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April 2013
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ओस बनूँगा

तांक झांक कर रही दुपहरिया

अल्हड़ हो गई सारी अमियाँ

गुलमोहर से कुमकुम बरसे

सजी सेज पर सजनी हरसे

छांव नीम की ठंडी ठंडी

मदहोशी में आंखे मूँदी

मटके से अमृत ले पीया

तर हो आया रोआं रोआं

आँगन में तसला भर पानी

रोज़ नहाती चिड़िया रानी

दादी कैसे रोज़ दिखाती

बबुआ देख, गिलहरी प्यारी

धन्य भाग , रामजी की दुलारी

अम्माँ की लोरी में

सपनों की डोरी से

बंधा हुआ था गाँव

इस मिट्टी में सने सने ही

बूढ़े हो गए पाँव

मैं इनमें था कहीं न खोया

जीवन के लंबे धागे में

एक एक कर इन्हें पिरोया

नहीं मिटूँगा इनमें मिलकर

इनमें मिलकर जी जाऊंगा

हवा बनूँगा ,ओस बनूँगा

सौंधी मिट्टी ,दूब बनूँगा

अमराई का बौर बनूँगा

अमलतास का फूल बनूँगा

यहीं रहूँगा आसपास मैं

इनमें खोजो तभी दिखूँगा

तभी दिखूँगा ।

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मेरे कॉलेज की वह लंबी लड़की

जिसे मैंने गूंगा प्रेम किया था

वेलेंटाइन पर कभी फूल नहीं दिया था

मेरे एकतरफा प्रेम की उसे

भनक पड़ गई थी

एक दिन वह तैश में आकार बोली थी देखो तुम्हारा मुझे प्यार करना एकदम गलत है

मेरी सगाई हो गई है

मैंने हँसकर उसी की तर्ज़ पर कहा

देखो प्यार अपने आप में कभी गलत नहीं होता

बस वक़्त की तराज़ू पर उन्नीस बीस हो जाता है

और फिर मैं कौन तुम्हें परेशान करूंगा

तुम रहो तुम्हारी दुनिया में

मैं कौन बीच में आऊँगा

उसका तैश कुछ कम हुआ था

होठों पर हंसी का गुलाब खिल गया था

हल्की सी डपट देकर चली गई थी वो

आज बरसों बाद कभी उसकी याद आती है

भूले से कहीं दिख जाए ये तमन्ना जाग जाती है

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मन्नत

नारद बोले प्रभु से

वह औरत कल से निर्जल है ,निराहार है

कहती है उसका बेटा इम्तहान मेन निकल जाए

तो तुलसी की माला चढ़ाएगी

जेठ की दुपरिया मेन नंगे पाँव मंदिर आएगी

प्रभु बोले अरे ,ये औरत कुछ दिन पहले बोली थी

बेटी का पहला जापा है ,सब ठीक कर देना

बेटी का आँचल दूध से भर देना

बच्चे के नामकरण पे तेरे नाम के

घुघरे बटवाऊंगी

सवा पाव पेड़े पहले तुझे ही खिलाऊंगी

नारद बोले स्वामी इसकी तो मन्नत खत्म ही नहीं होती

एक पूरी हुई कि दूसरी मांग लेती है

प्रभु बोले जो खुद के लिए कुछ नहीं मांगती

ममता कि मूरत बस ऐसी ही होती है

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बचपन नानी का

एक थी नानी बड़ी अनमनी नाती पोते व्यस्त बहुत है

सुनता कौन कहानी

याद आ गया फिर नानी को उसका अपना बचपन

भोली आँखों का जादू था भोला भाला था मन

कैसे सावन के माहों में आसमान तकते थे

रुई धुनकनेवाला ऊपर रहता है कहते थे

आँधी देख सहमकर कहते डायन झाड़ू झाड रही है

ऊपर गड़गड़ सुनकर कहते बुढ़िया चक्की चला रही है

साँझ पड़े नानी को घेरे सुनते नई कहानी

उसमें कैसे साँप फेंकती थी वह जादूगरनी

कैसे हँसती राजकुमारी कैसे रोती रानी

कैसे परियाँ रात को आकार माथा सहला जाती

छड़ी घुमाकर पलभर में यूं गायब हो जाती

कभी कहानी सुनते सुनते मुंह में परमल बजता

कभी कभी गुड़ की ड्ल्ली से मीठा रस भी घुलता

कभी बेर और इमली खाकर दाँत बांवले हो जाते

कभी हांथ में मोहन भैया ढेर आंवले दे जाते

साँझ समय मंदिर में जाकर घंटी रोज़ बजाते

चार चिरोंजी के दानों में दुनिया ही पा जाते

नानी ने देखा नन्हों को वे तो थके हुए थे

कांधे पर बस्ते को लादे कैसे झुके हुए थे

आँखों से वे बूढ़ा गए थे

भोलेपन को गाड़ गए थे

कैसी चक्की कैसी बुढ़िया

कैसे बादल कैसी परियाँ

बोले वक़्त नहीं है नानी

आज टेस्ट है कंप्यूटर की डांट नहीं है खानी

 

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समर्पित मन

अव्यक्त और अशरीरी प्रेम ! मैं नहीं जानता

मैं तो अपने प्रेम को व्यक्त करना चाहता हूँ

तुम्हारी आँखों में डूबकर ,तुम्हारे कांधे से टिककर

हांथों में हांथ देकर ,तुम्हारे बाजुओं से सटकर

तुम्हारे होंठो को छूकर ,तुम्हें बांहों में लेकर

तुम्हारे प्यार की बारिश में भीगना चाहता हूँ

जब जब मै तुमसे ऐसा प्रेम करता हूँ

तब तब शिख से नख तक समर्पित मन बन जाता हूँ

शायद तब मैं अशरीरी हो जाता हूँ

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ढाई अक्षर

वो कहता है मुझसे ‘ तुम्हें बहुत चाहता हूँ

लेकिन तुम मेरी चाहत को

ऊन के गोलों सी उलझाती हो

सही गलत की सलाइयों पर बुनती हो उधेड़ती हो

ढाई अक्षर प्रेम के किन किताबों में ढूंढती हो

मेरी दीवानगी किन मायनों में खोजती हो

मुहब्बत नापने के लिए कौनसा पैमाना लाओगी

समुंदर की गहराई में कहाँ तक जाओगी

मैं तो स्पर्श की भाषा जानता हूँ

दिल की इबारत पढ़ता हूँ

जब भी तुम्हें छूता हूँ ,एक नई कविता गढ़ता हूँ

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कोयल को समझाए कौन

पनघट रूठे ,नदियां रूठीं

पनिहारिन की गगरी फूटी

झरनो की झर झर से कुट्टी

बगिया की अस्मत क्यूँ लूटी

नीर नहीं अब शीतल निर्मल

कटे जा रहे जंगल जंगल

नग्न हो रहे पहाड़ पर्वत

किस वहशी ने रौंदी मिट्टी

कुएं की मुंडेर है सूनी

आए कौन ,कहाँ है पानी

दादुर ने साधा है मौन

कोयल को समझाए कौन

समुंदर की आँखों में पानी

उसकी पीड़ा किसने जानी

चीर हरण से रोटी अवनि

कृष्ण कौन ,दुर्योधन कौन

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जागो इंसान जागो

जाता साल और आता साल ,चिंता में थे

कहने लगे “ इंसान बहुत पढ़ लिख गया है

तकनीकी दुनिया में बहुत आगे बढ़ गया है

चाँद पर जाकर पानी खोज आया है

आसमान पर जाकर तारे तोड़ लाया है

फिर क्यूँ किसी औरत में ,चुड़ैल घुस आती है

डायन की छाया है कहकर मारी जाती है

झाड़ फूँक के सिलसिले बंद नहीं हुए हैं

नर बलि के किस्से कम नहीं हुए हैं

अंधविश्वास की जड़ें ज़िंदा हैं अभी भी

गलत रूढ़ियों में वो बंधा है अभी भी

वो किस विरोधाभास में जी रहा है

दवा समझकर कौनसा जहर पी रहा है

इंसान को अब सम्हलना होगा

मानसिक प्रदूषण से बचना होगा

वे दोनों हांथ उठाकर बोले चेतो इंसान चेतो

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रेशम की डोरी

देख उसे माँ की गोदी में

मैं लेने को मचली थी

मैं थी कोई पाँच बरस की

उस नन्हें की दीदी थी

मुझे देख वह कभी किलकता

खिले फूल सा ऐसे हँसता

मेरी अंगुली मुट्ठी में भर

झट से मुंह में लेता

भूली थी मैं संगी साथी

बस उसमें रमती थी

नन्हें की भोली आँखों में

मैं ही मैं दिखती थी

साँझ को दादी हम दोनों पर

राई लूण घुमाती थी

अम्माँ अपनी आँखों के

काजल से टीका करती थी

कहती बहना की आशीषे

भाई का घर भरती है

रेशम की बस एक डोरी से

बुरी नज़र भी डरती है

हे ईश्वर , मेरे भैया को

उमर मेरी लग जाए

खूब सजे घर आँगन उसका

अला बला टल जाए

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जल बूंदों के मोती

असंख्य जल बूंदों के मोती ,आसमान से बरसे हैं

इन्हें सहेजो , इन्हें समेटो ,नीर बिना सब तरसे हैं

यह निर्मल है ,यह पावन है

यही तीज है सावन है

यह है अनाज की बाली मेँ

बच्चों की बजती ताली मेँ

धरती की धानी चूनर मेँ

मुनिया के हरे समंदर मेँ

यह है कोयल की कुहुकन मेँ

यह है मयूर की थिरकन मेँ

यह खूब झरेगा झरनों मेँ

यह इठलाएगा नदियों मेँ

नीले पीले छातों पर

टप टप करता छप्पर पर

रिमझिम करता भिगो रहा है

वसुंधरा का तन

जैसे आँखों के पानी से

भीगे मेरा मन

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भारोपीय भाषा परिवार :

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(मैंने इधर कुछ विद्वानों के आलेख पढ़े हैं जिनमें यूरोपीय भाषाओं के अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति को संस्कृत से खोजने का प्रयास किया गया है। उन पर कोई टिप्पणी न करके, यहाँ मैं 'भारोपीय भाषा परिवार' के बारे में टिप्पण प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसके अवलोकन के बाद अध्येता स्वयं अपना अभिमत, धारणा अथवा नजरिया स्थापित कर सकें।)

भारत-यूरोपीय भाषा परिवार का महत्व जनसंख्या, क्षेत्र-विस्तार, साहित्य, सभ्यता, संस्कृति, वैज्ञानिक प्रगति, राजनीति एवं भाषा विज्ञान- इन सभी दृष्टियों से निर्विवाद है।

नामकरणः

भारत-यूरोपीय परिवार को विभिन्न नामों से अभिहित किया गया है। आरम्भ में भाषा विज्ञान के क्षेत्र में जर्मन विद्वानों ने उल्लेखनीय कार्य किया और उन्होंने इस परिवार का नाम 'इंडो-जर्मनिक' रखा। यूरोप के इंगलैण्ड, इटली, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, रोमानिया, रूस, पोलैण्ड आदि अन्य देशों में भी इसी परिवार की भाषाएँ बोली जाती हैं, पर वे न तो भारतीय शाखा के अन्तर्गत आती हैं और न जर्मनिक शाखा के। यूरोप के अन्य देशों के विद्वानों को यह नाम इसी कारण स्वीकृत नहीं हुआ। इसका एक और कारण था। प्रथम महायुद्ध के बाद जर्मनी के प्रति यूरोप के देशों की जो द्वेष-भावना थी, उसने भी इस नाम को ग्रहण करने में बाधा पहुँचाई। इस भाषा-परिवार के साथ जर्मनी का नाम संपृक्त करना यूरोप के अन्य देशों के विद्वानों को स्वीकार्य नहीं हुआ। जर्मन विद्वान आज भी इस परिवार को इंडो-जर्मनिक ही कहते हैं।

कुछ विद्वानों ने इस परिवार को आर्य परिवार कहा तथा कुछ विद्वानों ने इस परिवार के लिए भारत-हित्ती (इंडो-हित्ताइत) नाम सुझाया। सन् 1893 ई0 में एशिया माइनर के बोगाज़कोई (तुर्की में) नामक स्थान की पुरातात्विक खुदाई के प्रसंग में मिट्टी की पट्टियों पर कीलाक्षर लिपि में अंकित कुछ लेख मिले। सन् 1906 से 1912 के बीच ह्युगो विंकलर एवं थियोडोर मेकरीडी के प्रयत्नों के फलस्वरूप लगभग 10000 कीलाक्षरों में अंकित पट्टियाँ प्राप्त हुईं जिन्हें 1915 - 1917 में चेक विद्वान होज़्नी ने पढ़कर यह स्थापना की कि हित्ती भारत-यूरोपीय परिवार से संबद्ध भाषा है। हित्ती के सम्बन्ध में एक और मान्यता भी है कि वह 'आदि भारत-यूरोपीय भाषा' से संस्कृत, ग्रीक, लातिन की तरह उत्पन्न नहीं हुई बल्कि वह उसके समानान्तर बोली जाती थी। इस मान्यता के कारण वह 'आदि भारत-यूरोपीय भाषा' की पुत्री नहीं है अपितु उसकी बहन है। इसीलिए इस परिवार का नाम भारत-हित्ती रखने का प्रस्ताव आया।

'इंडो-जर्मेनिक' एवं 'भारत-हित्ती' - ये दोनों नाम चल नहीं पाए। विद्वानों को ये नाम स्वीकार न हो सके।

भारत-यूरोपीय (इंडो-यूरोपीयन) नाम का प्रयोग पहले-पहले फ्रांसीसियों ने किया। भारत-यूरोपीय नाम इस परिवार की भाषाओं के भौगोलिक विस्तार को अधिक स्पष्टता से व्यक्त करता है । यद्यपि यह भी सर्वथा निर्दोष नहीं है। इस वर्ग की भाषाएँ न तो समस्त भारत में बोली जाती हैं और न समस्त यूरोप में। भारत एवं यूरोप में अन्य भाषा परिवारों की भाषाएँ भी बोली जाती हैं। यह नाम अन्य नामों की अपेक्षा अधिक मान्य एवं प्रचलित हो गया है तथा भारत से लेकर यूरोप तक इस परिवार की भाषाएँ प्रमुख रूप से बोली जाती हैं, इन्हीं कारणों से इस नाम को स्वीकार किया जा सकता है।

भाषा परिवार का महत्वः

1 ़ विश्व की अधिकांश महत्वपूर्ण भाषाएँ इसी परिवार की हैं। ये भाषाएँ विश्व के विभिन्न महत्वपूर्ण देशों की राजभाषा/सह-राजभाषा हैं तथा अकादमिक, तकनीकी एवं प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। उदाहरणार्थ : अंग्रेजी, हिन्दी-उर्दू, स्पेनी, फ्रेंच, जर्मन, रूसी, बंगला।

2 ़ विश्व की आधी से अधिक आबादी भारोपीय परिवार में से किसी एक भाषा का व्यवहार करती है। यह व्यवहार मातृभाषा/प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में होता है।

3 ़पूर्व में इसका उल्लेख किया जा चुका है कि संसार में 10 करोड़ (100 मिलियन) से अधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाने वाली मातृभाषाओं की संख्या 10 है। इन 10 भाषाओं में से चीनी, अरबी एवं जापानी के अतिरिक्त शेष 7 भाषाएँ भारोपीय परिवार की हैं : 1. हिन्दी 2. अंग्रेजी 3. स्पेनी 4. बंगला 5. पुर्तगाली 6. रूसी 7. जर्मन।

4 ़ धर्म, दर्शन, संस्कृति एवं विज्ञान सम्बन्धी चिन्तन जिन शास्त्रीय भाषाओं में मिलता है उनमें से अधिकांश भाषाएँ इसी परिवार की हैं। यथा : संस्कृत, पालि, प्राकृत, लैटिन, ग्रीक, अवेस्ता (परशियन)।

5 ़ भारोपीय परिवार की भाषाएँ अमेरिका से लेकर भारत तक बहुत बड़े भूभाग में बोली जाती हैं।

भारत-यूरोपीय भाषा परिवार की शाखाएँ / उपपरिवार

1 ़ केल्टिक - मध्य यूरोप के केल्टिक भाषी लगभग दो हजार वर्ष पूर्व ब्रिटेन के भू-भाग में स्थानान्तरित हुए थे। जर्मेनिक ऐंग्लो सेक्सन लोगों के आने के कारण ये केल्टिक भाषी वेल्स, आयरलैंड, स्काटलैंड चले गए।

2 ़जर्मेनिक - अंग्रेजी, डच, फ्लेमिश, जर्मन, डेनिश, स्वीडिश, नार्वेजियन

3 ़लैटिन / रोमन / इताली - फ्रांसीसी, इतालवी, रोमानियन, पुर्तगाली, स्पेनी

4 ़स्लाविक -रूसी, पोलिश, सोरबियन, स्लोवाक, बलगारियन

5 ़बाल्तिकः - प्राचीन प्रशन, लिथुआनीय, लातवी

6. हेलेनिक - ग्रीक

7. अलबानी - इलीरी

8. प्रोचियन -आर्मेनी

9. भारत-ईरानी : इस परिवार को भाषावैज्ञानिक तीन वर्गों में विभक्त करते हैं। 'दरद' के अलावा इसके निम्न वर्ग हैंः

(क) ईरानी - परशियन, अवेस्ता , फारसी, कुर्दिश, पश्तो, ब्लूची

(ख)भारतीय आर्य भाषाएँ--संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, असमिया, ओड़िशा आदि। इनका विवरण आगे अलग से प्रस्तुत किया जाएगा।

10 ़तोखारी- इस भाषा के सन् 1904 ई0 में मध्य एशिया के तुर्किस्तान के तुर्फान प्रदेश में कुछ हस्तलिखित पुस्तकें एवं पत्र मिले जिन्हें पढ़कर प्रोफेसर सीग की यह मान्यता है कि यह भाषा भारत-यूरोपीय परिवार के केंतुम् वर्ग की भाषा है।

11 ़एनातोलिया -एनाातोलिया भाषाओं के अंतर्गत भारोपीय परिवार की ऐसी लुप्त भाषाओं को समाहित किया जाता है जो वर्तमान तुर्की के एशिया वाले भाग के पश्चिमी भूभाग में, जिसे एनातोलिया एवं एशिया माइनर के नामों से भी जाना जाता है, बोलीं जाती थीं। यह क्षेत्र प्रायद्वीप है जिसके उत्तर में काला सागर, उत्तर-पूर्व में जोर्जिया, पूर्व में आर्मेनिया, दक्षिण-पूर्व में मेसोपोटामिया तथा दक्षिण में भूमध्यसागर है। इन भाषाओं में हित्ती, लूवीय, पलायीय तथा लाइडन भाषाओं के नामों का उल्लेख तो मिलता है मगर भाषिक सामग्री केवल हित्ती की ही मिलती है। यही कारण है कि इस परिवार को केवल हित्ती के नाम से भी अभिहित किया जाता है। इस भाषा के बारे में सबसे पहले लाइसन ने सन् 1821 में उल्लेख किया। सन् 1893 ई0 में एशिया माइनर के बोगाज़कोई (तुर्की में) नामक स्थान की पुरातात्विक खुदाई के प्रसंग में मिट्टी की पट्टियों पर कीलाक्षर लिपि में अंकित कुछ लेख मिले। सन् 1906 से 1912 के बीच ह्युगो विंकलर एवं थियोडोर मेकरीडी के प्रयत्नों के फलस्वरूप लगभग 10000 कीलाक्षरों में अंकित पट्टियाँ प्राप्त हुईं जिन्हें 1915 - 1917 में चेक विद्वान होज़्नी ने पढ़कर यह स्थापना की कि हित्ती भारत-यूरोपीय परिवार से संबद्ध भाषा है।

