शुक्रवार, 5 अप्रैल 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - भगवान शिव एवं शैव दर्शन

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भगवान शिव एवं शैव दर्शन

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

त्रिदेव (ब्रह्मा, विष्णु, महेश) में भगवान महेश अर्थात् शिव संहार के देवता हैं । शिव का शाब्दिक अर्थ है 'शुभ', 'कल्याण', 'मंगल', 'श्रेयस्कर' आदि। हिन्दू धर्मावलम्बियों में वैष्णव एवं शैव सम्प्रदायों के अनुयायियों की सख्या सर्वाधिक है। शैव वह धार्मिक सम्प्रदाय है जो शिव को ही ईश्वर मानकर आराधना करता है। प्रसंगतः यह भी उल्लेखनीय है कि अधिकांश समकालीन हिन्दू धर्मावलम्बी सभी सम्प्रदायों के आराध्यों की आराधना करते हैं; शिव, राम, कृष्ण, दुर्गा आदि सभी देवी-देवताओं की पूजा करते हैं। सम्प्रति, भगवान शिव को लक्ष्य कर, विवेचना की जा रही है।

नाम और महिमाः

शिव के अनेक वाचक हैं,भगवान शिव के अनेक नाम हैं :

1. रुद्र ( जो दुखों का निर्माण व नाश करता है) 2. पशुपतिनाथ ( पशु पक्षियों व जीवात्माओं के स्वामी) 3.अर्धनारीश्वर ( शिव और शक्ति का मिलन) 4. महादेव ( सभी देवों में श्रेष्ठ, महान ईश्वरीय शक्ति) 5. भोला( कोमल हृदय, दयालु एवं भक्तवत्सल) 6. लिंगम (सम्पूर्ण ब्रह्मांड का प्रतीक) 7.नटराज ( नृत्य के देवता) ।

द्वादश ज्योतिर्लिंगों के नाम भी शिव के ही वाचक हैं तथा उनके साथ शिव के महत्व की गाथाएँ भी जुड़ी हुई हैं। ये निम्न हैं -

1.ओंकारेश्वर ( मंगलकारी) 2. केदारनाथ ( हिमालय के केदार पर्वत के स्वामी) 3. घुश्मेश्वर (सती शिवभक्त घुश्मा के आराध्य होने के कारण घुश्मेश्वर महादेव के नाम से विख्यात) 4. त्र्यम्बकेश्वर ( तीन नेत्रों वाले ईश्वर) 5. नागेश्वर ( नागों को धारण करने वाले) 6. भीमशंकर ( भीमकाय स्वरूप में प्रकट होकर त्रिपुरासुर को पराजित करने वाले शंकर) 7. महाकालेश्वर ( शिव का प्रलयकर्ता का रूप) 8. मल्लिकार्जुन स्वामी ( अर्चना में अर्पित चमेली जैसे मिल्लका पुष्पों को ग्रहण करने वाले) 9. रामलिंगेश्वर ( लंका पर चढ़ाई करने के पूर्व भगवान राम द्वारा स्थापित एवं उपासित शिवलिंग) 10. विश्वनाथ ( शिव के त्रिशूल पर स्थित काशी अथवा वाराणसी में विश्व के नाथ) 11. वैद्यनाथ ( आयुर्वेद आचार्यों के नाथ) 12. सोमनाथ ( वह स्थान जहाँ शिव को प्रसन्न करने के लिए चंद्रमा ने रोहिणी के साथ स्पर्श लिंग की पूजा की अथवा अपने मस्तिष्क पर चंद्रमा को धारण करने वाले शिव)

उनके अनेक रूपों में उमा-महेश्वर, अर्द्धनारीश्वर, पशुपति, कृत्तिवासा, दक्षिणामूर्ति तथा योगीश्वर आदि अति प्रसिद्ध हैं।

अनेक ग्रंथों एवं लेखों में भगवान शिव के 1008 नामों का उनके अर्थों तथा व्याख्याओं सहित विवरण मिलता है। उपर्युक्त वर्णित नामों एवं रूपवाचकों के अतिरिक्त जो और नाम अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध हैं, वे अकारादि क्रम से निम्न हैं :

1. अघोरनाथ 2. आशुतोष 3. ईशान 4. उमेश 5. कामेश्वर 6. कैलाशनाथ 7. गंगाधर 8. गिरीश 9. चंद्रशेखर 10. जटाधर 11. त्रिलोचन 12. नीलकंठ 13. भूतनाथ 14. भैरव 15. महेश 16. शंकर 17. शंभु 18. शशिधर।

पुराणों में वर्णित शिवस्तुति में उनके अनेक ऐसे नाम भी मिलते हैं जो जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर आदिनाथ अथवा ऋषभदेव के लिए भी प्रयुक्त होते हैं :

वृषभ, वृषभध्वज, वृषांक, दिगम्बर, दिग्वस्त्र, दिग्वास, जटी, चारुकेश, जटा-भार-भास्वर, ऊर्ध्वरेतेसु, ऊध्वेन्द्र, तपोमय, शान्त, इन्द्रियपति, अक्षोभ्य, अहिंसचैकितान, ज्ञानी-वज्रे-संहनन, पिच्छिकास्त्र।

डॉ. हीरालाल जैन ने शिव-रुद्र एवं जैन धर्म के प्रथम तीर्थंकर ऋषभदेव अथवा वृषभनाथ अथवा आदिनाथ की समानता के अनेक प्रमाण प्रस्तुत किए हैं। ( देखें – रचना और पुनर्रचना, पृष्ठ 172 – 175, डॉ. भीमराव अम्बेदकर विश्वविद्यालय, आगरा, (नवम्बर, 2000))।

वेद में इनका नाम रुद्र है। यह व्यक्ति की चेतना के अर्न्तयामी हैं । इनकी अर्द्धांगिनी (शक्ति) का नाम पार्वती है और इनके पुत्र स्कन्द और गणेश हैं । भगवान शिव का परिवार केवल पत्नी पार्वती एवं पुत्र स्कंद एवं गणेश तक ही सीमित नहीं है; एकादश रुद्राणियाँ, चौसठ योगिनियाँ तथा भैरव आदि इनके सहचर और सहचरी हैं।

शिव के रूप :

पंचमुखी महादेव के पाँच मुखों के नाम हैं – (1) ईशान (2) तत्पुरुष (3) वामदेव (4) अघोर (5) सद्योजात।

सर्वव्यापी शिव को पृथ्वी में शर्व, जल में भव, अग्नि में पशुपति, वायु में ईशान, आकाश में भीम, सूर्य में रुद्र, सोम अर्थात् चंद्रमा में महादेव और यज्ञक्रिया में उग्र मूर्ति रूप में दिखाया जाता है। इन्हें अष्टमूर्तियाँ कहा जाता है।

शिव महायोगी हैं। निराकार रूप में इनकी पूजा लिंग के रूप में होती है । शैव मत में वे सृष्टि की उत्पत्ति, स्थिति एवं संहार के अधिपति हैं । शिव और शक्ति में अद्वैत है। शिव के हृदय में शक्ति का और शक्ति के हृदय में शिव का वास है। चंद्र और चाँदनी जिस तरह से अभिन्न हैं, उसी तरह से शिव-शक्ति भी अभिन्न हैं। जिस प्रकार वैष्णव पुराणों में विष्णु के दश (10) अवतारों की गाथाएँ वर्णित हैं, उसी प्रकार शैव पुराणों में शिव-शक्ति अथवा शिव-पार्वती के दश अवतारों की गाथाएँ निबद्ध हैं। इनके नाम हैं : (1) महाकाल-महाकाली (2) तारण-तारा (3) बाल-बालभुवनेशी (4) षोडश-षोडशी (5) भैरव-भैरवी (6) छिनमस्त-छिनमस्ता (7) धूमवान-धूमवती (8) बगलामुख-बगलामुखी (9) मातंग-मातंगी (10) कमल-कमला।

द्वादश ज्योतिर्लिंगः

देश में बारह ज्योतिर्लिंग प्रसिद्ध हैं जिनके दर्शन की कामना प्रत्येक शिवभक्त को रहती है। इन 12 ज्योतिर्लिंगों में से 9 की स्थिति निर्विवाद है। इनके नाम हैः

1. सोमनाथ (गुजरात में वेरावल के पास)

2. महाकालेश्वर ( मध्य प्रदेश के उज्जैन नगर में)

3. ओंकारेश्वर ( मध्य प्रदेश में इंदौर के पास)

4. केदारनाथ (उत्तराखंड के रुद्रप्रयाग नगर से 86 किलोमीटर दूर। गौरीकुण्ड से 14

किलोमीटर की पद यात्रा।)

5. विश्वनाथ (उत्तर प्रदेश के वाराणसी नगर में)

6. त्र्यम्बकेश्वर (महाराष्ट्र में नासिक जिले में गोदावरी के उद्गम-स्थल के पास)

7. रामलिंगेश्वर ( तमिलनाडु में रामेश्वरम् में)

8. घुश्मेश्वर ( महाराष्ट्र में औरंगाबाद जिले में दौलताबाद स्टेशन से 20 किलोमीटर दूर)

9. श्री सैलम-मल्लिकार्जुन मंदिर(आंध्र प्रदेश के कुरनूल जिले में घने जंगलों के बीच)

अन्य तीन ज्योतिर्लिंगों की भौगोलिक स्थिति के बारे में निम्न दावेदार हैं और प्रत्येक स्थान के गाइड एवं पंडित-पुरोहित अपने-अपने पक्ष में प्रमाण प्रस्तुत करते हैं :

10. भीमशंकर – (अ) महाराष्ट्र में पुणें के पास सह्याद्रि पर्वत पर

(आ) उत्तराखंड में काशीपुर के पास मोटेश्वर मंदिर

11. वैद्यनाथ – (अ) झारखंड के देवघर में स्थित

(आ) महाराष्ट्र के बीड़ जिले में परभणी रेलवे जंकशन के पास परली में

(इ) हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में पालमपुर से लगभग 14

किलोमीटर दूर बैजनाथ मंदिर

12. नागेश्वर - (अ) गुजरात में जामनगर जिले में द्वारका के पास नागेश्वर मंदिर

(आ) उत्तराखंड में अल्मोड़ा से 36 किलोमीटर दूर जागेश्वर मंदिर

(इ) महाराष्ट्र के हिंगोली जिले में औंधा नागनाथ मंदिर

पंच तत्त्वों में व्यक्तः

भगवान शिव सर्वव्यापक हैं। दक्षिण भारत में भगवान शिव की सर्वव्यापकता को व्यक्त करने के लिए उन्हें जल, अग्नि, वायु, पृथ्वी और आकाश – इन पाँचों तत्त्वों में व्यक्त किया गया है। इस दृष्टि से तमिलनाडु में तिरुचिरापल्ली में जल या नीर(जंबूकेश्वरार या जम्बूकेश्वर), तिरुअन्नामलै में अग्नि (अन्नामलियार या अरुणाचलेश्वर), कांचिपुरम में पृथ्वी (एकंबरेश्वर), चिदंबरम् में आकाश (नटराज), तथा आंध्र प्रदेश में तिरुपति से 36 किलोमीटर की दूरी पर श्री कालहस्ति में वायु (श्री कालहस्तीश्वर स्वामी) के शिव मंदिर प्रसिद्ध हैं।

अन्य प्रसिद्ध मंदिर तथा पवित्र स्थलः

भगवान शिव के भारत तथा भारतेतर देशों में असंख्य मंदिर हैं। उपर्युक्त वर्णित ज्योतिर्लिंगों के अतिरिक्त भारत के प्रत्येक क्षेत्र में अनगिनत शैव मंदिर विद्यमान हैं। सबका विवरण ही नहीं, नामोल्लेख करना भी सम्भव नहीं है। राज्यवार अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध एवं मान्य मंदिरों के संकेत इस प्रकार हैं :

(1) तमिलनाडुः

अग्रेज़ी विकिपीडिया के अनुसार तमिलनाडु में लगभग 2500 प्रसिद्ध शैव मंदिर विद्यमान हैं।

http://en.wikipedia.org/wiki/Shiva_Temples_of_Tamil_Nadu

तिरसठ (63) शिवभक्त “नायनारों” या “नायनमारों“ के साहित्य में प्रसिद्ध शैव मंदिरों का वर्णन मिलता है जिनकी संख्या 264 है।

रामेश्वर के रामलिंगेश्वर के अतिरिक्त निम्न विश्व प्रसिद्ध शैव मंदिर हैं -

(1) एकंबरेश्वर एवं (2) कैलाश नाथरः कांचीपुरम् में

(3) अन्नामलियार या अरुणाचलेश्वरः तिरुअन्नामलै में

(4) जम्बूकेश्वरः तिरुचिरापल्ली में

(5) बृहदेश्वर या राजराजशेखर या पेरुवयुदियारः तंजावुर में

(6) अधि कुंबेश्वरः तंजावुर से 45 किलोमीटर दूर कुंबकोनम् में

(7) ऐरावतेश्वरः तंजावुर जिले में कुंबकोनम् के पास

(8) संगमेश्वरः इरोड जिले में भवानी में

(9) मीनाक्षी-सुन्दरेश्वरः मदुरै में

(10) पापनासम् रेलवे स्टेशन के चतुर्दिक शिव-मंदिर-समूहः तिरुनलवेली के पास

(11) नटराज शिव मंदिरः चिदंबरम् में

इनके अतिरिक्त कोयंबतूर जिले के (12) ध्यानलिंग मंदिर की भी अपनी विशिष्ट पहचान है तथा

चेन्नई के (13)कपिलेश्वर एवं (14) मरुंदीश्वरार मंदिर भी उल्लेखनीय हैं।

(2) आंध्र प्रदेशः

श्री सैलम-मल्लिकार्जुन तो ज्योतिर्लिंग है ही; निम्न मंदिर भी उल्लेखनीय हैं :

(क) रायलसीमा क्षेत्रः

(1) श्री कालहस्तिः चित्तूर जिले में स्वर्णमुखी नदी के तट पर। (2) पल्लि कोण्डेश्वरः चित्तूर जिले में ही। (3) जगन्नाथ गट्टूः कर्नूल शहर के पास।(4) जगन्नाथ गट्टूः कर्नूल शहर के पास। (5) वीरभद्रः अनंतपुर के पास।

(ख) तेलंगाना क्षेत्रः

(6)कालेश्वरम् : करीमनगर जिले में करीमनगर शहर से 125 किलोमीटर दूर।(7) वेमुलनाडः इसकी पहचान दक्षिण की काशी के रूप में भी होती है। करीमनगर शहर से 35 किलोमीटर दूर (8) कीसरगुट्टाः रंगारेड्डी जिलें में हैदराबाद से लगभग 40 किलोमीटर दूर

(3) कर्नाटकः

(क) पुरानी मद्रास रेज़ीडेंसीः

(1) श्री मंजुनाथेश्वरः धर्मस्थल।(2) श्री कदरी मंजुनाथः मंगलौर में।(3) श्री महालिंगेश्वरः मंगलौर से 52 किलोमीटर दूर पुत्तूर में।

(ख) पुराना बम्बई सूबाः

(4) महाबलेश्वरः उत्तर कन्नड जिले के गोकर्ण शहर में।(5) मुरुदेश्वरः उत्तर कन्नड जिले की भटकल तहसील के कस्बे में अरब सागर के तट पर। लेखक ने कर्नाटक में जिन मूर्तियों के दर्शन किए हैं, उनमें सर्वाधिक ऊँची, भव्य एवं चित्ताकर्षक प्रतिमाएँ दो हैं : (क) श्रवणबेलगोल नगर में जैन धर्म के भगवान गोम्मटेश बाहुबली की प्रतिमा (ख) इस मंदिर के बाहर नव-निर्मित शिव प्रतिमा। (6) कुंडलसंगमः बासवेश्वर के वीरशैव या लिंगायत संप्रदाय का प्रधान केंद्र। बासवेश्वर-समाधि के अतिरिक्त स्वयंभू लिंग। बागलकोट जिले के अल्माटी बाँध से लगभग 15 किलोमीटर दूर। (7) अर्द्धनारीश्वर, (8) 18 भुजाओं वाले नटराज एवं (9) भूतनाथः ये तीनों बीजापुर जिले में बादामी नगर में। (10) मल्लिकार्जुन मंदिर समूहः बीजापुर जिले में बादामी के पास पट्टाडकल में।(11) महादेवः कोप्पल जिले के यालबुर्गा ताल्लुका के पास इतगी गाँव में।(12) सोमेश्वर मंदिर समूहः गडक जिले के शिरहट्टी ताल्लुका में लक्ष्मेश्वर में।(13) सिद्धेश्वरः हवेरी जिले के हवेरी नगर में।

