रविवार, 28 अप्रैल 2013

आशीष कुमार त्रिवेदी की लघुकथा - मेरी इच्छा

मेरी इच्छा 

ईशान बेसब्री से अपने मम्मी डैडी के आने की प्रतीक्षा कर रहा था। बंसी ने कई बार कहा की वह खाना खाकर सो जाए नहीं तो मेमसाहब नाराज़ होंगी  किन्तु वह कुछ सुनने को तैयार नहीं था।

विभा और प्रसून दोनों मिलकर एक कंसल्टेंसी फर्म चलाते थे। बिजनेस बहुत अच्छा चल रहा था। दोनों सुबह बहुत जल्दी ही एक साथ दफ्तर को निकल जाते थे और एक साथ ही लौटते थे। अक्सर उन्हें बहुत देर हो जाती थी। आज भी उन्हें देर हो गयी थी।

दरवाज़े की घंटी बजी। बंसी ने दरवाज़ा खोला। प्रसून घुसते ही सोफे पर पसर गया। विभा अपने बेडरूम में चली गयी। बंसी उन दोनों के लिए पानी लेकर आ रही थी। ईशान ने लपक कर उसके हाथ से ट्रे ले ली। पहले वह अपने डैडी के पास गया। प्रसून ने गिलास उठा लिया। ईशान ने कुछ कहना चाह तो उसे रोक कर वह बोला " बेटा जो कुछ भी कहना है अपनी मम्मी से कहो। आज मैं बहुत थका हुआ हूँ। यू आर अ गुड बॉय।" ईशान चुप चाप वहां से चला आया।

जब वह विभा के पास पहुंचा तो उसे देखते ही बोल पड़ी " ईशान तुम अभी तक सोये नहीं। कितनी बार कहा जल्दी खाना खाकर सो जाया करो। सुबह स्कूल जाना होता है।" उसने एक घूँट में ही सारा गिलास खाली कर दिया " उफ़ आज का दिन, बहुत  काम था। जाओ तुम जाकर सो जाओ। बंसी ईशान को सुला दो।" विभा ने बंसी को पुकारा। 

ईशान की बात उसके मन में ही रह गयी। खाना खाकर वह चुप चाप अपने कमरे में चला गया। विभा और प्रसून भी बहुत थके थे अतः बिना खाए ही सो गए। देर रात को विभा का गला सूखने लगा तो वह पानी पीने बहार डाईनिंग टेबल पर आई। वह गिलास में पानी डाल रही थी कि तभी उसकी नजर टेबल पर रखी नोटबुक पर पड़ी। उसके ऊपर एक प्लास्टिक का पेंसिल बॉक्स था जो नया लग रहा था। उस पेन्सिल बॉक्स के नीचे एक कागज़ दबा था। विभा ने लाइट जलाई और पढ़ने लगी 

" मम्मी  डैडी आज स्कूल में मेरी टीचर ने हमें 'मेरी इच्छा' विषय पर लेख लिखने को कहा था। मेरा लेख उन्हें बहुत पसंद आया। इसलिए उन्होंने खुश होकर मुझे यह पेंसिल बॉक्स ईनाम में दिया है। अगर वक़्त मिले तो नोटबुक में मेरा लेख पढ़ लेना प्लीज ........"

विभा ने नोटबुक खोली और पढ़ने लगी 

" भगवान आप तो बहुत दयालु हैं। सबकी इच्छा पूरी करते हैं। मेरी भी एक इच्छा है। मैं अपने मम्मी  डैडी के साथ एक दिन बिताना चाहता हूँ। जब वो सिर्फ मेरे साथ रहें। जब उनके पास कोई ज़रूरी काम न हो, उन्हें कोई ज़रूरी फोन न आये और न ही उन्हें किसी ज़रूरी काम के लिए जाना हो। उस पूरे दिन वो मेरे पास रहे और सिर्फ मुझसे बात करें। मैं उन्हें बहुत कुछ बताना चाहता हूँ किन्तु उन दोनो के पास समय ही नहीं रहता है। आप बच्चों की बात जल्दी सुनते हैं। आप मेरी यह इच्छा पूरी करेंगे न।"

लेख पढ़कर विभा की आँखें भर आयीं और वह फूट फूट कर रोने लगी।

प्रसून जब बहार आया तो देखा विभा रो रही है उसने घबरा कर पूछा " क्या हुआ क्यों रो रही हो"

बिना कुछ कहे विभा ने नोटबुक उसे पकड़ा दी। प्रसून भी लेख पढ़ने लगा।

कुछ देर दोनों शांत बैठे रहे। फिर उठ कर ईशान के कमरे में गए। वह गहरी नींद में सो रहा था। दोनों पति पत्नी उसके अगल बगल वहीँ पलंग पर लेट गए।

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  1. लघु कथा को सार्थक बनाती कथा। ईशान के माध्यम से बिजी परिवारों में पल-बढ रहे बच्चों की पीडा का वर्णन आया है। ईशान लेख के माध्यम से जो व्यक्त कर सका वह सब बच्चे व्यक्त करें तो माता-पिता के दिल में बच्चों के प्रति प्रेम का सागर फूट सकता है। प्रेम तो होता है पर समय की कमी के कारण व्यक्त होता नहीं और 'समय दो' की ईशांत की मांग सफल और असरदार मार्ग से बाहर आई है।

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  2. विजय जी धन्यवाद अक्सर हम बच्चों को सरे जहां का सुख देने की ख्वाहिश में पैसे कमाने में इतने व्यस्त हो जाते हैं की उन्हें अपना थोडा सा समय भी नहीं दे पाते।

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  3. aj ke haalt par prahar karti shashakt laghukatha ..aaj bachcho ke paas sab kuchh hai sirf maata pita ka samy nahi ...

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