मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

बच्चन पाठक 'सलिल' की लघुकथा - एक नदी थी खरकाई

लघु कथा 

एक नदी थी खरकाई 

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                   -- डॉ बच्चन पाठक 'सलिल'

बिष्टुपुर के एक पांच सितारा होटल में अपने कमरे में लेटे राम पदारथ सोच रहे थे --- इक्कीसवीं सदी का आगमन हो चुका था । 

आज से पचास साल पहले (लैटिन अमेरिका) चला गया था । मेरे मामा वहीँ रहते थे । फिर वहीँ बस गया । 

परामारिवो एक अच्छा शहर है । सचमुच फूलों का शहर है । वहां मेरा परिवार है । मुझे अपने इस नगर की बहुत याद आती थी । 

मैं उन दिनों आदित्यपुर में रहता था । पिता की मृत्यु के बाद अकेला रह गया था । अपना कोई था नहीं, अतः सूरीनाम चला गया 

पर रह रह कर बचपन की याद आती थी \ आदित्यपुर की रेल लाइन, पंचमुखी हनुमान मंदिर, बन्तानगर की झोपडिया, नदी किनारे 

का श्मशान घाट-- सब याद आते थे । बचपन के दोस्त भी याद आते थे, जिनके साथ छठ घाट पर जाया करता था । मनोकामना 

मंदिर के नीचे गर्मी में नदी पारकर हम लोग जुगसलाई की ओर जाते थे और रास्ते में झडबेरिया खाते थे । 

आज मैं आदित्यपुर की ओर गया । कोई स्थान पहचाना नहीं लगा । बड़े-बड़े मॉल बने थे । किसी मंदिर का पता नहीं था । झुग्गी झोपड़ी 

वाले दशकों पहले भगा दिए गए थे । कुछ मर गए, कुछ पहाड़ों में चले गए और कुछ सुदूर गाँवों में झोपड़ी बनाकर रहने लगे । यह बात एक 

कोठी के दरवान ने मुझे बताई । 

मैं खरकाई नदी की ओर गया । नदी का कहीं अता-पता नहीं था । एक अधेड़ ने मुझे बताया कि सुना है कि यहाँ कभी एक नदी खरकाई 

बहती थी । अब तो उसे पाटकर ये बड़े-बड़े कॉम्प्लेक्स बना दिए गए हैं। 

राम पदारथ का मन खिन्न हो गया । लगता है किसी ने उनका बचपन छीन लिया । एक सूटेड-बूटेड प्रौढ़ से उन्होंने उसका नाम पुच्छा ।  

उसने उत्तर दिया -- शंकर गोराई । राम पदारथ ने अनमने मन से कहा -- मेरा एक दोस्त था मोहन गोराई । और वे जाने लगे । 

शंकर ने उनका हाथ पकड़ कर कहा -- मोहन गोराई मेरे पिता थे । आपको कभी देखा नहीं । राम पदारथ ने अपनी कहानी सुनाई । 

बोले-- जब मैं यहाँ से गया, तुम्हारे पिता की शादी नहीं हुई थी । वह व्यक्ति '' थैंक यू अंकल '' कह कर हाथ मिलाकर चला गया । 

राम पदारथ सोच रहे थे -- वह आदिवासी मासूमियत कहाँ गयी?

उनकी आँख लग गयी । प्रातः सात बजे वे टी वी पर देख रहे थे---- आदित्यपुर के दर्जनों  मॉल ध्वस्त । बाढ़ के पानी से खरकाई नदी 

में भयंकर बाढ़ । अचानक नदी का पानी ऊपर उठा । भवनों को गिराकर पानी बह निकला । अरबों रुपयों का नुक्सान । सैकड़ों जानें 

गईं । 

राम पदारथ सोच रहे थे -- आखिर खरकाई ने अपने अस्तित्व मिटाने का बदला ले ही लिया । 

पता-- बाबा आश्रम कॉलोनी 

       पंचमुखी हनुमान मंदिर के सामने 

       आदित्यपुर-- २, जमशेदपुर- १३ 

फोन--  0657/2370892

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  1. सूरीनाम में रहने वाले रामपदारथ के अंदर की भारतीयता ज़िंदा है ,हमारी क्यों नहीं ?----आदरणीय गुरुदेव श्री सलिल जी को शत-शत नमन .-----गोपाल गुंजन

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  2. एक सशक्त लघुकथा है जो आज की खोखली , बेनूर और रसहीन तरक्की की तस्वीर पेश करती है।
    कुदरत से खिलवाड़ करने का क्या परिणाम होगा? इस की भी चेतावनी देती है।---हरदेव कृष्ण.

    उत्तर देंहटाएं
  3. Gopal gunjan ji ashirvaad! main aapki tippani se ujjivit hua. lag raha hai ki koi to padh raha hai? main to taknik se dur hun par putravat yuva shayar Manoj 'Aajiz' ke prayas se hi Rachanakar me likhta rahta hun.

    Dr Bachchan Pathak Salil
    0657/2370892

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  4. Hardev ji dhanyavad!
    Dr Bachchan Pathak 'Salil'
    0657/2370892

    उत्तर देंहटाएं

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