(ग) पुराना मैसूर राज्यः

(14) श्री कांतेश्वरः मैसूर से 23 किलोमीटर दूर ननजनगुड में, जिसे दक्षिण की काशी की माना जाता है। । (15) भोगानंदीश्वर, (16) उमा-महेश्वर एवं (17) अरुणाचलेश्वरः ये तीनों बंगलुरु से 60 किलोमीटर दूर नंदी हिल्स पर।(18) विरूपाक्षः बेल्लारी जिले में तुंगभद्रा नदी के तट पर हंपी में।(19) कोटिलिंगेश्वरः कोलार जिले में। इसे विश्व का सबसे बड़ा लिंग माना जाता है।

(4) केरलः

(1)अलुवा का शिव मंदिरः एर्नाकुलम् जिले में कोची से लगभग 20-21 किलोमीटर दूर अलुवा में पेरियार नदी और सहायक नदी मंगलापुझा के बीच स्थित शिव लिंग। महाशिवरात्रि के अवसर पर बहुत बड़ी संख्या में श्रद्धालु आते हैं। (2)थिरुवलूर महादेवः एर्नारुलम् जिले में। (3) कवियूर महादेव एवं (4) थिरिप्पारा शिवः दोनों पथनामथीटा जिले में (5) आनन्देश्वरम् : अलप्पुजा जिले में (6) वामटपल्लै महाशिवः कोट्टायम जिले में। (7) वडक्कुमनाथः त्रिचूर में स्थित।(8)शिव मंदिरः त्रिचूर जिले में पोनकुन्नम् में। (9) राजराजेश्वरः कन्नूर जिले में।

(5) मध्य प्रदेशः

महाकालेश्वर, ओंकारेश्वर के अतिरिक्त निम्न मंदिर उल्लेखनीय हैः(1) कंदरिया महादेवः (खजुराहो)।(2) जटाशंकरः होशंगाबाद जिले के पचमढ़ी में।(3) शिव मंदिरः (खरगौन(पश्चिमी निमाड़) जिले के चोली में)।(4) केदारेश्वरः शिवपुरी जिले के पोहरी में।(5) गुप्तेश्वरः हरदा जिले के चारुवा गाँव में।(6) पशुपतिनाथः मंदसौर में।(7) भोजपुर का मंदिरः भोपाल से 28 किलोमीटर दूर।

(6) छत्तीसगढ़ः

(1) भोरमदेवः कबीरधाम जिले में कवर्धा से 18 किलोमीटर दूर चौरागाँव में।(2) शिव-शक्तिः दुर्ग जिले के अमलेश्वर नगर में माँ पीताम्बरा बगलामुखी मंदिर में शिव-शक्ति एवं भैरव की प्रतिमाएँ हैं।(3) कपिलेश्वर शिव मंदिर समूहः दुर्ग जिले के बालोद में।(4)कुलेश्वरः रायपुर से दक्षिण दिशा में 45 किलोमीटर की दूरी पर राजिम नगर में।(4) कालेश्वरनाथः जांजगीर-चाम्पा जिले के जांजगीर मुख्यालय से 11 किलोमीटर दूर पीथमपुर में।

(7) उत्तराखंडः

केदारनाथ, जागेश्वर एवं मोटेश्वर ज्योतिर्लिंगों के अलावा निम्न मंदिर भी उल्लेखनीय हैं।

(क) कुमाऊँ क्षेत्र में :

(1) बालेश्वर महादेवः चंपावत जिले में।

(ख) गढ़वाल क्षेत्र में :

(2) गोपेश्वर या गोपीनाथः चमोली जिले में गोपेश्वर शहर में।(3) पुराना विश्वनाथ मंदिरः रुद्रप्रयाग जिले के गुप्त काशी में।(4)तुंगनाथः पंचकेदार के केदारनाथ के अतिरिक्त कल्पेश्वर, रुद्रनाथ, तुंगनाथ एवं मध्यमहेश्वर हैं। तुंगनाथ का महत्व अधिक है। रुद्रप्रयाग जिले के चोपता से 4 किलोमीटर दूर।(5) कमलेश्वर महादेवः गढ़वाल की प्राचीन राजधानी श्रीनगर में। (6) दक्षेश्वर महादेव मंदिरः हरिद्वार से 4 किलोमीटर दूर कनखल में।(7) नीलकंठ महादेव मंदिरः ऋषिकेश से 32 किलोमीटर दूर।

(8) हिमाचल प्रदेशः

बैजनाथ ज्योतिर्लिंग के अतिरिक्त निम्न मंदिर, पर्वत, सरोवर आदि की मान्यता भी हैः (1) मणि-महेश-कैलाशः चम्बा जिले के भरमौर के अन्तर्गत धौलाधार, पांगी एवं जास्कर पर्वत श्रृंखलाओं के बीच कैलाश पर्वत एवं मणि-महेश सरोवर की मान्यता इस क्षेत्र के श्रद्धालुओं के लिए तिब्बत के कैलाश एवं मानसरोवर के समान है। (2) शिव मंदिरः कांगड़ा जिले के काठगढ़ में। (3) किन्नौर कैलाश या किन्नर कैलाशः किन्नौर जिले में स्थित पर्वत जिसे शैव एवं बौद्ध पवित्र मानते हैं। (4) बिजली महादेवः कुल्लू से लगभग 8 किलोमीटर दूर खराल घाटी में। (5) त्रिलोकीनाथः कुल्लू जिले में कुल्लू से मनाली होते हुए रोहतांग से लगभग 8 किलोमीटर दूर। निकट ही चन्द्रा और भागा नदियों का संगम तथा व्यास नदी का उद्गम। (6) त्रिलोकीनाथ, (7) भूतनाथ एवं (8) अर्द्ध-नारीश्वरः ये तीनों मंदिर मंडी जिले में। (9) जटोलीः सोलन जिले में।

(9) उत्तर प्रदेशः

वाराणसी के ज्योतिर्लिंग विश्वनाथ के अतिरिक्त निम्न मंदिरों का उल्लेख किया जा सकता है – (1) नया काशी विश्वनाथः वाराणसी में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय में। (2) जंगलीनाथः बहराइच में। (3) लोधेश्वर महादेवः बाराबंकी के रामनगर में। (4) गोकर्णनाथः लखीमपुर-खीरी जिले के गोला-गोकर्णनाथ में। यह तहसील-स्तर का शहर है जो सरैंया नदी के तट पर स्थित है। (5) बाबा भांडेश्वरनाथः चंदौली जिले के माटीगाँव में।(6) सकहा शंकरः हरदोई में।

(10) राजस्थानः

(1)एकलिंगजीः उदयपुर से 22 किलोमीटर दूर। (2) शिव मंदिरः बांसवाड़ा की गढ़ी तहसील के परतापुर में। (3) सोमनाथः पाली जिले के पाली शहर में।(4) निम्बो का नाथः पाली जिले में फालना के पास। (5) परशुराम महादेवः पाली जिले में सदरीनगर से 14 किलोमीटर दूर। (6) हर्षनाथः सीकर से लगभग 10 किलोमीटर दूर हर्षगिरि पहाड़ी की तलहटी के गाँव में।

(11) गुजरातः

सोमनाथ एवं नागेश्वर के अतिरिक्त निम्न मंदिर उल्लेखनीय हैः (1) पिंपलेश्वर महादेवः मेहसाणा जिले में सालदी के पास। (2) उत्कंठेश्वर महादेवः खेड़ा जिले में। (3) महादेवः भारुच जिले में। (4) कोटेश्वरः कच्छ जिले के लखपत के पास।

(12) महाराष्ट्रः

महाराष्ट्र एक मात्र ऐसा राज्य है जहाँ चार ज्योतिर्लिंगों की मान्यता है। (1) त्र्यम्बकेश्वर (2) घुश्मेश्वर (3) भीमशंकर (4) औंढ़ा नागनाथ। इनके अलावा औरंगाबाद से 50 किलोमीटर दूर वेरुल में विश्वप्रसिद्ध एलोरा की गुफा संख्या 16 विशेष रूप से उल्लेखनीय है। कैलाश मंदिर का पूरा परिसर दर्शनीय है जिसमें योगीश्वर, नटराज, त्रिमूर्ति एवं नन्दी की आकृतियाँ चित्ताकर्षक हैं। मुम्बई हार्बर से लगभग 10 किलोमीटर दूर विश्वप्रसिद्ध एलिफेंटा (घारापुरीची) के पश्चिमी भाग की मुख्य गुफा में शिव का वैभव दर्शनीय है।

(13) गोवाः

(1) शिव मंदिरः पणजी से 60 किलोमीटर दूर ताबड़ीसुर्ल गाँव में।

(14) ओडिशाः

तमिलनाडु के वर्णित रामेश्वरम् एवं क्रमांक 1 से लेकर क्रमांक 11 तक के मंदिरों के अलावा ओडिशा के भुबनेश्वर का लिंगराज मंदिर भी विश्व प्रसिद्ध है। लिंगराज मंदिर के अलावा भुबनेश्वर के ही आस-पास सैंकड़ों शिव मंदिर मौजूद हैं। राजारानी मंदिर का स्थापत्य भी बेजोड़ है। मुक्तेश्वर,घंटेश्वर, परसुरामेश्वर,कपिलेश्वर, गंगेश्वर तथा गुप्तेश्वर मंदिर भी चर्चित हैं। भारत में भुबनेश्वर शहर एवं उसके चतुर्दिक अन्य किसी शहर की अपेक्षा शिव मंदिरों की संख्या सर्वाधिक है। भुबनेश्वर के अलावा कटक से लगभग 37 किलोमीटर दूर महानदी में स्थित द्वीप में धबलेश्वर(धनल अर्थात श्वेत) भी दर्शनीय है। ओडिशा के अन्य स्थानों के प्रसिद्ध शिव मंदिर निम्न हैः

(1)भद्रक जिले के भद्रक से 37 किलोमीटर दूर अखंडलमनि मंदिर

(2) ढ़ेंकानल जिले में कपिलाश पर्वत की चोटी पर स्थित चंद्रशेखर मंदिर। ढ़ेंकानल से लगभग 20 किलोमीटर दूर नागनाथेश्वर मंदिर। ढ़ेंकानल से 32 किलोमीटर दूर ब्राह्मनी नदी के तट पर करमुला में आठ शिव मंदिर हैं, जो अष्टशंभू के नाम से प्रसिद्ध हैं। इनमें कनकेश्वर अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध है।

(3) संबलपुर जिले के संबलपुर से 23 किलोमीटर दूर महानदी के तट पर हूमा मंदिर ।

(15) असमः

(1)उमानन्द मंदिरःगोवाहाटी में ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य स्थित पीकॉक आइलैंड में। (2) शिव डोलः शिवसागर में। (3) गोपेश्वर पहाड़ः कामरूप जिले के देउदुआर में। मान्यता है कि यहाँ शिव पधारते थे।

(16) सिक्किमः

(1) किराटेश्वर महादेवः पश्चिम सिक्किम में रंगीत नदी के तट पर तेगशिप में।

(17) पश्चिम बंगालः

हुबली जिले के चन्दननगर प्रखंड के तारकेश्वर नगर का तारकनाथ मंदिर इस राज्य में शैव मत का सर्वाधिक महत्वपूर्ण केन्द्र है।

(18) झारखंडः

(1)बासुकीनाथः देवघर-दुमका राजमार्ग पर दुमका से लगभग 25 किलोमीटर दूर बासुकीनाथ शहर में। यहाँ श्रावण (सावन) के महीने में मेला लगता है। यहाँ दुकानों पर जीवानन्द शर्मा के द्वारा लिखी किताब “श्री बाबा बासुकीनाथ माहात्म्य” सुलभ है। मान्यता के अनुसार कि यहाँ के दर्शन किए बिना देवघर के बाबा बैद्यनाथ की यात्रा पूर्ण नहीं मानी जाती। (2) हरिहरधाम (बाबा धाम) : गिरिडीह के प्रखंड बगोदर में। यहाँ के पंडित इस मंदिर के लिंग को संसार का सबसे बड़ा शिवलिंग होने का दावा करते हैं। (3) पहाड़ी मंदिरः राँची में राँची-हिल की चोटी पर।

(19) जम्मू-कश्मीरः

अमरनाथ की गुफा के बर्फानी बाबा (स्वयंभू हिमानी शिवलिंग)। आषाढ़ पूर्णिमा से आरम्भ होकर रक्षाबंधन तक सम्पन्न होनेवाली अमरनाथ यात्रा में लाखों श्रद्धालु भाग लेते हैं।

भारतेतर देशों मेः

(1) तिब्बत क्षेत्रः

(1) मानसरोवर एवं (2) कैलाश पर्वत

(2) नेपालः

(1) पशुपतिनाथ मंदिरः काठमांडु में बागमती नदी के तट पर।(2) डोलेश्वर महादेवः भक्तपुर में।(3) कैलाशनाथ महादेवः काठमांडु के पास पर्वत पर। नेपाल में मान्यता है कि यह संसार की सबसे ऊँची प्रतिमा है।

(3) पाकिस्तानः

(1) कटासराज मंदिरः पंजाब प्रांत के चकवाल जिले में।

(4) बंगलादेशः

(1) कालभैरव मंदिरः बंगलादेश में।

(5) श्रीलंकाः

(1) कोनेश्वरम् एवं (2) कीथीस्वरम् मंदिर

(6) दक्षिण-अफ्रीकाः

जोहांसबर्ग में संसार की सबसे ऊँची शिव-शक्ति की प्रतिमा की स्थापना हुई है। समाचार-पत्रों की रिपोर्ट के अनुसार इसकी ऊँचाई 20 मीटर है तथा इसे बनाने में 90 टन स्टील लगा है।

शैव मत / शैव संप्रदाय का आरम्भ एवं विकासः

रुद्रः

शैवमत का मूलरूप ऋग्वेद में रुद्र की कल्पना में मिलता है। रुद्र के विशेषक के रूप में शिव शब्द का प्रयोग हुआ है। रुद्र की व्युत्पत्ति रुद् धातु से हुई है जिसका अर्थ है – भयानक, भयंकर, डरावना। (वामन शिवराम आप्टेः संस्कृत-हिन्दी कोश, पृष्ठ 859)

प्रोफेसर पिशेल ने यह प्रतिपादित किया है कि रुद् धातु का प्रयोग पहले लाल अथवा देदीप्यमान के अर्थ में भी होता था। ( देखें – टी. एच. राल्फ ग्रिफ्थः द हाइमेंस ऑफ द ऋग्वेद, पृष्ठ 75, टिप्पण 1., मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली, (1973))।

तुलनात्मक भाषाविज्ञान के विद्वान ग्रैसमेन ने इसका अर्थ चमकना माना है। (देखें – महादेव चक्रवर्तीः द कॅनसेप्ट ऑफ रुद्र- शिवा थ्रू द एजिज़, पृष्ठ 4, मोतीलाल बनारसीदास (1994))।

डॉ. रामकर्ण शर्मा ने शिवसहस्रनामा में इसका अर्थ संस्कृत-हिन्दी कोश की भाँति ही भयानक, भयंकर, डरावना स्वीकार किया है। ( शिवासहस्रनामाष्टकम्, पृष्ठ 301, नाग पब्लिशर्स, दिल्ली (1996))।

