गुरुवार, 18 अप्रैल 2013

तेलुगु कहानी - अजीब औरत

अजीब औरत!

मूल (तेलुगु कहानी- विन्त मनिषि') की लेखिका - जी. रेणुका देवी

अनुवाद - डॉ. दण्डिभोट्ला नागेश्वर राव

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‘‘तुम एक अजीब औरत हो और हमेशा अजीब ढंग से सोचती हो...’’ मेरे पति मुझसे सदा यही कहते रहते हैं। सिर्फ मेरे पति ही नहीं, मेरी सासू माँ भी यही कहती हैं। मेरे बचपन में मेरी माँ और मेरे पिताजी भी यही कहा करते थे। शायद मेरे बच्चे भी आज मेरे बारे में मन में यही सोचते होंगे.... सबको ऐसा क्यों लगता है, मेरी समझ में नहीं आता। क्या आपको भी मैं अजीब औरत ही लगती हूँ? ओह! क्षमा कीजिएगा...मेरे बारे में आपको कुछ भी मालूम नहीं है ना... अच्छा अब मैं अपने बारे में सुनाऊँगी! सुनिए ...हाँ, मेरी कहानी सुनने के बाद आप भी सोचिए।

सच पूछा जाय तो सबको बतायें, ऐसी महान जिन्दगी नहीं है मेरी। मैं भी सबकी तरह पैदा हुई और सबकी तरह पलकर बड़ी हुई। सबकी तरह मैं भी जी रही हूँ। फिर लोग मुझे अजीब ढ़ंग से क्यों देखते हैं- यह मेरी समझ में नहीं आता। इसलिए मैं अपनी जिन्दगी के बारे में आपको कुछ बताना चाहती हूँ।

बचपन में मैं भी खूब लिख-पढ़कर नौकरी करना चाहती थी। मेरे इस विचार के पीछे एक कारण था..मैं अपनी माँ, नानी, और अड़ोस-पड़ोस में रहनेवाली सब महिलाओं को देखती थी और मुझे लगता था कि उन सबके जीवन एक ही साँचे में ढ़ले हुए-से थे। खाना पकाना, बर्तन माँजना, कपडे धोना, हमेशा पति और बच्चों की सेवा करना, पति अगर पिटाई करें तो भी हँसते हुए सब कुछ झेलना... हमेशा बच्चों पर गुस्सा दिखाना, उन्हें पीटना- सारी औरतें यंत्रों की तरह ये ही काम प्रकारान्तर से किया करती हैं।

पहले मुझे भी ये सारे काम साधारण ही लगते थे पर एक दिन हमारे गाँव में एक अध्यापिका आयीं। वे हमारे पड़ोस में ही रहा करती थीं। उनके पति दूसरे गाँव में रहते थे। उनके बच्चे भी शहर में हॉस्टल में रहते थे। इसलिए अध्यापिका जी अकेली ही रहती थीं। जब भी देखें- हमेंशा कुछ न कुछ पढ़ती या लिखती रहती थी। सब लोगों से हँसते हुए बोलती थीं। गाँव में स्त्री-पुरुष सभी से उनका अच्छा व्यवहार रहा करता था। हमारे गाँव के मुखिया लोग भी अध्यापिका जी से हँसते हुए बात करते थे। मेरी माँ, अड़ोस-पड़ोस की अन्य महिलाएँ अगर कोई मर्द दिखे तो सिर और भुजाओं को साड़ी के पल्लू से ढ़ककर अलग सरक जाती थीं लेकिन अध्यापिका जी तो सभी से एक जैसा व्यवहार करती थीं। मर्दों के साथ हँसते हुए बिना किसी संकोच के, बात करनेवाली अध्यापिका जी को देखकर मुझे बहुत अच्छा लगता था। धीरे-धीरे मेरे मन में माँ जैसी औरतों के जीवन के प्रति ऊब और अध्यापिका जी की निस्संकोच जीवन-शैली पर आकर्षण पनपने लगा। अध्यापिका जी को गाँव में मिलता सम्मान उनकी नौकरी के कारण ही मिल रहा था- यह मैं समझ गयी। इसलिए खूब पढ़-लिखकर उनकी तरह नौकरी करना मेरा इरादा बन गया था। लेकिन मेरा इरादा पिताजी को बहुत अजीब लगा, इसलिए उन्होंने हाईस्कूली शिक्षा के पहले ही मेरी शादी करवा दी थी। शादी के बाद मैं इस शहर में आयी और हर दिन कॉलेज या ऑफिस को जाती महिलाओं को देखकर बहुत खुश हुआ करती थी। मेरी एकमात्र चिन्ता थी- उन सबकी तरह पढ़-लिखने का मौका मुझे नहीं मिला।