आदि / आद्य भारत-यूरोपीय भाषा के सिद्धान्त की उद्भावना एवं भारोपीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययनः

भारोपीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन की शुरुआत सन् 1767 में फ्रांसीसी पादरी कोर्डो ने संस्कृत के कुछ शब्दों की तुलना लैटिन के शब्दों से की। इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बोडन-चेयर के प्रोफेसर, संस्कृत व्याकरण, संस्कृत-अंग्रेजी कोश, अंग्रेजी-संस्कृत कोश आदि विश्वविख्यात रचनाओं के प्रणेता सर मोनियर विलियम्स जोंस ने जनवरी,1784 में 'द एशियाटिक सोसायटी' की नींव डालते हुए संस्कृत के महत्व को रेखांकित किया तथा प्रतिपादित किया कि भाषिक संरचना की दृष्टि से संस्कृत, ग्रीक एवं लैटिन सजातीय हैं। सन् 1786 में इन्होंने इस विचार को आगे बढ़ाया तथा स्थापना की कि यूरोप की अधिकांश भाषायें तथा भारत के बड़े हिस्से तथा शेष एशिया के एक भूभाग में बोली लाने वाली भाषाओं के उद्भव का मूल स्रोत समान है। इस स्थापना से आदि भारोपीय भाषा के सिद्धांत की उद्भावना हुर्ई। जर्मन भाषावैज्ञानिक फ्रेंज बॉप की सन् 1816 में संस्कृत के क्रिया रूपों की व्यवस्था पर फ्रेंच में पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें इन्होंने संस्कृत, परशियन, ग्रीक, लैटिन एवं जर्मन के समान उद्भव के कार्य को प्रशस्त किया तथा सन् 1820 में इन्होंने अपनी अध्ययन परिधि में क्रिया रूपों के अतिरिक्त व्याकरणिक शब्द भेदों को समाहित किया। इनका संस्कृत, ज़ेंद, ग्रीक, लैटिन, लिथुआनियन, प्राचीन स्लाविक, गॉथिक तथा जर्मन भाषाओं के तुलनात्मक व्याकरण का ग्रंथ (1833-1852) प्रकाशित हुआ जिसमें विभिन्न भाषाओं की शब्दगत रचना के आधार पर इनकी आदि भाषा के अस्तित्व के विचार की पुष्टि की गई है। डेनिश भाषी रैज्मस रैस्क ने सन् 1811 में आइसलैंड की भाषा तथा सन् 1814 में प्राचीन नार्स भाषा पर अपने कार्यों में यह प्रतिपादित किया कि भाषा के अध्ययन में शब्दावली से अधिक महत्व स्वन(ध्वनि) एवं व्याकरण का है।

ग्रिम नियमः

रैस्क से प्रभावित होकर जर्मन भाषी जेकब ग्रिम ने अध्ययन परम्परा को आगे बढ़ाया। सन् 1818 से 1837 के बीच इनका जर्मन व्याकरण से संबंधित ग्रंथ चार भागों में प्रकाशित हुआ। इसमें इन्होंने विभिन्न युगों में विवेच्य भाषाओं के शब्दों में होने वाले स्वनिक-परिवर्तन अथवा स्वन-परिवृत्ति के नियमों का प्रतिपादन किया जो ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में 'ग्रिम नियम' से जाने जाते हैं। इन नियमों के आधार पर इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि विभिन्न युगों में भाषाओं में होने वाले स्वन-परिवर्तनों की नियमित प्रक्रिया होती है।

ग्रैसमेन नियमः

जर्मन भाषावैज्ञानिक हेरमन ग्रैसमेन ने 'ग्रिम नियम' के अपवादों को स्पष्ट किया तथा प्राचीन ग्रीक एवं संस्कृत के स्वनिम प्रक्रम की असमानता को 'ग्रैसमेन नियम' से स्पष्ट किया। उनके दो नियम प्रसिद्ध हैं। पहला आदि भारोपीय एवं संस्कृत तथा प्राचीन ग्रीक से संबंधित है। आदि भारोपीय के शब्दों के पहले अक्षर के महाप्राण व्यंजन के बाद यदि दूसरे अक्षर में भी महाप्राण व्यंजन हो तो इन भाषाओं में प्रथम अक्षर का महाप्राण व्यंजन अल्पप्राण में बदल जाता है। दूसरे नियम के अनुसार आदि भारोपीय भाषा के शब्दों में प्रयुक्त 'स्' का ग्रीक में 'ह्' में परिवर्तित होना है; अन्य भाषाओं में यह परिवर्तन नहीं होता। ग्रैसमेन के नियम भी निरपवाद नहीं हैं।

केन्तुम् वर्ग और सतम् वर्ग की भारत-यूरोपीय भाषाएँः

अस्कोली नामक भाषाविज्ञानी ने 1870 ई0 में इन भाषाओं को दो वर्गों में बाँटा। इन भाषाओं की ध्वनियों की तुलना के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आदि भारत-यूरोपीय भाषा की कंठ्य ध्वनियॉ कुछ शाखाओं में कंठ्य ही रह गईं और कुछ में संघर्षी (श स ज़) हो गईं। इस प्रवृत्ति की प्रतिनिधि भाषा के रूप में उसने लातिन और अवेस्ता को लिया और सौ के वाचक शब्दो की सहायता से अपने निष्कर्ष को प्रमाणित किया। लातिन में सौ को केन्तुम् कहते हैं और अवेस्ता में सतम्। इसीलिए उसने केन्तुम् और सतम् वर्गों में समस्त भारत-यूरोपीय भाषाओं को विभाजित किया।

 

सतम्‌ वर्ग                       केन्‍तुम्‌ वर्ग

1 ़ भारतीय - शतम्‌      1 ़ लातिन - केन्‍तुम्‌

2 ़ ईरानी - सतम्‌           2 ़ ग्रीक - हेकातोन

3 ़ बाल्‍तिक - ज़िम्‍तस            3 ़ जर्मेनिक - हुन्‍द

4 ़ स्‍लाविक - स्‍तो               4 ़ केल्‍टिक - केत्‌

5 ़ तोखारी - कन्‍ध

आदि भारत-यूरोपीय भाषा की भाषिक स्थिति :

1.प्राचीन भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन से यह पता चलता है कि आदि भारत-यूरोपीय भाषा संश्लेषात्मक थी।

2. इस भाषा में विभक्ति-प्रत्ययों की बहुलता थी। वाक्य में शब्दों का नहीं अपितु पदों का प्रयोग होता था।

3. मुख्यतः धातुओं से शब्द निष्पन्न होते थे।

4. उपसगरें का सम्भवतः अभाव था। उपसर्गों के बदले पूर्ण शब्दों का प्रयोग होता था जो बाद में घिसते घिसते परिवर्तित हो गए और स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त होने की क्षमता खोकर उपसर्ग कहलाने लगे।

5. इस भाषा में संज्ञा पदों में तीन लिंग - पुंल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग तथा तीन वचन - एकवचन, द्विववचन, बहुवचन थे।

6. तीन पुरुष थे- उत्तम, मध्यम, अन्य ।

7. आठ कारक थे। बाद में ग्रीक एवं लैटिन में कुछ कारकों की विभक्तियाँ छँट गईं।

8. क्रिया में फल का भोक्ता कौन है इस आधार पर आत्मनेपद और परस्मैपद होते थे। यदि फल का भोक्ता स्वयं है तो आत्मनेपद का प्रयोग होता था और यदि दूसरा है तो परस्मैपद का प्रयोग होता था।

9. क्रिया के रूपों में वर्तमान काल था। क्रिया की निष्पन्नता पूर्ण हुई अथवा नहीं - इसको लेकर सामान्य, असम्पन्न एवं सम्पन्न भेद थे।

10. समास इस भाषा की विशेषता थी।

11. भाषा अनुतानात्मक थी । अनुतान से अर्थ में अन्तर हो जाता था। भाषा संगीतात्मक थी इसलिए उदात्त आदि स्वरों के प्रयोग से अर्थ बोध में सहायता ली जाती थी। वैदिक मंत्र इसके उदाहरण हैं जिनके उच्चारण में उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का प्रयोग आवश्यक माना जाता है। प्राचीन ग्रीक में भी स्वरों का उपयोग होता था। बाद में चलकर अनुतान का स्थान बलाघात ने ले लिया।

भारोपीय परिवार की भाषाओं की विशेषताएँः

(1) आरम्भ में इस परिवार की भाषाएँ संश्लेषात्मक थीं किन्तु अब इनमें कई विश्लेषणात्मक हो गई हैं। संस्कृत और हिन्दी के निम्नलिखित रूपों की तुलना से यह बात स्पष्ट हो जाएगीः

संस्कृत                   हिन्दी

देवम्                       देव को

देवेन                         देव से

देवाय                     देव के लिए

देवात्                         देव से

देवस्य                      देव का

देवे                          देव में

(2) शब्दों की रचना उपसर्ग, धातु और प्रत्यय के योग से होती है। आरम्भ में उपसर्ग स्वतंत्र सार्थक शब्द थे किन्तु आगे चलकर वे स्वयं स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होने में असमर्थ हो गए।

(3) वाक्य-रचना शब्दों से नहीं पदों से होती है अर्थात् शब्दों में विभक्तियाँ लगाकर पदों की रूप सिद्धि की जाती है और विभक्तियों के द्वारा ही पदों का पारस्परिक अन्वय सिद्ध होता है। शब्द में विभक्ति लगे बिना वाक्य नहीं बनता।

(4) आदि / आद्य भारत-यूरोपीय भाषा में समास बनाने की जो प्रवृत्ति थी, वह भारत -- यूरोपीय भाषाओं में भी रही।

(5) आदि / आद्य भारत-यूरोपीय भाषा में तथा लैटिन एवं वैदिक संस्कृत आदि में अनुतान की स्थिति मिलती है। बाद में अनुतान का स्थान बलाघात ने ले लिया।

(6) भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में प्रत्ययों की अधिकता है।

( 1 .P. Baldi (1983). An Introduction to the Indo-European Languages 2. S. K. Chatterji (2d ed. 1960) Indo-Aryan and Hindi 3. A. M. Ghatage (2d ed. 1960) Historical Linguistics and Indo-Aryan Languages 4. C. P. Masica, The Indo-Aryan Languages (1989))

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारत सरकार

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर - 203001

mahavirsaranjain@gmail.com <mailto:mahavirsaranjain@gmail.com>

मेरी कविता  " संगे मर मर से श्री विग्रह तक" उस अमर चेतना का प्रतिनिधित्व करता  है जो कण कण में समाया है । जड़ और चेतन से विश्व विकसित हुआ है पर जड़ता पूरे मानव जगत में धुंद बन कर छा गया  है  । आज का मानव समाज भौतिकता के पागलपन से इतना ग्रसित हो गया है कि सारे रिश्ते नाते गौड़ हो  गये  हैं । मनुष्य चेतनाविहीन होते जा रहा है और मानव  मुद्रायंत्र  बन गया है ,सचमुच ये कलयुग का विशेष सोपान है । ईश्वर के मंदिर और मूरत में भी कालेधन से बने  हीरे जडित स्वर्ण मुकुट ,हार अर्पित कर उस परमात्मा का विशेष प्रतिनिधि बन जाता है ।     मनुष्य में मनुष्यता के "अंकुर "को तलाशता ये कविता अपनी चेतना को संगे मर मर संग जीने का प्रयास किया  है । अद्वैत की कल्पना द्वैत की सापेक्षता में संभव  है । ये कविता जड़ता का विरोधी है ,पर जडत्व का नहीं । संग मर मर की यात्रा पत्थर से मूरत ,मंदिर ,मस्जिद और गुरुद्वारा बनने तक की आध्यात्मिक यात्रा है । गुरु और ईश्वर की प्रतिमा को श्री विग्रह कहा गया है और  विग्रह्जी भी कहा गया है । हमें ये  जीवन  जिस अनंत से मिला है उनकी प्रति मूर्ति  बना कर हम अपना प्राण उसमें प्रतिष्ठित करते हैं ,और उस सर्वाकार ,निराकार से बात करने का आध्यात्मिक  प्रयास करते हैं । ये   स्वनिर्माण की  सनातन यात्रा  है । इतिहास साक्षी  है कि भक्तों और संतों के इंतजार में प्रतिमाओं  को लोगों ने रोते हुए देखा है । "अंकुर "उनका भी विरोध करता जो मूरत को केवल बुत मानता है । ,कुछ वर्ष पहले एक देश ने गौतमबुद्ध की विशाल प्रतिमा को बुत मान कर छिन्न भिन्न कर दिया था कुछ वर्ष पश्चात ही वो देश कंगाली के कगार में पहुंच गया वहां की शांति भंग हो गयी ,। आज वो देश छिन्न भिन्न हो गया है ,वहां युद्ध के अलावा कुछ नहीं होता । अंत में अपनी चेतना से परमाणु चेतना तक पहुँचने का प्रयास कर रहा हूँ आप सब पढ़ने वालों का आशीर्वाद चाहता हूँ _
संगे मर मर से श्री विग्रह तक 
                        १
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों  में छिपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अनु  देख रहा
आकर रहित प्रतिकार रहित न जाने मैं क्या  था
मेरा मन या उसका मन न जाने वो कब आया
पर ये निश्चित है उसको आना ही था ,और आया
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों में छिपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                         २
कौन तराशे भाग्य हमारा , जो पाषाणों  में रहते है
मैं अविचल हूं पर गति तो मेरे  अंदर   भी है
मेरा उदभव होना था  पाषणों में  ये भी निश्चित है
तुम चेतन हो चल सकते हो परमाणु चेतना मुझमें है
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                              ३
में आदि  पिता का आदि अंश ,निश्चल  उर्जा मुझमें है
वो था रस से मढ़ा हुआ कुछ आकृति मन में गढ़ा हुआ
वो आया  मुझे तोड़ दिया चीत्कार भरा  पाषाणों ने
प्रतिध्वनि गूंजी  शिला खण्ड में ,में मुक्त हुआ पाषाणों से
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                           ४
गर हमको कुछ पाना है तो तुमको ही आना होगा
में संगे मर मर हूँ पर जीवित हूं तेरे ही आकारों में
मैं फर्श बनूँ या मूर्ति बनूँ या मंदिर के आकारों में
मैं  गिरजा या गुरुद्वारा या मस्जिद के मीनारों में
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों  में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                            ५
तू सोचे तो गढ़ सकता हूँ मेरे अंदर ईश्वर  है
में प्रति हूँ प्रतिबिम्ब तेरा, प्रतिध्वनि भी  मेरे  अंदर है
मैं रामकृष्ण ,मैं महावीर, मैं जगत पिता का दर्शन हूँ
मैं मातृ भवानी ,माँ अम्बे मैं जग जननी की प्रतिमा हूँ
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों  में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                              ६
नाभि प्रतिष्ठित हुआ केंद्र में तब मैं जड़ता  से मुक्त हुआ
तू भी तो माता  के नभ में नाभि से जीवन रस पाया
तू चेतन है  मैं अवचेतन,अवचेतन चेतन रचता है
आदि  काल से जग निर्माता हम को संग संग गढ़ता  है
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों  में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                                 ७
जो मुझको  केवल बुत माना वो ह्रास हुआ इतिहासों में
पर मैं अब भी वर्तमान हूँ साक्षी बन  इतिहासों का
तू चाहे तो मुझमें पढ़ सकता है गाथा अपने पूर्वज की
अंतर्दर्शन मुझमें गढ़ ले , अनचाहे परतों को हर ले
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों  में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                           ८
प्राण प्रतिष्ठित किया मनुज ने तब मैं कृत कृत्य हुआ
मान ब्रह्म का पाकर ,मैं सचमुच निर्रब्रह्म हुआ
मान दिया जब  भक्ति भाव से, तब   निर्गुण को जाना
ज्ञान ब्रह्म का पाकर जग ने  उस निराकार को भी माना
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों  में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                               ९
संगे मर मर से श्री विग्रह तक, तुझ से मैं जीवन पाया
जड़ तो है मूल वृक्ष का जिससे जग चेतन पाया
पर जड़ता है तेरे अंदर जिसने तुमको  रोक दिया
देह वृक्ष है, जड़ चेतन है कण कण में परमाणु चेतना है
तू अंदर है तू बाहर है कण कण में तू ही समाया है
तू जड़ता है तो  क्या जीता , आ संगे मर मर जा
मुझ संग घुल जा ,मुझ संग मिल जा और अमर आत्म  हो जा
परमाणु चेतना अवचेतन मन पाषाणों  में छुपा हुआ
कौन तराशे मेरा मन निर्द्वन्द भाव अणु  देख रहा
                         द्वारा
                             डाक्टर चंद जैन "अंकुर"
                          रायपुर छ .ग .mob. 98 26 1 1 6 9 4 6
                  _ ० ० ० ० ० _

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ख़ामोशी
कितना अजीब?
कि इतनी नजदीकियों बाद भी,
तुम हमें आम-लोगों में ही गिन पाते हो;
और ये भी,
कि इतना कुछ  होते हुए;
तुम हमें दिल के उतने ही करीब नज़र आते हो !
कुछ बातें,
लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं की जाती;
फिर तुम न जाने क्यों, हर एहसास को,
कह कर ही जताते हो;
अगर हम कहते,
तो फिर कह जाते दिल की हर बात;
तुम अगर कहते भी हो,
तो नजर से कुछ और,  जुबाँ से कुछ और कह जाते हो !

 

 


वादे :)

कई सारे तुम्हारे
मुझे अब तक याद आते हैं
लोगों को तो पूरे किये वादे भी याद नहीं रहते
और मुझे तो कमबख्त अधूरे ही अब तक सताते हैं
रिश्तों के कमज़ोर धागे तोड़ कर तुम
न जाने अपनी यादों का भारी झोला क्यों दे गयी हो मुझे
देखो ना अब तक छुपा कर रखी हैं
तुम्हारी इतनी बेशकीमती यादें
बस कभी-कभी ही निकालता हूँ नज़र के सामने, अकेलेपन में
जब कभी लडखडाता हूँ, तो हाथ सबसे पहले इन्हें ही सम्हालता है
तुम जानती थी ना अधूरेपन की मिठास ?
बस थोडा सा प्यार का रसगुल्ला चखा दिया और छोड़ दिया फिर तड़पने को
और ये तो चीज़ भी ऐसी कि जिसकी दुकान भी एक ही है
और एक तुम ही अकेली दुकानदार
वहीँ मेरे जाने पर पाबंदी हो, तो फिर बचा क्या है ?
सुनो ! और कुछ नहीं तो अपनी यादों का बोझ ही वापस ले जाओ
बेफिक्री और हल्केपन में प्यार की भूख तो कम लगेगी
और अगर तुम से हो सके
तो मेरा भरोसा जो तुम्हारे पास रखा था वो भी लेती आना
सुना हैं इस दुनिया में जीने के लिए भरोसा बहुत जरुरी है !

 


दूर..!