ऋग्वेद में रुद्र का उल्लेख अनेक स्थलों पर हुआ है। ( 1.43 । 1.114 । 2.33 । 7.46 )।

ऋग्वेद में रुद्र का वर्णन कहीं हिंस्र एवं खुंखार रूप में, कहीं वर्षा के पूर्व भयंकर झंझावात के रूप में तथा कहीं धनुष से बाणों की बौझार करते हुए योद्धा के रूप में हुआ है। ऋग्वेद में रुद्र से दया याचना की भावाभिव्यक्ति भी है तथा रुद्र को पराक्रमी रूप में भी दिखाया गया है।( 1.114 )

रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने रुद्र का सम्बंध व्याधिकर्ता के साथ-साथ व्याधियों से त्राण दिलाने वाले देव के साथ भी माना है। ( वैशनविज़्म, शैविज़्म एण्ड माइनर रिलिज़ीयंस सिस्टम्स, पृष्ठ 146, एशियन एज़ुकेशनल सर्विसिस, दिल्ली (1913))

शैव धर्म प्राग्वैदिकः

रामधारी सिंह दिनकर ने विद्वानों की इस मान्यता को रेखांकित किया है कि शैव धर्म प्राग्वैदिक अथवा द्रविड़ संस्कृति की देन है। मान्यता के पक्ष में उन्होंने जो तर्क प्रस्तुत किए हैं, वे संक्षेप में निम्न हैं :

1. ऋग्वेद में रुद्र के जिस स्वरूप का वर्णन हुआ है उसका आर्यों के प्रकृति पूजक स्वभाव से मेल नहीं बैठता।

2. मोहंनजोदड़ो और हड़प्पा की खुदाई में प्राप्त योगी की मूर्तियों से यह अनुमान होता है कि आर्यों के आगमन के पूर्व ही इस देश में शिव की पूजा प्रचलित थी।

3. शिव पुराण में वर्णित कथा में ऋषिगण शिव पर क्रोध करते हैं, शाप देते हैं जिससे शिवलिंग के नौ टुकड़े हो जाते हैं।

4. पुराणों में वर्णित है कि शिव का प्रसाद खाना निषिद्ध है।

5. दक्ष प्रजापति यज्ञ सम्पन्न करते हैं। उसमें शिव को स्थान नहीं दिया जाता।

6. आचार्य क्षितिमोहन सेन ने अपनी पुस्तक (संस्कृति संगम) में स्कंद-पुराण, लिंग-पुराण, कूर्म-पुराण, वामन-पुराण, शिव-पुराण और पद्म-पुराण के आधार पर यह प्रतिपादित किया है कि शिव के आचारों को देखकर ऋषि-पत्नियाँ काम-मोहित हो जाती थीं। ऋषि लोग शिवजी पर कुपित होकर मुष्टि-प्रहार करते थे, उन्हें अपशब्द कहते थे और शाप देते थे।

( संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ 70 – 71, उदयाचल प्रकाशन, पटना, तृतीय संस्करण (1962))।

पुराणों में ऋषि-पत्नियों के आचरण को उनकी कामुकता के रूप में प्रदर्शित किया गया है। आचार्य क्षितिमोहन सेन ने यह मत व्यक्त किया है कि सम्भवतः आगत आर्यों ने भारत के द्रविड़ों की कन्याओं से वैवाहिक सम्बंध स्थापित किया होगा और चूँकि ये ऋषि-पत्नियाँ अधिकतर आर्येतर कुलोत्पन्ना थीं, इसीलिए वे अपने पितृ-कुल-देवता की पूजा करने के लिए इतनी व्याकुल रहती थीं। तार्किक दृष्टि से यह व्याख्या अधिक संगत है। दिनकर ने भी आचार्य सेन की व्याख्या का समर्थन किया है। इस मान्यता के पक्ष में यह पुष्ट प्रमाण भी दिया जा सकता है कि भगवान शिव आर्य देवताओं के उपास्य होने के साथ-साथ उनके भी उपास्य हैं जिनको आर्य असुर कहते थे। रावण की शिव भक्ति तो प्रसिद्ध है ही, अनेक अन्य असुरों के द्वारा इनकी उपासना की गाथाएँ पुराणों में निबद्ध हैं।

रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने यह मत प्रतिपादित किया है कि रुद्र-शिव का सम्बंध आस्ट्रिक और नीग्रों जातियों के उपास्य देवताओं से रहा है। अपनी मान्यता के पक्ष में उन्होंने शिव द्वारा धतूरा-भाँग का सेवन करना, श्मशान में वास करना, शिव के साथ शव, सर्प, खप्पर एवं हाथी के चमड़े का सम्बंध तथा जंगली वृक्षों एवं वनस्पतियों के विशेषज्ञ होना आदि प्रमाण प्रस्तुत किए हैं।( देखें - वैशनविज़्म, शैविज़्म एण्ड माइनर रिलिज़ीयंस सिस्टम्स, एशियन एज़ुकेशनल सर्विसिस, दिल्ली (1913))।

दिनकर ने भगवान शिव के उदय एवं विकास तथा उसमें भारत की अनेक जातियों ( आस्ट्रिक या आग्नेय, द्राविड़, आर्य) तथा उनके देवी-देवताओं के योगदान का समाहार सारगर्भित शब्दों में किया हैः

“ - - - अनुमान है कि द्रविड़ों के यहाँ जो ताम्रवर्ण के प्रतापी देवता थे, वही आर्यों के मरुत-स्वामी रुद्र से मिल गए तथा औष्ट्रिक जातिवालों के पास जो अनेक जंगली देवता थे, उनके भी गुण, धीरे-धीरे, आकर रुद्र-शिव की भावना के साथ जुड़ने लगे। इस तरह, बहुत काल के बीत जाने पर, शिव का रूप अत्यंत विकसित हो गया और उसके एक छोर पर तो रुद्र-सम्बंधी दार्शनिक भावना प्रतिष्ठित हुई, जिसे आर्य और द्रविड़, दोनों जातियों के शिष्ट वर्ग ने अपनाया और दूसरे छोर पर शिव के पारिवारिक रूप, उनके अवढर और दयालु होने की बात तथा उनके योगेश्वर, भूतेश और फक्कड़ एवं अघोर होने की कथाएँ आ जुड़ीं, जिससे जन-साधारण को संतोष मिलने लगा।“ ( दिनकरः भारतीय संस्कृति के चार अध्याय, पृष्ठ 76)

ऋग्वेद के बादः

यजुर्वेद में रुद्र को महादेव की प्रतिष्ठा मिलती दिखाई देती है। यजुर्वेद का श्री रुद्रम चमक मंत्र  इसका प्रमाण है। (अस्य श्री रुद्राद्याय प्रश्न महामन्त्रस्य अघोर ऋषिः - - सङ्कर्षणमूर्तिस्वरूपो – परमपुरुषः स एष रुद्रो देवता।।)
यजुर्वेद के शतरुद्रिय अध्याय, तैत्तिरीय आरण्यक और श्वेताश्वतर उपनिषद में शिव को ईश्वर माना गया है। उनके पशुपति रूप का संकेत सबसे पहले अथर्वशिरस उपनिषद में पाया जाता है।  रामायण-महाभारत के समय तक शैवमत शैव अथवा माहेश्वर नाम से प्रसिद्ध हो चुका था। 
महाभारत के अनुशासन पर्व में वर्णित “शिव सहस्रनामा” (1008 नाम) के कम से कम आठ रूपान्तर मिलते हैं। इनको आधार बनाकर राम कर्ण शर्मा ने अपना ग्रंथ लिखा है। इसमें आठ रूपान्तरों के तुलनात्मक अध्ययन के साथ-साथ भूमिका भी है। अब शिव को महादेव एवं परमेश्वर बनने का गौरव प्राप्त हो गया। (देखें- राम कर्ण शर्मा (1996))।
आदि शंकराचार्य के विष्णु सहस्रनामा के 27 वें एवं 600 वें नामों में शिव के अनेक अर्थों की अभिव्यक्ति हुई है। उदाहरणार्थ, 1. विशुद्ध 2. प्रकृति के तीनों गुणों ( सत्व, रजस, तमस) से अप्रभावित 3. जिसके नाम के उच्चारण करने से व्यक्ति निर्मल एवं शुद्ध हो जाता है। ( विष्णु सहस्रनामा, पृष्ठ 47 एवं पृष्ठ 122, रामकृष्ण मिशन)।

शैव दर्शन एवं वेदांत दर्शनः

वेदांत दर्शन निगम से प्रेरणा लेता है। शैव दर्शन के आधार आगम ग्रंथ हैं। निगम से वेदों का बोध होता है। वेदार्थ बोधक या वेद सम्मत ग्रंथ निगम कहलाते हैं। परम्परा से आगत ज्ञान के संग्रह आगम ग्रंथ कहलाते हैं। आगम ग्रंथ शैव, जैन, बौद्ध सभी धर्मों के अलग-अलग हैं। वैष्णव आदि संप्रदायों के भी आगम ग्रंथ हैं। शैव दर्शन के संदर्भ में शैवागम ग्रंथ शिव एवं शक्ति के मुख से निकले हुए माने जाते हैं। वैदिक धर्म वर्ण व्यवस्था का पोषक है। वह वेद आदि ग्रंथों के पढ़ने का अधिकार शूद्रों को प्रदान नहीं करता। आगमों की परिणति भक्ति में हुई। भक्ति मार्ग का विश्वास है कि हम सब हरि की ज्योति के स्फुलिंग हैं। “एक जोति तैं सब ऊपजा, कौन ब्राह्मन कौन सूदा”।

वेदांत दर्शन साधना की परिणति अद्वैत भाव में मानता है। ब्रह्म पूर्ण अद्वैत, एकरूप एवं कूटस्थ है। ( ब्रह्म सूत्र 1/3/19; छांदोग्य उपनिषद् 6/2/1-2; विवेक-चूड़ामणि, 228; ईशावास्योपनिषद् 4 पर शांकर भाष्य)। शैव दर्शन अद्वैतवाद को स्वीकार नहीं करते। उनकी दृष्टि में अद्वैत परम तत्त्व नहीं है। सदानंद अवस्था अद्वैत भाव से भी ऊर्ध्ववर्ती है। अद्वैत के ऊपर नाथ हैं जो साकार-निराकार दोनों के परे हैं। उस नाथ से निराकार ज्योतिस्वरूप नाथ उत्पन्न हैं। निराकार ज्योति ही प्रतीक रूप में ज्योतिर्लिंग है। स्वयं ज्योतिस्वरूप सच्चिदानंद मूर्ति ही परतत्त्व है। “स्व ज्योतिः सत्यमेकं जयति तव पदं सच्चिदानन्द मूर्ते”।

वेदांत दर्शन एवं शैव दर्शन में निराकार ब्रह्म की शक्ति के स्वरूप-प्रतिपादन का अंतर स्पष्ट है। वेदांत में ब्रह्म की शक्ति “माया“ जड़ है। शैव दर्शन में शक्ति चैतन्य स्वरूप है। यह सत है, नित्य है और अविनश्वर है। शिव अपनी सिसृक्षा-रूपा शक्ति के कारण इस जगत् के रूप में हैं।

वेदांत दर्शन में माया का कार्य जीवों को बंधन में डालना है। शैव दर्शन में ब्रह्म की स्व समवेता शक्ति का कार्य जीवों को बंधन में डालना नहीं है। इसके विपरीत इसके प्रभाव से बंधनग्रस्त भी मुक्त हो जाता है।

वेदांत दर्शन में माया जिस जगत का सृजन करती है वह विवर्त होने के कारण असत्य एवं मिथ्या है। उसकी स्थिति रज्जु में सर्प अथवा शुक्ति में रजत की भाँति ब्रह्म में सत्य भासता हुआ सा है। वह तात्त्विक दृष्टि से स्वप्न एवं माया-रचित-गंधर्व-नगर के समान पूर्णतया मिथ्या एवं असत्य है। ( ब्रह्म सूत्र 2/1/14; गीता 15/3 पर शांकर भाष्य, विवेक-चूड़ामणि 140, 141, 405; वेदांत-सार, पृष्ठ 8)। शैव दर्शन में शिव की सिसृक्षा ही शक्ति है और शक्ति का परिणमन ही जगत है। शक्ति की सहायता से ही शिव सृष्टि आदि व्यापार निष्पादित करते हैं। शैव दर्शन में जगत उत्पन्न एवं नष्ट नहीं होता। इसमें परपिंड प्रकट होता है, लयीभूत होता है। जो कुछ भी ब्रह्माण्ड में है, वह सभी पिण्ड में भी है। परम तत्त्व की पराशक्ति जिस प्रकार समस्त ब्रह्माण्ड में व्याप्त है, उसी प्रकार पिण्ड में भी व्याप्त है। ब्रह्माण्ड में जो कुछ है, वही पिण्ड में भी है।

शैव मत के सम्प्रदाय एवं प्रमुख उपसम्प्रदायः

महाभारत एवं वामन पुराण में माहेश्वरों के चार सम्प्रदाय परिगणित हैं :


  1. शैव 2. पाशुपत 3.कालदमन और 4. कापालिक।

इनमें से अन्तिम दो नाम शिव के रुद्र तथा भंयकर रूपों को अभिव्यंजित करते हैं जबकि पहले दो नाम शिव के सौम्य रूप को व्यक्त करते हैं। रौद्र रूप में वे महाकाल के प्रतिरूप, महाविध्वंसक, सर्वसंहारक एवं प्रलयंकर हैं। सौम्य रूप में वे परम मंगलमय, सर्वकल्याणकारी और आशुतोश शिव हैं। आशुतोष का अर्थ है – थोड़े में संतुष्ट होनेवाला। शिव का अर्थ है – मंगलमय एवं कल्याणकारी।

पहले शैवमत के मुख्यतः दो सम्प्रदाय थे-


  1. पाशुपत और
  2. आगमिक।

पाशुपत और आगमिक शैव मतों में कालांतर में अनेक उपसम्प्रदाय विकसित हो गए। यहाँ प्रमुख उपसम्प्रदायों के बारे में संकेत किया जा रहा है :

(क) पाशुपत शैव मतः 1. पाशुपत 2. कापालिक 3. नाथ सम्प्रदाय

(ख) आगमिक शैव मतः 1. शैव सिद्धांत एवं तमिल शैव 2. काश्मीरीय शैव 3. वीर शैव या लिंगायत धर्म

(क) पाशुपत शैव मतः

1. पाशुपतः

यह सम्प्रदाय शिव को सर्वोच्च शक्ति मानकर उपासना करता है।इस सम्प्रदाय ने पाशुपत नाम शिव की एक उपाधि पशुपति से लिया है जिसका व्युत्पत्यर्थ है - 'पशुओं के देवता'। अर्थ-विस्तार के बाद इसका अर्थ 'प्राणियों के देवता' हो गया। श्वेताश्वतर उपनिषद में रुद्र का तादात्म्य शंकर के साथ पाया जाता है। महाभारत में पाशुपत सम्प्रदाय का उल्लेख है। यह भी उल्लेख है कि लकुलीश शिवोपासक ने इस सम्प्रदाय को संगठित किया। कुछ विद्वान लकुलीश पाशुपत को पाशुपत सम्प्रदाय से अलग सम्प्रदाय मानते हैं। तत्त्वतः दोनों में इतना भेद नहीं है कि इसे अलग सम्प्रदाय माना जाए।

पाशुपत तत्त्वज्ञान शान्तिपर्व के 249वें अध्याय में वर्णित है। 284 वें अध्याय में विष्णु स्तुति के बाद दक्ष द्वारा शंकर की स्तुति की गई है। इस मत में पशुपति सब देवों में मुख्य हैं। वे ही सारी सृष्टि के उत्पत्तिकर्ता हैं। इस मत में पशुपति या परमेश्वर स्वतंत्र तत्त्व है। वही जगत का कारण है। पशु का अर्थ समस्त सृष्टि है, अर्थात् ब्रह्मा से स्थावर तक सब पदार्थ।

