रविवार, 21 अप्रैल 2013

पुस्तक समीक्षा - आकाश तुम्हारा होगा

आकाश तुम्हारा होगा (महावीर रवांल्टा)

मैं सुकीर्ती प्रकाशन से प्रकाशित कविता संग्रह-“आकाश तुम्हारा होगा , में प्रकाशित कविताओं की बात कर रहा हूँ, जो लफ़्फ़ाजी और बड़़बोलेपन से दूर, बड़ॆ ही सहज रुप में ,किंतु गहरी अर्थ व्यंजना के साथ, एक अनूठे किस्म का अहसास कराती है. आपकी कविता कानों के जरिए मन-मस्तिस्क के कोने-अंतरों में जम जाती है और लंबे समय तक इनकी दस्तकें सुनाई देती हैं.

इन कविताओं के भीतर से इन्हें सिरजने वाले/रचने वाले, भाई महावीर रवांल्टा का संपूर्ण व्यक्तित्व हमारे सामने आ जाता है. सचमुच वे वे उतने ही सहज-सरल और पारदर्शी रहे हैं,जितनी की उनकी सर्जना. दुनियां की जोड़तोड़ से नावाकिफ़, जो आज की दुनिया में योग्य बनने के पहले आदमी को उसके कद से बड़ा बताकर सामने लाते हैं. कविताएं अपनी जमीन और जमीर को बचाये रखते हुए हमें आश्वस्त कराती है कि समय की तमाम आपाधापी, उखाड़-पछाड़,आदमी और आदमियत के तेजी से क्षरण के बीच, जो भी कुछ बचा हुआ है, अपनी मूलवर्ती पहचान, को अपने वजूद को जोड़ॆ हुए है. अनाहत, अक्षत-ईमानदार रचनाधार्मिता के भीतर से छनकार आती हुई आश्वस्ति-आज के बदरंग समय में कितनी मूल्यवान, कितनी अहम और कितनी सुखद है-आसानी से समझी जा सकती है.

श्री महावीर रवांल्टा मूलतः पहाड़ॊं के बीच रहने वाले (उत्तरकासी जनपद)व्यक्ति हैं. यहाँ की नीली-भूरी गगनचुंबी चोटियां मूक निमंत्रण देती लगती हैं. वे हमें अपने सम्मोहन के जाल में बांधकर अपने पास बुलाती हैं. दिन के उजाले में जल-जंगल-पहाड़ बड़े अच्छे लगते हैं,लेकिन रात होते ही वे किसी दैत्य की तरह ड़रावने से लगने लगते हैं. कोई रात में यहाँ रुकना नहीं चाहता,( यह बात उन लोगों के लिए है, जो कभी-कभार पहाड़ॊं पर जाते हैं) लेकिन जिसने जन्म लिया है पहाड़ॊं के बीच, वह उसे छोड़कर तो जा नहीं सकता. यह उनकी अपनी नियती है. यहाँ सारी कायनात उनकी दोस्त बन जाती है. कवि को पहाड़ॊं से प्यार है, वह उसी में रहकर पला-बढा है. उसकी चिता इन पहाड़ॊं को लेकर नहीं है, बल्कि उन पहाड़ॊं को लेकर है जिसे लोगों ने अपने जेहन में पाल रखा है, वह है “मैं’ और जब अहं बड़ा हो जाता है तो पहाड़ॊ की ऊँचाइयां भी बौनी सी लगने लगती है.