अब मेरे दो बेटे और एक बेटी है। पहली बार जब मैं माँ बननेवाली थी तब मेरी यह इच्छा सुनकर कि लड़की ही पैदा हो, मेरे पति ने कहा ‘‘कितनी अजीब इच्छा है तुम्हारी...पहलीबार हर कोई माँ बेटे की ही इच्छा करती है, तुम भी वही इच्छा रख सकती हो न?’’ यह सुनकर मेरी समझ में नहीं आया कि एक औरत होकर दूसरी औरत को जन्म देने में या जन्म देने की इच्छा रखने में कौन सी अजीब बात है! मेरा इरादा था कि मैं एक लड़की को जन्म दूँ और अपनी सारी असंपूर्ण इच्छाओं को उस बेटी के ज़रिये पूर्ण होते देखूँ....दूसरी बार ही मेरी इच्छा पूरी हुई और मैंने एक लड़की को जन्म दिया। उसे देखकर मैं कितनी खुश हुई...इसका बयाँ नहीं दे सकती। ऐसा लगा कि मुझे मेरा नारीत्व संपूर्ण रूप में अब प्राप्त हो गया। मैंने सोचा कि मेरी विजया का जन्म मेरी कामनाओं की पूर्ति के लिए ही हुआ। पलकर बड़ी होती विजया को देख, मैं बहुत खुश हुआ करती थी। कॉलेज या नौकरी को जानेवाली हर लड़की को देखकर मैं सोचा करती थी...‘‘मेरी विजया भी इनकी तरह पढ़ाई करेगी और बाद में नौकरी करेगी।’’

मेरी आशाओं को बरकरार रखते हुए विजया हर कक्षा में अव्वल आया करती थी। मेरे दोनों बेटे भी पढ़ाई में फिसड्डी तो नहीं थे, इसलिए अपनी संतान का विकास देखकर मेरे मन में स्वाभाविक प्रेम उमड़ पडता था। लेकिन विजया का विकास...चाहे वह शारीरिक विकास हो या मानसिक.. मेरे पति और मेरी सासू माँ के लिए चिन्ताजनक मालूम देता था! सासू माँ कहा करती थीं ‘‘इस उम्र में ही यह इतनी बड़ी लग रही है!’’ मेरी समझ में यह नहीं आया कि स्वाभाविक विकास को देखकर इतना परेशान क्यों कर हो।

मैं अपने तीनों बच्चों को हर विषय में एक-समान ही देखती थी। हमेशा उनकी मनोभावनाओं की कदर करती थी। हाँ, याद आता है, तब विजया तेरह साल की थी...

उस रात को मेरे साथ मेरे पति, सासू माँ और बच्चे सब मिलकर भोजन कर रहे थे। विजया ने दो कौर मुँह में डालकर कहा ‘‘माँ...मुझसे यह सब्जी खायी नहीं जाती।’’ ‘‘तो एक मिनट रूकना..’’ कहते हुए मैंने तुरंत एक आम्लेट बनाकर विजया को परोसा। विज्जी को आम्लेट बहुत पसंद है। मैं जब आम्लेट बनाने चौकी में जा रही थी, तब सासू माँ और मेरे पतिदेव मेरी तरफ कुछ अजीब ढ़ंग से देख रहे थे। रोज की तरह बच्चे जल्दी-जल्दी खाकर चले गये। तब उन्होंने शुरू किया ‘‘बच्चों को चाहिए कि जो भी खाने को मिला, उसी से संतुष्ट हो जाए। उनकी पसंद की चीजें तुम खिलाती रहोगी तो बाद में कैसे चलेगा।’’ उनकी बातों का आशय मैं समझ सकी। यहाँ ‘बच्चों’ का मतलब विजया ही है! क्योंकि अपने लड़कों के प्रति भी मेरा व्यवहार ऐसा ही रहा करता था। मैं कई बार उनके लिए भी मनपसंद की चीज़ें बना चुकी, और तब इन्होंने कोई शिकायत नहीं की। लेकिन अब लड़की के मामले में ही ऐसा क्यों?

‘‘अरे, ओ तो भिण्डी की सब्जी खाती ही नहीं! आम्लेट हो तो उसके साथ सब्जी भी खा लेती न..इसलिए बनाया।’’ मैंने जवाब दिया।

‘‘अब तो उसकी पसंद का खिलाया, सो ठीक है। पर कल...जब ओ ससुराल जायेगी, वहाँ कौन खिलायेगा? यहाँ इच्छा के अनुसार खाने की आदत पड़ गयी तो भविष्य में भुगतना पड़ेगा!’’ सासू माँ ने भी शुरू कर दिया।

‘‘ससुराल के लिए मेरी बेटी को अभी से तैयार करके रखना है क्या? कभी ससुराल में मनपसंद का खाना नहीं मिलनेवाला, इसलिए अब से उसे भूखों मरना है क्या?’’ मेरी बातों में न जाने कहाँ से, चुभन भर आयी।

मेरे पति को यह सब अच्छा नहीं लग रहा था। उन्होंने गुस्से में कहा ‘‘तुम्हें मालूम नहीं कि लड़की की पर्वरिश कैसे हो।’’ मैंने भी कह दिया ‘‘हाँ..हाँ..मालूम नहीं.. लड़का-लड़की में फरक करके देखना मुझे मालूम नहीं।’’

उनका गुस्सा अब और चढ़ गया। वे बीच में ही खाना छोड़कर उठ गये और यह कहते हुए चले गये कि ‘‘देखो..ओ सिर्फ तुम्हारी ही नहीं मेरी भी तो लड़की है। यह मत समझना कि मैं उससे प्रेम नहीं करता। लड़की के मामले में सावधान रहना चाहिए। नहीं तो आगे कठिनाई पड़ेगी।’’ उन्होंने भोजन बीच में ही छोड़ दिया, पर मैंने तर्क नहीं किया। उन्होंने खाना पूरा नहीं खाया-इसका भी मुझे ग़म नहीं। मैं भी कितनी बार छोटी-छोटी ख्वाइशों के लिए खाना छोड़ चुकी थी!

