मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

अनिल मेलकानी की कविताएँ

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ख़ामोशी
कितना अजीब?
कि इतनी नजदीकियों बाद भी,
तुम हमें आम-लोगों में ही गिन पाते हो;
और ये भी,
कि इतना कुछ  होते हुए;
तुम हमें दिल के उतने ही करीब नज़र आते हो !
कुछ बातें,
लफ़्ज़ों में बयाँ नहीं की जाती;
फिर तुम न जाने क्यों, हर एहसास को,
कह कर ही जताते हो;
अगर हम कहते,
तो फिर कह जाते दिल की हर बात;
तुम अगर कहते भी हो,
तो नजर से कुछ और,  जुबाँ से कुछ और कह जाते हो !

 

 


वादे :)

कई सारे तुम्हारे
मुझे अब तक याद आते हैं
लोगों को तो पूरे किये वादे भी याद नहीं रहते
और मुझे तो कमबख्त अधूरे ही अब तक सताते हैं
रिश्तों के कमज़ोर धागे तोड़ कर तुम
न जाने अपनी यादों का भारी झोला क्यों दे गयी हो मुझे
देखो ना अब तक छुपा कर रखी हैं
तुम्हारी इतनी बेशकीमती यादें
बस कभी-कभी ही निकालता हूँ नज़र के सामने, अकेलेपन में
जब कभी लडखडाता हूँ, तो हाथ सबसे पहले इन्हें ही सम्हालता है
तुम जानती थी ना अधूरेपन की मिठास ?
बस थोडा सा प्यार का रसगुल्ला चखा दिया और छोड़ दिया फिर तड़पने को
और ये तो चीज़ भी ऐसी कि जिसकी दुकान भी एक ही है
और एक तुम ही अकेली दुकानदार
वहीँ मेरे जाने पर पाबंदी हो, तो फिर बचा क्या है ?
सुनो ! और कुछ नहीं तो अपनी यादों का बोझ ही वापस ले जाओ
बेफिक्री और हल्केपन में प्यार की भूख तो कम लगेगी
और अगर तुम से हो सके
तो मेरा भरोसा जो तुम्हारे पास रखा था वो भी लेती आना
सुना हैं इस दुनिया में जीने के लिए भरोसा बहुत जरुरी है !

 


दूर..!

हाँ मैं समझता हूँ तुम्हारी आँखों की कही बात
तुम्हारी धडकनों के जज़्बात भी सुनाई देते हैं मुझे
तुम अपनी बातों को सिसकियों में बयां करने की कोशिश क्यों करती हो?
मेरी ख़ामोशी का मतलब भी कभी समझा करो
तुम्हारे और मेरे रिश्ते की कोई सीमा नहीं है
मगर ये तो तुम भी समझती हो ना की इसकी भी एक उम्र है?
ढलते हुए सूरज से मुंह फेरना तो धरती को समझता ही है
फिर तुम क्यों नज़रें टिकाये बैठी हो देर शाम तक ?
हम जब तक साथ हैं तब तक सब तरफ उजाला है
हम साथ नहीं होंगे, तो हर तरफ अँधेरा ही होगा
और इस शाम की उम्र तो होती ही बहुत कम है
कुछ ही पलों में गुज़र जाएगी
घुप्प अंधेरों में दिया जलाकर, मुझे फिर मत तलाशना तुम
थोडा इंतज़ार करोगी तो नया सूरज दिख ही जायेगा
तब तक तुम भी जरा सुस्ता लेना…
सुबह की मुस्कराहट और खिलेगी तुम्हारे लबों पर!

 


भँवर

बिना मल्हार तेज़ धार में बहती एक नाव जैसे
जिये जाता है कोई काले दिन,  और उजली रात कुछ ऐसे
हर ठहराव पर ढूंढ रहा जैसे कोई किनारा
हर भँवर से उलझने की कोशिश में कोई ऐसे .!
शाम के सूरज में, कमजोर परछाई के जैसे
इन दिनों, किसी के चेहरे की मुस्कुराहट कुछ ऐसे
शिद्दत से छुपा कर माथे की शिकन
बहाने से  दिल की शिकायतें झुठलाता हो जैसे .!

 

 

 

इक बार फिर से मिलते हैं

चलो इक बार फिर से हम , बनके अजनबी.. कभी मिलते हैं
अपनी दुनिया के ताने – बाने, नए धागों से बुनते हैं

फिर इक बार मुलाक़ातों के सिलसिले
नए सिरे से लिखने हैं
खुशनुमा लम्हे जो हमसे टूटे
वो फिर से पिरोने हैं
एक दूजे की ज़िन्दगी के हर पहलू को, अब गहराई से समझते हैं
चलो इक बार फिर से हम , बनके अजनबी.. कभी मिलते हैं

कितनी बारिशें हमने बिताई
अपनी-अपनी दीवारों के पीछे
भीगने की ख़ुशी समझते थे दोनों
फिर भी रह गए कैसे,  आँखें  मींचे
छोटी छोटी खुशियों की बारिश में, अब मिल के नाचते हैं
इक बार फिर से हम , बनके अजनबी.. कभी मिलते हैं

अपनी दुनिया के ताने – बाने, नए धागों से बुनते हैं

 

   

ये शहर ..

इस शहर के गली नुक्कड़ में..
कोई पुरानी पहचान ढूंढता हूँ मैं,
इन उलझे कठिन रास्तों में, बचपन की यादें,
और मेरे मिट्टी के मकान ढूंढता हूँ मैं !
इस शहर के लोग बागों में,
कोई मेरा जिगरी यार ढूंढता हूँ..
इन लोगों से मतलब की बातों में भी,
कभी मजाकिया हँसने की वजह ढूंढता हूँ मैं !
इस शहर के गली नुक्कड़ में..
कोई पुरानी पहचान ढूंढता हूँ मैं !

 

 

 


तेरे बिना फिर बदल गया…
तेरे आने से जहाँ बदला, तेरे बिना फिर बदल गया…
इक सफ़र, साथ तय करना था, तेरे बिना फिर ठहर गया !
पलक झपकी और तू दिखा, फिर झपकी तू था ही नहीं,
इक पल का हसीं खाब था वो…अगले पल ही टूट गया !
इक रिश्ता सोचा तुझे लेकर, रिश्ता जो नाकाम रहा,
मैं हारा वो ठीक, मगर ऐसा क्या.. तेरे हाथ आया ?
बहुत चाहा तुझे रोकना, ये बात अलग तू रुकता नहीं ,
फिर आरज़ू की तेरे लौटने की, तू ख्वाब समझ के भूल गया !!

 

 

 

Anil Malekani

 

Anil.malekani@outlook.com

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