वासुदेव सम्प्रदाय की तरह कुछ इतिहासकार पाशुपत के उद्भव को दूसरी शताब्दी के ई.पू. का मानते हैं, जबकि अन्य इसके उद्भव की तिथि दूसरी शताब्दी की ई. को मानते हैं।

पाशुपत सम्प्रदाय का मूल आधारग्रन्थ माहेश्वर रचित 'पाशुपतसुत्र' है। इसके ऊपर गुप्त काल में राशिकर कौण्डिय ने 'पंचार्थीभाष्य' लिखा। माधवाचार्य ने “सर्व दर्शन संग्रह” में इसके दार्शनिक तत्त्वों का उल्लेख किया है। वैशेषिक सूत्र का कर्ता कणाद्, वात्स्यायन के न्यायभाष्य की उद्योतनी टीका का लेखक भारद्वाज, वराहमिहिर और उसका टीकाकार उत्पल आदि ने इस सम्प्रदाय के दार्शनिक पक्ष की विवेचना की है।

इस मत के पाँच अंग हैं – 1. कार्य 2. कारण 3. योग 4. विधि 5. दुःखान्त्। जीव (जीवात्मा) और जड (जगत) को कार्य कहा जाता है। परमात्मा (शिव) इनका कारण है, जिसको पति कहा जाता है। जीव पशु और जड़ पाश कहलाता है। मानसिक क्रियाओं के द्वारा पशु और पति के संयोग को योग कहते हैं। जिस मार्ग से पति की प्राप्ति होती है उसे विधि की संज्ञा दी गयी है। संसार में दुखों से आत्यन्तिक निवृत्ति दुःखान्त अथवा मोक्ष है।

पाशुपत ग्रन्थों में लिंग को अति अर्चनीय बतलाया गया है। लिंग पूजा का प्रचलन कब से है, यह विवादास्पद है। पुरातत्त्ववेत्ताओं के विचार से यह ईसा के पूर्व से चला आ रहा है। ऋग्वेद में शिश्नदेव शब्द का उल्लेख मिलता है। पाशुपत मत के संघटन के समय तक लिंगपूजा को मान्यता मिल चुकी थी। जीव की संज्ञा 'पशु' है। यह इन्द्रियभोगों में लिप्त रहता है। यह पशु है। भगवान शिव पशुपति हैं। उन्होंने बिना किसी बाहरी कारण, साधन अथवा सहायता के इस संसार का निर्माण किया है। वे जगत के स्वतंत्र कर्ता हैं। हमारे कार्यों के भी मूल कर्ता शिव ही हैं। वे समस्त कार्यों के कारण हैं। संसार के मल-विषय आदि पाश हैं जिनमें जीव बंधा रहता है। इस पाश अथवा बन्धन से मुक्ति शिव की कृपा से ही प्राप्त होती है। मुक्ति दो प्रकार की है, सब दुखों की आत्यन्तिक निवृत्ति और परमैश्वर्य की प्राप्ति। यह मत शांकर अद्वैतवाद के स्थान पर द्वयात्मक सम्बंध का प्रतिपादन करता है।

पाशुपत सम्प्रदाय की साधना पद्धतियों में दिन में तीन बार शरीर पर राख मलना, ध्यान लगाना और शक्तिशाली शब्द ‘ओम’ का जाप करना शामिल हैं। इस सम्प्रदाय के साधक लाल रंग के वस्त्र धारण करते थे।

(विशेष अध्ययन के लिए देखेः डेविड लोरेंज़ेन. शैविज़्मः पाशुपताज़ (ऍन्साइक्लोपीडिया ऑफ रिलीज़न ( संपादकः मिर्च्या एलियादे), मेक्मिलन पब्लिशिंग, न्यूयोर्क (1987))।

2.कापालिकः

कापालिकों के उपास्य देव शक्त्यालिंगित शिव अथवा उमामहेश्वर हैं। प्रबोधचन्द्रोदय, मालतीमाधव तथा आनन्दगिरि के शंकरविजय आदि ग्रंथों में इस मत का परिचय मिलता है। इनके साम्प्रदायिक चिह्न इनकी छः मुद्रिकाएँ थीं। ये इस प्रकार हैं-

1. कंठहार

2. आभूषण

3. कर्णाभूषण

4. चूड़ामणि

5. भस्म और

6. यज्ञोपवीत।

इनके आचार शिव के घोर रूप के अनुरूप बड़े वीभत्स थे। कपालपात्र में भोजन करना, शव के भस्म को शरीर पर लगाना, भस्मभक्षण, यष्टिधारण, मदिरापात्र रखना, मदिरापात्र की पूजा करना आदि। कपाल पात्र में भोजन करने के कारण इनके आचरण की क्रियाओं के लिए “कापालिका क्रियाएँ “ शब्द रूढ़ हो गया। “गोरक्ष सिद्धांत संग्रह“ में एक उपाख्यान आता है जो कापालिक शब्द की व्युत्पत्ति के साथ-साथ उस युग का बोध कराता है जब वैष्णव मतों एवं शैव मतों में परस्पर कलह चरम सीमा पर था। संक्षेप में इस उपाख्यान का सार यह है कि जब भगवान विष्णु ने चौबीस अवतार ग्रहण करके उन अवतारों के माध्यम से अत्याचार एवं दुष्कृत्य करने आरम्भ कर दिए तब उनसे कुपित होकर श्रीनाथ ने 24 सिद्धों को भेजा जिन्होंने उन चौबीस अवतारों के कपाल काटकर उन्हें अपने गले में धारण कर लिया। इसी कारण ये कापालिक कहलाते हैं। कापालिकों के समान ही कालामुखी संप्रदाय का भी नाम मिलता है। इनके परस्पर सम्बंधों के बारे में डेविड लोरेंज़ेन ने अध्ययन किया है। ( देखें : द कापालिकाज़ एण्ड कालामुखाज़ः द टू लॉस्ट शैवाइट सेक्ट्स (मोतीलाल बनारसीदास, दिल्ली (1972))। डॉ. श्यामाकांत द्विवेदी ने कापालिक मत एवं नाथ मत के सम्बंधों का निरूपण किया है। (देखें : कौलज्ञान निर्णय (प्रथम खंड) : 62 – 63, चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी (2009)) ।

3.नाथ सम्प्रदायः

नाथ सम्प्रदाय के आदि आचार्य कौन हैं ? इसका उत्तर देना कठिन है। हमारे आचार्यों ने सभी शास्त्रों की प्रथम प्रवृत्ति परमेश्वर से मानी है। हठयोग प्रदीप की टीका में ब्रह्मानंद का कथन है कि सब नाथों में प्रथम आदिनाथ हैं जो स्वयं शिव ही हैं। साम्प्रदायिक ग्रंथों में नाथ संप्रदाय के अनेक नामों का उल्लेख हुआ है। नाथ सम्प्रदाय या नाथ मार्ग के अलावा इसे योग सम्प्रदाय, योग मार्ग, सिद्ध मत, सिद्ध मार्ग आदि नामों से भी जाना जाता है। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने इन नामों की सार्थकता का प्रतिपादन करते हुए लिखा है कि नाथ सम्प्रदाय योगियों का ही सम्प्रदाय है तथा ये अपने मार्ग को सिद्ध मत या सिद्ध मार्ग इसलिए कहते हैं कि इनके मत से नाथ ही सिद्ध हैं। “ना” का अर्थ है अनादि रूप और “थ” का अर्थ है (भुवनत्रय) स्थापित होना। नाथ मत का स्पष्टार्थ वह अनादि धर्म है जो भुवनत्रय की स्थिति का कारण है। ( नाथ-सम्प्रदाय, पृष्ठ 3, हिन्दुस्तानी एकेडेमी, उत्तर प्रदेश, इलाहाबाद(1950))।

इस बारे में लेखक का मत अलग है। इसके निम्न कारण हैं :

1. यह निर्विवाद है कि नाथ सम्प्रदाय पर योग का प्रभाव है। मगर इससे यह कहना कि “नाथ सम्प्रदाय योगियों का ही सम्प्रदाय है” - कहना उपयुक्त नहीं है। योग शब्द का प्रयोग पातंजल योग के साधकों के लिए रूढ़ हो गया है। योग की साधना-पद्धति का अनुसरण तो शैव, शाक्त, वैष्णव, कापालिक, स्मार्त, बौद्ध, जैन, सूफ़ी आदि सभी धर्मों एवं सम्प्रदायों के साधक करते हैं। जिस प्रकार इनको योग मत तथा इनके साधकों को योगी के नाम से नहीं पुकारा जाता, उसी प्रकार नाथ सम्प्रदाय को भी योग मत या योग मार्ग के नाम से पुकारना संगत नहीं है। पतंजलि का कैवल्य तथा नाथों की मुक्ति का स्वरूप समरूप नहीं है। दोनों में पिण्ड साधना के स्वरूप एवं लक्ष्य में भी अन्तर हैं।

2. डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने नाथ सम्प्रदाय को सिद्ध मत या सिद्ध मार्ग कहने का औचित्य इस तर्क के आधार पर माना है कि इनके मत से नाथ भी सिद्ध हैं। राहुल सांकृत्यायन नाथ पंथ को वज्रयान एवं सहजयान का ही विकसित एवं परिष्कृत रूप मानते हैं। उनका स्पष्ट कथन है कि नाथ सम्प्रदाय 84 वज्रयानी बौद्ध सिद्धों से ही आविर्भूत हुआ है। इसमें कोई विवाद नहीं है कि नाथों पर वज्रयानी सिद्धों का स्पष्ट प्रभाव है। मगर इस प्रभाव के कारण उन्हें सिद्ध मत या सिद्ध मार्ग के नाम से नहीं पुकारा जा सकता। सिद्ध शब्द वज्रयानी सिद्धों के लिए रूढ़ हो गया है। धर्मवीर भारती ने “सिद्ध साहित्य” लिखकर इसे और पुख़्ता कर दिया है।

नाथ सम्प्रदाय शैवों का पंथ है। इनके उपास्य नाथ अर्थात् शिव ही हैं। नाथ सम्प्रदाय के दर्शन एवं सिद्धांत का मूल आधार शैवों का तत्त्व-दर्शन एवं शैवों की ही भाँति शिव-शक्ति सिद्धांत, शिव-शक्ति में अभेद, सगुण-निर्गुण से परे लोक की कल्पना, अद्वैत से भी परे अवस्था में विश्वास, पिण्ड एवं ब्रह्माण्ड की एकता का प्रतिपादन आदि तत्त्व हैं। नाथों पर बौद्धों के शून्यवाद, विज्ञानवाद, वज्रयानी-सहजयानी तांत्रिकों के तात्त्विक सिद्धांतों, जैन-दर्शन के निवृत्ति मार्ग, अहिंसा-दर्शन एवं ब्रह्मचर्य तत्त्व, वैष्णवों की आचार निष्ठा, कापालिकों के सोम सिद्धांत, गीता के निष्काम-कर्म-योग, कपिल के योगपरक ज्ञानवाद, मार्कण्डेय के हठयोग, पतंजलि के अष्टांग योग, रसेश्वरवादियों के रस-सिद्धांत तथा शंकराचार्य के निर्गुण ब्रह्मवाद का प्रभाव पड़ा है मगर इनका मूल शैव दर्शन ही है।

नाथ संप्रदाय में उपास्य नाथ है। नाथ का स्वरूप निरंजन, परमानंद, विश्व गुरु है जो महासिद्धों का लक्ष्य है। नाथ सम्प्रदाय के साधक भी शिव-शक्ति के उपासक हैं अर्थात् आत्मोपासक हैं, शिव-शक्ति में अभेद मानते हैं, अद्वैत से भी परे लोक की कल्पना करते हैं जो सगुण-निर्गुण के परे है। इस कारण ये शैवों के अन्तर्गत परिगणित हैं। डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी का कथन है कि वज्रयानी परम्परा के 84 सिद्धों के समान नाथपंथ में भी 84 सिद्ध हैं। ( वही, पृष्ठ 31)।

नाथों के प्रवर्तक आदिनाथ हैं। नौवीं-सदी से लेकर बारहवीं सदी के बीच इस सम्प्रदाय की दो परम्पराओं या धाराओं के नाम मिलते हैं। एक मत्स्येन्द्रनाथ से शुरु होती है जिसमें गोरक्षनाथ या गोरखनाथ, निवृत्तिनाथ एवं ज्ञानेश्वर आदि आते हैं। दूसरी जालंधरनाथ से शुरु होती है जिसमें कर्णिया, चर्परनाथ या चर्पटनाथ तथा गोपीचंद, रेवीनाथ, मीननाथ आदि आते हैं। इन नाथों में मत्स्येन्द्रनाथ एवं गोरखनाथ अपेक्षाकृत अधिक प्रसिद्ध हैं।

मत्स्येंद्रनाथः

मत्स्येंद्रनाथ की शाखा को यौगिनी कौल मार्ग के नाम से पुकारा जाता है। इनकी रचनाओं में कौलज्ञान निर्णय, अकुलवीरतंत्र, कुलानन्द एवं ज्ञानकारिका अधिक प्रसिद्ध हैं। कौलज्ञाननिर्णय शीर्षक से स्पष्ट है कि इन्होंने शाक्त तंत्र की कौलधारा को अंगीकार किया था। कुल का अर्थ है - कुण्डलिनी। अकुल का अर्थ है – परमशिव। कौल वह है जो कुल एवं अकुल में सामरस्य स्थापित कर दे । दूसरे शब्दों में जो कुण्डलिनी को मूलाधार से ऊपर ऊठाकर सहस्त्रारचक्र में स्थित अकुल अर्थात परमशिव से मिला दे। डॉ. श्यामाकांत द्विवेदी ने इस सम्बंध में भावरहस्य से निम्न पंक्तियाँ प्रस्तुत की हैः

कुलं कुण्डलिनी ज्ञेया महाशक्तिस्वरूपिणी। अकुलन्तु शिवः प्रोक्तः शुद्धसत्वमयो विभुः।।

(कौलज्ञान निर्णयः, प्रस्तावना, (प्रथम खण्ड) चौखम्बा कृष्णदास अकादमी, वाराणसी (2009))।

गोरखनाथ या गोरक्षनाथः

गोरखनाथ अथवा गोरक्षनाथ ने योग साधना में अनेक नूतन पद्धतियों का अविष्कार किया। इन्होंने योग को वामाचार एवं स्वच्छंद यौनाचार के प्रभाव से अलग किया। हठयोग के साथ-साथ लययोग एवं राजयोग का वरण किया। इस कारण बहुत से विद्वान गोरखनाथ को अलग पंथ का प्रवर्तक मानते हैं। मगर इन्हें नाथ सम्प्रदाय के अन्तर्गत ही स्वीकार करना संगत है। कोई परवर्ती साधक यदि अपनी परम्परा में सुधार करता है या उसमें कुछ जोड़ता है तो उसे नए सम्प्रदाय या पंथ का प्रवर्तक नहीं मानना चाहिए। इनकी 40 रचनाओं का संग्रह “गोरखबानी” के नाम से प्रसिद्ध है। ( देखें – गोरखबानीः संपादक – डॉ. पीताम्बर दत्त बडथ्वाल, हिन्दी साहित्य सम्मेलन, इलाहाबाद)। इनकी (1) सबदी (2) पद (3) आत्म बोध (4) मछीन्द्रगोरख बोध (5) ज्ञान तिलक (6) ज्ञान चौंतीसा (7) पंच मात्रा आदि रचनाएँ अधिक प्रसिद्ध हैं। बहुत से विद्वान गोरखनाथ की साधना-पद्धति को शंकराचार्य के अद्वैतवाद के आलोक में विवेचित करते हैं। तत्त्वतः गोरखनाथ काश्मीरीय शैव दर्शन एवं शाक्त दर्शन के अधिक नज़दीक हैं।