लेकिन एक बात तो सच है। उन्हें विज्जी (विजया) से भी उतना ही प्यार है जितना लड़कों से। वे जहाँ कहीं भी जायें, लड़कों को कुछ लाये या नहीं, विज्जी के लिए तो कुछ न कुछ जरूर लाकर दिया करते थे- चूड़ियाँ, रिबन वगैरा। मैं नहीं सोच सकती कि विज्जी से वे प्रेम नहीं करते, पर बात तो यह है कि उनका प्रेम सीमाएँ तय करनेवाला रहा। मेरी राय यह कदापि नहीं कि बच्चों को सीमाओं की आवश्यकता ही नहीं है, लेकिन जो सीमाएँ लड़कों के लिए अनावश्यक हैं- वे लड़कियों के लिए भी उतनी ही अनावश्यक हैं। मेरा उद्देश्य है कि समस्याओं से बचने या सावधान रहने से बेहतर यह होगा कि बच्चों- चाहे वे लड़के हों या लड़कियाँ- की पर्वरिश ऐसी होनी चाहिए कि वे भविष्य में किसी भी तरह की समस्याओं का डटकर सामना कर सकें।

उस दिन विज्जी की दसवीं कक्षा का रिजल्ट आया था। वह फस्ट क्लास में पास हुई - यह जानकर मुझे असीम आनंद हुआ। कितना हंगामा किया था मैंने उस दिन! सबको मिठाई बाँटकर आयी। उस दिन मुझे लगा कि मेरे सपने साकार होने का दिन अब दूर नहीं। उस दिन खुशी के मारे मुझे नींद तक नहीं आयी। विज्जी को कॉलेज में दाखिल करना है...अच्छे-अच्छे कपड़े सिलवाने हैं...ऐसे कई विचार उमड़ते थे। मेरे पति को भी नींद नहीं आयी, वे कुछ सोच रहे थे, देखकर मैंने उनसे पूछा - ‘‘क्या बात है जी, अब तक सोये नहीं...क्या सोच रहे हैं?’’

उन्होंने जवाब दिया ‘‘मेरा दोस्त राजाराव है न- उसकी पहचान में एक रिश्ता है। लड़का अच्छी नौकरी में लगा हुआ है। हमारी बेटी के लिए यह रिश्ता ठीक रहेगा। उसीके बारे में सोच रहा हूँ।’’

कुछ समय तक मेरी समझ में नहीं आया कि वे क्या कह रहे हैं।

‘‘बेटी का रिश्ता क्या है जी?’’ मैं आश्चर्य में पूछ बैठी।

‘‘विज्जी का सयानी होके दो साल हो चुके हैं। अब वह दसवीं भी पास है। दिन-ब-दिन दहेज के पैसे बढ़ते ही जा रहे हैं। जितनी जल्दी हो सके, उसकी शादी करा दें तो ठीक होगा।’’ उन्होंने कहा।

मैं अवाक् रह गयी। मुझे लगा कि बीस साल पहले मेरे पिताजी ने जिस तरह सोचा, उसी तरह आज ये भी सोच रहे हैं। ‘‘आपका दिमाग खराब हो गया क्या? वह इतनी छोटी लड़की है- इस उम्र में उसकी शादी करके आप उसका गला काटना चाहते हैं क्या?’’ मैंने कुछ तीखेपन से कहा।

‘‘अरे, मैं यहाँ विवाह जैसी मंगल बातें कर रहा हूँ...तो तुम्हें यह गला काटना लगता है क्या?’’ अब वे भी गुस्से में आ गये।

‘‘नहीं तो और क्या...अब उसकी शादी के लिए जल्दी ही क्या है? वह चैन से पढ़ाई कर रही है...इस साल उसे हम कॉलेज में दाखिल करवा देंगे।’’ मैंने अपने गुस्से को काबू में रखते हुए कहा।

‘‘कॉलेज में जाके क्या करेगी ओ, समय और पैसा दोनों बरबाद!’’ उन्होंने कहा। मैं तब तक अपना गुस्सा काबू में रख पायी और अनुनय के साथ बोलने लगी- ‘‘आप भी कैसी बातें करते हैं जी! आजकल कितनी लड़कियाँ अव्वल दर्जे की पढ़ाई कर रही हैं। विज्जी भी खूब पढ़कर किसी अच्छी नौकरी में लगेगी और अपने पैरों पर आप खड़ी होगी। इसके बाद ही उसकी शादी के बारे में सोचेंगे।’’

