सोमवार, 15 अप्रैल 2013

कर्मानंद आर्य की कविताएँ

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घायल देश के सिपाही

(इरोम शर्मिला के लिए : जिसने मृत्यु का मतलब जान लिया है)

लड़ रही हूँ की लोगों ने लड़ना बंद कर दिया है
एक सादे समझौते के खिलाफ
कि “क्या फर्क पड़ता है”
मेरी आवाज तेज और बुलंद हुई है इन दिनों
घोड़े की टाप से भी खतरनाक
 
मुझे जिन्दगी से बहुत प्यार है
मैं मृत्यु की कीमत जानती हूँ
इसलिए लड़ रही हूँ 

लड़ रही हूँ की बहुत चालाक है घायल शिकारी
मेरे बच्चों के मुख में मेरा स्तन है
लड़ रही हूँ जब मुझे चारो तरफ से घेर लिया गया है
शिकारी को चाहिए मेरे दांत, मेरे नाख़ून, मेरी अस्थियाँ
मेरे परंपरागत धनुष-बाण
बाजार में सबकी कीमत तय है
मेरी बारूदी मिट्टी भी बेच दी गई है

मुझे मेरे देश में निर्वासन की सजा दी गई है
मैं वतन की तलाश कर रही हूँ

जब मैं फरियाद लिए दिल्ली की सड़को पर घूमती हूँ 
तो हमसे पूछा जाता है हमारा देश
और फिर मान लिया जाता है की हम उनकी पहुँच के भीतर हैं
वो जहाँ चाहें झंडें गाड़ दे 

हमारी हरी देहों का दोहन
शिकारी को बहुत लुभाता है
कुछ कामुक पुरुषों को दिखती नहीं हमारी टूटी हुई अस्थियाँ
सेना के टापों से हमारी नींद टूट जाती है
उन्होंने हमें रण्डी मान लिया है

उन्हें हमारे कृत्यों से घृणा नहीं होती है
उन्हें भाता है हमारा लिजलिजापन
वह कम प्रतिक्रिया देता है
सोचता है मैं हार जाउंगी

घायल शिकारिओं आओ देखो मेरा उन्नत वक्ष
तुम्हारे हौसले से भी ऊँचा और कठोर
तुम मेरा स्तन पीना चाहते थे न
आओ देखो मेरा खून कितना नमकीन और जहरीला है

आओ देखो राख को गर्म रखने वाली रात मेरे भीतर जिन्दा है
आओ देखो ब्रह्मपुत्र कैसे हंसती है
आओ देखो वितस्ता कैसे खिलखिलाती है मेरे भीतर 
देखो हमारे दर्रे से बहने वाली रोसनाई
कितनी लाल और मादक है

मेरा पुनर्जन्म नहीं होगा
मैं कायम रहूँगी अपनी पीढ़ियों में 
मैं इरोम हूँ इरोम
इरोम शर्मिला चानू

 


कोई जालिम भूख उन्हें खा जायेगी!

देश के उस हिस्से में
जहाँ मैं बड़ा हुआ

चीलें मंडरा रहीं हैं घरों के आस-पास
वे चीलें जिनके पंजे लोहे से बने हैं

जिनके चोंचो की धार में    
समा गया है सारा मुल्क 

कुरकुरे की पन्नियों से ज्यादा चमकदार
बोतलबंद सोडे से ज्यादा मारक हैं उनकी निगाहें 

सुमुखी विज्ञापन वाली चीलें,
निर्देशित कर रही हैं फ़िल्में, कला, आलोचना, नामवरी दहशत
सकुनियों के देश में समझना होगा
कब और कहाँ लुटने वाला तंत्र खड़ा है 

वे चीलें आम चीलें नहीं हैं
उनका कद अरब के गिद्धों से बड़ा है

रवायती सांप और चीलें अब दोस्त हैं
सावन की यह दोस्ती गुल लुटने तक कायम है
बलात्कारी देश में
सांप की आँखों में चमक तेज है

चमक तेज है कि चूहे घूम रहे हैं दर-बदर
उनके अपने खेत तो नहीं उन्हें मरने यहीं आना है
यही बिल्लियों के मजबूत पंजों में  

असंतुष्ट आग तेज जल रही है
धीरे-धीरे ठंडी हो जायेगी मृत्युक्षुधा
 
कुछ लोग फूंकमारकर जिन्दा रक्खेंगे दलित जान
वहशीपन जिन्दा रखने के लिए

चीलें मेरे बहुसंस्कृति वाले देश का आइकॉन हैं
उन्होंने अपना रूप बदल लिया है 

इस लत्ता देश में
वे जिन्हें सांप से भी डर लगता है और चीलों से भी
सावधान रहें
कोई जालिम भूख उन्हें खा जायेगी!