हाँ मैं समझता हूँ तुम्हारी आँखों की कही बात
तुम्हारी धडकनों के जज़्बात भी सुनाई देते हैं मुझे
तुम अपनी बातों को सिसकियों में बयां करने की कोशिश क्यों करती हो?
मेरी ख़ामोशी का मतलब भी कभी समझा करो
तुम्हारे और मेरे रिश्ते की कोई सीमा नहीं है
मगर ये तो तुम भी समझती हो ना की इसकी भी एक उम्र है?
ढलते हुए सूरज से मुंह फेरना तो धरती को समझता ही है
फिर तुम क्यों नज़रें टिकाये बैठी हो देर शाम तक ?
हम जब तक साथ हैं तब तक सब तरफ उजाला है
हम साथ नहीं होंगे, तो हर तरफ अँधेरा ही होगा
और इस शाम की उम्र तो होती ही बहुत कम है
कुछ ही पलों में गुज़र जाएगी
घुप्प अंधेरों में दिया जलाकर, मुझे फिर मत तलाशना तुम
थोडा इंतज़ार करोगी तो नया सूरज दिख ही जायेगा
तब तक तुम भी जरा सुस्ता लेना…
सुबह की मुस्कराहट और खिलेगी तुम्हारे लबों पर!

 


भँवर

बिना मल्हार तेज़ धार में बहती एक नाव जैसे
जिये जाता है कोई काले दिन,  और उजली रात कुछ ऐसे
हर ठहराव पर ढूंढ रहा जैसे कोई किनारा
हर भँवर से उलझने की कोशिश में कोई ऐसे .!
शाम के सूरज में, कमजोर परछाई के जैसे
इन दिनों, किसी के चेहरे की मुस्कुराहट कुछ ऐसे
शिद्दत से छुपा कर माथे की शिकन
बहाने से  दिल की शिकायतें झुठलाता हो जैसे .!

 

 

 

इक बार फिर से मिलते हैं

चलो इक बार फिर से हम , बनके अजनबी.. कभी मिलते हैं
अपनी दुनिया के ताने – बाने, नए धागों से बुनते हैं

फिर इक बार मुलाक़ातों के सिलसिले
नए सिरे से लिखने हैं
खुशनुमा लम्हे जो हमसे टूटे
वो फिर से पिरोने हैं
एक दूजे की ज़िन्दगी के हर पहलू को, अब गहराई से समझते हैं
चलो इक बार फिर से हम , बनके अजनबी.. कभी मिलते हैं

कितनी बारिशें हमने बिताई
अपनी-अपनी दीवारों के पीछे
भीगने की ख़ुशी समझते थे दोनों
फिर भी रह गए कैसे,  आँखें  मींचे
छोटी छोटी खुशियों की बारिश में, अब मिल के नाचते हैं
इक बार फिर से हम , बनके अजनबी.. कभी मिलते हैं

अपनी दुनिया के ताने – बाने, नए धागों से बुनते हैं

 

   

ये शहर ..

इस शहर के गली नुक्कड़ में..
कोई पुरानी पहचान ढूंढता हूँ मैं,
इन उलझे कठिन रास्तों में, बचपन की यादें,
और मेरे मिट्टी के मकान ढूंढता हूँ मैं !
इस शहर के लोग बागों में,
कोई मेरा जिगरी यार ढूंढता हूँ..
इन लोगों से मतलब की बातों में भी,
कभी मजाकिया हँसने की वजह ढूंढता हूँ मैं !
इस शहर के गली नुक्कड़ में..
कोई पुरानी पहचान ढूंढता हूँ मैं !

 

 

 


तेरे बिना फिर बदल गया…
तेरे आने से जहाँ बदला, तेरे बिना फिर बदल गया…
इक सफ़र, साथ तय करना था, तेरे बिना फिर ठहर गया !
पलक झपकी और तू दिखा, फिर झपकी तू था ही नहीं,
इक पल का हसीं खाब था वो…अगले पल ही टूट गया !
इक रिश्ता सोचा तुझे लेकर, रिश्ता जो नाकाम रहा,
मैं हारा वो ठीक, मगर ऐसा क्या.. तेरे हाथ आया ?
बहुत चाहा तुझे रोकना, ये बात अलग तू रुकता नहीं ,
फिर आरज़ू की तेरे लौटने की, तू ख्वाब समझ के भूल गया !!

 

 

 

Anil Malekani

 

Anil.malekani@outlook.com

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  मुझे जीना नहीं आता
                                     मूल उर्दू शायर- बशर नवाज
                                     अनुवाद- डॉ. विजय शिंदे
         
मैं जैसे दर्द का मौसम, (2)
घटा बन कर जो बस जाता है आंखों में
इंद्रधनुष के रंग, खुशबू नजर करने की तमन्ना लेकर
जिस नजारे तक जाऊं
उसे आंसुओं के कोहरे में, डूबा हुआ पाऊं। (2)

मैं अपने दिल का सोना, प्यार के मोती,
तरसते उम्मीदों के फूल, जिस दरवाजे पर सजाता हूं,
वहां जैसे रहता नहीं कोई। (2)

बना हूं कई दिनों से, आवाज ऐसी
जो दीवारों से टकराए,
हताश होकर लौट आए,
धडकते दिल के सूनेपन को सूना और कर जाए। (2)

मैं अपने आपको सुनता हूं,
अपने आपको छूता हूं,
अपने आप से मिलता हूं, सपनों के सुनहरे आईना घर में।
तब मेरी तसवीर मुझ पर मुस्कुराती है
कहती यह है
हुनर तुझे जीने का न आना था, नहीं आया। (2)

आवाजें पत्थरों की तरह मुझ पर
मेरे सपनों के बिखरते आयना घर पर बरसती है।
इधर तारा, उधर जुगनू
कहीं फूल की पत्ती, कहीं ओस का एक आंसू,
बिखर जाता है सब कुछ आत्मा की सुबह में। (2)

मैं फिर से जिंदगी जीने के अरमानों में
एक-एक रेशे को चुनता हूं, सजाता हूं, नई मूरत बनाता हूं।
इंद्रधनुष्य के रंग, खुशबू नजर करने की तमन्ना में कदम आगे बढाता हूं। (2)
तो एक बेनाम गहरी धुंध में, सब कुछ डूब जाता है,
किसी से कुछ शिकायत है, ना शिकवा है। (2)

मैं तो दर्द का मौसम हूं,
अपने आप में पलता हूं, अपने आप में जीता हूं, (2)
अपने आंसुओं में डूबता हूं, मुस्कुराता हूं। (2)
मगर सारे लोग कहते हैं
तुझे जीना नहीं आता। (2)
मुझे जीना नहीं आता।

(बशर नवाज महाराष्ट्र- औरंगाबाद के प्रसिद्ध उर्दू शायर है। ‘मुझे जीना नहीं आता’ इस अनुवादित नज्म का 2010 के गणतंत्र दिवस के उपलक्ष्य में आयोजित सर्व भाषा कवि सम्मेलन में आकाशवाणी औरंगाबाद से प्रसारण हो गया है। हिंदी पाठकों के लिए यहां प्रकाशित किया है।)

डॉ.विजय शिंदे
देवगिरी महाविद्यालय, औरंगाबाद
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खेत की मेढ़ पर कदम रखते ही मनहरण की द्य्ष्टि खेत के भीतरी हिस्से में दौड़ी. खेतों में बोई फसल को देखकर उसका पारा सातवें आसमान पर चढ़ गया. उसे फसलें दुश्मनों की तरह लगी. वह बौखला गया- सबको जला दूंगा. स्साले मुंह चिढ़ाने उतारु है. . . ।

यह तो वह क्रोधावेश में कह गया था. वह एक किसान था. खेती किसानी उसका मुख्य कार्य था. जीविकोपार्जन का साधन. कहीं किसान अपनी बोई फसलों से चिढ़ेगा? मगर मनहरण को चिढ़ हुई थी. क्षण भर नहीं सरका था कि उसे अपने बौखलाए पन का ध्यान आया. विचार मे बदलाव आया और उसने स्वतः को कोसने से परहेज नहीं किया-मैं कितना मूर्ख हूं. खेत के इन पौधों की क्या गलती ? पानी ही न हो तो फिर कहाँ से इनमें हरियाली आयेगी. . . . । मनहरण ने मन की कड़ुवाहट को निकालने के लिए पंच सरपंच से लेकर विधायक और मंत्री तक को बड़बड़ा कर गालियां दे डाली-भिखमंग्गों की तरह आ जाते है ंस्साले वोट मांगने. प्रलोभन पर प्रलोभन देते हैं स्वार्थ सधा नहीं कि भूल जाते हैं कहाँ सड़क बनवानी है. कहाँ नहर बांध बनवाना है. कहाँ स्कूल खोलनी है और कहाँ अन्य व्यवस्था देनी है. प्रपंच ही प्रपंच रचते हैं. मिट्टी से भी सस्ती हो चुकी है स्सालों की जुबान. . . ।

मनहरण के विचार में परिवर्तन आ गया था. उसे जिन फसलो पर क्रोध आ रहा था उन फसलों पर अब दया आने लगी . वह करुणा से ओतप्रोत हो गया. उसकी आँखें छलछला आयी. दो -तीन बूंद आँसू आंखों से छलक कर धरती पर भी गिरे. शेष आँसुओं को गले में पड़े गमछे ने सोख लिया.

उसने एक बार पुनः फसलों पर नजर दौड़ाई. खेत की जमीन को ताका. जमीन में दरारे पड़ गयी थी. फसल अब फसल नहीं रह गयी थी. वह पीली पड़ अब सूखने लगी थी . फसलों की दुर्दशा देखकर उसकी आत्मा कराह उठी. उसका क्रोध भी फनफना उठा. पैर कांप गये. भुजाएं फड़क गयी. भौहें तनी अब उससे फसलो की दुर्दशा देखी नही जा रही थी. वह घर की ओर लौट गया.

बरसात के दिन थे. वातावरण एकदम विपरीत था. वह जल्दी जल्दी घर आया. क्रोध से वह तप रहा था. घर में प्रवेश करते ही पहले पत्नी पर भड़का फिर बच्चों पर चीखा और अंत में स्वयं पर झुंझलाया. मनहरण की गतिविधियाँ परिवार वालों को समझ आ गयी थी. वे समझ चुके थे कि मनहरण क्रोध से तप रहा है. खैर इसी मे है कि सब अपनेअपने काम में लग जाये. मुन्ना -मुन्नी पुस्तक पढ़ने लगे. पत्नी चांवल साफ करने लगी. मनहरण दीवाल से लगी खाट को धम्म से बिछाया और उसमे चित्त पड़ गया. वातावरण खामोश होना चाहता था पर बार - बार उस शान्त वातावरण में सूपे की थप खलल पैदा कर देती थी.

धरती पुत्र मनहरण शांतप्रिय व्यक्ति था. वह कभी कभी ही अशांत होता था. जिस दिन वह अशांत होता तो उससे बात करने की तो दूर उससे आंख मिलाने का भी कोई साहस कर ले तो उससे बहादुर और कोई नहीं. शांतिप्रिय व्यक्ति इसलिए क्योंकि वह काफी हद तक अन्याय और अत्याचार को सहने की ताकत रखता था. उसकी इंसानियत तब गड्मड् हो जाती जब अन्याय चरम सीमा को भी लाँघ जाता था. उसके नथुने तब फूलने लगते जब अन्याय ही अन्याय होता चला जाता था. उसकी प्रवृत्ति ठीक उस बाँध के समान थी जो सहनशक्ति तक पानी थामता है और अति हो जाने पर फूट कर तबाही मचा देता है. . . . ।

संध्या का समय था. चिड़ियां दाना चुगकर अपने बसेरों को लौट रही थीं. दुधारु गायें रंभाने लगी थी. बछड़े मां से मिलने आतुर थे. संध्या ने रात का रुप लेना शुरु कर दिया था. अब मंदिर में घंटा-घंटी बजने लगे . आरती की आवाज उभरने लगी. भोजन बन चुका था. मनहरण भोजन करने बैठ गया. वह पहला निवाला मुंह में डालने ही वाला था कि कोटवार की हाँक उसके कान से टकरायी. मुंह तक पहुंचे निवाले को रोककर वह कोटवार की हाँक को सुनने लगा. कोटवार ने रात में पंचायत जुड़ने की मुनादी दी थी.

रात में लोग पंचायत स्थल पर एकत्रित हुए.

गांव से दूर श्मशान था. वहाँ आवारा कुत्ते भौकने लगे थे. कुत्ते एक दूसरे क ो अपनी आवाज द्वारा परास्त करने के प्रयास में थे. कुत्तों की स्वर लहरी गाँव तक पहुंच रही थी.

इस गाँव का रिवाज ही अजीब था. जब - जब यहाँ पंचायत जुड़ती, मुद्दे की बातों पर बहस न होकर विषयांतर हो जाया करता था. बहस छिड़ती और ग्रामीण आपस में टकराने लगते. बैठक में अनेक ग्रामीण उपस्थित होते और खासकर तब जब मजेदार विषयों पर पंचायत जुड़ती थी. गड़े मुर्दे तो उखाड़े ही जाते साथ ही जिसके विरुद्ध पंचायत जुड़ती उसकी भी हंसी उड़ा दी जाती थी.

पंचायत लगभग जुड़ चुकी थी. पंचायत किस विषय को लेकर जुड़ी थी यह उत्सुकता का विषय था. सरपंच के कहने पर ही यह पंचायत बुलायी गयी थी. उसने कहना शुरु किया-आज पंचायत कुछ ऐसे मुद्दों को लेकर बुलायी गयी है जो गंभीर समस्या है. नहर बनवाने को लेकर पंचायत जोड़ी गयी है. प्रश्न यह है कि यदि नहर निकालते समय किसी की जमीन आयी तो वह जमीन देगा या नहीं. जब सबकी सहमति मिलेगी तभी नहर बनाने आगे की प्रक्रिया की जायेगी.

- हमें भला क्या आपत्ति होगी यदि हाथ दो हाथ जमीन देना पड़े तो इसमे आपत्ति कैसी ? कम से कम नहर बनने के बाद हमें अवर्षा के समय पानी तो भरपूर मिलेगा । लगभग सभी ग्रामीणों का यही विचार था.

- अगर आप सब सहमत हैं तो समझो प्रस्ताव तो भेज ही दिया गया साथ ही नहर भी यथा संभव शीघ्र बन जायेगी.

पंचायत में ही कार्यवाही की गई. नहर कहाँ से निकलनी है यह तो विभागीय कार्य था बावजूद ग्रामीणों ने एक रुपरेखा तैयार की जिससे सभी को बराबर का पानी मिल सके. इसके बाद ग्रामीण अपने-अपने घर लौट गये.

उस बैठक के बाद ग्रामीण आगे क्या कार्यवाही होने वाली है को जानने उत्सुक थे. एक दिन गांव भर खबर फैल गयी कि जिस स्थान से नहर बनाने का प्रस्ताव तैयार किया गया था उस दिशा को विभाग ने सही नहीं माना और ऐसी दिशा तय की गई जिधर से नहर निकलने के बाद मुश्किल से बीस प्रतिशत कृषि भूमि को पानी मिल सकता था. इससे गाँव का हित तो होता अपितु गांव के कई किसानों की जमीन दब अवश्य जायेगी. इस खबर से गाँव में कानाफूंसी होने लगी और चर्चा तो यहाँ तक चल पड़ी कि जिस दिशा से नहर निकालने विभागीय कार्यवाही की जा रही है. उधर सरपंच की ही सबसे ज्यादा खेती है. खबर मनहरण के कानों तक पहुंची. वह सीधा सरपंच के घर गया. सरपंच घर पर ही था उसने मनहरण को देखकर कहा- आओ मनहरण,बोलो ,कैसे आना हुआ. . . . ?

- सुना है- विभाग ने दिशा बदल कर नहर बनाने की प्रक्रिया शुरु कर दी है. . . ।

- तुमने ठीक ही सुना है. . . . ।

- मगर ऐसा क्यों हुआ . . . . . ?

- तुम तो यह जानते ही हो कि पूर्व से पश्चिम हमने नहर निकालने प्रस्ताव तैयार किया था. उत्तर -दक्षिण गाँव होने के कारण हम गाँव के समीप से नहर नहीं चाहते थे. मगर विभाग का कहना है कि उत्तर से दक्षिण नहर नहीं बनाई जा सकती क्योंकि इससे जंगल की करोड़ों रुपयों की लकड़ियाँ काटनी पड़ेंगी. वन भूमि नहर के चपेट में आयेगी जबकि यह सुरक्षित वन क्षेत्र है. सुरक्षित वनक्षेत्र से लकड़ियाँ भी तो नहीं काटी जा सकती. इससे दो विभागों मे टकराव की स्थिति निर्मित होगी और इस विवाद के मध्य हम कई वर्षों तक नहर पाने से वंचित रह जायेंगे.

- अब क्या होगा सरपंचजी . . . ?  मनहरण की आवाज में उदासी थी.

- यही तो मैं भी सोच रहा हूं मनहरण. आज रात फिर बैठक रखा हूं.

मनहरण ने सरपंच से विदा ली और लौट आया.

रात को फिर पंचायत जुड़ी.

सरपंच ने कहा- तुम सबको यह पता चल ही चुका होगा कि विभाग द्वारा नहर की दिशा बदल दी गई है. मैं आप लोगों से सलाह लेना चाहता हूँ कि अब क्या करना चाहिए. क्या हमें विभाग द्वारा निर्धारित दिशा से नहर बनने देना चाहिए ? आप अपनी बात रख सकते हैं. . . . ।

सरपंच के सामने मुंह खोलने का साहस गाँव वाले तो क्या वे लोग भी नहीं कर पाते थे जिन पंचों के भरोसे उनकी कुर्सी टिकी हुई थी.  इसी का परिणाम था कि सरपंच को जो उचित लगता वही होता था. मगर आज तो किसी को कुछ बोलना ही था यदि नहीं बोला गया तो सरपंच मनमानी करके नहर निकलवा देगा और उसका पानी स्वयं के खेतों तक पहुंचवा देगा यह गांव वाले जान चुके थे. मगर बोले तो बोले कौन ? अभी ग्रामीण उधेड़ बुन में थे कि मनहरण ने ग्रामीणों से कहा-यदि आप सबकी सहमति हो तो मैं अपनी बात रखूं ?

ग्रामीणों ने मौन स्वीेकृति दी. मनहरण ने कहा- आज से दस वर्ष पूर्व की घटना आप सबक ो याद ही होगी. अकाल की मार झेले थे हम सब. त्राहि-त्राहि मची थी. पानी के अभाव में फसल तो हुई नहीं हम अपने जानवरो को भी नहीं बचा सके. कईयों की जमीनें पानी के मोल बिक गयी. गाँव के कई परिवारों ने रोजी रोटी के लिए परदेश पलायन कर लिया. तब भी हम गंभीर हुए थे और नहर की मांग की थी. हम वर्तमान में जिन स्थानों से नहर निकालने का प्रस्ताव पारित किए हैं पहले भी उसी दिशा से नहर निकालने की माँग की गई थी तब उसे स्वीकृति भी मिल गयी थी मगर अब सरपंच का कहना है कि सुरक्षित वन के कारण विभाग उधर से नहर निकालने की अनुमति नहीं दे रहा है. . . . . ।

बैठक में पूरी तरह सन्नाटा छा गया . पूरा गाँव मनहरण की बात को गंभीर होकर सुन रहा था . मनहरण ने आगे कहा- आप सब यह भी जान रहे हैं कि जिस दिशा से हमने नहर निकालने की मांग की थी उस दिशा से नहर बनाना भी शुरु हो गया था. कुछ दिन काम भी चला फिर अचानक बंद कर दिया गया और फिर चूँकि बरसात लग गयी. अतः बीच में काम रोक दिया गया, क्या तुममे से कोई जानता हैं ?

ग्रामीणों क ो तो कुछ समझ नहीं आ रहा था मगर सरपंच सब कुछ समझ गया था. मनहरण ने कहा- सरपंच साहब से मैं कुछ प्रश्न क रना चाहूंगा यदि उन्हें कोई आपत्ति न हो तो ?