नाथ संप्रदाय की साधना-पद्धतिः

नाथों में परस्पर मत वैभिन्नय भी हैं। यहाँ उनकी विवेचना करना लक्ष्य नहीं हैं। यहाँ हमारा उद्देश्य उनके सामाजिक विश्वास एवं आचरण तथा साधना पद्धतियों के सामान्य स्वरूप के बारे में विचार करना है। नाथ बाह्य आचरणों का निषेध करते हैं। तीर्थ स्थानों में जाना, गंगा आदि नदियों में स्नान करना, साकार रूपों की पूजा करना आदि का इनके लिए कोई महत्व नहीं है। वर्ण व्यवस्था एवं जाति-पाँति के आधार पर व्यक्ति के मूल्यांकन का खंडन करते हैं। शास्त्रों के ज्ञान को नहीं अपितु अनुभूति को प्रमाण मानते हैं।

नाथ-साधना में योग द्वारा पिण्ड का चिन्मयीकरण तथा चिन्मय पिण्ड का परम शिव या परमनाथ से सामरस्य स्थापित करना लक्ष्य है। यह प्रतिपादित किया जा चुका है कि शैव दर्शन ब्रह्माण्ड एवं पिण्ड की एकता मानता है। नाथों ने जोरदार शब्दों में कहा कि ब्रह्माण्ड में जो कुछ है, वही पिण्ड में भी है।“ब्रह्माण्डेSप्यस्ति यत्किंचित् तत् पिण्डेप्यस्ति“। समाधि की दशा में साधक नाथ अनुभव करता है कि वह परमनाथ रूप ही है। समरसीकरण की स्थिति में अहं वृत्ति परम वृत्ति से वैसे ही एकरस हो जाती है जैसे नमक गलकर पानी से एकरूप हो जाता है। पिण्ड का परपिण्ड में विलय नहीं होता; एकरस अथवा एकरूप होता है।

पिण्ड के चिन्मयीकरण के लिए आत्म शुद्धि अनिवार्य है। आत्म शुद्धि का अर्थ है - षडविध विकारों से शून्य होना। षडविध विकार हैं – (1) जन्म (2) वृद्धि (3) परिणाम (4) अपक्षय (5) जरा (6) मरण।

जरा-मरण तब तक है जब तक शरीर काल प्रवाह में है। अपरिपक्व देह या काया से चरम लक्ष्य की सिद्धि सम्भव नहीं है। जब तक मूल बिन्दु अस्थिर और चंचल रहता है, देह या काया अस्थिर और जराजीर्ण है। इसके स्थिरीकरण के लिए बिन्दु का स्थिरीकरण आवश्यक है। मन के स्थिर होने से वायु स्थिर हो जाती है। वायु के स्थिर होने से बिन्दु स्थिर हो जाता है। स्थिर पिण्ड काल के प्रवाह से अतीत हो जाता है। काल के प्रवाह से अतीत होने पर प्रारब्ध (पूर्व संचित कर्मों के फल) के प्रभाव से मुक्त हो जाता है।

नाथों की साधना हठयोग पर अधिक आधारित है। शरीर का मूल बिन्दु है। बिन्दु पाण्डुर और लोहित दो प्रकार का होता है। पाण्डुर शुक्र/ शिव तथा लोहित महारज/ शक्ति है। दोनों के संयोग/ समरसीकरण/ ऐक्य संपादन से परम पद की उपलब्धि होती है।

हठयोग के अलावा नाथों ने साधना पद्धतियों में मंत्रयोग, लययोग तथा राजयोग को भी अपनाया है।

मंत्रयोग को अजपाजप भी कहते हैं। यह वह योग है जिससे श्वास-प्रश्वास के माध्यम से निरंतर “हम्” तथा “सः “ उलटकर सुषुना में बिना आयास के “मैं शिव ही हूँ” की निरंतर अनुभूति होती रहती है। प्रत्येक व्यक्ति शिव रूप ही है। जितनी मात्रा में वह इसका अनुभव करता है, उतनी मात्रा में वह शिव की शक्ति को प्राप्त कर पाता है। मंत्रयोग की जप साधना से मंत्र क्रियाशील होता है। साधक अपनी चेतना को विश्व व्यापी चेतना के साथ अभिन्न अनुभव करता है, एकता का अनुभव करता है।

लययोग चित्त का लय है। गोरखनाथ की दृष्टि में नाद-लय सर्वसुलभ नादोपासना है। नाद शिव-शक्ति का पारस्परिक सम्बंध है। निर्गुण शिव तो विशुद्ध चैतन्य है। सगुण शिव उपाधियुक्त है। उपाधियुक्त शिव से उपाधियुक्त शक्ति उत्पन्न होती है। इन दोनों के संयोग से विश्व में विक्षोप होता है। यही नाद है। लय का ध्येय राजयोग की प्राप्ति है – “सर्वे हठलयोपाया राजयोगस्य सिद्धये”। सदैव अभ्यासरत रहने पर ही लयभाव अधिगत होता है।

हठयोग एवं राजयोग परिपूरक हैं। हठयोग से काय या पिण्ड की सिद्धि होती है। इसके बाद राजयोग से समाधि की सिद्धि होती है।

बिन्दु, प्राण एवं मन तीनों एक दूसरे से सम्बद्ध हैं। एक के स्थिर होने से दूसरे को स्थिर करने में सहायता मिलती है। यह जरूर है कि इन तीनों को स्थिर करने के लिए अलग-अलग प्रयत्न एवं अभ्यास भी करना होता है।

जिस साधक का बिन्दु असिद्ध होता है उसे कठोर प्राणायाम का अभ्यास करना होता है। अशुद्धि की स्थिति में वायु अथवा प्राण इड़ा और पिंगला के बीच वक्रभाव से घूमता रहता है। बिन्दु साधना से देह या काया का मल हट जाता है। इससे सात्विक तेज का उदय होता है। परिणाम होता है कि वायु हल्की हो जाती है। इस स्थिति में सूक्ष्म वायु अथवा सूक्ष्म प्राण वाम भाग में स्थिर इड़ा और दक्षिण भाग में स्थित पिंगला की जगह मध्य देश में स्थित सुषुम्ना में नीचे ऊपर संचरण करने लगती है, कभी-कभी स्थिर भी होने लगती है। यही अजपा-क्रिया है। गोरखनाथ का कथन है –

अवधू जाप जपौ जपमाली। चीन्हौ, जाप जप्यां फल होई ( अवधूत, जपमाला पहचानो और वह जप करो जिससे ( ब्रह्मानुभूति स्वरूप) यथार्थ की प्रतीति हो। ( गोरखबानी)।

पंडित गोपीनाथ कविराज ने अजपा रहस्य की विवेचना करते हुए लिखा है कि “प्रणव-जप का रहस्य अवगत होने पर यह समझ में आ सकता है कि अजपा-जप ही श्रेष्ठ जप है एवं अन्य सभी जपों की चरम अवस्था का स्वाभाविक जप है”। ( भारतीय संस्कृति और साधना (प्रथम खण्ड) पृष्ठ 343, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद्, पटना)। स्वभाव की प्रेरणा से मन के संकल्प और विकल्प की वृत्ति तिरोहित होने लगती है। परिणाम होता है – संकल्प शुद्धि। इससे मन स्थिर हो जाता है। सत्य संकल्प का उदय होता है। साधना की उत्कट अवस्था में इसका भी क्षय हो जाता है। वृत्यात्मक ज्ञानेच्छा की निवृत्ति हो जाती है। परमान्द की उपलब्धि होती है। अब कोई संकल्प-विकल्प की स्थिति नहीं रह जाती, कोई अवस्था नहीं रह जाती। स्वभाव की उपलब्धि हो जाती है। सहज की उपलब्धि हो जाती है। संकल्प-विकल्प की स्थिति न रहने के कारण साधक का चित्त विश्रांत हो जाता है। इसके बाद परमानंद ज्योति का आविर्भाव होता है। इसी समय स्वपिण्ड, ब्रह्माण्ड और शक्ति का परमपद से एकत्व स्थापित होता है। यही समरसता है, समरसीकरण है। यह स्वभाव है, समरसभाव है, अद्वयावस्था है, चिदानंदमयी अद्वैतनिष्ठा है, द्वैत एवं अद्वैत से अतीत परम तत्व है। यहीं अमृत का वास है – “गगन मँडल मैं ऊँधा कूबा, तहाँ अमृत का बासा”।

(ख)आगमिक शैव मतः

1.शैव सिद्धांत एवं तमिल शैवः

शैव सिद्धांत प्राथमिक देवता के रूप में भगवान शिव को मानता है। इसका उदय उत्तर भारत में हुआ तथा इसके सिद्धांतों का निरूपण संस्कृत में हुआ। इसका विकास दक्षिण भारत में हुआ तथा ग्रंथों का निर्माण तमिल भाषा में हुआ। इसी कारण दक्षिण भारत में यह तमिल शैव के नाम से जाना जाता है। इनकी शिव सम्बंधी मान्यताएँ वैदिक एवं पौराणिक परम्परा की शिवोपासना से अलग हैं। इनके सिद्धांत दर्शन का मूल आधार आगम एवं शैव तंत्र साहित्य है। तमिलनाडु का शैव-धर्म तमिल शैव ही है।

तमिलनाडु में पाँचवीं शताब्दी से नौवीं शताब्दी तक शैव मत का बहुत अधिक प्रचार-प्रसार हुआ। दक्षिण में शैव सिद्धांत सबसे पहले नायनारों की शिवभक्ति परक रचनाओं में मुखर हुए। तिरसठ (63) शिवभक्त “नायनार” या “नायनमार“ नाम से विख्यात हुए। गीत-संग्रह “तेवारम” में शिवभक्तों के पद संकलित हैं। इसके 11 खंड हैं। इसके आठवें खंड का नाम “तिरुवाचकम” है जिसे तमिल भाषा का उपनिषद कहा जाता है। 13 वीं एवं 14 वीं शताब्दी में मेयकंठदेवर, अरुलनंदी, मरई ज्ञानसंबंधर और उमापति ने शैव मत के 14 सिद्धांत ग्रंथों का प्रणयन किया। इनके पूर्व के शैव सिद्धांतों के सूत्र आठवीं शताब्दी में कांचीपुरम् के कैलाशनाथर मंदिर में पत्थर की शिलाओं पर उत्कीर्ण हुए।

सामान्य दर्शन की शब्दावली में ईश्वर, आत्मा एवं बंधन का व्यवहार होता है। शैव सिद्धांत में इन्हें क्रमशः पति, पशु एवं पाश के नाम से अभिहित किया गया है। इनके सिद्धांत ग्रंथों में पति, पशु और पाश इन तीन मूल तत्वों का गम्भीर विवेचन हुआ है। इनके अनुसार जीव पशु है जो अज्ञ और अणु है। जीव पशु चार प्रकार के पाशों से बद्ध हैं। (1)मल (2) कर्म (3) माया (4) रोध। साधक को आध्यात्मिक साधना के लिए चार मार्गों का अनुसरण करना चाहिए। ये मार्ग हैं : (1) चर्या (2) क्रिया (3) योग (4) ज्ञान या विद्या। साधना के द्वारा जब पशु पर पति का शक्तिपात होता है तब वह पाश से मुक्त हो जाता है। इसी को मोक्ष कहते हैं। वस्तुतः शिव अपनी शक्तियों से व्यामूढ़ होकर पशु बनता है। पशु भाव के परिहार से शिव भाव का उन्मेष हो जाता है। दूसरे शब्दों में पशु का शिव भाव में लौटना आत्मा का नित्य स्वरूप में लौटना है, शिव हो जाना है।

2.काश्मीरीय शैव मतः

काश्मीरीय शैव मत दार्शनिक दृष्टि से अद्वैतवादी है। अद्वैत वेदान्त और काश्मीरीय शैव मत में साम्प्रदायिक अन्तर यह है कि शांकर अद्वैतवाद का ब्रह्म निष्क्रिय है किन्तु काश्मीरीय शैवमत का परमेश्वर कर्तृत्व सम्पन्न है। शांकर अद्वैतवाद में ब्रह्म निर्गुण, निर्विकार चैतन्य मात्र है। काश्मीरीय दर्शन में परमेश्वर कर्तृत्व सम्पन्न है अर्थात उसमें स्वातंत्र्य है, वह आनंद शक्ति स्वरूपा है। दूसरे शब्दों में परम केवल चित् स्वरूप ही नही है। वह चित् और आनन्द स्वरूप है। स्वातंत्र्य एवं कर्तृत्व सम्पन्न होने के कारण वह पंचकृत्य करता रहता है। ये पंच कृत्य हैं – (1) सृष्टि (2) स्थिति (3) संहार (4) अनुग्रह (5) विलय।

अद्वैतवाद में ज्ञान की प्रधानता है, उसके साथ भक्ति का सामंजस्य पूरा नहीं बैठता। ज्ञान ही मोक्ष का साधन है। उसके बाद भक्ति की कोई सत्ता नहीं रह जाती। काश्मीरीय शैवमत में ज्ञान और भक्ति का सुन्दर समवन्य है। ज्ञान होने पर परम के प्रति भक्ति का उदय होता है। यही ज्ञानोत्तरा-भक्ति या पराभक्ति है। जीवात्मा और परमात्मा के मधुर मिलन में जीवात्मा की सत्ता नष्ट नही होती। उसे सामरस्य का अनुभव होता है, चिदानन्द की उपलब्धि होती है। यही शिव-शक्ति का सामरस्य है। वेदांत के ब्रह्मानंद में आस्वादन नहीं है, चर्वण नहीं है। काश्मीरीय शैव मत में रस है, आनन्द है। इस संदर्भ में सहसा जयशंकर प्रसाद की कामायनी की पंक्तियाँ याद आ रही हैं –

समरस थे जड़ या चेतन, सुन्दर साकार बना था।

चेतनता एक विलसती, आनंद अखंड घना था।।

अद्वैतवाद वेदान्त में जगत ब्रह्म का विवर्त (भ्रम) है। काश्मीरीय शैवमत में जगत ब्रह्म का स्वातन्त्र्य अथवा आभास है। यह परम शिव से अभिन्न है।शिव ही अपनी सिसृक्षा-रूपा शक्ति के कारण इस जगत के रूप में हैं। विश्व शिव का स्फुरण मात्र है।

काश्मीरीय शैव दर्शन के मुख्य ग्रन्थ ‘शिव दृष्टि’ (सोमानन्द), ‘ईश्वरप्रत्यभिज्ञाकारिका’ (उत्पलाचार्य), ईश्वरप्र्त्यभिज्ञाकारिकाविमर्शिनी’ और ‘तन्त्रालोक’(अभिनवगुप्त) हैं।

रामकृष्ण गोपाल भण्डारकर ने काश्मीरीय शैवागम को दो भागों में विभक्त किया है :

(1) स्पन्द शास्त्र ( प्रचारक – वसुगुप्त )

(2) प्रत्यभिज्ञा शास्त्र ( प्रवर्तक – सोमानंद )

इनमें तत्त्व भेद नहीं है। दोनों शाखाओं में कोई तात्त्विक भेद नहीं है; केवल मार्ग का भेद है। स्पन्द शास्त्र में ईश्वर अद्वैय की अनुभूति का मार्ग ईश्वरदर्शन और उसके द्वारा मलनिवारण है। प्रत्यभिज्ञाशास्त्र में ईश्वर के रूप में अपनी प्रत्यभिज्ञा है, अपने को पहचानना है। इन दोनों शाखाओं के दर्शन को ‘त्रिक दर्शन’ अथवा ईश्वराद्वयवाद’ भी कहा जाता है।

इस दर्शन को त्रिक दर्शन इसलिए कहा जाता है क्योंकि शैव सिद्धांत की भाँति इसमें भी पति, पशु और पाश नामक तीन पदार्थों की सत्ता है। ( पतिपशुपाशभेदात् त्रयः पदार्था इति। - सर्व दर्शन संग्रह, पृष्ठ 154, मध्वाचार्य, गंगाविष्णु श्रीकृष्णदास, लक्ष्मी वेंकटेश्वर प्रेस, बम्बई (1957))।