कहते हैं आत्मा मरती नहीं
फिर कहाँ मरी हैं चीलें?
तुमने कभी सोचा सूखे तपे पहाड़ों का दुःख

मेरे जिस्म से निकलने वाली नदियों
समय के क्रूर पत्थरों
अस्मिता की अँधेरी गलियों में भटकने वाली दलित आत्माओं
बाहर निकलो

उन्होंने हमें सच का प्रलोभन दिया है
छीना है हमारा स्वत्व, हमारा घर, हमारे हरे-भरे खेत 
हमारे लहू में नमक की मात्रा बढ़ा दी है
गला दी हैं हमारी कमजोर अस्थियाँ

सिर्फ मौत का समझौता करते हुए
बेच दिया है रोटी का एक टुकड़ा
बेटी के लिए
रोटी का वही टुकड़ा मेरे जीवन का अंतिम उद्देश्य हो गया है

हमने कभी नहीं सोचा प्रेम में नयापन
कभी सौन्दर्यबोध की कविता नहीं रची भाषा में
ऊंट की पीठ पर कविता लिखते हुए
गुलाब के दावे को सुर्ख किया है हमने
हम अपनी बदबूदार गलियों में भटकते रहे हैं दर-दर
करते रहे हैं माई-बाप

हम असंतुष्ट कभी नहीं रहे
धर्म और अहिंसा के पेंडुलम में भकाते हुए तुमने
भेज दिया घर में शमशानी शांति
तुमने हमारा मरणभोज खाया है पीढ़ियों से
जूठन खिलाया फेंका हुआ

नए सूरज का उदय हुआ है पूरब में
हम राजा से मांग रहे हैं अपनी खोई हुई मुहरें

यह अस्मिता या अस्तित्व की लड़ाई भर नहीं
हम टूटी मूर्तियों में खोज रहे हैं अपना इतिहास
हमने भूख को मरने के लिए छोड़ दिया है जलते जंगल भीतर
अब हम रोटी की भीख नहीं मांगेंगे
सच का निवाला छीन खायेंगे 

समय दुहरा रहा है खुदको
मेरा भोग हुआ दुःख भोगेंगी तुम्हारी पीढ़िया
शुरुवात हो गई है
तुम खाने लगे हो मरे गोरु का मांस
जिसे तुम गन्दी निगाह से देखते थे
अपना रहे हो वही संस्कृति 

आंधिया शांत हो गई हैं
आज हम रेत के ढूहे नहीं हैं
जगते हुए पहाड़ हैं
हमारी कंदराओं से जन्म रहीं है विकास की नदियाँ
हमारे खून के रंगों से खिल रहें हैं बनौधे लाल टेसू
बनाश बिखर रहें हैं बेटी के सपनों भीतर

देखना एक दिन परिंदे फडफड़ायेंगे अपने पंख
आकाशवाणी होगी
तुम विजयी हुए हो पार्थ!
क्या तुमने कभी सोचा है
सूखे तपे पहाड़ों का दुःख


असंतोष एक शक्ति

मेरी बाहों के दायरे
कितने भी खुले हों
समा सकता हो आसमान भर प्यार
खो जाती हों पगडंडीया
मेरा असंतोषी मन
उनको बाहों में भरकर प्यार कर लेना चाहता है

प्रेम एकांत की उपज
मन के भीतर बने किसी कोने में
प्रेम पर किसी एक का हक
सुना है ऐसा
पर ये दलित बच्चे जो पढते है सरकारी स्कूल में
स्वेटर बुनती उनकी मेमे
बताती है आरक्षण
उन स्कूलो का नाम जिसमे लागू हो शिक्षा का अधिकार

आखिर कौन सी शिक्षा मांग रहें है दलित बच्चे
जिनसे वंचित रहें हैं वे
सौन्दर्यबोध की कविता में कितना है उनका प्रतिशत
उन्हें जागना है
असंतोष भी एक शक्ति है

चौबीस बरस की लड़की
 
अचानक नहीं घटती कोई घटना
न ही कोई उत्परिवर्तन होता है
कई दिन के ना नुकुर के बाद
समझौते में स्वीकार कर लेती है
चौबीस की उम्र का प्यार

एक लड़की के लिए छोटी नहीं होती
चौबीस पार की उम्र
इक अभ्र दमकता है उसकी शिराओं में
भोलापन को जाता है
वह अधिक सावधान हो जाती है
आसपास के माहौल से