- मुझे भला क्यों आपत्ति होने लगी. तुम निश्चिंत होकर प्रश्न करो मैं उत्तर दूंगा.

- जिन दिनों हम अकाल की मार सह रहे थे ,उन दिनों भी आप ही सरपंच थे न ?

- तुम्हारा कहना गलत नहीं. वास्तव में उन दिनों मैं ही सरपंच था.

- तब भी नहर निकालने की योजना बनी थी,योजना ही नहीं बनी थी अपितु काम भी शुरु हो गया था और कुछ दूर तक उसी ओर से नहर बनने का कार्य सम्पादित हो रहा था जिधर से वर्तमान मे मांग की गई है. प्रथम प्रश्न यह है कि नहर बनते बनते आखिर क्यों रोक दिया गया ? दूसरा यह कि जिस ओर से नहर पूर्व में बनाने स्वीकृति दे दी गई थी उसमें फिर अड़ंगा क्यों ?

- तुम्हारा प्रश्न ठीक है. पूर्व में जो रुपये मिले थे वह खर्च हो गए अतः काम अधूरा रह गया. पता नहीं शासन अब उस दिशा से नहर निकालने क्यों सहमत नहीं है. . . ।

- आप और कितना झूठ बोलेगे सरपंच साहब. . . . ?  मनहरण की आवाज तेज हो गयी.  उसने कहा- आखिर आप कब तक हम ग्रामीणों को बेवकूफ बनाते रहेंगे. . . । वह ग्रामीणों की ओर मुखातिब हुआ- गाँव वालो शायद आप लोगों को सच्चाई का ज्ञान नहीं इसलिए इनकी बातों पर आंखें मूंद कर हम सहमत हो जाते है. पूर्व में नहर बनते-बनते इसलिए रोक दी गई क्योंकि शासन से राशि तो पर्याप्त मिली थी मगर उसमें अधिकारियों से मिल कर भारी मात्रा में भ्रष्टाचार किया गया. राहत राशि का दुरुपयोग किया गया. इसलिए शासन ने जांच का आदेश देकर काम रुकवा दिया जाँच भी शुरु हुई मगर खा पी कर मामला रफा - दफा कर दिया गया. जिस नहर नाली की माँग हम कर रहे हैं. कागजों में बन चुकी है क्या एक काम के लिए दो दो बार राशि दी जा सकती है ? दूसरी बात यह कि जिधर से सरपंच नहर निकलवाने की योजना बना रहे है -मुझे बताएँ कि इससे क्या सरपंच के सिवा हम किसी को लाभ मिल सकता है . . . ?

ग्रामीणों में कानाफूसी शुरु हो गयी. उन्हें एक एक प्रकरण याद आने लगा. मनहरण ने आगे कहा-क्या अब भी हम ऐसे भ्रष्ट और स्वार्थी सरपंच को बर्दाश्त करते रहेंगे. . . क्या हम छले जाते ही रहेगे. . . क्या हमने सोचने-समझने की शक्ति खो दी है. क्या हमें अब ऐसे नाकाबपोश सामजसेवियों की असलियत समाज के समक्ष नहीं रख देनी चाहिए. . . ।

मनहरण हाँफ गया था. सरपंच हड़बड़ा गया था और ग्रामीण उत्तेजित हो गए . किसी एक ने आवाज दी- सरपंच मुर्दाबाद. . . .  इसी के साथ पूरी जनता जनार्दन - मुर्दाबाद -मुर्दाबाद के नारे लगाने लगे. सरपंच वहां से खिसकने की सोच रहा था पर भीड़ से वह बचता तो बचता कैसे ? लोहा गरम था. मनहरण ने कहा- ऐसे सरपंच को हम पद से हटा कर ही दम लेंगें. . . । वहां सभी वार्डो के पंच भी उपस्थित थे. आनन-फानन में सचिव को बुलाया गया. सरपंच को अपदस्थ करने का प्रस्ताव तैयार किया गया. सरपंच के विपक्ष मे पूरे आठों पंच उतर आये. एकतरफा कार्यवाही हुई और सरपंच को हटाने की कार्यवाही कर शासन को भेज दिया गया. कुछ दिनों बाद गाँव में एक और नारा गूंजायमान हुआ- मनहरण भइया. . .

- जिन्दाबाद. . . . .

- मनहरण भइया. . .

- जिन्दाबाद. . .

-गांव का नेता कैसा हो

- मनहरण भइया जैसा हो. . . . ।

और इसी के साथ गांव जाग गया.

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साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

हलकू शहर से वापस अपने गाँव आ गया.उसके पास अब लबालब सम्पति थी.धन दौलत के कारण ग्रामीण उसे अब हलक ू कहने से परहेज करने लगे.अब वह सेठ के नाम से पुकारा जाने लगा.उसे भरपूर मान सम्मान मिलने लगा.जो लोग हलकू को देखकर कन्नी काटते थे वे ही लोग उसके करीबी हो गये थे.

आज से कुछ वर्ष पूर्व हलकू इसी गाँव का एक छोटा किसान था.यहां थोड़ी सी खेती थी. उसमें फसल उगा कर जीवन यापन करता था.एक समय नील गाय उनकी खेतो ं की फसलों को चर गयी.उसकी पत्नी मुन्नी ने कहा-यहां हर साल यही हाल होता है.फसल बर्बाद होती है.साहूकारों का कर्ज अदा नहीं होता.ऊपर से और कर्ज चढ़ते जाता है.इससे अच्छा तो शहर जाकर काम करते.वहां दो वक्त की रोटी तो चैन से मिलती. कुछ बचा भी लेते....।

मुन्नी की सलाह हलकू को पसंद आयी .उसने कहा- तुम्हारा कहना गलत नहीं.शहर में कैसी भी स्थित में दो वक्त की रोटी तो मिलेगी ही साथ ही मैं पूस की रात में ठण्ड सहने से भी बच जाऊंगा.यहां तो ठण्ड सहते प्राण ही निकल जायेगे.

दूसरे दिन वे शहर जाने निकल गये.सही समय पर वे रेल्वे स्टेशन पहुंचे.वहां उनके साथ जबरा भी आया था.रेल छूटने के बाद जबरा वापस लौट गया था- उदास..निराश...।

हलकू ने शहर की चकाचौंध को देखा तो देखते ही रह गया.उसने तो आज तक गांव में झोपड़ियां,टूटी-फूटी खपरैल का मकान ही देखा था.वहां गाड़ी के फिसलते चक्के को देख कर हलकू ने सोचा- मैंने ठीक ही किया जो कि जबरा क ो अपने साथ यहां नहीं लाया.यहां के फिसलते चक्के में आकर पीस जाता तो....?

हलकू ,मुन्नी को काम मिलने में देर नहीं लगी.उन्हें मकान बनाने का काम मिला.उनकी कमाई दिन दुनी रात चौगुनी होने लगी.जीवन में सुख आता गया.हलकू की इज्जत बढ़ती गई.एक अवसर ऐसा आया कि वह मजदूरी छोड़ कर स्वयं ठेकेदार बन गया.हलकू के ठेकेदार बनते ही मुन्नी घर पर रहने लगी.उनकी आमदनी बढ़ी साथ ही उनके रहन सहन में भी बदलाव आ गया.जहां हलकू सफारी पहनता था वहीं मुन्नी ऊंची से ऊंची साड़ी पहनने लगी.हलकू के पास अत्याधुनिक समान हो गये.टी.वी.,सोफा,कूलर,फ्रीज़,मोटर साइकिल के अतिरिक्त उसका बैंक बैलेन्स भी बढ़ गयी और मुन्नी जवाहरो से लद गई.अब उन्हें झोपड़पट्टी में रहना रास नहीं आ रहा था वे एक कालोनी मे रहने आ गये.कालोनी ऐसी थी जहां समाज के तथा कथित सभ्य और उच्चवर्गीय लोग रहते थे.वहां की महिलाओं से मुन्नी की जान पहचान बढ़ गयी.

एक दिन मुन्नी हरजीत कौर के घर गयी.वहां उसने बंटी नाम का एक विदेशी नस्ल का कुत्ता देखा.उसे जबरा की याद हो आयी. उसने जबरा का जिक्र हरजीत कौर के सामने नहीं किया.आखिर जबरा देशी नस्ल का कुत्ता था. उसक ा जिक्र करती तो उसकी इज्जत पर आंच आ सकती थी.शाम को जब हलकू घर आया तो मुन्नी ने बंटी की तारीफ में ऐसा पुल बांधा कि हलकू भी विदेशी नस्ल के कुत्ते से प्रभावित हो गया.उसने दूसरे ही दिन एक कुत्ता खरीद कर ले लाया वह भी विदेशी नस्ल का.उन लोगों ने उसका नाम टीपू रख दिया.

टीपू बहुत ही नखरे बाज था.वह दिन भर घर में उधम मचाता.मुन्नी को उसके साथ खेलने में खूब मजा आता था.टीपू जिधर दौड़ता मुन्नी उसके पीछे दौड़ती और उसे उठाकर चुम लेती.हलकू भी काम से आते ही उसके साथ खेलने लग जाता था.उसे कभी कंधे पर बिठता तो कभी सीने से चिपका लेता.उसे दुलारता-पुचकारता.

सुख सुविधा बढ़ने के साथ ही मुन्नी के शरीर में आलस्य घर करता गया.एक अवसर ऐसा आया कि उसने एक काम वाली रख ली,उसके हिस्से में भोजन बनाना छोड़ सभी काम आ गये.अब मुन्नी के पास बहुत समय खाली रहता था .समय का उपयोग करने उसने एक क्लब में सदस्यता ग्रहण कर ली.

जिस दिन मुन्नी ने सदस्यता ग्रहण की.वह बहुत ही खुश थी.उसे उस रात ढंग से नींद भी नहीं आयी.वह देर रात तक क्लब के बारे में ही सोचती रही.उसने क्लब की खूिबयां पड़ोसियो से सुन रखी थी.वह जब भी क्लब के संबंध में पड़ोसियों से सुनती उसके भीतर भी क्लब में सदस्यता लेने की चाहत होती और आज उसकी चाहत पूरी हो गयी थी.

पहले दिन मुन्नी सहमी-सहमी थी.वहां की एक एक गतिविधियों को वह जांचती परखती रही.पहले तो वहां की चकाचौंध ने मुन्नी को आश्चर्य में डाल दिया था.वह झिझक भी रही थी.आखिर वह गाँव की महिला थी.ऐसा वातावरण उसने कभी नहीं देखा था.पहला अनुभव था अतः उसमें झिझक होना स्वाभाविक था.धीरे से वह समय आया कि उसके भीतर का झिझक पूरी तरह खत्म हो गया और वह पूरी तरह खुल गयी.

समय अपनी धुरी पर चलायमान था.

एक रात हलकू ने मुन्नी के समक्ष गाँव जाने का प्रस्ताव रखा.मुन्नी ने सहजता पूर्वक उस प्रस्ताव का समर्थन कर दिया.जब से बहू बन कर आयी थी,मुन्नी उस गाँव की होकर रह गयी थी.उसे वह धरती अपनी धरती जैसी लगने लगी.और किसे अपनी धरती को देखने की चाहत नहीं होती होगी.उसे उन महिलाओं का स्मरण हो आया जो उसके खपते शरीर को देख कर उस पर दया किया करती थी.उनकी गरीबी पर तरस खाया करती थी.उन्हें सांत्वना दिया करती थी.

एक दिन वे शहर छोड़ गाँव आ गये.

जिस दिन वे गांव आये ,उनके साथ वे सामान थे जिसे ग्रामीणों ने कभी देखा ही नहीं था.ट्रक से उतरने वाले हर सामान पर ग्रामीणों की नजर जा टिकती.हलकू सीना ताने खड़ा समान उतरवाता रहा.मुन्नी भी वहीं पर खड़ी थी,वह स्वर्णाभूषण से लदी थी. गांव की महिलाएं उसके स्वर्णाभूषण को देखती रही.सामान उतर ही रहा था कि जबरा कहीं से लहसता हुआ आया.वह हलकू के पास पहुंच कर उसे सूंघने लगा.हलकू के फूलपेंट मे जरा सा दाग लग गया.हलकू को गुस्सा आ गया.उसने उसे दुत्कार दिया.जबरा ने एकटक हलकू को देखा.उसे विश्वास नहीं हो रहा था कि यह वही हलकू है जो उसके साथ चौबीसों घण्टे रहा करता था.पूस की रात में एक साथ खेत में रात काटा करते थे.आव से पार करते थे.वह मुन्नी की ओर लपका.मुन्नी एक कुत्ते को सीने से चिपका रखी थी.जबरा को देख कर वह कुत्ता कुई कुई करने लगा.जबरा वहां भी दुत्कारा गया.जबरा वहां से छटक कर दूर जा खड़ा हुआ.

हलकू के पास न सोने चांदी की कमी थी न आधुनिक सामानो का. रुपयों से वह भरा पूरा था.कुछ ही दिनों बाद उसके घर बिजली भी लग गयी. बिजली लगते ही उसके घर रंगीन टी.वी. शुरु हो गयी.अब तो हलकू के घर में वे लोग भी आने लगे जो पूर्व में हलकू से कोई मतलब रखने से भी कतराते थे.हलकू और मुन्नी का व्यवहार जबरा को चुभ गया था.वह समझ नहीं पा रहा था कि ये दोंनों इतना बदल कैसे गये.जबरा ने खाना पीना त्याग दिया.वह दिन भर हलकू के घर के सामने बैठे हलकू के घर की ओर निहारा करता था.कभी -कभार मुन्नी एक दो रोटी उसे फेंककर दे देती उसे वह सूंघता तो था पर खाता नहीं था.जबरा का शरीर जर्जर होता गया.एक दिन गॉँव में खबर फैली कि जबरा मर गया.खबर हलकू के क ान तक पहुंची.खबर सुनते ही हलकू अपनी उस खेत की ओर दौड़ा जहां जबरा मरा पड़ा था.यह वही जगह थी जहां वह पूस की रात में आव जला कर फसल की रखवाली किया करता था. आव से पार करने का प्रयास किया करता था .बीते दिनों की याद से हलकू की आँखें छलछला आयीं.तीन चार दिनो तक हलकू को जबरा की याद सताती रही फिर भूल गया धीरे धीरे जबरा को हलकू और मुन्नी दोनों.

हलकू ने किराना की दुकान डाल लिया था.उसकी दुकान चल पड़ी.सहना की दुकानदारी मार खाने लगी.सहना कर्ज में डूबता गया.एक अवसर ऐसा आया कि उसे हलकू से भी उधारी मांगनी पड़ी.खेती खार तो उसके बिक ही चुके थे .जब सहना ने हलकू से उधारी की मांग की तो हलकू को उस दिन का स्मरण हो आया, जब हलकू छोटा किसान था और सहना क ा उधारी अदा नहीं कर पाया था.कर्ज नहीं लौटा पाने के कारण सहना ने उसे भला बुरा कहा था. हलकू के मन में तो एक बार आया कि सहना को दुत्कार कर भगा दें पर उसने ऐसा नहीं किया.उसने सहना से कहा-सहना,उधारी लोगे तो लौटाओगे कहां से ? तुम्हारी खेती-किसानी तो बिक चुकी है और फिर तुम्हारे पास गिरवी रखने का भी कुछ नहीं है,तुम एक काम करो,तुम्हे व्यवसाय का ज्ञान है,तुम मेरे यहां काम करो मैं तुम्हें मेहनताना दूंगा.उससे अपना घर परिवार चलाना....।

सहना के पास हलकू की बात मानने के अलावा और कोई चारा नहीं था.

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साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

बादल की टुकड़ियों को देखकर विश्राम तिलमिला रहा था.मानसून के आगमन की खबर फैली और एक बारिस हुई भी.फिर बारिस थमी तो बरसने का ही नाम नहीं ले रही थी.इधर किसान खेत में हल चला चुके थे.बीज छींच चुके थे.बीज अंकुरित होने के बजाय सड़ने लगे थे.अकाल की स्थिति बनती जा रही थी.उधर देश की सीमा पर लड़ाई चल रही थी.घुंसपैठियों को खदेड़ने लगे थे रंणबांकुरे.इन चिन्ताओं से दूर देश के राजनेता चुनाव की तैयारी में लगे थे.

विश्राम का दिमाग सोच-सोच कर सातवें आसमान पर चढ़ा जा रहा था .खींझन इतनी थी कि उसके मुृंह से अनायस गालियां निकल पड़ती-स्साले हरामी के पिल्लों को चुनाव की पड़ी है.अब बनाएंगे अकाल और सीमा पर चल रही लड़ाई को चुनावी मुद्दा.इन नौंटकी बाजों का बिगड़ता भी क्या है ? देश की जनता की भावनाओं से खेलना ही एक मात्र कार्य है इन हरामखोरों का.हानि सहते हैं किसान.भूख सहते हैं इनके बच्चें.राष्ट्र को बचाने शहीद होते हैॅ सीमा पर डंटे सैनिक.उजड़ती हैं मांग उनकी पत्नियों की.उनके माता पिता को पुत्र खोना पड़ता है.पिता के हाथ का साया उठता है तो उनके बच्चे के सिर से.इन सफेदपोशों का क्या? शहीद के परिवार जन से मिल कर दो शब्द संवेदना के कह देंगे.मगरमच्छ के आंसू बहा देंगे और कर्म का इतिश्री. खटमल बन राष्ट्र का खून चूसने के अलावा और कर ही क्या रहें है देश के नेता?

विश्राम की अकुलाहट बढ़ती जा रही थी.उसकी नजर कभी आकाश की ओर दौड़ती तो कभी टेलीविजन पर जिसमें देश की सीमा पर हो रही लड़ाई को दिखाया जा रहा था.उसकी छटपटाहट बढ़ती जा रही थी.विद्रोह का मन बनता जा रहा था.वह स्वयं से लड़ रहा था कि उसकी पत्नी सुषमा आयी.बोली-कल रामधन आया था.कह रहा था-उसको उसकी मजदूरी चाहिए.वह बाहर कमाने-खाने जायेगा.

विश्राम ने ध्यान से पत्नी की बातें सुनी.उसके ओंठों पर मुस्कान तैर आयी.उस मुस्कान में कड़वाहट थी.वह बड़बड़ाया-स्साले लूच्चे-लंफगे और करेंगे भी क्या! पेट भरने शहर जायेगा और खपाएगा शरीर.यहां लंगोटी लगाकर रहेगा.शहर की हवा लगी कि टेकनी उतरता नहीं कुल्हे से . ... उसके विचार में परिवर्तन आया-समय की धारा के साथ न बहना भी समझदारी नहीं.ठीक ही है.यहां रह कर करेगा भी क्या! शहर जायेगा,रोजी-रोटी के साथ कुछ विकास भी तो करेगा.यहां भूख काटने को दौड़ेगी.कर्ज चढ़ेगा.चोरी चकारी की प्रवृत्ति बढ़ेगी.उसने सुषमा से कहा-तो उसे उसकी मजदूरी दे देनी थी.

-खेत का काम अधूरा पड़ा है.मजदूरी पाते ही वह शहर भाग जायेगा.कौन करेगा अधूरा काम ?

पत्नी के कथन में दम था .पर इसमें स्वार्थ भी लिप्त था.पत्नी के स्वार्थपन पर फिर एक बार विश्राम के मस्तिष्क में विचार कौंधा-स्वार्थी बन गई है सुषमा.अपने काम पूरा करने का आस दूसरे से क्यों ? हमारी इसी कमजोरी का ही तो फायदा उठाया जाता है.ऊंगली करता है और शेर के मांिनंद पंजा मारता है.खेत हमारा है इसकी देखरेख की जिम्मेदारी हमारी बनती है.इसे क्यों किसी दूसरे के कंधे पर डाले? क्या इतना कमजोर पड़ गया है खेतिहारों के कंधे ? मजदूर मेहनत करते हैं.मजदूरी से जीवन चलाते हैं.क्या उनकी मेहनताना रोकना मानवता है ? नहीं..नहीं..। उसने पत्नी से कहा- वह शहर जाये या और कहीं जाये.हमें क्या.उसने पूरी ईमानदारी और लगन के साथ काम किया है.उसे उसकी मजदूरी दे देनी थी.खेत का काम साधने का ठेका तो वह लिया नहीं है.