कवि को यही दुख सालता है कि शहरों के रहने वाले, पहाड़ में बसने वाले लोगों को, किसी दूसरी नजरों से देखते-समझते हैं.(कविता-पहाड़-पेज ७८).”भले ही पहाड़वासी/छॊड़ देते हो पहाड़/पर पहाड़ उन्हें नहीं छोड़ते (कवित पहाड़वासी-पेज-५५) यह कविता इस बात की पुष्टि करती है कि पहाड़ॊ के बीच रहने वाला आदमी, भले ही पहाड़ छोड़ दे,लेकिन पहाड़ उन्हें नहीं छोड़ते, माने यह कि दोनों एक-दूजे के संपूरक बन चुके होते हैं. एक अन्य कविता में-पहाड़ॊ को इंतजार बना रहता है कि उसका अपना साथी लौट आएगा(इंतजार-३,पेज ५४) वरिष्ठ कवि श्री चन्द्रकांत देवताले ने “माँ” पर कविता न लिख सकने के अपने दर्द को उजागर करते हुए लिखा था कि वह सारे असंभव कामों को अंजाम दे सकता है, लेकिन माँ पर एक मुक्कमल कविता नहीं लिख सकता. शायद इस तरह लिखना इस बात को इंगित करता है कि मां का स्वरुप इतना विराट है कि उसे शब्दों में नहीं बांधा जा सकता. “माँ” कविता में महावीर(हनुमानजी का एक नाम, जो असंभव को भी संभव बनाना जानते हैं.)लिखते हैं-हजारों वर्ष पहले जैसी/अब भी है माँ/समय बदला/बदला परिवेश/पर नहीं बदली माँ.”एक जानदार-शानदार कविता लिख जाते हैं. यह उनके गहरे सोच का ही परिणाम है.

मनुष्य विरोधी विचार, हर काल में, नए-नए रुप में उभरकर सामने आते रहे हैं, इसी के बरक्स, मनुष्यता को बचाए रखने की रचनात्मक पहल आदि काल से होती आ रही है. श्री रवांल्टा भी उसी के अनुरुप, समाज में मानवीयता बचाए रकने की पहल बराबर करते नजर आते हैं. इसी तरह प्रकृति में प्यार देखना, प्रकृति को अपने भीतर महसूस करना, तभी संभव है,जब कवि स्वय़ं प्रकृति में रचता-बसता हो. अपनी काव्य-रचना के माध्यम से उन्होंने अपने प्रकृति प्रेमी होने का प्रमाण भी दिया है. संग्रह में वर्णित कविताओं को पढकर यह कहा जा सकता है कि—किसी कविता को अच्छी कविता बनाने वाला तत्व उसका “जीवन” होता है. अपनी सहजता- सरलता और निश्छल भावुकता से श्री महावीर रवांल्टाजी ने शब्दों के माध्यम से कागज पर उतारने का भरसक प्रयास किया है.

किसी ने कहा है-“इन्सान, इन्सान का दुख जानता है क्योंकि जीवन में उसकी भागीदारी बराबरी की रहती है. इसी भागीदारी ने उसे दूसरों के दुख में उदास होना और खुशी में मुस्कुराना सिखाया. लेकिन इन्सान अगर कवि अथवा कथाकार है तो वह हैवानों और पशुओं और पक्षियों के अन्तरमनों की सैर कर लेता है.” प्रख्यात कवि-आलोचक श्री विष्णु खरे से किसी ने यह सवाल किया था कि-“ हमारे समय की कविता क्या हो सकती है? इस पर उन्होंने जवाब देते हुए कहा था- “वह उस सीमा रेखा की खोज है, जिसमे एक तरफ़ अर्थहीन शोर है और दूसरी ओर जड़-खामोशियां. कविता इन दो स्थितियों के बीच इतिहास की तमाम विड़म्बनाओं और त्रासदियों से गुजरती हुई, तमाम तरह के धोकों, फ़रेबों ,प्रपंचों और बदकारियों का सामना करती हुई भरोसे का एक निदान चाहती है और बुनियादी सवाल को उठाती है कि यह सब क्यों?”

मुझे लगता है कि श्री महावीर रवांल्टा ने अपनी कविताओं के माध्यम से इन सब प्रश्नों को बड़ी ही सहजता और सरलता से हल करने का प्रयास किया है. वे बधाई के पात्र है. मुझे उम्मीद ही नहीं, वरन पूरा विश्वास है कि उनके इस संग्रह से पाठक, पूरी तल्लीनता के साथ जुड़ेगा और इस संग्रह का सर्वत्र पुरजोर स्वागत होगा.

---

गोवर्धन यादव -

१०३, कावेरीनगर,छिन्दवाड़ा(म.प्र.) ४८०००१

फ़ोन ०७१६२-२४६६५१/ ०९४२४३५६४००

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

----

1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.अपनी रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------