‘‘देखो! पढ़ाई, नौकरी ये बातें इतनी आसान नहीं हैं। इनमें कितना खर्चा लगेगा कुछ मालूम है तुमको? अभी दो लड़के बचे हैं। उनकी पढ़ाई के लिए पैसा खर्च होगा। लड़कों की पढ़ाई में पैसा लगायें तो वह व्यर्थ न जायेगा। कल वे ही तो हमारा पोषण करेंगे... इतना ही नहीं, हमने जो पैसा लगाया वह सब दहेज के रूप में ब्याज सहित वसूल हो जायेगा! पर लड़की को पढ़ायेंगे तो उसमें हजारों रूपये लगेंगे ही, अलग से दहेज भी देना होगा न? जितनी भी पढ़ाई करायें, दहेज तो देना ही पड़ता है। पढ़ाई के वास्ते शादी में देर होगी। तब तक दहेज और बढ़ जायेंगे... यह सब ढ़ोने की औकात नहीं है मेरी। इसलिए विज्जी की शादी जितनी जल्दी हो सके, कर देनी ही चाहिए।’’ मुझे उन्होंने सविस्तार समझाया।

‘‘नहीं... नहीं। यह बात मुझे मंजूर नहीं है। वह खूब पढ़ाई करे, अच्छी नौकरी में लगे, मेरा सपना साकार हो! कृपया आप उसकी शादी की बात मत कीजिए।’’ मैंने मिन्नत के स्वर में कहा।

‘‘तुम बड़ी अजीब औरत हो। हमारी विज्जी को नौकरी करने की क्या पड़ी है? उसका पति जो रहेगा उसका पोषण करने?’’ उन्होंने ऊबकर कहा।

मैंने स्पष्ट रूप से कहा- ‘‘हर चीज के लिए पति पर निर्भर होकर जीने की जिन्दगी मेरी बेटी को नहीं चाहिए। वह अपनै पैरों पर आप खड़ी हो...वह अपने लिए एक व्यक्तित्व बनाये और आगे बढ़े। उसके बाद ही होगी उसकी शादी!’’

लेकिन मेरी बातों पर पतिदेव ने ध्यान नहीं दिया। विज्जी को जन्म देकर, उसका पोषण करनेवाली मुझ से भी ज्यादा अधिकार उस पर मेरे पतिदेव को है- यह बात मुझे बड़ी विचित्र जान पड़ी। अब उनसे कहकर कोई फायदा नहीं, इसलिए मैंने बेटी से कहा कि वह पिता का विरोध करे और इस शादी के लिए ‘ना’ कह दे!

बीस साल पहले मैंने अपने पिताजी के निर्णय का विरोध न करके सिर झुका दिया। अब मेरी बेटी ने भी अपने पिता के सामने सिर झुका दिया।

मेरी सारी आशाएँ ध्वस्त....मेरे सारे सपने चूर-चूर...मेरी बेटी की शादी हो गयी। हमारे ही शहर में दामाद जी की नौकरी लगी हुई है। वे अपने माँ-बाप के साथ यहीं पर रहते हैं। आटो में उनके घर जायेंगे तो आधा घण्टा लगेगा। लेकिन कभी मैं उनके घर जाती नहीं थी। विज्जी त्योहार के दिनों घर आया करती थी। मैं चौकी में काम करती तो मेरे पास आकर कुछ न कुछ बोलती रहती थी। अपनी सासू माँ के बारे में, ससुराल की रीति-रिवाजों के बारे में, उनके पति की नाराजगी, उनको क्या पसंद है- क्या पसंद नहीं, इन सबके बारे में उत्साह के साथ बोलती ही जाती थी। पर न जाने क्यों...ये सारी बातें मुझे बिलकुल नीरस लगती थीं। मैं बहुत अनासक्त होकर अपना काम करती थी। सच कहा जाय तो विज्जी की शादी के बाद मुझमें एक प्रकार की निर्लिप्तता आ गयी।

मेरी अनासक्ति को देखकर विज्जी मुझसे ऐसी बातें कम किया करती। अब वह मेरी सासू माँ से ये सारी बातें करने लगी। सासू माँ उसकी बातें चाव से सुना करतीं और बीच-बीच में कुछ न कुछ सवाल करते हुए उसका उत्साह बढ़ा देती थीं।

विज्जी की शादी हुए पूरा एक साल भी नहीं बीता कि एक दिन मेरे पतिदेव ने घर में आते ही मुझे पुकारा- ‘‘अरी ओ बुढ़िया...कहाँ हो?’’ उनका संबोधन सुनकर मैं चकित होकर कहने लगी ‘‘क्या...मैं इतनी जल्दी बूढ़ी हो गयी?’’ शायद कई दिनों के बाद उन्हें मेरे होठों पर मुस्कान दिखाई पड़ी होगी! इसलिए और उत्साह से कहा ‘‘बुढ़िया नहीं तो और क्या...नानी जो बननेवाली हो!’’ उनकी बातें समझ में आयीं और मेरे होठों की मुस्कान गायब हो गयी।

मैंने पूछा ‘‘क्या बोल रहे हैं आप?’’

‘‘आज मैं विज्जी को देखने गया तो इस शुभ समाचार का पता चला।’’ उनकी बातों में खुशी है।

‘‘अभी वह सत्रह की भी नहीं हुई...इस उम्र में गर्भवती बन गयी तो उसके स्वास्थ्य का क्या होगा?’’ मैंने घबराहट के साथ पूछा।

मेरी घबराहट को देखकर वे चिढ़ गये। उन्होंने कहा- ‘‘किसी भी माँ के लिए अपनी बेटी का गर्भवती होना खुशी की बात है। लेकिन यह क्या...तुम बहुत उदास दिखती हो? तुम जैसी अजीब औरत को मैंने कहीं नहीं देखा। तुम तो सोलह की उम्र में ही माँ बन गयी थी न?’’