पत्नी चुपचाप चली गई.विश्राम घर से निकल खेत की ओर चल पड़ा.दूर से खेतों को देख कर उसका मन कुलबुलाने लगा.उसके मस्तिष्क में चिड़चिड़ाहट पैदा होने लगी.खेत की मेड़ पर पैर पड़े.नजर खेत में दौड़ी.जोंते-बोये खेतों की मिट्टी सूख चुकी थी.वह खेत के भीतर घुसा. एक मिट्टी का चीड़ा(टुकड़ा) उठाया.उसे हाथ से मसला.मिट्टी ऐसे मसल गयी मानो,सूखी रेत हो.उसने कुनमुनाया-इस बार भी अकाल सिर पर मंडरायेगा. कर्ज चढ़ेगा.खेती बिकेगी.हम किसानों से अच्छा तो उन मजदूरों के दिन कटते हैं.खेत में अन्न उपजे न उपजे उन्हें मजदूरी देनी ही पड़ती है.यहां अकाल पड़ा नहीं कि पलायन करने उतावले हो जाते हैं.शहर में मजदूरी कर जीवनयापन कर लेते है.हम मात्र पचास-सौ एकड़ जमीन होने की शेखी बघारते रह जाते हैं.हाथ क्या खाक लगता है.बाहर जाने का भी नाम नहीं ले पाते.झूठे लिबास ओढ़े,बड़े होने का दम भरते हैं.चार जानवर बांध कर बहाना बना देते हैं-बिना मुँह के जानवर को किसके भरोसा छोड़कर जाये ? मूक जानवरों पर दोषारोपण कर देते हैं.छिः कितनी घृणित मानसिकता है हमारी.

विश्राम अब पल भर वहां ठहरने के पक्ष मे नहीं था.खेतों की दुर्दशा ने उसके मन को झकझोर कर रख दिया.उसने एक बार टुकड़ियों में बिखरे बादल को देंखा.उसके मन में बादल के प्रति नफरत पैदा होने लगी.गुजरे वर्ष भी बादल घुमड़कर आते.बारिस किधर होती थी पता ही नहीं चलता था.परिणाम खेत में डाले गये बीज खेत में ही जल गए.पिछले वर्ष के अकाल की मार से उबर नहीं पाया था और इस साल भी अकाल सिर पर मंडरा रहा था.

विश्राम वापस बस्ती की ओर चल पड़ा.बस्ती में पहुंचकर देखा- मनहरण के घर के सामने भीड़ इक्ठ्ठी है.उसने डाकिया को लौटते देखा था.वह जानता था-मनहरण का इकलौता बेटा सेना में भर्ती है.उसकी भी ड्यूटी उसी क्षेत्र में लगी है,जहां गोली-बारुद चल रही है.उसके भीतर एक अज्ञात आशंका सिपचने लगी.उसकी चाल बढ़ गयी.उसे रोने की आवाज सुनाई देने लगी.वह समझ गया कि कुछ तो गड़बड़ है.वह नजदीक गया.वहां स्पष्ट हो गया कि मनहरण का इकलौता देश के लिए शहीद हो गया.मनहरण सिर पीट-पीट कर रो रहा था.विश्राम के पास उसे हमदर्दी के दो शब्द कहने के अलावा और कुछ नहीं था.

देश की सीमा की रक्षा करते हुए मनहरण का पुत्र शहीद हो गया,यह चर्चा कुछ दिनों तक रही फिर धीरे धीरे लोग भूलने लगे और एक दिन ऐसा अवसर आया कि सब भूल ही गए.

चुनाव सन्निकट था.अकाल ने अपन तेवर दिखा दिया था.अकाल की विभीषिका से बचने अधिकांश लोग गांव छोड़ चुके थे.रह गए थे तो विश्राम जैसे किसान.गांव सूना पड़ गया था.खेत सांय-सांय करने लगी थी.गांव के सूनापन को भंग करती तो चुनाव में लगी गाड़ियां.लाउडिस्पीकरों की आवाजें.

उस दिन विश्राम छपरी में खाट डाले लेटा था.पत्नी समीप बैठी चांवल साफ कर रही थी.गांव के चौराहे पर लाउडस्पीकरों से आवाज गूंज रही थी.विश्राम जानता था-आज दो प्रतिद्वंदी आपस मे टकरायेंगे.दोनो नेताओ के लिए दो राजनीतिक दलों मे बंटे ग्रामीण अलग-अलग मंच बना रखे थे.नेताओ ंके आगमन होते ही लाउडिस्पीकरों से उनके आगमन की खबर फैलाने का काम शुरु हो गया.आवाज विश्राम के कान तक पहुंची.उसने उधर ही कान दे दिया. आए नेता भाषण ठोंक रहा था-बार-बार चुनाव का भार जनता पर पड़ती है.दुख की बात है कि कुर्सी हथियाने के फिराक में सरकार गिरा दी जाती है.चुनाव की स्थिति निर्मित कर दी जाती है.यह वह नेता था जिसकी सरकार थी और वह गिर गयी थी.विपक्ष के नेता की आवाज आयी-आज देश में विदेशी शक्तियां काबिज होती जा रही है.देश की सीमा रक्षा करने हमारे जवान अपनी जान की बाजियां लगा रहें हैं.इस गांव की मिट्टी ने भी एक जवान ऐसा दिया जिसने अपनी धरती मां की लाज रखने अपनी जान दे दी.यदि हमारी सरकार रहती तो यह दिन देखने नहीं मिलता.

विश्राम एक-एक शब्द को गांठ मे बांध रहा था.शहीद के नाम पर नेता वोट बटोरने भाषण ठोंक रहा था और विश्राम के तन बदन में आग लग रही थी .वह खाट से उठा और पटाव की ओर बढ़ा.पत्नी सूपा चलाना भूल,विश्राम की ओर देखने लगी.विश्राम पटाव से नीचे आया तो उसके हाथ में वह लाठी थी जिसे उसने वर्षों पूर्व पकने के लिए रख दिया था.लाठी पक कर काली और वजनदार हो गई थी.विश्राम का चेहरा क्रोध से फनफना रहा था.पत्नी अवाक थी.उसने साहस एकत्रित कर पूछा- लाठी लेकर तुम किधर चले ।

विश्राम ने पत्नी पर एक नजर डाली .उसकी आंखों से क्रोध झलक रहा था.कहा- मंच पर जो राजनीतिक रोटी सेंक रहे हैं उन्हें इस लाठी का कमाल दिखाने...।

विश्राम जिधर से आवाज उभर रही थी उधर बढ़ गया....।

--

साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

संध्या होते होते अमृतपाल शराब के नशे में चूर हो जाता. कोई दिन ऐसा नहीं गया कि वह बिना शराब पिये घर पहुंचा हो। वह दिन भर रिक्शा खींचता और जो कमाई होती उसे शराब में उड़ा देता.उसकी पत्नी ने समझाने का बहुत प्रयास किया मगर वह असफल रही हार कर उसने समझाना छोड़ दिया. आलम यह था कि कई कई दिनों तक उसके घर चूल्हा नहीं जलता था पूरे परिवार को भूखे सोना पड़ता था. उसकी पत्नी रमशीला बच्चों को समझा - बुझा कर सुला देती थी. शराब के नशे में मदमस्त अमृतपाल आता और घर में धमाचौकड़ी मचाता सो बच्चे नींद से जाग जाते और घर का महाभारत देखते.

अमृतपाल की इस आदत से बच्चे सहम गये थे और स्थिति यहां तक निर्मित होती कि उन्हें भूख रहती पर भूख न लगने की बात कह देते.

आज भी अमृतपाल ने इतनी शराब पी ली थी कि उससे रिक्शे का हेंडिल सम्हाले नहीं जा रहा था मगर वह रिक्शे को ओटे जा रहा था.सड़क सूनी थी वरना दुर्घटना की संभावना बनती ही थी.घर के पास पहुंच कर उसने रिक्शा रोका. डगमगाते पैरों से घर के पास गया.वह कुंडी खटखटाना चाहा कि भीतर से उभर रही आवाज ने उसे क्षण भर के लिए रोक दिया.उसका बड़ा लड़का जीवेश अपनी मां से कह रहा था - मां, बाबू जी कब आयेंगे. जोर से भूख लगी है.आज खाना बनेगा न ?४

- हां - हां, क्यों नहीं ? आते ही होगें तुम्हारे बाबू जी, वे सामान लायेगे. मैं भोजन तैयार करुंगी.तुम सो जाओ. मैं भोजन बनने के बाद तुम्हें उठा लूंगी. ४

मां ने बच्चों का दिल रखना चाहा.

- कल भी तो तुमने यही कहा था, पर नहीं उठाया.मां मुझे कहीं से भी खाना लाकर दो न ? ४ यह था छोटा पुत्र अनय.

- मैं क्या कह रही हूं समझ नहीं आ रहा है क्या ? भूख- भूख - भूख ..... एक दिन नहीं खाओगे तो मर तो नहीं जाओगे....। ४

मां बच्चों पर बिफर पड़ी.बच्चे रोने लगे.अमृतपाल ने कुंडी खटखटा दी.रमशीला ने दरवाजा खोलकर देखा- सामने अमृतपाल खड़ा था. अमृतपाल के आगमन का भान बच्चों को हो गया.वे सहम गये.वे अच्छी तरह जानते थे कि यदि उन्होंने जरा सी भी उजर की तो अमृतपाल उनके साथ मां की पिटाई करेंगे.मगर आज अमृतपाल क ी आत्मा को बच्चों के वाक्यों ने छू लिया था.वह बच्चों की ओर बढ़ा.बच्चे भयभीत सा दिखने लगे.अमृतपाल ने अनय के सिर पर हाथ रखा.लड़खड़ाते शब्दों से कहा - क्यों बेटे, तुम्हें भूख लगी है न.... जोरों की भूख.....? ४

घबराया अनय मां की ओर सरका.अमृतपाल खाट तक आया.उस पर चित्त पड़ गया.कुछ क्षण वह स्वयं बड़बड़ाता रहा.बड़बड़ाते ही उसकी आंख लग गयी.

अर्धरात्रि में ही अमृतपाल की नींद उजड़ गई थी . शराब का नशा उतर चुका था. उसके कानों में बच्चों और पत्नी के वे शब्द फिर से गुंजने लगे.जो उसके आगमन पर उनके द्वारा कह गया था.अमृतपाल अपनी खाट से उतर कर बच्चों तक आया.बच्चें नींद में थे. उनके मासूम चेहरे को देख कर अमृतपाल का प्यार मचलने लगा.बच्चों को उठाकर वह सीने से लगा लेना चाहता था पर ऐसा कर नहीं सका.

सूर्य चढ़ा नहीं था कि अमृतपाल रिक्शा चलाने निकल पड़ा.संध्या होते - होते वह वापस होने लगा.बीच रास्ते में शराब की दूकान पड़ी.हां, यह वही शराब की दूकान थी जहां वह हर दिन दिन भर की कमाई उड़ेल देता था.अमृतपाल आज किसी भी कीमत पर मेहनत की कमाई को शराब में फूंकना नहीं चाहता था.शराब की दूकान के पास पहुंचते - पहुंचते उसकी आत्मा एक बार अवश्य डगमगाई थी.इच्छा हुई थी कि एक पाव खींच ले.मगर उसने शराब की दूकान को ऐसी हिकारत की द्य्ष्टि से देखी मानों उस दूकान ने उसका जीवन बर्बाद कर दिया हो. उसकी सुख - शान्ति छीन ली हो.एक प्रकार से उसे उस दूकान से घृणा सी हो गई.

अमृतपाल ने शराब दूकान के बजाय राशन दूकान के सामने रिक्शा रोका.वहां से जरुरी वस्तुएं खरीदी और अपने घर की ओर चल पड़ा.वह रिक्शा ओटते सोच रहा था - बच्चें जाग रहे होंगे.वे भोजन मांग रहे होंगे और रमशीला उन्हें धैर्य बंधा रही होगी......। इन्हीं विचारों मे खोया वह घर तक पहुंचा.रिक्शा सामने रोक कर उसने कुंडी खटखटायी.रमशीला ने दरवाजा खोला.अमृतपाल भीतर गया. उसने देखा बच्चें नींद में डूबे हैं.

अमृतपाल ने सामान नीचे रखा.कहा - क्या बच्चे बिना खाये सो गये ....? ४

- हां...। ४ रमशीला का संक्षिप्त उत्तर था.वह आश्चर्यचकित थी कि आज अमृतपाल के मुंह से शराब की दुर्गंध कैसे नहीं आ रही है.रमशीला ने अमृतपाल द्वारा लाये थैले को खोल कर देखा.उसमें चांवल दाल और सब्जियां थीं.अमृतपाल ने कहा - चलो, जल्दी भोजन तैयार करो...। ४

रमशीला भोजन तैयार करने जुट गयी.अमृतपाल बच्चों के पास आया तो बच्चें गहरी नींद में थे.उससे रहा नहीं गया.वह बच्चों के सिर पर हाथ फेरने लगा.स्पर्श से बच्चों की नींद टूट गई.सामने अमृतपाल को देख वे घबरा गये.अमृतपाल ने छोटे पुत्र अनय को गोद में उठा लिया.देवेश सहमकर उठ बैठा था.अमृतपाल ने अनय के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा - आज के भोजन में बड़ा मजा आयेगा ,क्यों बेटा आयेगा न....? ४

अनय चुप रहा.अमृतपाल ने जीवेश के सिर पर हाथ फेरा.कहा - क्यों जीवेश, जोर की भूख लगी है न ? ४

- नहीं , हमें भूख नहीं है. एक दिन नहीं खाने से आदमी मर नहीं जाता.४

जीवेश के शब्द से अमृतपाल दहल गया.कहा - नहीं बेटे, ऐसा नहीं कहते...? ४

भोजन तैयार हो चुका था.सब्जी की सुगंध बच्चों के नाक को तर गयी थी.भूख से उनकी लार टपक पड़ी.रमशीला ने भोजन परोसा.बच्चे भोजन पर ऐसे टूटे मानो बरसों बाद उन्हें स्वादिष्ट भोजन करने को मिला हो और शायद भविष्य में कभी नहीं मिलेगा.अमृतपाल को लगा कि वह अब तक गलत राह पर था.घर में कलह उसके कारण ही उत्पन्न हुई थी.उसने मन ही मन द्य्ढ़ निश्चय किया कि अब कभी वह शराब को हाथ भी नहीं लगायेगा.घर में दरिद्रता प्रवेश करने नहीं देगा..... कभी नहीं.....।

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साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

          

सम्पादक जी नमस्कार।

मैंने जीवन में अनेक अवसरों मनोकाश पर उभरे.. . . शब्दों की लड़ियों में दर्जनों अभिव्यक्तियां अपने डायरी के पन्नों में बिखेर रखी थी जिन्हें पुस्तक के रूप में प्रकाशित कराये जाने हेतु धनाभाव के कारण वे मेरी डायरियों  के पन्नों से बाहर नहीं आ सकी थीं, किन्तु अचानक एक दिन आपके स्तम्भ रचनाकार का अवलोकन कर, आपको रचनायें प्रेषण किये जाने की जिज्ञासा होने पर मैंने, उन्हें प्रेषित किया, आपने  रचनाकार में मेरी रचनाओं को प्रकाशित कर  मुझ गुमनाम को स्थान देकर अनुग्रहित किया है।

अब तक मैं रचनाओं के प्रकाशन उपरांत मिलने वाले आनंद से वंचित रहा हूँ, जिसका रसास्वादन आपने कराया है, इसलिये आपको धन्यवाद। कुछ और रचनाएँ प्रेषित हैं।


                    आत्माराम यादव पीव
प्रेमपर्ण,कमलकुटी,विश्वकर्मा मंदिर के सामने, शनिचरा मोहल्ला, होशंगाबाद मध्यप्रदेश
    मोबाईल-०९९९३३७६६१६] ०७८७९९२२६१६

सुख की चाह में-
      एक

मेरे जीवन में,
सुख का
भीषण अकाल पड़ा है,
दूर तक
नजर नहीं आती
राहत की
कोई बदली
दुख की भीषण
महातप्त आंधियों ने
बिबाईयों की तरह
अनगिनत दरारें
पाड़ दी है
मेरे जीवन में।
आकाश के अन्तिम छोर पर बैठा
जगतपिता ईश्वर
फिर भी
अनवरत पीड़ायें
बरसा रहा है
मेरे जीवन में
और
मैं उसकी
तथाकथित संतान
जाने क्यों?
उसकी वसीयत
सुख से
अब तक बेदखल हूँ।
 

    दो
असीम समृद्घिशाली जागीरें
मेरे जीवन की
बियावान धरती से सॅटकर
जगतपिता परमेश्वर ने
अपनी अन्य संतानों में
असमान वितरित की है?
जीवन की
इन सब जागीरों में
चन्द लागों ने
सुन्दरतम महल बनाकर
सुख के फाटक लगाये हैं
मेरे
ये तथाकथित पड़ौसी
अपने महल की
खिड़कियों से
रात गये बेईमान सुन्दरी को
काले लिवास का जामा पहनाकर
तिजौरियो में भरते हैं
और दिन के साफ उजाले में
वैभवता की शक्ल में
अपने कुचरित्र पर
ईमान का पानी चढ़ाते हैं।
उनके जीवन में झॅूठ
हरपल सत्य बनकर
प्रखरित होता है
उनके महल में पिछा
ये रंगीन कालीन
गरीब बेवशो की
मजबूरियॉ है।
जो उनका पेट काटकर
बिछायी गई है।
गुम्बज में चमकता
ये विदेशी झूमर
युवाओं के सपनों को चुराकर
जारजार होते दिलों को मिलाकर
आने वाली उनकी
हर रोशन जिल्दगी की
खूबसूरत रंगीन चमक से
चमकाया है।
महल में जगह-जगह 
लहराते ये रेशमी परदे
तुच्छ भेंटे है
मजबूर लाचारों की।
लम्बी कतारों को
नजरअंदाज कर
मामूली तोहफों के रूप में
कुछ चिर-परिचित
लक्ष्मी भक्तों ने इन्हें दी है।
जो फाईलों के ढ़ेर में
अपना कीमती वक्त बर्बाद नहीं करते
और पलक झपकते ही
कतारों में खडे
तथाकथित लोगों के
कीमती वक्त और भावी अरमानों को
धराशाही करके तुच्छ भेंटों से
अपना काम करवातें  है।
महल की शान बनी
ये  चमचमाती रंगीन गाडियॉ
करीनें से सजी
कई अमूल्य वस्तुएं
सिफारिश के
मजबूत थाल में
रिश्वत के साथ सजाकर
व्यवहार कुशलतारूपी
कपडे से ढँककर
उन्हें ईमानदारी के साथ दी गई है।
महलों में रहने वाले 
इन पडोसियों ने
कई उपहारों को स्वीकार करके
अपने व बच्चों के
भावी जीवन के लिये
हर तरह के साधन जुटाये है।
लेकिन उन्हें ज्ञात नहीं
उनकी इस आदत ने
कई अन्जान लोगों का
जीवन चौपट कर रखा है,
और कईयों को जीते जी ,
आत्महत्या/मरने को विवश किया है।