अब वह जिद नहीं करती
घर सजाने का सपना बुनती है
माँ से खुलकर बोलती बतियाती है
उनकी हर बात मानती है दिल से
इसी उम्र में खुलवालेती है बैंक खाता

चौबीस पार की मुहब्बत पर
उसे होता है पूरा विश्वास
एक बारगी वह अर्पित हो जाती है
सम्पूर्णता के साथ

वह अक्सर भगवान् से मांगती है
प्यार की लम्बी उम्र
और भी कई परिवर्तन महसूसती है
चौबीस पार की लड़की
जिसे केवल महसूस करती हैं
चौबीस पार की लड़कियां
डरो नहीं ! मेरी कविता तुम्हारे खिलाफ नहीं है
आवेश में अक्सर धमकियों भरे ख़त हम भी लिखते हैं
किसी आतंकवादी समूह की तरह नहीं
मिट्टी में बंद बारूदी सुरंग की तरह

जिन्दगी की जंग लड़ते-लड़ते बंद मुट्ठी में भीगे हुए ख़त अचानक स्याह हो जाते हैं
उस दोराहे पर जहाँ पहलवानछाप बीड़ी का धुवां मेरी धमनियों में फैल जाता है
और मुझे सांस लेने में दिक्कत होती है

मैं कहता हूँ डाक्टर मुझे दिक्कत हो रही है
तुम कहते हो सब ठीक हो जाएगा 

जहाँ मेरे बच्चे को खून की उल्टियाँ होती हैं
और मेरी मासूम बेटी किसी गुमनाम सिपाही की माँ बनती है
तुम कहते हो सब ठीक हो जाएगा 
 
जब मैंने हथियार उठाया तब मेरी उम्र बहुत छोटी थी
अक्सर हमें बताया जाता था हमने बहुत दुःख झेला है
अपनी जमीन से बेघर होने से पहले हम सुखी थे

बीच-बीच में तुम्हारे मध्यस्थ आते रहे हैं
पर उन्होंने समझौते के बदले हमें दुबारा बिखेर दिया

जिस कलम ने हमारे विकास का सपना लिखा था
समय के साथ उसकी स्याही सूख गई
हमारे लिए लिखवाए गए विकास सेना की बंदूकों में कैद हो गए

क्या आप जानते हो जब अस्मिता की जमीन कोई छीन ले
तब हथियार ही हमारी पहली फसल हो जाता है

जब हमारे अधिकार छीन लिए गए और हमें कहा गया तुम हाशिए के लिए पैदा हुए हो
तब हमें बिलकुल भी अच्छा नहीं लगा
हमें लगा जहाँ न्याय ख़त्म हो जाए वहाँ न्याय के लिए लड़ना भी पड़ता है

हमने हथियार उठा लिए हैं
डरो नहीं हम तुम्हारे खिलाफ नहीं हैं यदि तुम हमारे खिलाफ नहीं हो

 

पतुरिया नाच
वे किसी नौटंकी नाच की जान होती थीं
जब वे ठुमक पड़ती थीं तो ऐसा लगता था मानो धरती नाच रही हो
और भगवान् चैतन्य भक्ति में लीन हो गए हों

लोगों की आँखे देह देखती थी
और माया वाली जिन्दा देहें भोग में योग तराशती थीं

हालाँकि कठघोड़वा, पंचगुइंयाँ, धोबियहिया, कहँरउआ, अहिरउआ जैसी कई नांचें थीं
पर नौटंकी की जान पतुरिया ही थी

जब वे संज-संवर कर निकलती थीं तो सूखे हुए गाल निकल पडते थे
जैसे निकल पड़ते हैं सद्या विवाहिता के अन्तरांग 

उनके घुंघरूओं में लोककला जीवित थी और उनकी वाणी में सरस्वती
जब उनके पैर थिरकते तो बूढ़े बैल कुलांचे मारते और गायें पगहा तोड़ देती थीं 
ठीक उस रात पूरी संस्कृति ब्रज हो जाती थी 
 
हारमोनियम से उठने वाला सुर जब हवा में लहराता
तो भौजाईयां बिन मौसम अन्दर तक भीग जाती थीं

वे भोली देहें उन भूखे देहों की शिकार होती थीं
जिनकी स्त्रियाँ केवल बच्चे जनती थीं
या जिनका यौवन जल्दी ख़त्म हो गया था
 