मैंने उनकी बातों का जवाब नहीं दिया। मैंने कितना चाहा कि मेरी बेटी की जिन्दगी मेरी जिन्दगी जैसी न हो...पर लगता है कि उसकी जिन्दगी और मेरी जिन्दगी में ज्यादा अंतर नहीं रह गया।

इसी तरह दो साल और बीत गये। बड़ा लड़का डिग्री में, छोटा इण्टर मीडिएट में आ चुके। विज्जी अब दो बच्चों की माँ बन गयी। बेटी और उसकी संतान के आने से हमारे घर में सब ओर खुशियाँ छा जातीं। बच्चों को उठाकर सब खुश हुआ करते थे। पर मैं तो हमेशा की तरह गुमसुम रहती। बच्चों के सारे काम करती जरूर...लेकिन उनकी खिलखिलाहट से मेरी उदासी पिघल न सकी। मुझमें जो परिवर्तन आया, मेरे पतिदेव और बच्चे उसके आदती हो गये। वे अब मेरी तरफ ध्यान ही नहीं देते। मैं एक प्रकार की निर्लिप्तता से जिन्दगी काटने लगी। अब मेरी कोई ख्वाइश नहीं...अब मेरी जिन्दगी की न कोई आशा रह गयी और न ही कोई मकसद। जैसे-तैसे दिन काटना ही मेरा एकमात्र लक्ष्य बन गया है। शायद मेरी पूरी जिन्दगी ऐसी ही निर्लिप्त बीत गयी होती! पर मैंने कल्पना भी नहीं की कि मेरी निर्लिप्तता को तोड़नेवाला ऐसा एक दिन आयेगा। लेकिन वह आ गया!

मैं उस दिन को कभी भूल नहीं पाऊँगी।

उस दिन घर के सामने आटो रूकने की आवाज पर मैंने ध्यान नहीं दिया। आटो से उतरकर घर में आये मेरे पति मुझे देखते ही फूट-फूटकर रोने लगे! मुझे बड़ा अचरज लगा। मैंने उन्हें रोते हुए कभी नहीं देखा।

‘‘क्या हुआ रे?’’ मेरी सासू माँ ने पूछा।

‘‘सत्यानाश हो गया माँ...दामाद जी की स्कूटर एक ट्रक से टकरा गयी! क्या बताऊँ? दामाद जी की वहीं पर मौत हो गयी। मेरी बेटी का सत्यानाश हो गया।’’ छाती पीटते हुए कहा उन्होंने।

उनकी बातों के मेरे दिमाग में घुसने के लिए थोड़ा समय बीत गया। तब मुझे लगा ‘‘मेरे दिल की धड़कन बंद क्यों नहीं हुई!’’ मैं अपने पतिदेव को पकड़कर -शायद जिन्दगी में पहली बार- जी भर रोयी। कुछ ही मिनटों में हम सब आटो में बैठ गये। मैं कुछ संभल गयी और अब विज्जी के बारे में सोचने लगी। उसका मासूम चेहरा मुझे बार-बार याद आता रहा। ‘‘विज्जी...मैं- तुम्हारी माँ- आ रही हूँ...तुम्हें ढ़ाढ़स बंधाने।’’ आँखें पोंछते हुए मैं अपने आप से कहने लगी।

जैसे ही हम उनके घर पहुँचे, विज्जी मुझे देखकर ‘‘माँ’’ कहते हुए रो पड़ी। वह शोक और करुणा का मानों मूर्तिमान स्वरूप लग रही थी। मैंने अपने दोनों हाथों से विज्जी को गले लगाया। यह बात मेरी समझ में नहीं आ रही थी कि क्या कहकर उसका दुःख कम कर सकूँ।

‘‘माँ...अब मैं कैसे जी सकती माँ...जिऊँ तो किसलिए? उनके साथ-साथ मैं भी मर जाऊँगी!’’ विज्जी का रोदन दिल को पिघलानेवाला था।

मेरे हृदय को कोई अपनी इस्पाती मुट्ठी में पकड़कर मसलता जा रहा है। मैंने सोचा-‘‘हाय री...पति नहीं रहा तो बेचारी समझने लगी कि अब अपनी जिन्दगी ही बची नहीं!’’

‘‘नहीं बेटा...ऐसा नहीं कहते...अपने बच्चों को देखो...अब तुम्हें उनका मुँह देखकर दिल को पत्थर बना, जैसे-तैसे जीना चाहिए।’’ वहाँ के लोगों में से एक बूढ़ी औरत ने ढ़ाढस बंधाने की कोशिश की।

‘‘अब तक तो पति के लिए जीती रही...अब से लेकर उसका जीवन सिर्फ अपने बच्चों के लिए ही है क्या?’’ मेरा मन रोने लगा।

मैं तब विज्जी की पीठ पर हाथ फेरते हुए दृढ़ता से बोली- ‘‘नहीं विज्जी...अब से तुम्हें किसी दूसरे के लिए नहीं- अपने लिए जीना होगा। तुम अभी पूरी बीस की भी नहीं हुई। बहुत सारा भविष्य है तुम्हारे सामने। धीरज रखो बेटी...तुम्हारी जिन्दगी तुम्हारे लिए ही...किसी दूसरे के लिए नहीं।’’

