टर /वो /उड़न तश्तरी /

इस विस्तृत ब्रांहांड में /

निर्विरोध /घूमेंगे ।

वहाँ हम /उपजाएंगे क्या ?और /

कहाँ पैर टिकाएंगे/

मेरे सवाल पर /आंखे बंद कर /

अपने हवा महल पर /

मारी थी मुट्ठी उसने /

और देर तक /

मिट्टी को /

पैरों तले रौंदता रहा था ।

6 ओ मेरे ,,,।

उसने उस पर /

मुट्ठी भर के मिट्टी फेंके /

बंद कर गया था दरवाजा /

बाहर की गली का /

गुमसुम बैठे टौमी की/

रोटी वाली कटोरी भी फेंक दी /

न जाने कहाँ खो दिया था बौल/

टेबल घड़ी टुकड़ों में नीचे फैली थी /

सुना रही थी जब वो कहानी /

झकझोर सी गई /

मुझे भी बच्चों का /

वह मासूम बचपन ।

कामिनी कामायनी ।

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4 टिप्पणियाँ "कामिनी कामायनी की कविता - उदास बरगद"

  1. कितना असमंजस में है आज का महुष्य. उसे एक तरफ अतीत के सुखद दिन की यादें सताती हैं और दूसरी तरफ भविष्य की आकांक्षाएँ आशंकित करती हैं कि जाने क्या होगा. दिन फिरेंगे या नहीं. वर्तमान तो उसकी मुट्ठी में टिकता ही नहीं न वह उसकी बहुत फिक्र करता है.

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  2. बहुत बहुत धन्यवाद ...सारी कवितायेँ सुन्दर

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    1. बेनामी1:18 pm

      धन्यवाद शारदा जी
      कामिनी

      हटाएं
  3. बेनामी3:44 pm

    अपना बहुमूल्य विचार देने के लिए कोटिश; धन्यवाद
    कामिनी

    उत्तर देंहटाएं

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