सोमवार, 15 अप्रैल 2013

आत्माराम यादव, पीव की 5 कविताएँ


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प्रथम कविता
जीवन की तस्वीरें
एक-
जीवन,
स्नेहिल नजरें
वंश की चाह में
मेरी प्रतीक्षा करती है।
तब नारी के सन्सर्ग से
पुरूष को मिले
कौस्तुभि सुख की
मीठी भीनी बयार में
तुम,          
स्नेह पुष्प बनकर
खिलते हो।

दो-
जीवन,
कामातुर नजरें
वासना की अंधी चाह में
विसंगति की चौखट पर
इंसानियत का रक्त करती है
तब कलुषितता के गर्भ से
भीभत्स अनैच्छिक 
त्रासदीमय सुख की,
पाशविक जहरीली बौछारों में
तुम,
शंकित पुष्प बनकर उगते हो।


तीन-
जीवन,
बेवश अबला की नजरें
पेट की दाह/चाह में
अनैच्छिक मन की चौखट पर
बलात्कार को स्वीकारती है
तब मजबूरिन अबला के गर्भ से
सभ्ययता के
शर्मनाक सुख की
बदसूरत ओलों की बौछार में
तुम
कलंकित बनकर उपजते हो।

चार-
जीवन,
आत्मा प्रेतात्मा के बीच
सृष्टा के गौदाम ब्रम्हाण्ड में
तुम,
सदियों से बिखरें पडे हो
जहॉ पाप पुण्य का ये जगत
तेरे अंकुरण की भूमि तलाशता है।


पॉच-
जीवन,
देह की क्षणभंगुर
चादर के करीने से लिपटा
समय की गोद में पला
अहंकार के पानी से धुला
अपने पन के मीटर से नपा
तू,
अन्तस /अन्दर से सिकुडा
इस व्योम में देह तलाशता है।

छह-
जीवन,
अपने अस्तित्व को
सदियों से स्वार्थ के सागर में
उन्माद की नौका/नाव पर
संसार की पतवार लिये
तुम
अज्ञात किनारों को खोज रहे हो
एक तन को पा, पूर्णता से जीने के लिये।

सात-
जीवन,
श्रद्धा के अलौकिक शिखर पर
धर्म के अनुगमन राही
प्रेम के पग रखता है
तब जगत की करूणा के लिए
तुम,
भगवान बन अवतरित होते हो।

आठ-
जीवन,
मानवी बस्तियों से
तुम उजाड दिये जाते हो
मौत के आगोश में
खुद अपने ही आवरणी
क्रूर मानवी पंजों से ही
तुम,
खामोश सुला दिये जाते हो
फिर मौत की बस्ती श्मशान से
तुझे,
कभी उजडने का भय नहीं रहता।

नौ-
जीवन,
अनगिनत दुख के परचम
कभी तेरे कद्रदानों की परीक्षायें लेते है
जो गहरी पीडाओं में तपकर बच जाये
वह मौत की हथोड़ी से
यम के बेशुमार हाथों के बीच
मरने /पिटने से नहीं बचता है
तब अन्तिम कसौटी में
तुम,
कुन्दन बनकर निखरते हो।

दस-
जीवन,
कभी तुम
बुद्घों के झौकें में आये
धरती पर सौन्दर्य बिखरायें
आनन्द का माधुर्य लुटायें
अपनी पूर्ण निजता को जी गये हो
अब मुर्दों के हाथों बेवश
तुम,
अपने अतीत रोशनपल की
अमिट प्रतीक्षा में हो।

ग्यारह-
जीवन,
राहू-केतु की कुदृष्टि
ओर शनिचराधि के प्रकोप से
नक्षत्रों का भागना
अनवरत राशियों का गिरना
अन्तरिक्ष में तारों की टूटन
तेरा,
कहीं अगला पिछला
पाप-पुण्य तो नहीं?

बारह-
जीवन,
सनातनकाल से
मानवी शिशु के रूप में
तेरे आगमन  जन्म पर
सूदक/छूत का आडम्बर
और उसका थोथा प्रदर्शन
तेरा,
कहीं अपमान तो नहीं है।

तेरह-
जीवन,
एक नेत्रहीन में जन्म लेकर
सुख-दुख को जानते हा?
निजी अनुभव को पहचानते हो?
आकृतियों को अन्तस की ऑखों से,
या स्पर्श इन्द्रियों से
बिन देखे अनुमानित करते हो
अन्तस से अन्तस का
तम को खोजे जाने की
तुम,
कहीं कोई खबर दे सकते हो?