पति से अभिप्राय है – शिव ( तत्र पति पदार्थः शिवोभिमतः। वही, पृष्ठ 155)। जीवात्मा पशु है ( अनणुक्षेत्रज्ञादिपदवेदनीयो जीवात्मा पशुः। वही, पृष्ठ 159)। पाश से अभिप्राय सांसारिक बंधनों से है जो मल, कर्म, माया और रोध के भेद से चार प्रकार के होते हैं ( पाशश्चतुर्विधो मलकर्ममायारोधशक्तिभेदात्। वही, पृष्ठ 165)। पदार्थ त्रय का विवेचन करने के कारण इसे त्रिक दर्शन, त्रिक शास्त्र या त्रिक भी कहा जाता है।

इस दर्शन में पशु और पाश नामक पदार्थों की स्वतंत्र सत्ता नहीं है। वे पशुपति के प्रसार मात्र हैं। परमशिवभट्टारक के स्फुरण हैं।

“ श्रीमत्परमशिवस्य पुनः विश्वोत्तीर्ण-विश्वात्मक-परमानन्दमय-प्रकाशैकघनस्य - - - - अखिलम् अभेदेनैव स्फुरतिः , - - - श्री परमशिवभट्टारक एव इत्थं नानावैचित्र्यसहस्त्रैः स्फुरति।“

(क्षेमराज - प्रत्यभिज्ञा हृदयम्, पृष्ठ 8, संपादक – जगदीश चन्द्र चट्टोपाध्याय, पुरातत्व तथा शोध विभाग, जम्मू-कश्मीर (1911))।

इस दर्शन में शक्ति शिव भट्टारक अथवा परमेश्वर की शक्ति है। इस कारण इसे पारमेश्वरी तथा शैवी शक्ति कहा गया है। यह शिव की ज्ञानज्ञेयारूपा परम शक्ति है।

“ज्ञानज्ञेयस्वरूपिण्या शक्त्या परमया युतः “। (स्पंदकारिका, 2/2, व्याख्याकार – रामकंठाचार्य, पुरातत्व तथा शोध विभाग, जम्मू-कश्मीर (1913))।

शिव की इसी शक्ति से उद्भूत होने के कारण सारा विश्व शिव की शक्ति से युक्त है।

स्वशक्तिप्रचयो स्य विश्वम् ( वसुगुप्त - शिवसूत्र-विमर्शिनी, 3/30, व्याख्याकार – क्षेमराज, पुरातत्व तथा शोध विभाग, जम्मू-कश्मीर, (1911))।

शिव के साथ शक्ति उस तरह अभिन्न एवं अभेद रूप में विद्यमान रहती है, जिस तरह हिम के साथ शीतलता, अग्नि के साथ उष्णता, दीपक के साथ आलोक तथा सूर्य के साथ तापमयी किरणें।

न हिमस्य पृथक् शैत्यं, नाग्नेरौष्ण्यं पृथग्भवेत्। ( सोमानन्द - शिवदृष्टि 3/6, व्याख्याकार – उत्पलदेव, पुरातत्व तथा शोध विभाग, जम्मू-कश्मीर (1934))।

यथालोकेनदीपस्य किरणैभार्स्य च। ज्ञायते दिग्विभादि तद्वच्छक्त्या शिवः प्रिये।। ( विज्ञान भैरव, 21, व्याख्याकार – क्षेमराज, पुरातत्व तथा शोध विभाग, जम्मू-कश्मीर (1918))।

यह दर्शन शिव तथा शक्ति में किसी प्रकार का कोई भेद स्वीकार नहीं करता। एक ओर स्वतंत्र आत्मा रूप शिव चिति-शक्ति है (स्वातंत्र्यात्मा चितिशक्तिरेव) तो दूसरी ओर व्योमाकार रूपा, विश्वव्यापिनी एवं निराश्रया भगवती चित्-शक्ति स्वतंत्र रूप से अनन्त जगत् के रूप में स्वयं प्रकट होती है ( चिदेव भगवती स्वच्छस्वतंत्ररूपा तत्तदनन्तजगदात्मना स्फुरति)

( देखें – प्रत्यभिज्ञाहृदयम्, पृष्ठ 13 एवं पृष्ठ 3 )।

इस अद्वयवाद की विशद व्याख्या डॉ. श्री गोपीनाथ कविराज ने की है। उसका सार है – “यहाँ अद्वैत का अर्थ है – दो का नित्य सामरस्य। शिव और शक्ति अभिन्न हैं। उन्मेष और निमेष को लक्ष्य करने पर शिव प्रधान एवं शक्ति प्रधान रूप हैं। शक्ति प्रधान अवस्था में भी शिवभाव रहता है। प्रकाशमय शिवभाव में ही विमर्शात्मक शक्ति का विकास-स्वरूप विश्व प्रतिबिम्बित होता है। शिवप्रधान अवस्था में भी शक्तिभाव रहता है, विश्वबीज-शक्ति उस समय प्रकाश में विलीन रहती है। शक्ति ही अन्तर्मुख होने पर शिव है और शिव ही बहिर्मुख होने पर शक्ति। शिवतत्त्व में शक्तिभाव गौण और शिवभाव प्रधान है। शक्तितत्त्व में शिवभाव गौण और शक्तिभाव प्रधान है। जहाँ शिव और शक्ति दोनों एकरस हैं, वहाँ न शिव का प्रधान्य है और न शक्ति का। वह साम्यावस्था है। यही नित्य अवस्था है। यही तत्त्वातीत है।“ (देखें - भारतीय संस्कृति और साधना (प्रथम खण्ड), पृष्ठ 3 -17, बिहार-राष्ट्रभाषा-परिषद् , पटना)

प्रत्यभिज्ञा दर्शन के आचार्यों ने भक्ति को रस के रूप में स्वीकार कर भक्ति को रसस्वरूपा बना दिया। इसी कारण भक्ति साहित्य को जिन दर्शन सिद्धांतों ने प्रभावित किया है उनमें काश्मीरीय शैवागमों का स्थान सर्वोपरि है। लेखक ने हिन्दी निर्गुण भक्ति साहित्य पर विचार करते हुए इस मत का प्रतिपादित किया है। यद्यपि यह तथ्य है कि सभी संतों के विचारों में अनेक दार्शनिक सिद्धान्‍तों का प्रतिपादन हुआ है तथा इनकी रचनाओं में अत्‍यंत व्‍यापक, मानवीय, उदार उवं उदात्‍त चेतना की अभिव्यक्ति हुई है तथापि इनके दार्शनिक सिद्धान्‍तों एवं भक्‍ति-प्रवाह को शैव दर्शन तथा उसमें भी काश्मीरीय शैवागमों की पृष्ठभूमि में अच्छी तरह से समझा जा सकता है । लेखक ने यह संकेत भी किया है कि भक्‍तिकाल के साहित्‍य की रस साधना में जो भक्‍ति है वह तत्‍वतः आत्‍मस्‍वरूपा शक्‍ति ही है। सभी संतों का लक्ष्‍य भाव से प्रेम की ओर अग्रसर होना है। प्रेम का आविर्भाव होने पर ‘भाव' शांत हो जाता है। भक्‍त महाप्रेम में अपने स्‍वरूप में प्रतिष्‍ठित हो जाता है। सूफियों ने भी भाव के केन्‍द्र को भौतिक न मानकर चिन्‍मय रूप में स्‍वीकार किया है तथा कृष्‍ण भक्‍तों की भाव साधना में भी भाव ही ‘महाभाव' में रूपान्‍तरित हो जाता है। कृष्‍ण भक्‍त कवियों के काव्‍य में भी राधा-भाव आत्म-शक्ति के अतिरिक्त अन्य नहीं है।

(रचनाकार: महावीर सरन जैन का आलेख : मध्य युगीन संतों ...

4 अक्तू 2009 ... महावीर सरन जैन का आलेख : मध्य युगीन संतों का निर्गुण-भक्ति -काव्य : कुछ प्रश्न. [मध्‍य युग ने मोक्ष का अतिक्रमण कर, भक्‍ति की स्‍थापना की। हिन्‍दी साहित्‍य के इतिहास में भक्‍तिकाल का विवेचन करते समय विद्वानों ने निर्गुण भक्‍ति ...

www.rachanakar.org/2009/10/blog-post_1347.html)।

3.वीर शैव या लिंगायत धर्मः

वीर शैव मत के संस्थापक महात्मा बसव थे। इनका प्रभाव क्षेत्र कर्नाटक है। डॉ. पांडुरंगराव भीमसेनराव देसाई ने इनका जीवन काल सन् 1105 से 1167 ईस्वी माना है। (बसवेश्वर एण्ड हिज़ टाइम्स, पृष्ठ 298 – 299, कर्नाटक यूनिवर्सिटी, धारवाड ( 1994)))। बसव एवं उनके वीरशैव धर्म के 700 शिवशरण और 700 शिवशरणियों के विचार-विमर्श के फलस्वरूप रचित बसव-वचनों की संख्या एक लाख छियानवे हजार मानी जाती है। डॉ. आर. सी. हिरेमठ ने 1393, डॉ. एम. एम. कलबुर्गी ने 1426 और डॉ. भगवानदास तिवारी ने 1450 वचनों का संग्रह किया है। डॉ. हिरेमठ के “श्री सिद्धरामेश्वर वचनगऴु” तथा “बसवण्णनवर वचनगऴु” तथा कलबुर्गी का “समग्र वचन संपुट” कन्नड़ में हैं। जो अध्येता हिन्दी में वचन-साहित्य की जानकारी प्राप्त करना चाहते हैं, वे निम्न ग्रंथों का अध्ययन कर सकते हैं :

1. बसव वचनामृतः उमापति शास्त्री, बसव समिति, बंगलुरू (1967))।

2. बसवेश्वर के चुने हुए वचनः राजेश्वरय्या, वचन मंटप, बेलगाम (1952))।

3. भक्ति भंडारी बसवेश्वर के वचनः सु. रामचंद्र आदि, कर्नाटक विश्वविद्यालय, धारवाड, भाग-1 (1976), भाग-2 (1978))।

4. महात्मा बसवेश्वर के वचनः आर. सी. भूसनूरमठ और एस. आर. भूसनूरमठ, कर्नाटक प्रांतीय हिन्दी प्रचार सभा, धारवाड (1970))।

5. वचन-संपादकः भालचंद्र जयशेट्टी, कर्नाटक साहित्य अकादमी, बंगलुरू (1918))।

6. विश्वविभूति श्री बसव-वचनः डॉ. भगवानदास तिवारी, बसव सेंटर, सोलापुर (1997))।

7. वचन-साहित्य (चिंतन और संशोधन) : डॉ. भगवानदास तिवारी, बसव धर्म प्रचार संस्था, हिरेमठ संस्थान, भालकी (1998))।

इन वचनों में परशिव, जगत, जीवन, अंग, साधना आदि का सांगोपांग निरूपण हुआ है। स्थल का अर्थ परशिव है। महास्थल में सृष्टि आविर्भूत होती है, अस्तित्व में रहती है। अंततोगत्वा लय होने पर उसी में समा जाती है। सृष्टि परशिव की लीला है। सृष्टि के आविर्भाव के पहले और उसके तिरोभाव के बाद भी परशिव स्वयंभू रूप में, वैश्विक चैतन्य रूप में, लिंग रूप में विद्यमान रहते हैं। “लिंगमध्ये जगत् सर्वम्” इस मत की आधारभूत मान्यता है। वीर शैव मत को लिंगायत भी कहते हैं, क्योंकि इसके अनुयायी बराबर शरीर पर इष्टलिंग धारण किए रहते हैं।

डॉ. भगवानदास तिवारी ने बसव या लिंगायत या वीरशैव धर्म का सार इन शब्दों में व्यक्त किया है :

“1.धर्मगुरुः श्री बसवेश्वर 2. धर्म ग्रंथः वचन साहित्य 3. धर्म चिह्नः इष्टलिंग 4. धर्म ध्वजः षटस्थल ध्वज 5. धर्म केंद्रः बसवकल्याण 6. धर्मक्षेत्रः महात्मा बसवेश्वर का लिंगैक्य स्थल – कूडलसंगम 7. धर्म भाषाः कन्नड़ 8. धर्म ध्येयः वर्ण, वर्ग, जाति-रहित मानव-समता-मूलक शरण अर्थात् आदर्श मानव समाज की निर्मिति।“

( जगज्ज्योति महात्मा बसवेश्वर, पृष्ठ 79, बसव सेंटर प्रकाशन, सोलापुर, (1999))।

शैव मत के उपर्युक्त सम्प्रदायों में इतना गम्भीर, गहन एवं विशद विवेचन हुआ है जिसको एक लेख में समेटना असम्भव है। इनका सार यह है कि शिव का व्यक्ति की दृष्टि से अभिप्राय है – स्वयं की आत्म-शक्ति। समष्टि की दृष्टि से अभिप्राय है – स्वयंभू शिव। शिव-शक्ति अभिन्न हैं। यह शांकर-अद्वैतवाद नहीं है। शैव मत के विभिन्न सम्प्रदायों की विचारणा के अनुसार द्वयात्मक-अद्वयवाद या ईश्वराद्वयवाद या द्वैताद्वैत-विलक्षणतावाद या शक्ति-विशिष्ट-अद्वैतवाद है।

शिवः विरोधी भावों का सामंजस्य एवं सामरस्य

शिव में परस्पर विरोधी भावों का सामंजस्य देखने को मिलता है। शिव के मस्तक पर एक ओर चंद्र है, तो दूसरी ओर महाविषधर सर्प उनके गले का हार है।। वे कामेश्वर या अर्द्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं, वीतरागी हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी हैं। सौम्य तथा आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं।

महाभारत का अध्ययन करने पर हमें शिव के परस्पर विरोधी गुणों का उल्लेख मिलता है। महाभारत के अनुशासन पर्व में ही निम्न विरोधी गुणों के प्रसंग देखे जा सकते हैं : (1)स्थिर/जंगम (2) गोचर/अगोचर (3) सुरूप/विरूप (4) सत्/असत् (5) व्यक्त/अव्यक्त (6) पर/अपर (7) सूक्ष्मात्मा/महारूप (8) गुह्य/अगुह्य।

पुराणों में भी शिव के विरोधी गुणों के उल्लेख प्राप्त हैं : (1) विष्णुरूपिन् / रुद्ररूपिन् (2) वरदाता / दण्डदाता (3) क्षर / अक्षर (4) द्रष्टा / दृष्य (5) व्याप्य / व्यापक (6) विश्व / विश्वेश्वर (7) कूटस्थ /कूटवर्जित (8) एक /अनेक (9) भोक्ता /भोग्य (10) स्थूल / सूक्ष्म (11) मूर्त / अमूर्त (12) सौम्य / कराल।

शैवागमों में भी शिव के विरोधी गुणों का प्रतिपादन मिलता है : (1) प्रमेय / अप्रमेय (2) प्रमाता / प्रमेय (3) कार्य / कारण (4) विश्वमय / विश्वोत्तीर्ण (5) अन्तर्मुख / बहिर्मुख (6) सर्व / सर्वातीत (7) वाच्य / वाचक (8) स्थूल / सूक्ष्म (9) व्याप्य / व्यापक (10) गोचर / अगोचर (11) चित् / अचित् (12) नित्य / अनित्य।

शिव परिवार भी इससे अछूता नहीं हैं। उनके परिवार में भूत-प्रेत, नंदी, सिंह, सर्प, मयूर व मूषक सभी का समभाव देखने को मिलता है। वे स्वयं द्वंद्वों से रहित सह-अस्तित्व के पोषक एवं समरसता के प्रतीक हैं।

शैव मत की पारिभाषिक शब्दावली एवं प्रतीकार्थः

पारिभाषिक शब्दावलीः

शैव मत या सम्प्रदाय के जिन उपसम्प्रदायों के तत्त्व-दर्शन की विवेचना की गई है, उससे यह स्पष्ट है कि इनमें विशिष्ट अथवा पारिभाषिक शब्दों का भी प्रयोग हुआ है। इस पारिभाषिक शब्दावली के विशेष अर्थों को हृदयंगम करने के बाद ही शैवागमों के सिद्धांतो को सम्यक् रूप में समझा जा सकता है। यहाँ इस पारिभाषिक शब्दावली का अर्थ तात्विक अध्ययन प्रस्तुत करने का अवकाश नहीं है। विवेचना के प्रसंग में कुछ शब्दों के विशिष्ट अर्थों की ओर संकेत किया जा चुका है। यहाँ कुछ पारिभाषिक शब्द प्रस्तुत किए जा रहे हैं। लेखक की कामना है कि शोधक इन पारिभाषिक शब्दों का गहन एवं विशद् अध्ययन प्रस्तुत करें तथा अध्ययन-परम्परा को आगे बढ़ाएँ।