उस समय कोई नहीं सोचता था की पतुरिया कहाँ से आती हैं
या क्या वे केवल मनोरंजन के लिए पैदा हुई थीं
या जवान देहें बुढ़ापे में कहाँ गईं होंगी 

पतुरियां वास्तव में खोई हुई बच्चियां थीं या जारज संतानें
जिनकी वे बहन-बेटियां थीं उन्हें भी नहीं पता था की वे पतुरियां हैं
उनको पता था की ये उनका धंधा है और धंधा भगवान् होता है

उनकी जिन्दगी देवदासियों की जिन्दगी थी
जिनकी हरी-हरी चूड़ियाँ पुजारियों की बाहों में टूट गई थी 

कई बार पूरी-पूरी रात नाच होता था
और अगली सुबह शुक्रिया अदा के साथ ख़त्म होता था पतुरिया नाच 
मरजाद के बाद बारात लौट जाती थी

अब पतुरिया के बारे में कोई नहीं जानता
वे दलिताएं आखिर कहाँ चली गईं

डॉ.कर्मानंद आर्य


तुम्हारी उम्मीदों के साथ

तुम्हारी उम्मीदों के साथ
यथास्थिति बनाये हुए
नहीं चल सकता तुम्हारे साथ
तुम्हारे साथ चलने में मैं हांफ गया हूँ

मुझे दौड़ना होगा ब्राम्हण !
मैंने परंपरा की बैसाखियां तोड़ दी हैं ..........
तुम्हारे स्थापित मानदंडों की किरचें सीधी नहीं होतीं
और मेरे अन्दर इतनी आग नहीं की उन्हें सीधी करूँ

तुम्हारी बांधी हुई गांठे जकड गईं हैं
वे खुलने का नाम नहीं लेतीं
लगता है काटनी पड़ेगी आदमकद रस्सियाँ 

तुम्हारे सामने मैं सिद्धार्थ नहीं होना चाहता
तथागत होना चाहता हूँ

मेरे आदर्शों में जगजीवन राम नहीं
आंबेडकर की क्रन्तिकारी ऊर्जा है

शांत रातों के गर्भ में विधवा पाल रही है बच्चे
बच्चे की हथेलियाँ जब खुलेंगी तो उसे ठीक से बताया जाएगा
तुम्हारे कवच कुंडल छीनने का पाप करेंगे देवता
अपने स्वत्व की रक्षा के लिए तुम्हें चालाकी सीखनी होगी

तुम्हारी परंपरा से लड़ते हुए हमने जाना है
तुम्हारी परंपरा रूढ़ और काली है

सघन और बदबूदार काइयां, भीतर पड़े हुए जाले बताते हैं
तुममें वर्षों से हलचल नहीं हुई है

मैंने ट्रेन की टिकटें खरीद ली हैं
उस ट्रेन की टिकटें जिसका वास्ता विकास से है

मैं असुन्दरता में रहकर सुन्दरता से खिलाफत नहीं कर सकता
मैं उस गोल पर्वत के खिलाफ आवाज उठाता हूँ

मैं अपने चेहरे पर युद्ध का घाव नहीं रखना चाहता
मैं अपने नाखूनी पंजों के साथ मरना चाहता हूँ

--

मेरे बारे में :

मेरा जन्म उत्तरप्रदेश के बस्ती जिले में १५ मई १९८४ को एक दलित-मजदूर परिवार में हुआ. पांचवीं तक की शिक्षा प्राइमरी स्कूल से तत्पश्चात गुरुकुलीय वैदिक परंपरा में स्नातक. उच्चशिक्षा यूजीसी से वरिष्ठ अध्येतावृत्ति प्राप्त कर प्राच्यविद्या के लिए विख्यात गुरुकुल कांगड़ी विश्वविद्यालय, हरिद्वार से. सम्प्रति बिहार केन्द्रीय विश्वविद्यालय के भारतीय भाषा विभाग में सहायक प्राध्यापक.

रचना कर्म :

हाशिये की वैचारिकी में गहरी आस्था. देश की प्रतिष्ठित पत्र पत्रिकाओं में शोधलेख, लेख एवं बहुत सी कवितायेँ प्रकाशित.   

भवदीय

Dr. Karmanand Arya,

Assistant Professor,

Center for Indian Language-Hindi,
School of Foreign and Indian language,
Central University of Bihar,
(Founded by GoI under Central Universities Act, 2009)
Camp Office: BIT Campus-Patna
P.O-B.V. College, Patna 800014,
Bihar, India
Email:
karmanand@cub.ac.in; karmam1984@yahoo.co.in

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