वहाँ मौजूद अड़ोस-पड़ोसवाली सभी औरतों ने मेरी तरफ कुछ अजीब ढ़ंग से देखा। इतने गहरे दुःख में भी मेरी बेटी ने सिर उठाकर मेरी आँखों में देखा।

उसके बाद सारे काम औपचारिक ढ़ंग से पूरे हो गये। सारे कर्म-काण्ड के समाप्त होने के बाद भी मैं वहीं रूक गयी। विज्जी को अपने घर ले जाना मेरा उद्देश्य था.. लेकिन अड़ोस-पड़ोस की औरतों के सहानुभूति-भरे वचनों से विज्जी की रक्षा करना भी मेरे रूकने का कारण था। वैसे भी मेरा वहाँ रहना उसके लिए सहारा ही था।

दस दिन का कर्म-काण्ड समाप्त होने वाला ही था कि एक दिन दामाद जी के सहकर्मचारी आये थे- सांत्वना देने के लिए। वे इधर-उधर की बातें करके कहने लगे ‘‘विजया जी की पढ़ाई अगर डिग्री तक होती तो बहुत अच्छा होता..शेखर (दामाद जी) की नौकरी उन्हीं को मिल जाती।’’

किसी दूसरे ने कहा ‘‘कोई बात नहीं...अब भी उन्हें क्लर्क की नौकरी मिल सकती है।’’ ‘‘अब वह नौकरी क्या करेगी..जाने दीजिए’’ विजया की सासू माँ ने कहा।

‘‘उसे नौकरी करने की नौबत नहीं आयी...उसकी देख-भाल करने के लिए हम हैं न?’’ मेरे पति ने कहा। इस घटना के बाद दो-तीन दिन तक मैं उसी विषय के बारे में सोचती रह गयी- लेकिन किसी के सामने प्रकट नहीं किया। एक दिन विज्जी से कहा ‘‘बेटी...मुझे लगता है कि अब तुम नौकरी करोगी तो अच्छा होगा।’’

‘‘मैं! और नौकरी? मेरी नसीब में अब सिर्फ उसीकी एकमात्र कमी रह गयी! मैं नहीं कर सकती माँ..’’ विज्जी ने निराशा में कहा।

‘‘इतनी अधीर मत होना बेटे...मेरे नज़रिये से अब तक तुमने जो जीवन बिताया वह सिर्फ तुम्हारा बचपन है! अब तुम्हारी जवानी और बूढ़ापा बहुत आगे की बातें हैं। कितने दिन तक ऐसी पड़ी रोती रहोगी? तुम्हारा जीवन जहाँ खो गया, उसी जगह- फिर से उसके लिए ढूँढ़ो। नया जीवन आरंभ करो। मैं कहती हूँ...मायके पर या ससुराल पर निर्भर होकर जीना बहुत मुश्किल होगा...अच्छी तरह सोच लेना...’’ इस तरह की बातें करके मैंने उसे बहुत विस्तार से समझाया।

अब वह मेरी बातें सुनकर आँसू पोंछकर सोचने लगी। मुझे तब लगा कि वह जरूर सही निर्णय लेगी।

दसवाँ दिन कर्म-काण्ड की समाप्ति का दिन था। उसी दिन सभी ने निश्चय किया कि विज्जी को विधवा बनायी जाये। कुछ औरतें उस कार्यक्रम का प्रबंध भी करने लगीं। कुछ महिलाएँ सफेद साड़ी और चाँदी की चूड़ियों में जैसी ही विजया दिखे, फूट-फूटकर रोने का इंतजार करने लगीं। पर मैंने उस काण्ड को चलने नहीं दिया। ‘‘वह मंगलसूत्र उतार देगी जरूर...लेकिन बिंदी और चूड़ियाँ नहीं उतारेगी’’ मैंने दृढ़ता से कहा।

सभी रिश्तेदारों ने ‘‘आचार-संप्रदायों का क्या होगा’’ कहकर बड़ा हल्ला मचाया। ‘‘तुम एक अजीब औरत हो!’’ मेरे पति ने कहा। उन सबको मेरा एकमात्र उत्तर था- ‘‘आप अपने आचार-संप्रदाय अपने ही पास रखिए...’’ कुछ लोग चीख-चिल्ला रहे थे। कुछ लोग मेरी तरफ अजीब ढ़ंग से देख रहे थे। विज्जी की समझ में नहीं आ रहा था कि क्या किया जाय, सो वह रोती हुई एक कोने में बैठ गयी। मुझे लगा कि वहाँ अब नहीं रहा जायेगा। इसलिए विज्जी और बच्चों को साथ लेकर वहाँ से अपने घर चल दी। किसी ने हमें रोकने का प्रयास नहीं किया। विज्जी भी मुझसे बिना कुछ सवाल किये, गुड्डी बनकर मेरे साथ आ गयी और आटो में बैठ गयी।

हमारे घर आने के एक घण्टे के अंदर मेरे पति, सासू माँ और मेरे बच्चे आ गये। आते ही उन्होंने मुझे आड़े हाथो लिया। उनका कहना था कि ‘मैंने सभी रिश्तेदारों के सामने उनकी नाक कटवा दी...दामाद जी की आत्मा को अब शांति नहीं रहेगी..’ मैं बिना कुछ जवाब दिये ऐसी ही बैठी रही। शायद मेरी निस्तब्धता ने उन्हें और चिढ़ा दिया। उन्होंने यहाँ तक कह दिया- ‘‘मेरी अनुमति के बिना मेरी बेटी को वहाँ से उठा लाने का अधिकार किसने दिया तुम्हें?’’