चौदह-
जीवन,
अन्तस की अंधियारी रातों में
मस्तिष्क के रजातपट पर
तुम,
स्वप्न बनकर उभरते हो
जिसे पूर्ण साकार करना
मानवी गरिमा को विकसित कर
तेरा शाश्वत अभिनन्दन है
फिर इन्द्रधनुष के सप्त रंग के
तुम,
मानव में निखरते हो।

पन्द्रह-
जीवन,
दुख के अथाह सागर में
आशा की नौका पर
सवार होकर तुम 
आनन्द की पतवार बनते हो
जिसे सुख से हर्षित हाकर जीना
तेरा
अभिनन्दनीय शुभारंभ है
जो सभी को सुख बॉटने से
तुम
दुख से उबारते हो।
   सोलह-
जीवन,
संसार असारता के
दीपक में
मानवी आशा का तेल
चुकने पर
तुम,
एक चुनौती बनते हो
जिसे आत्मविश्वास की बाती से
संकल्पित मानव चेताता है
तब
सत्यम,शिवम के रूप में तुम सॅवरते  हो।

                    द्वितीय कविता

ये गुल हमने खिलाये हैं
परिवर्तन के झुनझुनें
कुछ हमने बजाये हैं
बेसहारा मजबूरों के चेहरे
उसे सुनकर मुस्कुराये हैं
तुमने दबा दिये सारे स्वर
कुछ ऐसे ही भूकम्प जगाये हैं।
जनक्राति के गीत
कुछ हमने गाये हैं
पराधीन भाबुक मन ने
अपने दिल में सजाये हैं
किन्तु पुराने कानों के परदों ने
कुछ जलभुनकर ये ठुकुराये हैं।।
अरमानों क ज्वाला मुखी
कुछ हमने जगाये हैं
सूखे ऑसुओं की जलती ऑखों ने
अभावों से भी शीतल बताये हैं
सब अपनी ने ही दमन किये
कुछ ऐसे धन के अंबार लगाये हैं।।
महाप्रलय की अंधड ऑधी
कुछ हमने चलायी है
उखड जाये सब अंधविश्वास डूंड,
अपने जन्म पर युवा चेतना हर्षायी है।
सब फूटते इन अंकुरों को दबा दिया
कुछ ऐसे डुंडों ने ही रोक लगायी है।।
घायल दिल के युवकों को
कुछ हमने सहलाया है
अतीत की उफनती लहरों ने
भॅवर में उनका भविष्य फॅसाया है
अंधेयुग के आकाओं ने
कुछ ऐसे सदियों से ही डुबाया है।
पथराई हुई ऑखों को
कुछ सपने हमने दिखाये हैं
अन्यायपूर्ण हरकती दलीलों से
वे अब भी घबराये हैं
बुदबुदाते हताश- उदास वे
कुछ ऐसे ही हम पर चीखे चिल्लाये हैं।

                            तृतीय कविता
                      मैं कोई देवता नहीं
मैं उन्हें कैसे समझाऊ
कि मैं कोई देवता नहीं हूँ
एक सीधा-सादा इंसान हूँ
जो इंसानियत से जीना चाहता हूँ।
पर वे मानते ही नहीं
मुझे देवता की तरह पूजे जाते हैं,
जाने क्यों मुझ इंसान को ये देवता बताते है।
ये दुनिया बडी जालिम है
जो हम जैसे शैतानों के पीछे पडी है
हम कभी इंसान तो न बन पाये
पर ये देवता बनाने पर अडी है।
किन्तु मैं देवता नहीं बनना चाहता हूँ
एक इंसान बनना चाहता हूँ।
इनके लिये किसी को भी
देवता बनाना कितना सरल है
ये हर सीधेसादे इंसान को
पहले पत्थर जड़ बनाते हैं।
उजाडकर दुनिया उसकी
ये उसे नीरस बनाते है।
जिन्हें ये देवता बनाते हैं
अक्सर वह इनका सगा सम्बधी होता है
इनका अपना तो कम
इनके अपनों का सपना होता है।
दूसरों के सपनों को चुराकर
ये अपनी हकीकत बनाते हैं।
हर प्रेम  करने वालों को
निजी स्वार्थ सिद्घी हेतु ही
ये पीडा का ताज पहनाकर
बेबश और लाचार बनाते हैं ।
दो प्रेमियों को जुदा करने को
ये अपना फर्ज बताकर निभाते हैं
उनकी ऑखों से जुदाई के ऑसुबहाकर
उनके ह्दय में गमीं का सैलाव लाते हैं।
दो प्रेम करने वाले इंसानों को
ये पहले जिन्दा लाश बनाते हैं
प्रेम की लाश ढोने वाले हर इंसान प्रेमी को
ये देवता बनाते हैं।
       


