सोमवार, 15 अप्रैल 2013

विजय वर्मा का हास्य व्यंग्य - कर्ज उतारने की जिद

क़र्ज़ उतारने की ज़िद

एक दिन सुबह-सुबह वे अपनी प्यारी सी रौबदार सूरत लेकर मेरे सामने प्रगट हो गये. वे अपनी क़र्ज़ उतारना चाहते थे,या यूँ समझ लें कि उनपर क़र्ज़ उतारने की सनक सवार थी .बस किसी तरह क़र्ज़ उतार देना चाहते थे. बड़ी विनम्र मुद्रा में कहने लगे कि बस! अब बहुत हो चुका ,अब मुझे क़र्ज़ उतार ही लेने दीजिये .अब मुझसे बर्दाश्त नहीं होता .कैसों-कैसों ने अपना क़र्ज़ उतार दिया, मैं तो खैर बहुतों से ज्यादा समर्थ हूँ,फिर भला मैं क्यों क़र्ज़ नहीं उतारूं.

मैंने दिमाग के खरबों स्नायु- तंत्रों को झकझोरा तब भी मुझे याद नहीं आया कि उन्होंने कब क़र्ज़ लिया था .मैंने दुगुणी विनम्रता से दरख्वास्त किया '' सर जी जहाँ तक मुझे याद है आपने कोई क़र्ज़ लिया ही नहीं है.फिर क्यूँ इतने परेशान हैं क़र्ज़ उतारने के लिए? ''

बस इतनी सी बात पर वो नाराज़ हो गए और कहने लगे कि यही दिक्कत है आप जैसे साधारण जीव के लिए ,बात समझते नहीं और भक्क से मुँह खोलकर बोल देते है. अरे भाई,कुछ क़र्ज़ ऐसे होते है जो बिना लिए ही चढ़ जाते है. यह सुनकर मैं बहुत घबडा गया कि अगर कुछ ऐसे भी क़र्ज़ होते है जो बिना लिए चढ़ जाते है तो हो सकता है कि वो क़र्ज़ मुझ पर भी चढ़ गया होगा .यह तो मैं बिलकुल बर्दाश्त नहीं कर सकता कि मुझसे पूछे बिना कोई क़र्ज़ मुझ पर चढ़ जाए .मैंने अपनी दोनों हथेलियों को एक-दूसरे से सटा- कर उनसे पूछा ,''अच्छा सर जी,अगर कोई क़र्ज़ बिना लिए भी चढ़ जाता है तब तो यह मुझ पर भी चढ़ गया होगा .''

कृपा कर के यह बतलाने का कष्ट करें कि मैं अपना क़र्ज़ कैसे उतार सकता हूँ? किस दिन उग्र- संवाद-व्रत रखना होगा या किस सांप्रदायिक -दिवस को धूम-धाम से मनाना होगा? या जो भी विधि हो क़र्ज़ उतारने का बताएं क्योंकि मैं अपने सर पर क़र्ज़ लिए मरना नहीं चाहता .

वे बड़े निश्चिंत-भाव से बोले,''देखिये,आप जैसे साधारण आदमी को यह चिंता करने की जरुरत नहीं है. आपकी हैसियत ही क्या है कि आपके ऊपर क़र्ज़ चढ़ेगा .क़र्ज़ को पता होता है कि कहाँ चढ़ना है और कहाँ नहीं चढ़ना है .आप किसी ऐसे भवन पे चढ़ते है जहाँ से उतरना सम्भव नहीं हो ?नहीं न? वैसे ही क़र्ज़ भी देख लेती है कि जिस पर चढ़ने जा रही है उस पर से उतरना सम्भव है कि नहीं .ऐसा नहीं होता है कि दौड़ते हुए आए और धप्प से किसी के ऊपर चढ़ जाए .आप ही बोलिए कि आप क़र्ज़ उतारने में सक्षम है?''

मैंने कहा की मैं अपनी हैसियत जानता हूँ ,अगर आप जैसे २-४ समर्थ सज्जन यह गारंटी ले ले कि मुझ पर कोई बिना लिए वाली क़र्ज़ नहीं चढ़ी है तो मैं कम-से-कम चैन की नींद तो सो सकूँगा , नहीं तो मुझे रात-भर बुरे -बुरे सपने आयेंगे कि आस-पास कहीं आग लगी है और मैं उसके बीच घिर गया हूँ , और अपना क़र्ज़ उतारे बिना मर रहा हूँ या यह कि मेरे पडोसी क्या,मेरे खुद के घर के लोग ही मुझे क़र्ज़ नहीं उतारने दे रहें हैं ,और बदले में खुद ही क़र्ज़ उतारना चाहते है .अब यह कोई बात हुई कि क़र्ज़ मुझ पर चढ़े और उतारे कोई दूसरा . मेरी इस बात पर वे थोडा सेंटिमेंटल होते हुए बोले कि बिलकुल सत्य-वचन है ,क़र्ज़ जिस पर चढ़े उतारना तो उन्हें ही चाहिए .और भगवान् सबको मौका देता है क़र्ज़ उतारने का .अरे,कुछ लोग तो ऐसे है जो वर्षों से क़र्ज़ उतार रहे है और अभी तक उनका मन नहीं भरा .उनका कहना है कि मैं क़र्ज़ उतार भी सकता हूँ और नहीं भी उतार सकता हूँ,लेकिन मुझे क़र्ज़ उतारने का आदेश दिया जाएगा तो मैं पीछे नहीं हटूंगा . मैं हमेशा तैयार हूँ क़र्ज़ उतारने के लिए बस किसी स्पष्ट आदेश का इंतज़ार है .