‘‘आप कहिए तो मैं इसी क्षण अपनी बेटी को लेकर यहाँ से चली जाऊँ!’’ मैंने शांतिपूर्वक कह दिया।

मेरी बातें सुनकर उनकी गिघ्घी बंद हो गयी। उन्होंने सोचा होगा कि मैंने जो कहा वह जरूर कर दूँगी। इसीलिए मौन रह गये।

ऐसे कई दिन बीत गये। मैं हमेशा विज्जी के साथ ही रहा करती। खाना बनाते समय उसे चौकी में बिठाती और उससे इधर-उधर की बातें करते हुए काम करती। उसे अब चिंता से कुछ मुक्ति मिली। एक दिन उसे साथ लेकर दामाद जी के आफीस भी जाकर आयी। आफीसर जी से सारी बातें हुईं। उन्होंने विज्जी से कुछ सवाल किये और उसके हस्ताक्षर लिये। कुछ ही दिनों में खबर भी आ गयी कि ‘आकर नौकरी में ज्वाइन करें।’

उस दिन हमारे घर में फिर से लड़ाई शुरू हो गयी। ‘‘उसका पति मर चुका है...उसे घर में पड़ी रहने के बजाय नौकरी के नाम पर शहर में घुमा-फिराना चाहती हो क्या?’’ मेरे पति ने गुस्से में कहा।

‘‘हाँ!’’ मैंने बहुत ही मामूली ढ़ंग से कहा।

‘‘अरे...उसे नौकरी करने की क्या पड़ी है? उसकी देख-भाल करनेवाला मैं जो हूँ न?’’ उन्होंने कहा।

‘‘उसका पति-जिसने वादा किया कि जिंदगी भर साथ रहूँगा- वही, उसे मँझधार में छोड़कर चल बसा है। फिर आपका क्या भरोसा?’’ मैंने बड़ी शांति से कह दिया। वे भौचक्के-से रह गये। मुँह खोलकर कुछ बोलने ही वाले थे, फिर वहाँ से चल दिये।

विजया ने नौकरी में ज्वाइन किया। उस दिन मैंने कितना हंगामा किया था! उसकी साड़ी ठीक से ‘इस्तरी’ करके रखी। साड़ी पहनते समय उसकी मदद की। कंगी करके उसके बाल बनाये। उसका मनपसंद नाश्ता खिलाया। बच्चों को तैयार करके मैं भी तैयार हो गयी। जब मैं यह सब कर रही थी, तब विज्जी कहने लगी- ‘‘माँ...मुझे बड़ी चिंता लगती है, न जाने क्यों...’’ मैं उसका ढ़ाढ़स बंधाती, उसे बाहर ले चली। आटो में हम सब कार्यालय गये। वहाँ विज्जी को कार्यालय में भेजकर मैं बिटिया को गोद में बिठाकर कार्यालय के सामने पेड़ के नीचे एक बेंच पर बैठ गयी। छोटू वहीं पर खेलने लगा। विज्जी एक घण्टे के बाद बिटिया को दूध पिलाने कार्यालय से बाहर आयी। तब मैंने उसके चेहरे पर चिंता की जगह धैर्य को देखा। दुपहर में घर से लाया भोजन बच्चों को खिलाकर हमने भी खाया। भोजन के वक्त विज्जी के सहकर्मचारी दो-तीन आकर हमारे साथ बैठ गये। हमने आपस में बात-चीत करते हुए भोजन किया। उस शाम को जब हम सब आटो में घर लौट रही थीं, तब मुझे लगा- किसी पिकनिक से लौट रहे हैं।

ऐसे ही दो तीन दिन तक मैं भी विज्जी के साथ कार्यालय जाकर आयी। लेकिन अब तो वह खुद बस में जाने लगी है। बिटिया को बोतल-दूध पिलाने की आदत डाल दी गयी। अब मैं नहीं जानती कि स्तब्धता क्या चीज़ होती है! अब हर पल मैं कुछ न कुछ काम करती, बहुत व्यस्त रहती हूँ। अब मुझे काम से ऊब नहीं और काम में यांत्रिकता बिलकुल नहीं है। कोई भी काम मैं अब मन से करती हूँ। हमेशा बच्चों को खेलाती, बहुत खुश रहती हूँ। भोजन के बाद विज्जी की साडियाँ इस्तरी करती, बच्चों को खेलाती, साड़ियों की एम्ब्राइडरी करती, बिटिया के कपड़े सीती या बच्चों के लिए स्वेटर बनाती शाम तक समय बिता रही हूँ। शाम के ढ़लते ही बच्चों को नहा- कपड़े पहनाकर उन्हें तैयार करती हूँ। उन्हें देखकर यह बिलकुल नहीं लगता कि वे मेरे पोता-पोती है। उन्हें देखकर मुझे लगता है कि वे मेरी अपनी ही संतान हैं। कई बार उन्हें देखकर मेरे अपने बच्चे याद आते हैं। बिटिया तो मेरी विज्जी को ही बराबर याद दिलाती है।