    तीन
्रगॉव के गरीब फजलू ने
जवान बेटियों की शादी
और अपने बुढापे के लिये
अपनी पुस्तैनी जमीन
और घर के जेवर बेंचकर
अपने इकलौते बेटे की
नौकरी के लिये
परिवार के लिये खुशियॉ 
खरीदनी चाही
पर अफसोस।
हाय री उसकी किस्मत
जीवन को बदरंग करके
उसने अपना सर्वस्य लुटाया
किन्तु नौकरी सुन्दरी ने
उसके बेटे को न अपनाया।
एक से एक खूबसूरत
नौकरी सुन्दरी
अय्यासी के लिये
साहब की सहचरी बनी है,
जिनके गले में बॉहे डाले
साहब मौज कर रहे है,
और गरीब फजलू
पैसा देकर आज भी
भटक रहा है
एक आशा लिये
आसमान ताकता
साहब कभी न कभी
दया करके
अपनी एक नौकरीसहचरी को
मेरे बेटे के साथ कर देगा
और उसका घर
खुशियों से भर देगा।
वर्षों से नौकरी सहचरी के पीछे भागते
मृगमरीचिका की तरह
फजलू की ऑखें धॅस गई है।
असमय ही झुर्रियों ने
उसके शरीर में
अपना जाल बिछा दिया है
हाथ में वैशाखी थामें
धीरे धीरे मौत की ओर सरकता
वह जिन्दगी को
तलाश रहा है
इसके परिवार में
भुखमरी संगनी बन गई है
जो घर में
बेहाल दमक रही है
और फजलू के
परिवार की लक्ष्मी
नौकरी सहचरी के रूप में
साहब के महल में चमक रही है।
   
चार
मेरे पडौसी के
खूबसूरत महल की नीव
अराजकता की
डॉटों/ पत्थरों से भरी गई है
इस महल की
सारी ईटें
भ्रष्टाचार की
मिट्टी से बनी हुई है
जिसमें अनीति की
रेत डालकर
कुटनीति की
सीमेंट का
मसाला मिलाया गया है।
पानी की जगह
मसाला /गारा बनाने
का काम लिया है
भूख से तडफते
छिथडों में लिपटे
बेबश
मजदूरिन की
पीठ से बॅधे
मासूम बिलखते
बच्चें के ऑसू से।
जिसे लिये
वह हरदम जुट जाती है
पूरी लगन से
पत्थर तोड़ने
ईटें  ढ़ोंने
और गारा बनाने ।
वह भूल जाती है
गर्मी के थपेडों को
शीत के प्रकोप को
और मूसलाधार वारिस को
अपना गॉव छोडकर
चल पडती है
बच्चे को
निबाला देने के लिये।
मेरे
तथा कथित पडौसी ठेकेदार
खुश है उसकी
कमाई खा-खा कर
और वह
अबला अनभिज्ञ है,
पूरी मंजूरी मिलने से ।
मेरा
पडौसी ठेकेदार
उसके लिये
माई-बाप और भगवान है।
क्योंकि वह
पेट भरने को काम जो देता है ?
जाने कब
वह समय आयेगा
जब
उसके व बच्चों के
तन पर
उजले कपडे होंगे।
और ये ठेकेदार
उसके पसीने की
कमाई खाना
बन्द करेगा?
शायद तब
जब वह
अज्ञानरूपी अंधकार को
शिक्षा के प्रकाश से दूर करेगी।
   

पॉच

महलों में रहने वाले
मेरे चन्द रईस पडौसी
रोज सॉझ ढले शराब की गिलासों में
सभ्यता क ी बरफ डालकर
शराफत के साथ
मजबूर कमसिन युवती के
गले में अपनी बॉहे डॉल
अपने मृत झुर्रीदार जिस्म को
उसके गरम खून से
जिन्दा रखने की कोशिश करते है
उस बेवश युवती के मन में
इस रोगग्रस्त समाज के प्रति
भीभत्स घृणा होती है
और चन्द रूपयों के
खनकने की खुशियों से
वह अपनी क्षुदाग्रस्त संतान को
दूध खरीदकर पिला सकती है।
और वृद्घ मॉ-बाप को खिला सकती है निवाला
डिग्रियों की धज्जियॉ उड़ाकर
मिटा सकती है बेरोजगारी
ढॅक सकती है तन
और जुटा सकती है
बेरहम मौसम से
लडने की ताकत।


    छह
हे जगतपिता परमेश्वर
सुना है तेरे ऑख
नाक कान नहीं होते
पर तू सब देख
सूंघ और सुन सकता है।
फिर भी
तेरी ओर से
चली आती है
बीमारियॉ परेशानियॉ
और मजबूरिया
जिन्हें जीने के लिये तूने
हम जैसों को चुनकर भेजा है।
जो झेल रहे हैं
तेरी ही संतानों के
जुल्म सितम
और तू
मूक दर्शक बना
देख रहा है
हम दबे हुए है
पीड़ाओं से सिर तक
हम मरकर भी
कोशिश करते है जीने की
हमारी जर्जर झोपडी में
छेद है हजारों
जिससे छन-छन कर आती है
एक दो पल की खुशी
हम तेरे
इस सौतेले व्यवहार को
जी रहे है मर-मर कर।
हर दम मन में
ये धुकधुकी लगी हुई है
कहीं हमारी
झोपडी न गिर जाये
अन्यथा ढ़ेर हुये
सपाट मैदान में
मेरे पडोसियों के साथ
स्वर से स्वर मिलाकर
चिटकती धूप
और बहती हवा
खूब जी भर कर
हॅसेंगे गायेंगें,
और मेरा मजाक उडायेगें
तब अपनी बेबशी पर मै
रो भी  नही सकॅूगा?


सात
हे जगतपिता परमेश्वर
जी चाहता है,
ईमानदारी का
गला घोटकर
अपने पडौसियों के
महल से चुरा लॅू
इस क्षणभंगुर जीवन के लिये
थोड़ी सी खुशियॉ।
जो उनकी इजाजत के बिना
किसी गैर के साथ
महल से बाहर,
कदम तक नहीं रखती।
बरसों हो गये इंतजार . . . करते
सिद्घान्तों पर चलते,
आदर्श निभाते
कृशकाय
बूढी नैतिकता को
उसूलों की पावन्दी से अपनाते।
कभी मेरा जीवन भी
हरा भरा था
जिसकी डालों पर हरदम
चहका करता था एक पखेरू
सुख
पर शायद इसे
एहसास हो गया था
कि मेरे जीवन में
भीषण पतझड
आने वाला है
इसलिये मुझे
मॅुह बिराकर
वह मेरे पडोसी के
उपवन में चला गया।
अब तू ही बोल -
जगतपिता परमेश्वर
मैं किन शब्दों में
आराधना करूॅ
जिससे फिर मेरा जीवन
हरा-भरा हो जावे
और मेरा
प्रिय पखेरू
सुख
हरदम  मेरे ऑगन में
चहकने लगे।

 

हॅसी में मेरे ही कफन का, मैंने साया छिपाया है
ओठों ने करके दफन सपने,
तेरे प्यार को भुलाया है।
सताया है रूलाया है
मुझे तेरी यादों ने बुलाया है।
चाहा था दिल में हम,
गम की कब्र खोदेंगे
दिल का क्या कसूर,
जो उसमें गम ही नहीं समाया है।
दिखती है मेरे लवों पर,
तुमको जमाने भर की हॅसी
हॅसी में मेरे ही कफन का,
मैंने साया छिपाया है।
तुम्हारी खुशी के लिये ही
ये शौक पाले थे मैंने
ये मेरी ही खता थी
जो तुमने बदनाम करवाया है।
गल्तियों को अपनी कहॉ,
छिपाओंगे तुम यहॉ पर
झुकाकर नजर गुजर जाना
तूने अच्छा ये सबब अपनाया है।
कसूर ऑखों में छिपाकर जब,
कसूरवालों ने अकडकर चलना सीख लिया
तब से हर शरीफजादा,
गली से चुपचाप निकल आया है।
दिल की बोतल से तेरी,
मैंने पी डाले न जाने कितने कड़वे घूंट
पीव जलजले जहर के मैँने,
खुदा की रहमत से पचाया है।
शमें रोशनी को कहीं और जलाओे तुम लोगों,
अंधेरों से हमें कुछ इस कदर प्यार आया है।

ये लड़के और लड़कियॉ
यौवन की दहलीज पर
कदम रखते
ये नडके और लडकियॉ
जब प्यार करते है
तो बस प्यार करते हैं।
अपने प्यार की अमराई में
ये जाति धर्म के तम्बू को
रिश्ते नातों की खॅूटी से बॉधते है।
थम जाता है समय भी
इनकी ऑखों में भॅवर बनकर
जीवन के भावी क्षितिज पर
ये कस्में वादों का
इन्द्रधनुष बनाते है।
ये लडके और लडकिया
जिन्दगी को सॅवारने के लिये
डूब जाते है एक दूसरे में
दो जिस्म एक जान बनकर
ये प्रेम के भॅवर में
प्यार करते है।
प्यार की बीथिका में
चलतें है ये स्वच्छंद होकर
प्रलय के दावानल से
अज्ञात दिवा स्वप्न की टूटन में
ये भूल जाते है इच्छायें,
बस प्यार करते है।
प्रेम कोष को अन्तस में छिपाये
बरसते है एक दूजे पर
प्यार की झडी लगाये
दुनिया से अंजान
उन्हें क्षमा करते
ये उनकी ईष्या को भुलाकर
पीव प्यार करते है
भक्त भगवान बनकर।


मूल्यांकन
प्यार के गीत गाता हूँ मैं,
तब मस्ती की महफिल सजाते हो तुम।
प्राणों की वीणा बजाता हूँ मै,
तब सच्चाई से दामन बचाते हो तुम॥
जिन्दगी से इश्क फरमाता हूँ मैं,
तब सभ्यता को मदिरा पिलाते हो तुम।
फूलों कीे सेज साता हूँ मैं,
तब नम्रता को नंगा नचाते हो तुम।।
दिल की बेचैनी को दुल्हन बनाता हूँ मैं,
तब कल्पनाओं को बैठे फुसलाते हो तुम।
अंगारों पर सहज सो जाता हूँ मैं,
तब शीतलता का बिस्तर लगाते हो तुम।।
सूली पर भी बैखौफचढ जाता हूँ मैं,
तब फलों को भी कॉटा बताते हो तुम।
ईश्वर से ऑखे मिलाता हूँ मैं,
तक ललनाओं पर जान लुटाते हो तुम॥
बहारों की गोद खिलाता हूँ मैं,
तब शरारतों से अपनी रिझाते हो तुम।
चाद-सूरज से रोशनी लुटाता हूँ मैं,
तब दिल की अंधेरी रातों में छिप जाते हो तुम॥
सूरज से नजरें मिलता हूँ मै,
तब चान्दनी की हॅसी ऑखों में डूब जाते हो तुम।
अपने गमों से पत्थर पिघलाता हूँ मैं,
तब अपनी खुशियों के लिये पत्थर को रूलाते हो तुम॥
बर्फ पर चिन्गारी जलाता हूँ मैं,
तब नाव में दीवाली मनाते हो तुम।
दुखों को गले लगाता हूँ मैं,
तब खुशियों को बैठे सहलाते हो तुम।
मौत को घर अपने बुलाता हूँ मैं,
तब जीवन का जश्न मनाते हो तुम।
अरमानों की लाश उठाता हूँ मैं,
तब मेहमानों को खाना खिलाते हो तुम।
परम्पराओं को कॉन्धा लगाता हूँ मैं
पीव बगावतों की गोली चलाते हो तुम।।


दहशत जमाने में छा रही है आज
दहशत जमाने में छा रही है आज,
जिन्दगी खौफ से मरे जा रही है आज।
कह दो मौत से अब डर रहा नहीं तेरा,
अब मौत को भी मौत, आ रही है आज।
आदमियत की अब कोई खैर नहीं इस जहॉ में,
घर-घर बन्दूकें बनाई जा रही है आज।
जो निकले थे घर से सेहरा खरीद लाने को
लिपटी कफन में उनकी लाश, आ रही है आज।
क्या खाक मनाओगे जश्न आजादी का तुम लोगों,
घर में ही अपने बेटियों की, इज्जत उतारी जा रही है आज।
उजड़ रही है बस्तियॉ, न जाने किसकी नजर लगी,
मौत काला टीका,घर घर लगा रही है आज।
अंधे,गूंगू और बहरे इन सत्ताधीशों से कोई कह दो
जागो, मदमस्तों नहीं तो अर्थी भी तुम्हारी सॅजायी जा रही है आज।

पुस्तैनी सम्पत्ति को बिगाड़ने की जरा सी भी इच्छा गोविन्द के मन में नहीं थी.वह चाह रहा था जिस तरह उसके दादा की सम्पत्ति को पिता ने सहज कर रखा और पूरी ईमानदारी के साथ उस सम्पत्ति की रक्षा की, उसी तरह उसका पुत्र जीवेश भी उसे सम्हाल कर रखे पर जीवेश खेती किसानी न करके व्यवसाय करना चाहता था. वह भी जमीन बेंचकर.गोविन्द की पत्नी मालती ने कहा - जब लड़का खेती किसानी करना ही नहीं चाहता तो उस पर जबरन क्यों लादते हो ? वह धंधा करना चाहता है तो जमीन बेचकर उसे रुपये क्यों नहीं दे देते ?

- मालती तुम समझती क्यों नहीं. आजकल व्यवसाय में भारी प्रतिस्पर्धा है. व्यापार करने वाले ही जानते हैं कि वे कि स तरह दो वक्त की रोटी लायक कमाते हैं । पत्नी के प्रश्न का उत्तर गोविन्द ने दिया.

- यहां लाभ - हानि सबके साथ लगा रहता है. हम भी तो खेत में बीज डालकर कभी - कभी हानि उठाते हैं. जैसे हम खेती में जुआ खेलते हैं वैसे ही उसे व्यवसाय में जुआ खेलने दो.लड़के का मन खेती - किसानी में बिलकुल नहीं है. जबरन थोपोगे तो वह मन लगाकर खेती करेगा क्या यह संभव है ?

- तुम्हारा कहना सच है पर वह निश्चय तो करे कि आखिर कौन सा व्यवसाय करना चाहता है उसे. किराना व्यवसाय में रखा ही क्या है. देख ही रही हो गॉँव में कितनी किराने की दुकान हो गयी है. दुकानदार दिन भर मक्खी मारते बैठे रहते हैं जिसका व्यवसाय चलता है तो वह उधारी.

- लड़का पढ़ा - लिखा है.खेती - किसानी करना नहीं चाहता. अपना हित - अहित की समझ उसे भी है. पढ़ - लिखकर हल जोंते क्या यह उचित है ?

- यहीं पर तो हम मात खा जाते हैं. यदि सभी पढ़े लिखे लोग यही सोचने लगे तब खेती कौन करेगा ? अन्न आयेगा कहॉँ से ? एक बात याद रखनी चाहिए कि जो जितना अधिक पढ़ा लिखा होता है. खेती करता है तो वह अधिक अन्न उत्पन्न करने की क्षमता रखता है .पढ़ा - लिखा व्यक्ति अत्याधुनिक कृषि करके कृषि उत्पादन में बढ़ोत्तरी करता है. पर पता नहीं आजकल के बच्चों को क्या हो गया है , जरा सा पढ़ा लिखा नहीं कि वह दूसरे के घर नौकरी करना चाहेगा या फिर व्यवसाय.

- तुम सदैव अपनी बात मनवाने तर्क पर तर्क देते हो.

- मैंने जीवन का कटु अनुभव किया है. मैं कोई जीवेश का शत्रु तो नहीं. मैं भी उसका हित चाहता हूं पर उसकी माँग मुझे उचित नहीं लगती. क्या तुम भी यही चाहती हो कि हम उस व्यवसाय के लिए अपनी जमीन बेचकर राशि झोंक दें जिसके विषय में हमें जरा भी जानकारी न हो ?

मॉँ - पिता में चल रहे वार्तालाप को जीवेश सुन रहा था. पिता के कठोर वाक्य को जीवेश सह नहीं सका. वह सामने आया. कहा - दद्दा आप व्यवसाय के लिए पैसा नहीं देना चाहते , न दे पर याद रखे मैं खेती - किसानी नहीं करुंगा यानि नहीं करुंगा.

- तेरी मर्जी में जो आता है कर... मुझे यह मंजूर नहीं कि खेती बेचकर व्यवसाय कराऊं .

बहस बढ़ती इससे पहले जीवेश वहां से चलता बना.

रात गहरा चुकी थी.जीवेश अब तक लौटा नहीं था.उसकी मां मालती की आँख नहीं लग पायी थी.गोविन्द खर्राटे भर रहा था.मालती की द्य्ष्टि बराबर दरवाजे पर टिकी थी. मालती को लगा रात गहरा चुकी है.उसने खर्राटे भर रहे गोविन्द को झकझोर कर कहा - तुम खर्राटे भर रहे हो.जीवेश अब तक नहीं आया है.

- आ जायेगा....।

गोविन्द ने करवटे बदलते हुए नींद में ही बड़बड़ाया.मालती सोने का प्रयास करती रही पर नींद आंखों से दूर हो चुकी थी. अब मालती के मन में तरह - तरह की शंकाएं - कुशंकाएं जन्म लेने लगी.उससे रहा नहीं गया तो उसने फिर से गोविन्द को झकझोरा - तुम्हें जरा भी चिंता नहीं. पता नहीं, लड़का कहां चला गया होगा ?

- तुम जैसी माताओं की वजह से ही संताने बिगड़ती है. अरी, वह आ जायेगा न. तुम खुद सोती नहीं जो सोया है उसे टोचक - टोचक कर उठाती हो. तुम चुपचाप सो क्यों नहीं जाती ? गोविन्द ने झल्लाकर कहा .

- तुम पता क्यों नहीं कर लेते ?

- क्या पता करुं, कहां पता करुं. गया है तो आयेगा ही ..... ।

और फिर गोविन्द की आँख लगने  लगी. रात गहराने के साथ मालती समय का अंदाजा लगाती रही. आधी से भी ज्यादा रात गुजर चुकी थी पर जीवेश का पता नहीं था.पुत्र के इंतजार में मां की आंख कब लगी वह जान नहीं पायी.पहट होने के साथ उसकी आंखें खुली.जीवेश आया नहीं था. गोविन्द अब तक नींद में ही था.मालती ने कहा - तुम घोड़े बेचकर सो रहे हो. तुम्हारा लड़का रात भर नहीं आया.इसकी जानकारी तुम्हें  है..... ?

अब गोविन्द रटपटाया. कहा - क्या... जीवेश रात भर नहीं आया... ?

- नहीं, मैं झूठ बोल रही हूं... । मालती ने झल्लाकर कहा.

नींद खुलते ही गोविन्द की आदत लोटा लेकर दौड़ने की थी पर आज वह इस आदत को बिसर गया.वह दौड़ा दिलीप के घर की ओर.दिलीप, जीवेश का अभिन्न मित्र था. जब दिलीप से उसने जीवेश के संबंध में पूछा तो दिलीप ने बताया - कल कोई तीन - चार बजे के लगभग उससे मेरी मुलाकांत हुई थी.उसके बाद वह कहां गया मैं भी नहीं जानता.वह कुछ उदास सा था. घर में कोई बात हो गयी क्या काका ?

- बात कोई बहुत बड़ी नहीं थी दिलीप.वह चाहता है मैं जमीन बेचकर उसे व्यवसाय करने पैसा दूं. अब तुम ही बताओ, क्या व्यवसाय करने के लिए जमीन बिगाड़ना अच्छी बात है ?

