शनिवार, 13 अप्रैल 2013

राजीव आनंद का आलेख - अम्‍बेडकर के राज्‍य समाजवाद का कोई पूछनहार नहीं

डा. भीमराव अम्‍बेड़कर के राज्‍य समाजवाद का कोई पूछनहार नहीं

122वां जन्‍मदिवस पर विशेष

डा. अम्‍बेड़कर ने महात्‍मा फूले की शिक्षा संबंधी सोच को परिवर्तन की राजनीति के केन्‍द्र में रखकर संघर्ष किया और आने वाले नस्‍लों को जाति के विनाश का एक ऐसा मूलमंत्र दिया जो सही अर्थों में सामाजिक परिवर्तन का बाहक बन सके. डा. अम्‍बेड़कर ने महात्‍मा फूले द्वारा ब्राहमणवाद के खिलाफ शुरू किए गए अभियान को विश्‍वव्‍यापी बनाया. परंतु डा. अम्‍बेड़कर के बाद उनकी राज्‍य समाजवाद के अवधारणा को कोई पूछने वाला ही नहीं है. डा. अम्‍बेड़कर के जीवनकाल में किसी ने यह नहीं सोचा था कि ‘अम्‍बेड़कर के सिद्धांत' को आधार बना सत्‍ता भी हासिल की जा सकती है लेकिन काशीराम और मायावती ने सत्‍ता तो हासिल की परंतु सत्‍ता का सूख भोगने वाली मायावती सरकार ने डा. अम्‍बेड़कर के मुख्‍य सिद्धांत जाति का विनाश को क्‍या अग्रसारित किया या कि जाति प्रथा को और सुदृढ़ किया, यह अलग से पड़ताल का विषय है.

‘जाति का विनाश' पुस्‍तक के रूप में छपवाने का भी एक ऐतिहासिक कहानी है. दरअसल लाहौर के जातपात तोड़क मंड़ल नामक संस्‍था ने डा. अम्‍बेड़कर को जाति प्रथा पर भाषण देने का आमंत्रण दिया था. डा. अम्‍बेड़कर ने अपने भाषण को लिखकर भिजवा दिया था परंतु जातपात तोड़क मंड़ल के ब्राहणवादी कर्ताधर्ता ने भाषण का विरोध करते हुए उसे संपादित कर पढ़ने की बात डा. अम्‍बेड़कर से कही जो डा. अम्‍बेड़कर को मंजूर न था. डा. अम्‍बेड़कर ने अपने भाषण सामग्री को पुस्‍तक रूप में छपवा दिया जो ‘दी आनहिलेशन अॉफ कास्‍ट' के नाम से आज भारतीय इतिहास की धरोहर है.

भारतीय समाज के दलित वर्ग में जन्‍म लेने के कारण जाति प्रथा के कटु अनुभव बाबा साहब भीमराव अम्‍बेड़कर को हुआ था और यही वजह है कि उनके सिद्धांत और दर्शन में दलित, अछूत, शोषित और गरीब ने जगह पायी. बाबा साहब एक अछूत और मजदूर का जीवन जी कर देख चुके थे, वे कुली का भी काम किए तथा कुलियों के साथ रहे भी थे. उन्‍होंने गांव को वर्णव्‍यवस्‍था का प्रयोगशाला कहा तथा शेडयूल्‍ड़ कास्‍ट फेडरेशन की ओर से संविधान सभा को दिए गए अपने ज्ञापन में भारत में तीव्र औद्योगीकरण की मांग करते हुए कृषि को राज्‍य उद्योग घोषित करने की मांग की थी. डा. अम्‍बेड़कर का यह ज्ञापन ‘स्‍टेटस अॉफ माइनारिटीज' नाम से उनकी रचनाओं में संकलित है. कृषि को उद्योग का दर्जा देने की मांग के अतिरिक्‍त पृथक निर्वाचन मंड़ल, पृथक आबादी, राज्‍य समाजवाद, भूमि का राष्‍द्रीयकरण की सामाजिक अवधारणाओं को संविधान का अंग बनाना चाहते थे परंतु मसौदा समिति के चेयरमैन होने के बावजूद वे यथास्‍थितिवादियों के विरोध के कारण संविधान में पूरी तरह शामिल नहीं करवा पाए थे.