            चतुर्थ कविता
    अनुभूति की चाह
सत्य रूप बीज बनू, सौर्न्य हो अंकुरण।
पुलक सृष्टि नृत्य करें, शिवम हो प्रस्फुरण।
मृत्युपाश मम प्राणहो, तन चैतन्य का सत्यत्व बोध हो।
जब प्राणहीन देह हो जग सारहीन लगे जीव को।
मन मुक्त हुआ जो माया से शिवत्व मणिक बोधिसत्व हो।
अनित्य लखत जग अस्तित्व को, अहो पीव सुन्दरम सृष्टा तत्व हो।
           
पंचम कविता
निजत्व की ओर
   एक
मेरा नगर शाश्वत काल से
अत्यन्त रमणीक और सुन्दर रहा है
और उसका महाशून्याकार आकाश
निर्मल असीम नीलिमा लिये रहा है।
न जाने कहॉ से
मॅडराते घने काले बादलों ने
मेरे नगर के सौन्दर्य को निगल लिया है।
कई अज्ञात नगरों में
होता हुआ
मैं इस ज्ञान विवेकयुक्त
अद्भुत नगर में आया हूँ।
मेरे नगर में
आरंभ में प्रवेश करते समय
मैं सम्राट बनकर आया था।
जिसमें मिट्टी जल वायु अग्नि और आकाश का
सुन्दर मंदिर
विराट अस्तित्व ने
प्रतिक्रमण करने हेतु दिया था।
जिसमें मेरी विरासत
पीवों के पीव से
रहस्यमय अर्न्तयात्रा करके
अंतरगृह में स्वाभाविक मिलने क ी थी।
मगर अब मैं अपने ही नगर में
एक भिखारी बनकर रह गया हूँ।
जो अपने स्वभाव से हट कर
काम क्रोध लोभ और मोह माया के
धने काले बादलों के बीच घिर गया हूँ।
जन्म से लेकर जगत से परिचित न होने तक
मेरा ह्दयाकाश
अखण्ड असीम विराट गहराई के लिये
बेबूझ परालौकिक रंगहीन
नीलिमा के तात्विक बादलहीन था।
इसमें वास करते सम्राट को
दूर तक इन बादलों का कोई पता न था।
वह नहीं जानता
इन बादलों को
और तूफानों को
क्योंकि इनकी प्रकृति से वह अनभिज्ञ रहा।
पर सम्राट की चेतना को
माया बाजार में भिखारी होने का
आभास कराया गया
जहॉ उसने पाया कि उसके नगर की
सुन्दरता खो गई मानों चन्द्रमा में लगे
धब्बे की तरह हो गई।
उसके पूर्ववत सौन्दर्य को लाना होगा
बादलों को हटाने के लिये
तूफानों को बुलाना होगा
जाने इन पर कहर बन कर छा जाये
या तो इन बादलों को बरसा कर
या इन्हें उडाकर ले जाये
तब कहीं मेरे नगर का
वास्तविक सौन्दर्य स्वरूप लौटकर आयेगा।
जहॉ माया बाजार का भ्रम टूटेगा
भिखारी बन बैठा सम्राट
परमात्मा के आनन्द को लूटेगा।                                          दो
करोडों जीवाणुओं से युक्त
मेरा शरीर एक रहस्यनगर है
जिसमें विराट ऊर्जा छिपी हुई है।
मेरे इस रहस्य नगर पर
मेरी असीम वासनाएं
घने काले बादलों की तरह छा गई है।
मेरे शरीर का ह्दयाकाश
जन्म के समय शाश्वत निर्मल और धबल रहा है
और मेरी वासनायें उम्र के साथ-साथ 
अनन्त और विशाल होती गई है।
जो सारे ह्दय को
मस्तिष्क के साथ निगल रही है
इन बासनाओं का जहर
सारे नगर शरीर में फैल रहा है
और मेरा मन न जाने क्यों ?
मृत्यु के पास जाने हेतु
इस वासनाओं के मार्ग पर
पतन की ओर चल रहा है।
मेरी वासनायें मेरी कामनाओं का सम्प्रेषण है
जो मुझे स्वजनों से विरासत में मिली है।
इनमें सभी का स्वार्थ निहित है
पर मेरा ह्दयाकाश प्रेम रहित है।
मैं कामनाओं में
प्रेम को तलाश रहा हूँ
और वासनाओं की अति पर जी रहा हूँ।
सुना है एक अति से
दूसरी अति पर जो जाता है
वह शुन्य का या निजत्व का
पूर्व शाश्वत स्वभाव बोध पाता है।

आत्माराम यादव, पीव
प्रेमपर्ण,कमलकुटी, विश्वकर्मा मंदिर के सामने, शनिचरा मोहल्ला,
होशंगाबाद मोबाईल-०९९९३३७६६१६

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