- काका आप भी न, यदि वह चाहता है व्यवसाय करना तो आप उसे रुपये क्यों नहीं दे देते ?

- पर मेरे पास इतने रुपये नहीं है कि बिना जमीन बिगाड़े उसे दे सकूं .

- एक ही तो लड़का है. उसकी इच्छा पूरी नहीं करोगे तो काम कैसे बनेगा. अब पता नहीं वह कहां गया होगा.मेरी मुलाकात तो हुई थी पर उसने ऐसा कुछ नहीं बताया कि वह कहां जायेगा.उसने इतना अवश्य कहा था - खेती - किसानी मुझसे होगी नहीं. कहीं जाकर नौकरी करनी पड़ेगी. मैं तैयार होकर पता करता हूं वह कहां गया होगा.... ।

दिलीप तैयार होने चला गया. चाय आ गयी थी. चाय की चुस्की लेते हुए उसका मन अशांत था.उसके भीतर एक प्रकार से अज्ञात भय घर करता जा रहा था. उसमें विचार उठने लगा था कि जीवेश कोई ऐसी - वैसी कदम न उठा ले जिससे उसे परेशानी में पड़ना पड़ जाये.चाय खत्म कर उसने खाली कप जमीन पर रख दिया. दिलीप तैयार होकर आया. गोविन्द ने कहा - मैं उसकी बात मानने तैयार हूं. भले ही जमीन बेचनी पड़े मैं उसे व्यवसाय करने पैसा दूंगा.

दोनों निकल पड़े जीवेश की खोज में. वे सारा दिन आसपास के गाँवों में जीवेश की खोज करते रहे. उसकी खोज खबर लेते रहे. सारा दिन निकल गया. जीवेश का कहीं पता नहीं चला.उनके अन्य संगी साथियों से जानकारी लेने का प्रयास किया गया पर किसी ने भी जीवेश के संबंध में कुछ नहीं बता सका.संध्या थके - हारे दोनों वापस गांव आ गये.घर पहुंचते ही उसकी पत्नी मालती ने पूछा - जीवेश का कहीं पता चला.... ।

- नहीं..... ।

गोविन्द पूरी तरह थक चुका था.

दिन सरकता गया.गोविन्द ने सभी संभावित जगहों पर जीवेश का पता लगाया पर आशा जनक खबर कहीं से नहीं मिली.इसी तरह दिन महीना में बदल गया और छै माह हो गये.जीवेश का कहीं पता नहीं चला.एक बार तो गोविन्द के मन में इश्तिहार निकलवाने का विचार आया पर वह यह सोच कर चुप रह गया कि जीवेश आज नहीं तो कल अवश्य आयेगा.गोविन्द आशावान था पर छैमाह बाद भी जीवेश न खुद आया और न उसकी चिठ्ठी - पत्री आयी.मां की आंखें  रो - रो कर पथरा गयी थी. सोच - सोच कर गोविन्द का मन बैठ गया था.


उस दिन छपरी की खाट पर पड़े गोविन्द कवेलू वाले छानी को निहार रहा था.पास ही बैठी उसकी पत्नी मालती चांवल साफ कर रही थी. सूपे की थाप के साथ ही गोविन्द का विचार रफू चक्कर हो जाता.अभी भी वह जीवेश के बारे में सोच रहा था. सूपे की थाप के बीच ही उसे अनुभव हुआ कि किसीने घर के दरवाजे की कुण्डी खटखटाया है. उसने मालती से कहा - लगता है किसी ने कुण्डी खटखटायी, देखो तो ?

मालती चांवल भरे सूपे को वहीं पर रखकर दरवाजे की ओर दौड़ी. दरवाजा खोलकर देखी. सामने पोष्टमेन खड़ा था. उसने एक पत्र मालती को थमा दिया.मालती गोविन्द के पास आयी.पत्र उसकी ओर बढ़ाते हुए बोली - पोष्टमेन आया था. ये चिठ्ठी दे गया...।

क्षण भर देर किये बगैर गोविन्द खाट से उठा. पत्नी के हाथ से पत्र लिया. तुरंत खोला.यह पत्र उसके पुत्र जीवेश का था. मालती ने पूछा - किसकी चिठ्ठी है ... ?

- जीवेश का... । गोविन्द की आँखों में चमक आ गयी.उसने चिठ्ठी पढ़ना शुरु किया. पता नागपुर का दिया था.वह तुरंत तैयार हुआ और घर से निकलने लगा.

मालती ने पूछा - कहां जा रहे हो... ?

- मैं दिलीप के पास जा रहा हूं. आज ही नागपुर जाकर जीवेश को ले आता हूं.

इतना कह कर वह दिलीप के घर की ओर दौड़ा. दिलीप घर पर ही था. दिलीप ने गोविन्द को देखकर कहा - कैसे आना हुआ काका... ?

गोविन्द ने चिठ्ठी उसकी ओर बढ़ाते हुए कहा - ये जीवेश की चिठ्ठी आयी है. वह नागपुर में रहता है.बेटा, उसे कैसे भी करके ले आओ. अब वह जो चाहेगा, वही होगा.

गोविन्द का मन अधीर हो उठा.दिलीप ने चिठ्ठी लेकर पढ़ा. कहा - काका, मैं कल ही नागपुर जाकर उसे ले आता हूं... ।

- कल क्यों .. आज क्यों नहीं ... ?

- अभी कहां गाड़ी मिलेगी काका.. कल सुबह की गाड़ी से चला जाऊंगा. देर रात तक उसे लेकर लौट आऊंगा.

गोविन्द का मन उदास हो गया.गोविन्द चाहता था - दिलीप अभी जाये. जितनी जल्दी हो सके लाल को लेकर आये पर यह संभव था ही नहीं उसे एक दिन प्रतीक्षा करनी ही थी.

दूसरे दिन दिलीप नागपुर जाने के लिए निकल गया.जब दिलीप प्रस्थान कर रहा था तो न सिर्फ गोविन्द अपितु उसकी पत्नी मालती ने भी कई बार कहा - उसे लेकर ही आना.वह जो चाहेगा, जैसा चाहेगा, अब घर में वही होगा.पुत्र के लिए वह धरती का मोह त्याग देगा कहा.

दिलीप, जीवेश के बताये पते पर पहुंच गया.दिलीप को देखकर जीवेश ने उसे गले से लगा लिया. दिलीप ने कहा - तुम यहां मजे में हो, वहां तुम्हारी मां का रो - रो कर बुरा हाल हो गया है. तुम्हारे पिता सोच - सोच कर दुबले हो गये हैं.. चलो गाँव.. ।

- नहीं मित्र, मैं गाँव नहीं जाऊंगा... ।

- तुम व्यवसाय करना चाहते हो न, मैंने काका को समझा दिया है. वे तैयार हैं, खेत बेचकर पैसा देने के लिए..।

- यदि नहीं दिए तो.. ?

- क्या तुम्हें मुझ पर विश्वास नहीं.. ?

यदि जीवेश का सबसे विश्वसनीय मित्र था तो वह दिलीप ही था . उसने कहा -तुम कैसी बातें करते हो.मुझे तुम पर उतना विश्वास है जितना स्वयं पर नहीं.. ।

- तो फिर चलो, मैं तुम्हारे विश्वास का खून नहीं होने दूंगा.

दिलीप तैयार होकर जीवेश के साथ गाँव आ गया. जीवेश के आने की खबर गॉँव भर दावानल की तरह फैली.गाँव के लोग उसके घर पर आने लगे. रामदीन ने कहा - बेटा, तुम चले गये. वहां सुख शांति से रहे होगे पर पता है तेरे माता - पिता पर क्या - क्या बीता होगा ? दिन रात ये तुम्हारे नाम लेकर जीते मरते रहे .

जीवेश चुप रहा. उसी समय घनश्याम ने आकर गोविन्द से कहा - मैंने जमीन का सौदा पक्का कर दिया है. कल हमें रजिस्ट्री कराने जाना है.

- हां , वह तो करना ही पड़ेगा.बारिस भी लगने वाली है. इससे पहले वह खेत में फसल डालने खेती की साफ सफाई भी तो करेगा. गोविन्द ने कहा.

रात होने के साथ एक - एक कर गाँव वाले गोविन्द के घर से छंटने लगे. दिलीप ने कहा - काका मैं भी चलता हूं. कल समय पर तैयार हो जाऊंगा. रजिस्ट्री कराने जाने के लिए.

अब घर में तीन जन रह गये थे.गोविन्द , जीवेश से यह पूछना तो चाहता था - जमीन बेचकर प्राप्त रुपये से कौन सा व्यवसाय करेगा पर वह डर रहा था कि बात बिगड़ न जाये. उसने जीवेश से कुछ नहीं कहा.

प्रातः होते ही गोविन्द उठकर तैयार हो गया. उसने मालती से कहा - तुम जमीन के कागजात थैली में डाल देना. ऐसा न हो कि जाते वक्त उसे ही लेना भूल जाऊं.

- तुम चिंता मत करो. मैंने सारे पर्चे पट्टे थैली में डाल दिये है.

माता - पिता की वार्तालाप जीवेश सुन रहा था.वह अंर्तद्वंद में फंसा था - वह जमीन बिकवा कर जो व्यवसाय करने को सोच रहा है क्या उचित है ? कहीं वह भविष्य सुधारने की फिराक में उसे अंधेरे में तो नहीं धकेल रहा है. दादा - परदादाओं की भावनाओें के साथ कहीं वह खिलवाड़ तो नहीं कर रहा है ? उसका एक मन कहता - वह जो करने जा रहा है वह उचित है पर दूसरे ही क्षण उसके दूसरे मन उसे भंवर जाल में फंसा देता.

दस बज चुके थे.गोविन्द तैयार हो चुका था.दिलीप और घनश्याम के साथ जमीन के खरीददार मंगलू उसके घर आया.गोविन्द ने जीवेश को आवाज दी.जीवेश घर पर नहीं था.उसने मालती से पूछा. मालती ने भी अनभिज्ञता जाहिर की. अब फिर गोविन्द के मन में शंका सिपचने लगी - कहीं जीवेश फिर से शहर की ओर तो नहीं भाग गया ? वह बाहर निकला. गाँव में तीन - चार लोगों से पूछा.पर किसी ने संतोष जनक जवाब नहीं दिया.खेत की ओर से चरवाहा सहदेव आ रहा था. उसने गोविन्द से कहा - तुम जीवेश को खोज रहे हो न ?

- हां, क्या तुमने उसे देखा है ... ?

- हां, हां... मैंने उसे तुम्हारी खेत की ओर जाते देखा है .

- क्या... ? गोविन्द की आँखें आश्चर्य से फटी की फटी रह गयी. एक प्रकार से भय भी उसके भीतर सिपचने लगा - जीवेश खेत में जाकर उलटा सीधा न कर ले. गोविन्द, घनश्याम , मंगलू और दिलीप के साथ खेत की ओर दौड़ा.वे खेत की मेड़ पर खड़े होकर एक एक करके आवाज दी. उधर से आवाज आयी - मैं लीमाही खेत में हूं. यहां आ जाओ .. ।

सबके सब लीमाही खेत की ओर दौड़े . उन्होंने देखा - जीवेश उथला खेत को खोदने में व्यस्त है. वे उसके पास गये. गोविन्द ने कहा - ये तुम क्या कर रहे हो ?

- दद्दा इस पर पानी नहीं चढ़ पाता इसलिए यहां पर अन्न उत्पन्न नहीं होता है.उबड़ - खाबड़ जमीन को समतल बनाने में जुटा हूं .... ।

- अरे , हमने तो इस जमीन को बेचने का निर्णय ले लिया है. अब इसकी सुधार की जिम्मेदारी हमारी नहीं. चलो, हमें इस जमीन की रजिस्ट्री कराने जाना है ... ।

- नहीं दद्दा अब यह जमीन नहीं बिकेगी.

और वह उथली जमीन को खोदकर नीचली जमीन में मिट्टी डालने लगा....

--

साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

मेरी इच्छा 

ईशान बेसब्री से अपने मम्मी डैडी के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। बंसी ने कई बार कहा की वह खाना खाकर सो जाए नहीं तो मेमसाहब नाराज़ होंगी  किन्तु वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था।

विभा और प्रसून दोनों मिलकर एक कंसल्टेंसी फर्म चलाते थे। बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा था। दोनों सुबह बहुत जल्दी ही एक साथ दफ्तर को निकल जाते थे और एक साथ ही लौटते थे। अक्सर उन्हें बहुत देर हो जाती थी। आज भी उन्हें देर हो गयी थी।

दरवाज़े की घंटी बजी। बंसी ने दरवाज़ा खोला। प्रसून घुसते ही सोफे पर पसर गया। विभा अपने बेडरूम में चली गयी। बंसी उन दोनों के लिए पानी लेकर आ रही थी। ईशान ने लपक कर उसके हाथ से ट्रे ले ली। पहले वह अपने डैडी के पास गया। प्रसून ने गिलास उठा लिया। ईशान ने कुछ कहना चाह तो उसे रोक कर वह बोला " बेटा जो कुछ भी कहना है अपनी मम्मी से कहो। आज मैं बहुत थका हुआ हूँ। यू आर अ गुड बॉय।" ईशान चुप चाप वहां से चला आया।

जब वह विभा के पास पहुंचा तो उसे देखते ही बोल पड़ी " ईशान तुम अभी तक सोये नहीं। कितनी बार कहा जल्दी खाना खाकर सो जाया करो। सुबह स्कूल जाना होता है।" उसने एक घूँट में ही सारा गिलास खाली कर दिया " उफ़ आज का दिन, बहुत  काम था। जाओ तुम जाकर सो जाओ। बंसी ईशान को सुला दो।" विभा ने बंसी को पुकारा। 

ईशान की बात उसके मन में ही रह गयी। खाना खाकर वह चुप चाप अपने कमरे में चला गया। विभा और प्रसून भी बहुत थके थे अतः बिना खाए ही सो गए। देर रात को विभा का गला सूखने लगा तो वह पानी पीने बहार डाईनिंग टेबल पर आई। वह गिलास में पानी डाल रही थी कि तभी उसकी नजर टेबल पर रखी नोटबुक पर पड़ी। उसके ऊपर एक प्लास्टिक का पेंसिल बॉक्स था जो नया लग रहा था। उस पेन्सिल बॉक्स के नीचे एक कागज़ दबा था। विभा ने लाइट जलाई और पढ़ने लगी 

" मम्मी  डैडी आज स्कूल में मेरी टीचर ने हमें 'मेरी इच्छा' विषय पर लेख लिखने को कहा था। मेरा लेख उन्हें बहुत पसंद आया। इसलिए उन्होंने खुश होकर मुझे यह पेंसिल बॉक्स ईनाम में दिया है। अगर वक़्त मिले तो नोटबुक में मेरा लेख पढ़ लेना प्लीज ........"

विभा ने नोटबुक खोली और पढ़ने लगी 

" भगवान आप तो बहुत दयालु हैं। सबकी इच्छा पूरी करते हैं। मेरी भी एक इच्छा है। मैं अपने मम्मी  डैडी के साथ एक दिन बिताना चाहता हूँ। जब वो सिर्फ मेरे साथ रहें। जब उनके पास कोई ज़रूरी काम न हो, उन्हें कोई ज़रूरी फोन न आये और न ही उन्हें किसी ज़रूरी काम के लिए जाना हो। उस पूरे दिन वो मेरे पास रहे और सिर्फ मुझसे बात करें। मैं उन्हें बहुत कुछ बताना चाहता हूँ किन्तु उन दोनो के पास समय ही नहीं रहता है। आप बच्चों की बात जल्दी सुनते हैं। आप मेरी यह इच्छा पूरी करेंगे न।"

लेख पढ़कर विभा की आँखें भर आयीं और वह फूट फूट कर रोने लगी।

प्रसून जब बहार आया तो देखा विभा रो रही है उसने घबरा कर पूछा " क्या हुआ क्यों रो रही हो"

बिना कुछ कहे विभा ने नोटबुक उसे पकड़ा दी। प्रसून भी लेख पढ़ने लगा।

कुछ देर दोनों शांत बैठे रहे। फिर उठ कर ईशान के कमरे में गए। वह गहरी नींद में सो रहा था। दोनों पति पत्नी उसके अगल बगल वहीँ पलंग पर लेट गए।

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व्यंग्य

शहर में साँड़

डॉ. रामवृक्ष सिंह

इधर हमारे शहर में साँड़ों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई है। और साँड़ से हमें अभिधा वाला अर्थ ही अभिप्रेत है, लक्षणा या व्यंजना वाला नहीं। यानी गाय का पुल्लिंगी, चौपाया पशु। इसलिए फिलहाल हम उसी पर चर्चा करना चाहते हैं। शहर में साँड़ का क्या काम? काम चाहे न हो, किन्तु वास्तविकता तो यही है कि हमारे शहरो में साँड़ों की संख्या में बहुत वृद्धि हो गई है। हम महानगरों की बात नहीं कर रहे। वहाँ साँड़ों की कमी मानव-प्रजाति के दो-पाए ही पूरी कर देते हैं। दरअसल हुआ यह है कि अब देश के कृषि-कार्यों में बैल की दरकार रही नहीं। लोग बैलों को हल में नाँधकर अपने खेत अब नहीं जोतते। जुताई का काम निजी अथवा भाड़े पर लिए गए ट्रैक्टरों से होने लगा है। यह किफायती, कम समय-साध्य और सुविधा-प्रद है। इस वजह से बैल हमारे खेती-बाड़ी के काम के लिए अप्रासंगिक हो गए। बैल-गाड़ियाँ भी अब इक्का-दुक्का ही दिखती हैं। गायें जब बछिया को जन्म देती हैं तो किसान लोग उन्हें पाल लेते हैं, क्योंकि बछिया वयःप्राप्ति के बाद ब्याएगी और दूध देगी। लेकिन यदि गैया बछड़ा ब्याती है तो लोग उसे कुछ दिन पालने के बाद घर से बेदखल कर देते हैं। लावारिस बछड़ा यदि गाँव में रहे तो अपनी माँ का दूध पी जाएगा, लोगों की फसलें खाएगा और मारा-कूटा जाएगा। इसलिए धीरे-धीरे उसे खदेड़कर शहर की और खिसका दिया जाता है। हमारे लिए जो कुछ भी आर्थिक दृष्टि से बेकार हो चुकता है, उसका प्रायः यही हश्र हम करते हैं। दुःख की बात है कि कई बार इस सूची में हमारे बूढ़े माँ-बाप, विक्षिप्त अथवा विकलांग परिजन भी शामिल हो जाते हैं। तो शहर में पहुँचा साँड़ कहीं न कहीं हमारी उसी स्वार्थपरता का प्रतीक है, जिसके शिकार हमारे रक्त संबंधी भी हो जाते हैं।

साँड़ और बैल में बुनियादी अंतर है। साँड़ गो-वंश का वह नर प्राणी है, जो प्रजनन-क्षमता की दृष्टि से अपनी नैसर्गिक अवस्था में होता है। बैल को यह सुविधा प्राप्त नहीं। उसके अंड-कोशों को कम उम्र में ही दबाकर ऐसा कर दिया जाता है कि वह प्रजनन में अक्षम हो जाता है। और फिर धीरे-धीरे उसे कृषि कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है। साँड़ से आप खेती का काम नहीं ले सकते, क्योंकि वह आपकी कोई बात नहीं सुनेगा और ज्यादा सताएंगे तो आपको उठा के पटक देगा, हो सकता है मार ही डाले। इस प्रकार साँड़ निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता और मस्ती का प्रतीक है। इसके विपरीत बैल कर्मठता, नियम को आँख मूँद कर मानने और परिश्रम-पूर्वक अपना काम करते जाने वाले जीव का प्रतीक है। इसीलिए ऐसे मनुष्य को कोल्हू का बैल कहते हैं, जबकि बेफिक्र और निर्द्वन्द्व घूमनेवालों को छुट्टा साँड़ कहा जाता है।