ये निम्न हैं – (1) अकुल (2) अकुलावस्था (3) अजपा-जप (4) अणु (5) अमनस्क योग (6) अविनश्वर (7) अष्ट मूर्ति (8) अष्टावरण (9) अहं (10) अहंता (11) आशुतोष (12) इच्छा (13) इदम् (14) इष्टलिंगोपासना (15) ईशान (16) उन्मना (17) उमा (18) एकलिंगेश्वर (19) कंचुक (20) कला (21) कापालिक (22) काम (23) कामेश्वर (24) कौल (25) चिति (26) चिन्मयीकरण (27) जप-साधना (28) तांडव (29) तिरोभाव (30) त्रिक (31) त्रिपुर (32) त्रिपुरारी (33) त्रिविध मल (34) त्रिविध पाश (35) दृश्य (36) द्वन्द्व (37) द्वयात्मक अद्वय (38) द्वैताद्वैत विलक्षणवाद (39) नटराज (40) नाथ (41) नादानुसंधान (42) निजावेश (43) नित्य लीला (44) निरुत्थान (45) पंचकृत्य (46) पंच तत्व (47) पंचाचार (48) परपिण्ड (49) परमशक्ति (50) परमाणु (51) परा (52) पराशक्ति (53) पशु (54) पशुपति (55) पाश (56) पिण्ड (57) पिण्डपद समरसीकरण (58) पिण्डब्रह्माण्डैक्यवाद (59) प्रत्यभिज्ञा (60) प्रारब्ध (61) बिन्दु (62) भव (63) भवानी (64) भूतनाथ (65) मंत्र (66) मल (67) महाकापालिक (68) महाचिति (69) महाकाल (70) महामाया (71) महालिंगम (72) महाशक्ति (73) राजयोग (74) लययोग (75) लयीभूत (76) लिंग (77) लिंगेश्वर (78) विद्या (79) विमर्श (80) विश्वात्मा (81) वैश्वानर (82) शक्ति (83) शक्तिपात (84) शिव (85) शिव- लोक (86) षट् (87) षट् कंचुक (88) षोडोशोपचार (89) संहार (90) समरसता (91) समररसीकरण (92) सहजावस्था (93) सामरस्य (94) सामरस्यवाद।

प्रतीकार्थः

भगवान शिव की दो रूपों में उपासना करने का विधान हैः (क) शिवलिंग (ख) शिव की मूर्ति

(क) शिवलिंग (अव्यक्त का मूर्त प्रतीक)

अधिकांश मंदिरों में शिवलिंग की पूजा की जाती है। पूजित शिवलिंग के दो प्रकार हैं। मानव द्वारा निर्मित 2. प्राकृतिक रूप से पाए जाने वाले ( उदाहरणार्थ, कश्मीर में अमरनाथ गुफा में स्थित स्वयंभू बर्फानी बाबा)। मैंने ऐसे अनेक शिव मंदिरों के दर्शन किए हैं जहाँ के पंडित पुराणों के संदर्भ देकर यह सिद्ध करते हैं कि इस मंदिर का शिवलिंग मनुष्य के द्वारा निर्मित नहीं है। ये स्वयंभू धरती से निकले हैं। इनका आधार ऐतिहासिक प्रमाण नहीं अपितु जनश्रुतियाँ हैं।

कुछ पश्चिमी विद्वानों ने प्रतिपादित किया है कि शिवलिंग लौकिक लिंग की छवि है। इसका कारण उनका भारतीय आध्यात्मिक परम्परा से अनभिज्ञता प्रतीत होता है। हम पहले उन द्वादश ज्योतिर्लिंगों पीठों का विवरण दे चुके हैं जहाँ शिव की पूजा ज्योतिर्लिंग के रूप में की जाती है और जिन पीठों के महात्म्य की पौराणिक गाथाएँ प्रसिद्ध हैं। भारत में शिव के द्वादश-ज्योतिर्लिंग-पीठों के अतिरिक्त अन्य असंख्य मंदिर हैं जिनमें शिवलिंग की पूजा की जाती है। शैव मत में शिवलिंग के कई प्रतीक-अर्थ मान्य एवं प्रचलित हैं।

1. शिवलिंग का अंडाकार ब्रह्माण्ड का प्रतीक है।

2. शिवलिंग आत्मा का प्रतीक है।

3. यह भगवान के साथ आत्मा के एकीकरण का प्रतीक है।

4. यह परशिव या निराकार शिव का प्रतीक है जो शांकर अदैत-दर्शन के ब्रह्म (ब्रह्मा नहीं) के तुल्य है। यह शिव का विशुद्ध रूप है। इसे शब्दों में व्यक्त नहीं किया जा सकता, क्योंकि यह शब्दातीत है। यह अनुभूतिगम्य है। जिन योगियों को इसकी अनुभूति हुई है, उन्होंने परमानंदानुभूति के संकेत किए हैं। यह ब्रहाण्ड की सत्ता का परम कारण है।

शिव सम्प्रदायों के बसवेश्वर के वीरशैव या लिंगायत सम्प्रदाय की विवेचना के संदर्भ में यह निर्दिष्ट किया जा चुका है कि इस सम्प्रदाय में शिव की पूजा केवल शिवलिंग के रूप में ही की जाती है। इस सम्प्रदाय के अनुयायी सदैव इष्टलिंग धारण करते हैं।

शिवलिंग को कुछ मंदिरों में चार मुखों के साथ भी दिखाया गया है। इसे पंचमुखी शिव कहते हैं। प्रदर्शित चार मुख चार दिशाओं के द्योतक हैं। पाँचवा अदृश्य है। पंचमुखी शिव सदाशिव या अनन्त शिव का एक रूप है।

(ख) शिव की मूर्ति (शिव का व्यक्त रूप)

भगवान शिव की मूर्तियों के विभिन्न प्रकार हैं। जिन विद्वानों ने शिव मूर्ति-कला पर कार्य सम्पन्न किया है, उन्होंने विभिन्न प्रकार की मूर्तियों तथा उनके भेद – प्रभेदों की मीमांसा की है। मूर्तिकला की दृष्टि से मंदिरों में शिव की निम्न प्रकार की मूर्तियाँ अधिक मिलती हैं।

1. दक्षिणामूर्तिः चतुर्भुज शिव प्रतिमा। इसमें त्रिशूल, डमरू, सर्प, चंद्रमा, जटाजूट, गंगा आदि उत्कीर्ण होते हैं।

2. अर्ध-नारीश्वरः मूर्ति के बायें भाग में शिव त्रिशूल, कमंडल, सर्प, जटाजूट, नर-कपाल आदि धारण किए रहते हैं।

3. नटराजः शिव का तांडव-नृत्य प्रदर्शित करने वाली मूर्ति। इसमें शिव के नटराज रूप का अंकन रहता है। नट अर्थात् नृत्यादि कला। राज अर्थात् भगवान। इसमें चतुर्भुज शिव का रूप-विधान निम्न प्रकार से उत्कीर्ण होता है।

(क) ऊपरी दाहिने हाथ में डमरू (ख) ऊपरी बाएँ हाथ में अग्नि (ग) निचला दाहिना हाथ अभय मुद्रा में (घ) निचला बायाँ हाथ ऊठे हुए पैर की ओर संकेत करते हुए (च) दाहिना पैर अपस्मार असुर या दैत्य को दबाए हुए (छ) बायाँ पैर हाथी के पैर की आकृति में आगे की ओर ऊठा हुआ (ज) चारों ओर अग्नि की लपटों का वलय (झ) केश-पाश (जटायें) खुले हुए, बिखरे हुए तथा उड़ते हुए।

नटराज-शिव का मुख्य मंदिर तमिलनाडु के चिदम्बरम में स्थित है। दक्षिण भारत के अन्य शिव मंदिरों में मुख्य लिंग-मंदिर या शिव की अन्य प्रकार की मूर्ति के अगल-बगल में प्रायः एक नटराज का मंदिर या नटराज की छवि रहती है।

भगवान शिव की मूर्तियों के चर्चित एवं महत्वपूर्ण प्रतीकः

(अ) त्रिशूलः इसके कई प्रतीकात्मक अर्थ हैं –

1. एक अस्त्र के रूप में यह बुराइयों को नष्ट करने की क्षमता का द्योतक है।

2. त्रिशूल के तीन शूल सृष्टि के क्रमशः उदय, संरक्षण और लयीभूत होने का प्रतिनिधित्व करते हैं। शैव मतानुसार शिव इन तीनों भूमिकाओं के अधिपति हैं।

3. यह शैव सिद्धांत के पशुपति, पशु एवं पाश का प्रतिनिधित्व करता है।

4. यह प्रकृति के त्रिगुणों अर्थात् सत्व, रजस तथा तमस का प्रतिनिधित्व करता है।

5. यह महाकालेश्वर के तीन कालों (वर्तमान, भूत, भविष्य) का प्रतिनिधि है।

6. यह स्वपिण्ड, ब्रह्माण्ड और शक्ति का परमपद से एकत्व स्थापित होने का प्रतीक है।

7. यह वाम भाग में स्थिर इड़ा, दक्षिण भाग में स्थित पिंगला तथा मध्य देश में स्थित सुषुम्ना नाड़ियों का प्रतीक है।

8. ज्योतिश-शास्त्र में त्रिशूल मंगल से सम्बद्ध है।

(आ) डमरूः

मान्यता है कि नाद का उद्भव भगवान शिव के डमरू बजाने से हुआ। संगीत में अन्य स्वर तो आते-जाते रहते हैं, उनके बीच विद्यमान केन्द्रीय स्वर नाद है। अनुभवी संगीतज्ञ ही इस नाद का आनंद ले पाते हैं। नाद से ही वाणी के चारों रूपों की उत्पत्ति मानी जाती है। (1) पर (2) पश्यंती (3) मध्यमा (4) वैखरी। वैखरी रूप से अक्षर या वर्ण उत्पन्न होते हैं। मनुष्य के द्वारा जो भाषा-रूप बोले जाते हैं, उनका आधार वैखरी वाणी ही है। पर-वाणी-रूप महाबिन्दु के स्फोट के पूर्व की स्थिति है। इस कारण अगम्य एवं अनिवर्चनीय है।यह रूप कुण्डलिनि के मूलाधार में वर्तमान रहता है। स्पंदन-वाणी-रूप में पश्यंती की स्थिति है। इसका स्थान मूलाधार से मणिपूरक तक है। मध्यमा-वाणी-रूप के दो प्रकार हैं। (1) मध्यमा शब्द (2) मध्यमा अर्थ। मध्यमा शब्द वह मानसिक गति है जो किसी पदार्थ की धारणा बनाती है। मध्यमा अर्थ स्थूल या मूर्त की मानसिक छाप है। जब श्रोता वैखरी के उच्चारित शब्द को सुनता है तो उसे उसके मस्तिष्क में विद्यमान उस वाचक शब्द के वाच्य पदार्थ का बोध होता है। यही शब्द का अर्थ-ग्रहण है। अध्यात्म साधना में इसका विशिष्ट एवं पारिभाषिक अर्थ है। यह कुण्डलिनी जागरण से सम्बद्ध है। यह आहत नाद का नहीं अपितु अनाहत नाद का विषय है। बिना किसी आघात के उत्पन्न चिदानंद, अखंड, अगम एवं अलख रूप सूक्ष्म ध्वनियों का प्रस्फुटन अनाहत या अनहद नाद है। इस अनाहत नाद का दिव्य संगीत सुनने से गुप्त मानसिक शक्तियाँ प्रकट हो जाती हैं। नाद पर ध्यान की एकाग्रता से धीरे-धीरे समाधि लगने लगती है। नाद के आधार पर साधक मनोलय करता हुआ ब्रह्म रूप परमपद से एकत्व स्थापित कर लेता है। डमरू इसी नाद-साधना का प्रतीक है।

(इ) नाग या सर्पः

भगवान शिव के नागेश्वर ज्योतिर्लिंग नाम से स्पष्ट है कि नागों के ईश्वर होने के कारण शिव का नाग या सर्प से अटूट सम्बंध है। भारत में नागपंचमी पर नागों की पूजा की परम्परा है। विद्वानों का अनुमान है कि नाग-पूजा आर्येतर प्रभाव का प्रमाण है। विरोधी भावों में सामंजस्य स्थापित करने वाले शिव नाग या सर्प जैसे क्रूर एवं भयानक जीव को अपने गले का हार बना लेते हैं। लिपटा हुआ नाग या सर्प जकड़ी हुई कुण्डलिनी शक्ति का प्रतीक है।

(ई) चंद्रमाः

भगवान शिव के सोमनाथ ज्योतिर्लिंग के बारे में मान्यता है कि भगवान शिव के द्वारा सोम अर्थात् चंद्रमा के श्राप का निवारण करने के कारण यहाँ चंद्रमा ने शिवलिंग की स्थापना की। इसी कारण इस ज्योतिर्लिंग का नाम सोमनाथ प्रचलित हुआ। सोमनाथ का शिवलिंग चंद्र की भक्ति से प्रसन्न शिव का प्रतीक है। चंद्रमा मन का कारक है। यह मंगल-पराक्रम का प्रतीक है। ज्योतिष शास्त्र की दृष्टि से चंद्र सत्वगुणी है। जिस जातक की कुंडली में चंद्र उच्च एवं शुभवाला होता है, उस जातक में सतोगुण प्रकट होते हैं। वह तदनुसार आचरण करता है। शिव द्वारा चन्द्रमा को धारण करना मन के नियंत्रण का भी प्रतीक है।

(उ) जटाजूटः

भगवान शिव जटाजूटधारी हैं। इस बारे में अनेक पौराणिक मान्यताएँ हैं। उदाहरण के लिए गंगावतरण के संदर्भ में लोकमान्यता है कि भगवान शिव गंगा के स्वर्ग से अवतरण के बाद लोक कल्याण के लिए पहले गंगा को अपनी जटाओं में समाहित करते हैं। इसके बाद जटाजूट से गंगाजल की एक पतली धारा भगीरथ के पूर्वजों को तारने के लिए पृथ्वी पर प्रवाहित करते हैं।

शिव की मूर्तियों में जटायें समान रूप से प्रदर्शित नहीं हैं। नटराज के तांडव नृत्य को प्रदर्शित करने वाली मूर्तियों में केश-पाश (जटायें) खुले हुए, बिखरे हुए तथा उड़ते हुए दिखाये जाते हैं। इसके विपरीत अन्य प्रकार की मूर्तियों में जटायें बँधी हुई दिखाई जाती हैं। इस अंतर के क्या प्रतीकार्थ हैं।

इस दृष्टि से विचार करें तो शिव की जटायें ब्रहाण्ड के विभिन्न लोकों की प्रतीक हैं। खुले, बिखरे तथा उड़ते केश-पाश विभिन्न लोकों के पारस्परिक संतुलन-चक्र के बिखराव एवं ध्वंस होने के प्रतीक हैं। विभिन्न लोकों की लयबद्धता के नष्ट होने तथा सृष्टि की प्रलय-उन्मुखता के प्रतीक हैं। बँधी हुई जटायें विभिन्न लोकों के संतुलन-चक्र की प्रतीक हैं। सृष्टि के लय-विधान की प्रतीक हैं।

(ऊ) शिव का तीसरा नेत्रः

त्र्यंबकेश्वर ज्योतिर्लिंग के व्युत्पत्यर्थ के सम्बंध में मान्यता है कि – “तीन नेत्रों वाले शिवशंभु के यहाँ विराजमान होने के कारण इस जगह को त्र्यंबक (तीन नेत्र) के ईश्वर कहा जाता है। शिव के तीसरे नेत्र का क्या रहस्य है। इसका क्या प्रतीकार्थ है। इस बारे में निम्न मत एवं धारणायें प्रचलित हैं –

