रविवार, 24 मार्च 2013

राकेश भ्रमर की कविता - अम्मा क्यों रोई?

कविता

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अम्मा क्यों रोई?

राकेश भ्रमर

घर के हर कोने में अम्मा

डोला करती हैं,

शहर गया है बेटा जबसे

रोया करती हैं,

बहू मायके गई, लौटी

आंगन सूना है,

घर खाली है, पेड़ चिड़िया

मन भी सूना है,

पिता बहुत पहले गुजरे थे

दिन भी याद नहीं,

किन्तु पितृ पक्ष आते ही

अम्मा रोया करती हैं!

पिछले बरस अकाल पड़ा था

अब की फसल बही,

बहुत पुराना छप्पर टूटा

छत की आस नहीं,

खाली पेट गाय बैठी है

पागुर भूल गयी,

अम्मा उसको गले लगाकर

रोया करती हैं।

बेटे की पाती आई है

अपने हाल लिखे,

काम अभी तक नहीं मिला है

दिन बेआस दिखे

आगे लिखा, अम्मा रोना

मिल जाएगा काम,

फिर भी अम्मा गुमसुम बैठी

रोया करती हैं।

कमर झुक गई अम्मा की अब

झाडू कौन करे,

बहू अभी तक आई

पानी कौन भरे,

सुख-दु: की बातें गइया से

अम्मा कहती हैं,

बेटा-बहू पता कब आएं

सोचा करती हैं।

बिना नींद के अम्मा कैसे

सोया करती हैं।

--

राकेश भ्रमर

ई-15, प्रगति विहार हास्टल

लोधी रोड, नई दिल्ली-110003

मोबाइल- 9968020930

1 blogger-facebook:

  1. एक माँ के दर्द को भी चलों शब्द मिल गए ।

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