हमारे समाज की बहुत भारी विडंबना यह है कि उसमें नवोन्मेषिता का सर्वथा अभाव है। कोई सफेद या पीली चमड़ी वाला आकर बताएगा, तब हमारे दीदे खुल जाते हैं कि अरे यार, ऐसा हमें क्यों नहीं सूझा! इस समस्या का समाधान तो हमारे पास ही था। हमारे खेतों में बैल का काम नहीं बचा तो हमने बछड़ों को छोड़ दिया और वे साँड़ बन गए। साँड़ों से हमारी फसलों को नुकसान का अंदेशा था तो हमने उन्हें खदेड़कर शहरों की ओर ठेल दिया कि जाओ, शहर में रहकर अपने मानव-संस्करणों के साथ सत्ता में हिस्सेदारी करो। इसी का नतीजा है कि हर चौराहे, हर सड़क, हर डिवाइडर, हर सब्जी मंडी में हमें इफरात में सॉँड़ देखने को मिल जाते हैं। और यदि वहाँ कोई गाय भी आ जाए तो कहना ही क्या! उसके पीछे-पीछे तरह-तरह की मुद्राएँ बनाते कई-कई दिन तक ये भाई लोग घूमेंगे। वर्चस्व की लड़ाई लड़ेंगे, घायल होंगे, लंगड़े हो जाएँगे। फिर भी लड़-लड़कर पूरे वातावरण को अखाड़े में तबदील किए रहेंगे। यदि इस दौरान कोई वक्त का मारा इन्सान उनके लपेटे में आ गया तो उसकी जान बचने की कोई गारंटी नहीं। साँड़ों द्वारा इन्सानों के अपनी जान से हाथ धोने के कितने ही किस्से रोज अखबारों में छपते हैं।

शहर की सड़कों पर कुछ-कुछ दूरी पर आपको दो-दो, चार-चार के समूह में साँड़ और गायें बैठी दिख जाएंगी। गायें तो घूम-फिरकर सुबह-शाम अपने मालिक के घर पहुँच भी जाती हैं, क्योंकि वहाँ उनकी बछिया या बछड़ा बँधा होता है, जिसके बहाने उनका मालिक उन्हें बाँधकर दूध दुहता है और फिर छोड़ देता है। किन्तु साँड़ बेचारे लावारिस हैं। उनका कोई घर नहीं, कोई माई-बाप नहीं, कोई पूछनेवाला नहीं। इसलिए वे रात-दिन सड़क पर ही जमे और रमे रहते हैं।

आप वाहन लेकर निकलें तो पहला साबका इन साँड़ों से ही पड़ता है। वे सड़कों पर प्राकृतिक डिवाइडर और स्पीड-ब्रेकर का काम करते हैं। कई बार तो हमें लगता है कि लोक निर्माण विभाग और विभिन्न नगर पालिकाएं बेकार में ही सड़कों पर डिवाइडर तथा स्पीड ब्रेकर बनवाती हैं। ये काम तो साँड़ों से ही बखूबी लिया जा सकता है। और चूंकि साँड़ सचल होते हैं, इसलिए जहाँ जरूरत हो, वहाँ उन्हें हाँककर ले जाया जाए। ईंट-पत्थर और सीमेंट के डिवाइडर व ब्रेकर में सचलता की सुविधा की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

चूंकि गो-धन की संख्या हमारे देश में बहुत ज्यादा है और प्राकृतिक रूप से गायें बछड़ों को जन्म देती ही रहती हैं, इसलिए सड़क के डिवाइडर व ब्रेकर के रूप में इस्तेमाल करने के बाद भी साँड़ों की काफी बड़ी संख्या ऐसी बच रहेगी, जिसके लिए हमारे पास पर्याप्त काम नहीं होगा। इस समस्या का समाधान यह हो सकता है कि इस तरह के साँड़ों को वहाँ भेज दिया जाए, जहाँ उनकी माँग है।

साँड़ों की माँग दो प्रकार से है- गो-भक्षक मनुष्यों के दस्तरखान पर और हिंस्र, माँसाहारी जीवों के नैसर्गिक पर्यावास में। चुनाव हमें करना है। पहले विकल्प पर चर्चा नहीं करते, वह स्वतः स्पष्ट है। दूसरे पर कर लेते हैं, क्योंकि वह हमारे धर्म-भीरु समाज में निरापद है। हम अकसर देखते-सुनते और पढ़ते हैं कि अमुक-अमुक जगह पर बाघ, चीते आदि माँसाहारी जीव जंगल की सीमा से बाहर मानव-बस्तियों में घुस आए और उन्होंने मवेशियों अथवा इन्सानों पर आक्रमण कर दिया। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उन जीवों को जंगल में पर्याप्त आहार नहीं मिल पाता। आहार की खोज में वे जंगल के आस-पास के गाँवों की और चले आते हैं।

तो क्या यह उचित नहीं होगा कि हम बछड़ों और साँड़ों को जंगल में छोड़ आएँ? जंगल में रहने से उनके लिए खाने की पर्याप्त वनस्पति उपलब्ध होगी, शहरी सड़कों पर स्पीड ब्रेकर और डिवाइडर की भूमिका निभाने में उन्हें जो पीड़ा झेलनी पड़ती है, उससे सदा के लिए मुक्ति मिलेगी और माँस-भक्षी वन्य जीवों को शिकार की तलाश में गाँव-गाँव भटकने की जरूरत नहीं रह जाएगी। अकसर हम देखते हैं साँड़ें, गायें, कुत्ते और सूअर शहर के कूड़ा घरों में अपने-अपने काम की आहार-सामग्री खोज रहे होते हैं। शहर के कूड़ा-घर एक प्रकार के आधुनिक चरागाह हैं, जहाँ इन जीवों के लिए खाद्य-सामग्री मिल जाया करती है। उसी में कई बार कुछ दो-पाए भी कूड़ा-कबाड़ छाँटते-बीनते नज़र आ जाते हैं। यदि साँड़ों को ले जाकर जंगल में छोड़ा जा सके तो बाकी के प्रतिस्पर्धियों के कलेजे को कुछ ठंडक मिलेगी और साँड़ों को भी कचरा खाकर गुजारा करने की जिल्लत से मुक्ति मिल जाएगी।

कुछ लोगों को लग सकता है कि अरे, हमारे शहर भी जंगल ही बन गए हैं। हममें से बहुत से लोग तो अपने व्यवहार व आचरण में जंगली जानवरों को भी मात देते हैं। इसलिए साँड़ को जंगल भेजने की क्या जरूरत है! यह बिलकुल सच है कि हम इन्सानों ने अपने नगरों को जंगल बना दिया है किन्तु चौपाए साँड़ के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उस बेचारे को अपनी सुविधा के अनुरूप जंगल बनाना नहीं आता। इसलिए वह सड़कों, पार्कों, कूड़ा-घरों, चौराहों आदि पर पडा रहता है। दोपाए साँड़ को हर जगह मन-चाहा जंगल बनाने की सुविधा और काबिलियत उपलब्ध है। वह जहाँ चाहता है, जंगल रच लेता है, जहाँ उसका मन करता है वहीं जंगल-राज चला लेता है। शहर में आ बसे दोपाए साँड़ों पर तो हमारा वश चलने वाला नहीं है, किन्तु चौपाए साँड़ों का तो उपाय निश्चय ही किया जा सकता है। पिछले करीब ढाई हजार वर्षों से गो-वंश की पूजा करते आ रहे भारतीय समाज को इस विषय में गहराई से सोचना चाहिए।

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आर.वी.सिंह/R.V. Singh
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

नियति चक्र

-डॉ बच्चन पाठक 'सलिल 

 

मगध साम्राज्य के राज वैद्य आचार्य जीवक को उस रात  नींद नहीं आरही थी अपने प्रसाद में ,अपने पर्यंक पर लेटे लेटे वे विचारों में मग्न थे .उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि नियमित दिनचर्या वाले होने पर भी उन्हें रात के तृतीय प्रहार में अनिद्रा का भार क्यों वहन करना पड़  रहा है . 

आचार्य जीवक ख्याति प्राप्त वैद्य थे ,सम्राट बिम्बसार ने उन्हें राज वैद्य नियुक्त किया था .सुंदर ,भवन दास दासियाँ ,गएँ और आने जाने के लिए सुंदर रथ -सब कुछ उन्हें उपलब्ध था .वे सप्ताह में एक दिन जाकर राजघराने के सदस्यों के स्वास्थ्य की जाँच कर आते थे ,इसके बाद उन्हें कोई राजकीय दायित्व नहीं था .पर वे प्रतिदिन प्रातः चार पांच घंटे अपने आम्रकुंज स्थित भवन में बैठ कर जन  साधारण की चिकित्सा करते थे कभी कभी कनिष्ठ वैद्य आकर उनका निदान देखते और आवश्यक परामर्श लेते ...

आचार्य जीवक की ख्याति सम्पूर्ण आर्यावर्त में व्याप्त थी ,उन्होंने बिम्बसार की अनुमति से भगवान बुद्ध और अवन्ती नरेश चन्द्र्प्र्द्योत की चिकित्सा की थी .इससे बिम्बसार अत्यंत प्रसन्न रहते थे .आचार्य जीवक कभी किसी से कोई शुल्क नहीं लेते थे ... राजगृह ,वाराणसी ,एवं वैशाली के कई कोटि पति उनकी चिकित्सा से स्वस्थ हो चुके थे ..वे जीवक को सहस्रों स्वर्ण मुद्राएँ दान स्वरूप देना चाहते थे किन्तु जीवक विनम्रता पूर्वक उन्हें अस्वीकार कर देते थे ,वे कहते --''मै अकेला हूँ ,सम्राट ने आवश्यकता की सभी सामग्रियां दे राखी हैं .प्रतिवर्ष एक चीनांशुक उत्तरीय और एक सहस्र स्वर्ण मुद्राएँ भी देते हैं,मै और लेकर क्या करूँगा ?..आप इस राशी से किसी अनाथ या विपत्ति ग्रस्त की सेवा कर दें और इसका प्रचार भी नहीं करें ,मुझे संतोष होगा ,कि मेरी सेवा का पुरस्कार मिल गया है ''

उस दिन आचार्य जीवक करवटें बदलते हुए सोच रहे थे --''मै आयुर्वेद का विद्यार्थी हूँ ,दर्शन का मैंने विधिवत अध्ययन नहीं किया ,इस लिए जीवन क्या है इसकी कोई परिभाषा नहीं दे सकता --पर मेरा अपना जीवन ही इस तर्क का साक्षी है कि मानव जीवन सरल रेखा में गमन नहीं करता ..अपनी प्रतिभा और पुरुषार्थ का जहाँ महत्व है वहां नियति के परिहास से भी अस्वीकृति नहीं प्रकट की जा सकती ''

उस शाम भोजन के बाद सेवक रजत पात्र में गो-दुग्ध दे गया था ,जीवक ने परिहास के लिए पूछा --''चन्दन तुम्हारी घरवाली का कुछ पता चला ?''

चन्दन ने दार्शनिक मुद्रा में कहा --''स्त्री का चरित्र ब्रह्मा भगवन भी नहीं जानते ,मेरी घरवाली पश्चिम से आये श्रेष्ठिन के साथ भाग गई ,मुझे इसका पता तब चला जब वे मगध की सीमा पार कर गए थे ...उसके जाने का मुझे दुःख नहीं है ...वह पांच साल की एक पुत्री छोड़ गई है -अब उसका पालन पोषण कैसे होगा ?मुझे यही चिंता है ''..

जीवक ने कुछ सोच कर कहा --''एक दासी रख लो -वह लालन पालन करेगी ,सारा व्यय मेरी ओर से वहन होगा ;''

चंदन संतुष्ट मुद्रा में चला गया था .आचार्य जीवक सोच रहे थे की चंदन ने श्लोक का एक भाग ही सुना है --त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम -देवो न जानती कुतो मनुष्यः ''और वे अपने जीवन पर दृष्टिपात करने लगे .उनके अज्ञात माता पिता ने उनके जन्म के बाद तत्काल उन्हें घूरे पर फेंक दिया था .श्वेतकेतु नामक एक सहृदय ब्राह्मण ने उनका पालन किया था ...पलक पिता श्वेतकेतु एवं माँ पंचमी देवी के असीम स्नेह से ही वे बड़े हुए ...पिता ने उन्हें सुशिक्षित करने का पूर्ण प्रयत्न किया -यज्ञोपवीत कराया -घर पर ही शिक्षा दी -,वे उन्हें कर्मकांड या ज्योतिष पढ़ना चाहते थे पर उनकी रूचि आयुर्वेद की ओर थी ,पिता सहृदय थे ,उन्होंने अन्यथा नहीं लिया ,और मगध के एक प्रसिद्द वैद्य के पास जीवक को रखा .वैद्य जी लालची थे ,वे रोगियों को अधिक दिनों तक लटकाए रखते ,और    धन संग्रह करते ..एक बार वैद्य जी  काशी गए ,जीवक को प्रभार दे गए ,जीवक ने अल्पकाल में  काफी ज्ञान  कर लिया  उन्होंने ऐसी ओषधियाँ दीं -निदान के बाद ठीक पथ्य बतलाया कि साल साल भर  से आने    रोगी एक महीने  में ठीक हो गए .

वैद्य जी  लौटे और जीवक पर  नाराज हुए बोले ,--  तुमने मेरा व्यापर चौपट कर ,दिया हजारों स्वर्णमुद्राओं की हानि कर दी ,मेरे घर से निकल जाओ ''...भग्न ह्रदय जीवक  वापस लौटे .

पिता श्वेतकेतु भी नहीं रहे ,जीवक पुनः एकाकी रह गये .एक दिन वह राजगृह के वन मी अकेले बैठे थे ,आत्महत्या करने की इच्छा हो रही थी ,अचानक एक ओर से कोलाहल सुनाई  पड़ा ,सेनापति का एकलौता पुत्र मित्रों के साथ मृगया के लिए आया था ,यहाँ उसे सांप ने काट किया ...उसकी हालत अत्यंत चिंतनीय थी .घोड़े पर लेजाकर राजगृह जाना सम्भव नहीं था .जीवक ने उन लोगों से धैर्य  धारण करने के लिए कहा ,कटार से घाव चीर कर विषाक्त रक्त बहा दिया और एक जड़ी का लेप लगा दिया -----उस युवक की चेतना वापस आने लगी ,उसने पानी माँगा ---जीवक ने मना कर दिया और कुछ पत्तियों का रस उसकी जीभ पर टपका दिया ---एक घटिका में युवक स्वस्थ हो गया और अश्वारोहण कर वापस आ गया .

दुसरे दिन जीवक के दरवाजे पर स्वयम सेनापति उपस्थित थे ,बोले --''ब्राह्मण  !..तुमने पुत्र की जान बचा कर मुझे जीवन दान दिया है।।।बोलो क्या चाहिए ?''

जीवक ने विनम्र स्वर में कहा --''मुझे कुछ नहीं चाहिए ,एक अनाथ को इतना सम्मान दिया ,मेरे लिए यही बहुत है ''

सेनापति ने इस घटना की चर्चा महाराज बिम्बसार से की -जीवक को दरबार में बुलाया गया ,महाराज ने --पूछा ''तुम  ओषधालय में काम करोगे ?तुम्हे प्रतिदिन एक स्वर्ण मुद्रा दी जाएगी ''

जीवक ने हाथ जोड़ कर कहा --''महाराज की जय हो ,मै आयुर्वेद का विधिवत अध्ययन करना चाहता हूँ ,मेरी इच्छा है कि तक्षशिला जाऊं और आयुर्वेद का अध्ययन करूँ ,पुनः वापस  आकर मगध की सेवा करूँ ''....महाराज प्रसन्न हो गए --इस युवक के तक्षशिला जाने का प्रबंध किया जाये ,...तक्षशिला में सबका प्रवेश नहीं होता ,उस विश्वविद्यालय में द्वारपडित  परीक्षा लेते हैं ..मगध के कई वैद्य निराश हो चुके हैं ''

जीवक ने कहा --''महाराज निश्चिन्त रहें ..मै मगध हूँ ,मगध और राज्य की प्रतिष्ठा बढाकर वापस  आऊंगा ''

तक्षशिला में जीवक का प्रवेश हुआ ,उन्होंने परिश्रम और योग्यता से पढाई की ,विश्वविद्यालय की एक घास अनुपयोगी समझ कर ,काट कर फेंक दी जाती थी ,अनुसन्धान द्वारा जीवक ने बताया कि वह चरम रोग दूर करने की ओषधि है --परीक्षणों के बाद उनका शोध सही पाया गया ,उन्जे आयुर्वेद महारथी ''की उपाधि मिली .

आचार्य जीवक वापस आये -राजवैद्य नियुक्त किये गए ,उनकी ख्याति देश -विदेश में फ़ैल रही थी .कई ब्राह्मण अपनी कन्याओं के प्रस्ताव लेकर आये पर जीवक न तो अपने अनुकूल पत्नी पा सके और न कभी विवाह की उत्सुकता ही उनमे जगी -संघर्षों ने ऊनकी रागात्मक वृत्ति को मानो सुख दिया था .

मगध की शाल्व्सी की उन्होंने चिकित्सा की थी ,शाल्व्सी उनके सौम्य व्यक्तित्व से आकर्षित हुई ,उसने निवेदन किया --''मै  आपसे विवाह करना चाहती हूँ ,मेरे पास कोटि स्वर्ण मुद्राएँ हैं ,मै सब आपको समर्पित कर दूंगी .मै कला प्रदर्शन भी छोड़ दूंगी ,;;

संकोची जीवक ने कहा था --'',देवी कला ईश्वरीय दें है ,इससे आप लोक रंजन करें ,मै वैद्य हूँ ..मुझे सेवा करने दें ,स्वर्ण और सूरा में मेरी कोई आसक्ति नहीं है ''

बाद में मालूम हुआ कि मगध के एक सेनापति की दृष्टि शालवसी पर थी ,उससे घनिष्ठता के कारण सेनापति ने एक सामंत की हत्या करवा दी थी .महाराज बिम्बसार की अनुमति से जीवक अवन्ती गये एवं महाराज चंद्रप्रद्योत को स्वस्थ किया .राजकुमारी वासवदत्ता भी उनके सम्पर्क में आई ..राजकुमारी ने प्रकारांतर से अपना प्रणय निवेदन किया -राजकुमारी के रूप और गुण पर जीवक प्रभावित थे पर उन्हें तक्षशिला के आचार्य का कथन याद आया ---'वैद्य को संयमी होना चाहिए ,उसे राजनीति और राजपुरुषों से मोह नहीं रखना चाहिए यही उसके और प्रजा के हित में होता है ''बादमे वासवदत्ता का विवाह कोशाम्बी के रजा सम्राट उदयन से हुआ .

जीवक सोच रहे थे --मेरा जीवन क्या है ?..घटनाओं की श्रृंखला है ,बचपन में ही कूड़े के ढेर पर मर गया होता या राजगृह के वन में आत्महत्या कर ली होती ..सुन्दरियों के प्रणय जाल में राजकोप का भागी हो सकता था ...पर अभी तक परमात्मा ने मुझे जीवित रखा है --शायद वह मुझे लोकसेवा के लिए ही जीवित रखना चाहता है .

उनका सिर भरी हो रहा था ,जीवक उठे ,शीतल -जल पान किया ...और आंवला उठाकर कूटने लगे ....!

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