डा. अम्‍बेड़कर कहा करते थे कि हर व्‍यक्‍ति जो जॉन स्‍टुअर्ट मिल के इस सिद्धांत को दुहराता है कि एक देश दूसरे देश पर शासन नहीं कर सकता, उसे यह भी स्‍वीकार करना चाहिए कि एक वर्ग दूसरे वर्ग पर शासन नहीं कर सकता. प्रसिद्ध समाजवादी विचारक मधु लिमये ने एक लेख में डा. अम्‍बेड़कर लिखित पुस्‍तक ‘जाति का विनाश' को कार्ल मार्क्‍स लिखित ‘कम्‍युनिस्‍ट मैनीफैस्‍टो' के बराबर महत्‍व देते हुए लिखा था कि डा. अम्‍बेड़कर जाति का विनाश चाहते थे जिसके बिना न वर्ग का निर्माण हो सकता है और न ही वर्ग संघर्ष. डा. रामविलास शर्मा ने ठीक लिखा था कि ‘एक मजदूर नेता के रूप में डा. अम्‍बेड़कर में जाति के भेद पीछे छूट गए थे.' डा. अम्‍बेड़कर के राज्‍य समाजवाद की अवधारणा कृषि और उद्योग पर राज्‍य के स्‍वामित्‍व पर आधारित था जिसे हम मार्क्‍सवादी अवधारणा से तुलना कर सकते है. डा.अम्‍बेड़कर और मार्क्‍स की अवधारणाओं में अंतर सिर्फ समय सीमा का है. डा. अम्‍बेड़कर राज्‍य समाजवाद की अवधारणा को सिर्फ संविधान लागू होने के समय से अगामी एक दशक के लिए चाहते थे जबकि मार्क्‍स के राज्‍य समाजवाद में एकसी कोई समय सीमा नहीं पायी जाती है.

इसमें तो कोई दो राय नहीं है कि गरीबी हटाओ के लोकलुभावने नारे के बावजूद गरीबी तो खैर क्‍या हटेगी, हाँ दलित-आदिवासी गरीब को ही बहुत हद तक हटा दिया जाता है. परंतु डा. अम्‍बेड़कर ने अपने एक निबंध ‘स्‍माल होल्‍डिंस इन इंड़िया एंड देयर रेमिडीज' में भारत में गरीबी के कारण और निवारण पर स्‍पष्‍ट विचार प्रस्‍तुत किए है. उनका कहना है कि भारत में जमीन पर जनसंख्‍या का बहुत अधिक दबाव है जिसके कारण जमीन का लगातार विभाजन होता रहा है और बड़ी जोतें छोटी जोतों में बदलती रही है जिसके परिणामस्‍वरूप अधिक लोगों को खेत में कार्य नहीं मिल पाता है और बहुत बड़ी श्रम शक्‍ति बेकार हो जाती है और यह बेकार पड़ी श्रम शक्‍ति बचत को खाकर अपना जीवनयापन करते है. भारत में यह बेकार श्रम शक्‍ति एक नासूर की तरह है जो राष्‍द्रीय लाभांश में बृद्धि करने की जगह उसे नष्‍ट कर देता है. डा. अम्‍बेड़कर ने इसका हल बतलाया कि कृषि को उद्योग का दर्जा देने से यह समस्‍या हल हो सकती है. उन्‍होंने कहा कि औद्योगीकरण से ही जमीन पर दबाव कम होगा और कृषि जो अभी छोटे-छोटे जोतों का शिकार है, औद्योगीकरण से पूंजी और पूंजीगत सामान बढ़ने से जोतों का आकार खूद-ब-खूद बढ़ जाएगा इसलिए डा. अम्‍बेड़कर ने शेडूल्‍ड कास्‍ट फेडरेशन की ओर से संविधान सभा को दिए गए अपने ज्ञापन में भारत के तीव्र औद्योगीकरण की मांग करते हुए कृषि को राज्‍य उद्योग घोषित करने की मांग की थी.

बुद्धि के विकास को मानव अस्‍तित्‍व का अंतिम लक्ष्‍य मानने वाले डा. अम्‍बेड़कर का कहना था कि वो ऐसे धर्म को मानते है जो स्‍वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए और यदि हम एक संयुक्‍त एकीकृत आधुनिक भारत चाहते है तो सभी धर्मों के शास्‍त्रों की संप्रभुता का अंत होना चाहिए. उन्‍होंने कहा कि हिन्‍दू धर्म में विवेक, तर्क और स्‍वतंत्र सोच के विकास के लिए कोई गुंजाइश नहीं है. आज भारतीय दो अलग-अलग विचारधाराओं द्वारा शासित हो रहे है. उनके राजनीतिक आदर्श जो संविधान की प्रस्‍तावना में इंगित है वे स्‍वतंत्रता, समानता और भाईचारे को स्‍थापित करते है और उनके धर्म में समाहित सामाजिक आदर्श इससे इंकार करते है.

डा. अम्‍बेड़कर के बाद दलित राजनीति और दलित आंदोलनों में डा. अम्‍बेड़कर के सामाजिक विचारधारा की अवहेलना इस कदर की गयी है कि आज दलित आंदोलन पथभ्रष्‍ट हो चुका है. आज मजदूर वर्ग के नेतृत्‍व की डा. अम्‍बेड़कर की अवधारणा महज बौद्धिक विमर्श का विषय बन कर रह गया है. दलित और बामपंथी विचारक मजदूर वर्ग के नेतृत्‍व के प्रश्‍न पर चुप्‍पी साधे हुए है. डा. अम्‍बेड़कर शायद इसलिए पहले ही कह गए कि ‘मनुष्‍य नश्‍वर है, उसी तरह विचार भी नश्‍वर है. प्रत्‍येक विचार को प्रचार-प्रसार की जरूरत होती है जैसे किसी पौधे को पानी की, नहीं तो दोनों मुरझा कर मर जाते है.

राजीव आनंद

मो. 9471765417

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