कुछ ऐसे लोग भी है जो परदे के पीछे से क़र्ज़ उतार रहें है ,और लोग उनकी त्याग- भावना पर लट्टू हुए जा रहे है की देखो त्याग की भावना हो तो ऐसी कि मौका मिलने पर भी खुद क़र्ज़ उतारने के बदले दूसरों से क़र्ज़ उतरवा रहे है . इसको कहते है आदर्श संयुक्त-परिवार .

मैंने उन्हें रोकते हुए पूछा कि अच्छा आप यह बताएं कि आज जो आप इतने परेशान है क़र्ज़ उतारने के लिए तो जब यह चढ़ रही थी तो आपने चढ़ने ही क्यों दिया? उनका जवाब था कि यह क़र्ज़ तो उनपर बचपन में ही चढ़ गया था ,उन्हें पता ही नहीं चला कि कब यह क़र्ज़ चढ़ गयी .जब चढ़ गयी तब होश आया .उनका यह भी कहना था कि लोग उन्हें ही क्यों टारगेट बना रहे है . कुछ लोग तो पीढ़ियों से क़र्ज़ उतार रहे है ,बाप-बेटी-बेटा सभी ने क़र्ज़ उतार दिया ,बल्कि आने वाली पीढ़ी भी क़र्ज़ उतारने की तैयारी में है, खैर मैंने उन्हें सांत्वना दिया ,'' देखिये,आप अपना कर्म करते रहिये,अल्लाह ने चाहा तो आप का भी क़र्ज़ उतर ही जायेगा .हमने जो इतनों को क़र्ज़ उतारने का मौका दिया तो आप भी कभी ना कभी क़र्ज़ उतारने में सक्षम हो ही जाएंगे .

उनके जाने के बाद मैं सोचने लगा कि क़र्ज़ लेने वाले तो क़र्ज़ लेकर रास्ता भूल जाते है ,लेकिन क़र्ज़ उतारने वाले तो बार -बार आएंगे .और क़र्ज़ उतारने वाले कभी-कभी पेंट-शर्ट भी उतरवा लेते है, मुँह का निवाला तक छीन लेते है. हे भगवान, क़र्ज़ उतारने वालों से बचाना .या तो क़र्ज़ सही ढंग से उतारे या फिर रहने दे.

--
v k verma,sr.chemist,D.V.C.,BTPS

BOKARO THERMAL,BOKARO
vijayvermavijay560@gmail.com

0 blogger-facebook

एक टिप्पणी भेजें

रचनाओं पर आपकी बेबाक समीक्षा व अमूल्य टिप्पणियों के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद.

स्पैम टिप्पणियों (वायरस डाउनलोडर युक्त कड़ियों वाले) की रोकथाम हेतु टिप्पणियों का मॉडरेशन लागू है. अतः आपकी टिप्पणियों को यहाँ प्रकट होने में कुछ समय लग सकता है.

------------------------------------------------------------

और दिलचस्प, मनोरंजक रचनाएँ पढ़ें-

प्रकाशनार्थ रचनाएँ आमंत्रित हैं...

1 करोड़ से अधिक पृष्ठ-पठन, 1.5 लाख गूगल+ अनुसरणकर्ता, 1500 से अधिक सदस्य

/ 2,500 से अधिक नियमित ग्राहक तथा 2000 से अधिक फ़ेसबुक प्रसंशक
/ प्रतिमाह 10,00,000(दस लाख) से अधिक पाठक
/ 10,000 से अधिक हर विधा की साहित्यिक रचनाएँ प्रकाशित
/ आप भी अपनी रचनाओं को इंटरनेट के विशाल पाठक वर्ग का नया विस्तार दें, आज ही नाका से जुड़ें. नाका में प्रकाशनार्थ रचनाओं का स्वागत है.किसी भी फ़ॉन्ट, टैक्स्ट, वर्ड या पेजमेकर फ़ाइल में रचनाएँ rachanakar@gmail.com पर ईमेल करें. अधिक जानकारी के लिए यह लिंक देखें - http://www.rachanakar.org/2005/09/blog-post_28.html

विश्व की पहली, यूनिकोडित हिंदी की सर्वाधिक प्रसारित, समृद्ध व लोकप्रिय ई-पत्रिका - नाका

मनपसंद रचनाएँ खोजकर पढ़ें
गूगल प्ले स्टोर से रचनाकार ऐप्प https://play.google.com/store/apps/details?id=com.rachanakar.org इंस्टाल करें. image

--------