कार्यालय से आते ही विज्जी बच्चों को उठाकर प्यार करती, फिर स्नान करके आती। कॉफी पीते हुए अपने कार्यालय तथा इधर-उधर की बातें करती, अख़बारों में छपा समाचार बताती। मुझे विज्जी को ऐसी बातें करते हुए देखना और उसकी बातें सुनना कितना अच्छा लगता है! मैं तो ऐसे ही दिन के सपने देखा करती थी।

दो दिन पहले विज्जी अपने कार्यालय से कुछ आवेदन पत्र लेके आयी। मुझे वे सब दिखाते हुए कहने लगी ‘‘माँ... अब मैं ओपन यूनिवर्सिटी के ज़रिये डिग्री की पढ़ाई करना चाहती हूँ। डिग्री के बाद मुझे प्रमोशन भी मिलेगी।’’ वह और बहुत कुछ बोलती जा रही थी...तब विज्जी की आँखों में कितना आत्मविश्वास! अपने भविष्य को लेकर कितनी आशाएँ!

तब मेरी खुशी का क्या वर्णन करूँ? यह बात जानकर मेरे पति ने कहा ‘‘नौकरी से जी नहीं भरा क्या? अब कॉलेज की पढ़ाई भी करने जायेगी?’’

‘‘क्या जी...पढ़ाई करने में ग़लती क्या है? फिर भी मेरा यह सपना था कि विज्जी इस तरह पढ़ाई करे और आगे बढ़े...अब मेरा वह सपना पूरा हो गया और मेरी कामना भी पूरी हो गयी।’’ मैंने कुछ उद्वेग में आकर कहा।

उन्होंने मेरी तरफ कुछ अजीब ढ़ंग से देखकर कहा ‘‘यह ठीक है कि तुम अपने सपने की सफलता को लेकर खुश हो। लेकिन उसकी जिन्दगी में जो घटी है, उस भयानक घटना के बारे में तुम नहीं सोच रही हो। तुम यह भूल रही हो कि विज्जी ने अपने जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ खो दी है। तुम इस बात को लेकर खुशियाँ मना रही हो कि वह नौकरी में लगी है। लेकिन तुम भूल गयी कि वह नौकरी विज्जी को इसलिए मिली कि- उसके पति की मौत हो गयी! इसका मतलब यह तो नहीं न कि तुम दामाद जी की मौत से खुश हो?’’ उनका सवाल बड़ा ही सीधा था।

मैं अवाक् रह गयी। कुछ क्षणों के बाद संभली और कहने लगी ‘‘मैंने इस तरह कभी नहीं सोचा। उनकी मौत को लेकर मैंने भी बहुत दुःख झेला। लेकिन मैं आपकी इस बात से सहमत नहीं हूँ कि विज्जी ने अपने जीवन में सबसे महत्वपूर्ण चीज़ खो दी है। विज्जी ने सिर्फ अपने पति को खोया... लेकिन उसने उससे भी कीमती अपना जीवन फिर अपने हाथों ले लिया है। मैं दामाद जी की मौत से खुश नहीं हूँ...लेकिन उसी समय मैं इस बात केलिए खुश भी हूँ कि मेरी बेटी अब अपनी जिन्दगी एक इनसान की तरह बिता रही है।’’ मेरी बातों में आवेश नहीं था।

‘‘तुम्हारे कहने का मतलब क्या है? उसे पति की जरूरत नहीं- पढ़ाई, नौकरी ये रहें तो बस है, यही न?’’

‘‘उसे ही नहीं, हर एक स्त्री के लिए पति और परिवार की जरूरत होती है। लेकिन मेरा कहना यह है कि उसके लिए भी अपना एक जीवन जरूर होना चाहिए।’’

‘‘तुम एक अजीब औरत हो...तुम्हारी बातें मेरी समझ में कभी नहीं आतीं।’’ कहते हुए वे तुनककर चले गये।

अब आप लोग क्या सोच रहे हैं? क्या आपको भी मैं अजीब औरत ही लगती हूँ?

(‘‘विशालांध्र तेलुगु कथा 1910 - 2000’’ पुस्तक में प्रकाशित)

।।।

Original Telugu story written by Smt.G. Renuka Devi

Translated by

Dr. D. Nageswara Rao,

Assistant Professor, Department of Hindi,

SCSVMV (Deemed) University,

Enathur 631561,

Kanchipuram, Tamil Nadu.

Mobile Phone 0 9655035217

e-mail: nagukanchi09@gmail.com

6 blogger-facebook:

  1. नागेश्वर राव जी, रचनाकार में तेलुगु की सुगंध फैलाने के लिए आप अभिनंदन के पात्र हैं, अग्रज रविशंकर जी को भी साधुवाद एवं बधाइयाँ ।

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  2. विचारों की जकड़न भी कितनी कठोर हो, प्रयास व्यर्थ नहीं जाते ...

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  3. ek vicharneey katha vastu ....bahut sundar rachna..abhar..

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  4. आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा शनिवार (20 -4-2013) के चर्चा मंच पर भी है ।
    सूचनार्थ!

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  5. रोचक और संवेदनशील रचना.

    उत्तर देंहटाएं

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