रविवार, 21 अप्रैल 2013

राजीव आनंद की कविताएँ

मेरा घर
आंखे आज भी तकती है
उस तवील राह को
जिस पर चलकर मैं
अपने घर को छोड़ आया था
नजरों की हदों के पार
बादलों के बीच
नजर आता है अभी भी एक
दरवाजा
जो कभी खुला रहता था
पर अब बंद है
प्रतीत होता मेरा भ्रम है


खेल
छप्‍पर के छेद से
भूख से कुहकते हुए बच्‍चों ने
चांद से आती रोशनी को
कटोरे में छान लिया
पानी से आधे भरे कटोरे में
छोटे-छोटे कंकड़ों को रखकर
बच्‍चों ने खीर बना लिया
और
खाना-खाना खेलने लगे

चांद रोटी
कई दिनों से न देखा हो जिसने रोटी
अंतड़ियों में भूख से जिसके हो गया हो दर्द
उसे चांदनी की सर्द रातों में
कहां है दिखता सौंदर्य
गोलाकार चांद भी उसके लिए
फकत रोटी है और कुछ नहीं

कचरे का डब्‍बा
मौत को रूबरू देखकर
प्रतीत होती जिंदगी
कचरे का वो डब्‍बा
जिसमें बंद है
रिश्‍ता, प्‍यार, मोह, माया
मलबे में परिवर्तित होता
शरीर
जो बिखरा पड़ा है
बिस्‍तर पर

चार मुक्‍तक

सफल होने की हवस में
नैतिक मर्यादा छोड़ दी
सुंदर काया का फायदा उठाया
सफलता के कई कीर्तिमान तोड़ दी

शरीर एक धर्मशाला
आत्‍मा एक मुसाफिर
अन्‍तर्यात्रा एक तैयारी
चल देना किस्‍मत हमारी

कर्म में वासना न रहे तो
जीवन साधना बन जाती है
जनकल्‍याण में अपना कल्‍याण
परम उपलब्‍धि जीवन की कहलाती है

बछड़े ने अपनी माँ को
जोर से पुकारा माँ.....
बिरजुआ की मइया सब छोड़कर
दौड़ी गोहाल चली आयी

 

राजीव आनंद
प्रोफेसर कॉलोनी, न्‍यू बरंगड़ा, गिरिडीह
झारखंड़ 815301
मो. 9471765417                

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