(1) तीसरे नेत्र का योग साधना संदर्भित प्रतीकार्थ है कि कुण्डलिनी जागरण में एक चक्र को भेदने के बाद जब षटचक्र पूर्ण हो जाता है तो इसके बाद आत्मा का तीसरा नेत्र मल शून्य हो जाता है। वह स्वच्छ और प्रसन्न हो जाता है।

(2) शिव के तीसरे नेत्र का अर्थ है कि शिव केवल दो नेत्रों के ही अधिपति नहीं हैं। केवल इड़ा एवं पिंगला नाड़ियों के ही स्वामी नहीं हैं। वे अजपा-जप के साधक हैं। इसमें सूक्ष्म प्राण वाम भाग में स्थिर इड़ा और दक्षिण भाग में स्थित पिंगला के स्थान पर मध्य देश में स्थित सुषुम्ना में नीचे ऊपर संचरण करने लगता है तथा कभी-कभी स्थिर भी होने लगता है। समाधि लगने लगती है। स्वपिण्ड का परपिण्ड से एकत्व स्थापित हो जाता है। यही समरसता है। यही समरसीकरण है। यही स्वभाव है, समरसभाव है, अद्वयावस्था है, चिदानंदमयी अद्वैतनिष्ठा है, द्वैत एवं अद्वैत अतीत परम तत्व है।

(3) कुमारस्वामी ने शिव के तीसरे नेत्र को प्रमस्तिष्क (सेरिब्रम) की पीयूष-ग्रंथि (पीनिअल ग्लैंड) माना है। पीयूष-ग्रंथि उन सभी ग्रंथियों पर नियंत्रण रखती है जिनसे उसका सम्बंध होता है। कुमारस्वामी ने पीयूष-ग्रंथि को जागृत, स्पंदित एवं विकसित करने की प्रक्रियाओं का विवेचन किया है। अध्यात्म साधना में चेतना ध्यानावस्था में केंद्रीभूत हो पीयूष-ग्रंथि में स्थिर हो जाती है। ऐसी स्थिति में साधक को समाधि-सुख का अनुभव होता है। उस स्थिति में साधक की चेतना और विश्व-चेतना में तादात्म्य स्थापित हो जाता है। जीव की अनुभूति और शिव की अनुभूति एक-रूप हो जाती है।

(विशेष अध्ययन के लिए द्रष्टव्यः टैक्नीक ऑफ ऑपनिंग द थर्ड आईः महातपस्वी कुमारस्वामी, महातपस्वी श्री कुमारस्वामीजी स्प्रिच्युल एण्ड योगा सोसाइटी, तपोवन, धारवाड (1981))।

)) नटराजः

नटराज शिव का नृत्य गतिशील सार्वभौम ब्रह्माण्ड का प्रतीक है। चार हाथ चार दिशाओं (उत्तर, दक्षिण, पूर्व, पश्चिम) के प्रतीक हैं। त्रिदेव के रूप में नटराज एक ब्रह्माण्डीय नर्तक हैं जो गलित-पलित ब्रह्माण्ड को नष्ट करने और ब्रह्मा को निर्माण की प्रक्रिया आरम्भ करने के लिए नृत्य करते हैं। इस नृत्य का नाम तांडव है। इसे लोक में प्रलयंकारी माना जाता है। दक्षिण भारत में इस नृत्य को आनन्दतांडव कहा जाता है।

शिव का तांडव उनके क्रोध का परिचायक है। इससे प्रलंयकारी रौद्र स्वरूप का बोध होता है। रौद्र तांडव करने वाले शिव रुद्र हैं। आनंद तांडव करने वाले शिव नटराज हैं। मान्यता है कि आनन्द तांडव से सृष्टि का अस्तित्व है तथा उनके रौद्र तांडव के कारण सृष्टि का विलय है।

इस दृष्टि से यह ब्रह्माण्ड के उदय एवं विलय का प्रतीक है। इसकी व्याख्या यह भी है कि यह शिव के परस्पर विरोधी भावों का व्यंजक है। पूर्व में प्रतिपादित किया जा चुका है कि वे कामेश्वर या अर्द्धनारीश्वर होते हुए भी कामजित हैं, वीतरागी हैं। गृहस्थ होते हुए भी श्मशानवासी हैं। सौम्य तथा आशुतोष होते हुए भी भयंकर रुद्र हैं। अन्य व्याख्या यह भी है कि यह ऋत (स्थिर नियम) तथा गति दोनों का प्रतीक है।

नटराज के नृत्य के प्रतीकों का गहन अध्ययन सन् 1924 में आनन्द कुमारस्वामी ने सम्पन्न किया। ( द डॉंस ऑफ शिवाः ऍसेज़ ऑन इंडियन ऑर्ट एण्ड कल्चर, न्यूयोर्कः डोवेर (1985))।

इस अध्ययन ने पाश्चात्य विद्वानों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित किया। उनके द्वारा किए गए अध्ययनों में कुछ अधिक महत्वपूर्ण हैं। वे कालक्रमानुसार निम्न हैं :

(1) हेइनरिख ज़िमेरः मिथ्स एण्ड सिम्बॉल्स इन इंडियन ऑर्ट एण्ड सिविलॉइजेशन (1946)। (2) जोसेफ केम्पबेलः द मिथिक इमेज़ (1974)।

(3) फ्लॉहेरटी, वेण्डी डोनिगेरः शिवा - द ऍरोटिक एस्केटिक (1973)।

(4) डी. एम. डूलिंगः लॉर्ड ऑफ द डांस (1979)।

(5) जोसेफ केमेपबेल एवं बिल मोयेर्सः द पॉवर ऑफ मिथ (1988)।

(6) दीपक चोपड़ाः बॉडी, माइंड एण्ड सोल - द मिस्ट्री एण्ड मैज़िक (1995)।

(7) डेविड स्मिथः द डॉन्स ऑफ शिवाः रिलीज़न, ऑर्ट एण्ड पॉयट्री इन साउथ इंडिया (1996)।

उपर्युक्त अध्ययनों में विशेष रूप से नटराज की नृत्यरत मूर्ति में प्रदर्शित चार हाथों एवं दो पैरों की स्थितियाँ, ऊपर वाले हाथ में अग्निशिखा, दायें पैर से असुर को दबाना, चारों ओर अग्नि-वलय एवं खुले, बिखरे, उड़ते हुए केश-पाश आदि का गहन प्रतीकात्मक अध्ययन सम्पन्न हुआ है। इनमें मत-वैभिन्य भी हैं। यहाँ हम डमरू एवं जटायें आदि के अलावा निम्न चर्चित तथा महत्वपूर्ण प्रतीकों का सामान्य अध्ययन प्रस्तुत करेंगेः

(क) ऊपरी दाहिना एवं बायाँ हाथः

ऊपरी दाहिने हाथ के डमरू से प्रसूत नाद सृजनात्मक शक्ति का द्योतक है तथा ऊपरी बाएँ हाथ की अग्नि विनाश की प्रतीक है। शिव एक हाथ से सृजन करतें हैं तथा दूसरे से विनाश।

(ख)निचला दाहिना एवं बायाँ हाथः

निचले दाहिने हाथ की अभय-मुद्रा हमें आश्वस्त करती है। बायाँ पैर ऊठा हुआ है जो वृत्तियों के ऊर्ध्वरेतस् (अखंड एवं अनवरत ब्रह्मचर्य व्रत का पालन) का प्रतीक माना जाता है। इस ऊठे हुए पाँव की ओर इंगित करने वाले निचले बाएँ हाथ का प्रतीकात्मक अर्थ यह है कि शिव ऊर्ध्वरेतस्- मार्ग की ओर चलने के लिए मार्ग प्रदर्शन कर रहे हैं। जो साधक धर्मानुसार आचरण करता है, वह अज्ञान एवं पाप-कर्म से मुक्त हो जाता है। वह निर्भय हो जाता है। साधना-पथ पर चलने के लिए यह अनिवार्य शर्त है। इसका अर्थ यह भी है कि शिव के चरणों में ही कल्याण है। इसकी व्याख्या यह भी है कि ऊठा हुआ पाँव हाथी की सूँड की आकृति बनाता है जिसका प्रतीक गणेश है। गणेश, जो शिव के पुत्र हैं। गणेश, जो विघ्नविनाशक हैं। उनके दाहिने पैर के नीचे कुचला हुआ असुर है। इस असुर को अपस्मारपुरुष के नाम से अभिहित किया गया है। अपस्मार का अर्थ है – स्मरण शक्ति का अभाव। इस नाते यह अज्ञान का प्रतीक है जिसका विनाश शिव करते हैं।शिव पाश से आबद्ध पशु को पाशमुक्त करते हैं।

(ग)चतुर्दिक अग्नि की लपटें :

चारों ओर उठ रही अग्नि की लपटें इस ब्रह्माण्ड की प्रतीक हैं। बौद्ध दर्शन में निर्वाण में दीपक की अग्नि-ज्योति बुझ जाती है। शैव मत में शिव अग्नि के मूर्त रूप से समरसीकरण कर, नृत्य करते हैं। अग्नि से घिरे होने के बावजूद आनन्द तांडव में आनन्दरूप हो जाते हैं।

अन्त में यह कहा जा सकता है कि नटराज निर्माण और विनाश का, वासना और तप का, स्थिरता और गत्यात्मकता का, जीवन और मृत्यु का प्रतीक है। नटराज का रौद्र तांडव और आनन्द तांडव अनन्त विरोधाभासों और द्वंद्वों का दिव्य एवं भव्य अलौकिक समरसीकरण है। इसकी परिणति अखंड आनन्द है।

शिव पूजन में अर्पित पदार्थों के भी प्रतीकार्थ हैं। सामान्य व्यक्ति शिव पूजन के निमित्त वर्णित पदार्थों का लौकिक अर्थ ग्रहण करता है। उदाहरण के लिए शिव भक्ति के लिए अर्पित किए जाने वाले पुष्पों का अर्थ वृक्षों पर लगने वाले फूलों से लिया जाता है। तात्विक दृष्टि से अध्यात्म- साधना में पुष्पों से अभिप्राय मानसिक पुष्पों से है। अष्ट पुष्पों का प्रतीकात्मक अर्थ हैः

1. प्रथम पुष्प – अहिंसा

2. द्वितीय पुष्प – इन्द्रिय निग्रह

3. तृतीय पुष्प – दया

4. चतुर्थ पुष्प – भाव

5. पंचम पुष्प – क्षमा

6. षष्ठ पुष्प – क्रोध से रहित होना

7. सप्तम पुष्प – ध्यान

8. अष्टम पुष्प – ज्ञान

इसी प्रकार सामान्यतः प्रत्येक धर्म एवं सम्प्रदाय में मंत्रों के जाप करने का विधान है। जाप के समय माला के दानों को फेरने का बाह्याचरण है। तत्वतः मंत्र-साधना बाह्यमुख से लौकिक भाषा के वर्णों का उच्चारण करना नहीं है। यदि मन का शोधन नहीं हुआ, राग-द्वेष विहीनता की स्थिति नहीं आई तो केवल मंत्रों में प्रयुक्त वर्णों के उच्चारण की कोई सार्थकता नहीं है। बाह्य जप में मंत्र के वर्णों या अक्षरों का बाह्यमुख से उच्चारण होता है। जब जप सहज साधना का अंग हो जाता है तो जप अपने-आप भीतर-भीतर चलता रहता है। ऐसी स्थिति में जप साधना नहीं अपितु स्वभाव हो जाता है। यह स्वर-व्यंजन का उच्चारण नहीं रह जाता। यहाँ पहुँचकर नाद सहित मंत्र का स्फोट होता है। मंत्र का स्फुरण होता है। यह नाद-साधना की प्रथम अवस्था है। हमारा उद्देश्य नाद की ब्रह्म-साधना की विवेचना एवं मीमांसा करना नहीं है। हम केवल यह इंगित करना चाहते हैं कि साधना के सभी अंग-उपांगों के प्रतीकात्मक अर्थ हैं। इनका उद्देश्य मन की शुद्धि की प्रक्रिया की ओर साधक को उन्मुख करना है। इनका लक्ष्य चित्त की वृत्तियों का परिष्कार एवं उन्नयन करते हुए चेतना को ऊर्ध्वमुखी बनाना है। यह बाहर से शुरु कर अन्दर की गहराइयों में उतरना है; पाशों के बंधनों से अपने को मुक्त करने की ओर कदम बढ़ाना है।

महाशिवरात्रिः

महाशिवरात्रि शिवत्व का जन्म दिवस है। मान्यता है कि भगवान शिव इस दिन ज्योतिर्लिंग रूप में प्रकट हुए थे। फाल्गुन कृष्ण चतुर्दशी को महाशिवरात्रि का पर्व मनाया जाता है। यह पर्व महाकाल शिव की आराधना का महापर्व है। ऐसी मान्यता है कि इस दिन पारणा करने पर उपासक को समस्त तीर्थों के स्नान का फल प्राप्त होता है। शिवरात्रि का उपवास नहीं करने पर वह जन्म-मरण के चक्र में घूमता रहता है। शिवरात्रि का व्रत करने वाले इस लोक के समस्त भोगों को भोगकर अंत में शिवलोक में जाते हैं। शिवरात्रि की पूजा रात्रि के चारों प्रहर में करनी चाहिए। शिव को बिल्वपत्र, धतूरे के पुष्प तथा प्रसाद में भांग अति प्रिय हैं। लौकिक दृष्टि से दूध,दही,घी,शकर,शहद -, इन पाँच अमृतों (पंचामृत) का पूजन में उपयोग करने का विधान है। महामृत्युंजय मंत्र शिव आराधना का महामंत्र है। शिव रात्रि वह समय है जो पारलौकिक, मानसिक एवं भौतिक तीनों प्रकार की व्यथाओं, संतापों, पाशों से मुक्त कर देता है। शिव की रात शरीर, मन और वाणी को विश्राम प्रदान करती है। शरीर, मन और आत्मा को ऐसी शान्ति प्रदान करती है जिससे शिव तत्व की प्राप्ति सम्भव हो पाती है। शिव और शक्ति का मिलन गतिशील ऊर्जा का अन्तर्ज्ञात से एकात्म होना है। लौकिक जगत में लिंग का सामान्य अर्थ चिह्न होता है जिससे पुल्लिंग, स्त्रीलिंग और नपुंसक लिंग की पहचान होती है। शिव लिंग लौकिक के परे है। इस कारण एक लिंगी है। आत्मा है। शिव संहारक हैं। वे पापों के संहारक हैं। लय की निर्मति के लिए प्रलय करते हैं। अवरोधक गलित एवं पलित तत्वों का विनाश कर नव जीवन प्रदान करते हैं।

शिव रात्रि की सार्थकता रात भर बलात् जागना नहीं हैं; जोर जोर से चीख चीख कर भजन गाना नहीं है। यह जागृति का पर्व है। यह आत्म स्वरूप को जानने की रात्रि है। यह स्वयं के भीतर जाकर अथवा अंतश्चेतना की गहराइयों में उतरकर आत्म साक्षात्कार करना है। काल के इस क्षण की सार्थकता शिव सायुज्य प्राप्त करने में है; शिवमय हो जाने में है। शक्ति माया नहीं है, मिथ्या नहीं है, प्रपंच नहीं है। इसके विपरीत शक्ति सत्य है। जीव और जगत भी सत्य है। सभी तत्वतः सत्य हैं। सभी शिवमय हैं। शिव और शक्ति भाषा के धरातल पर भेदक हैं; भिन्न हैं। तत्वतः एक के ही दो रूप हैं। अभिन्न हैं। विश्वदृष्टि से देखने पर, सृष्टि और संहार की दृष्टि से देखने पर, उन्मेष और निमेष को लक्ष्य करके देखने पर, शिव और शक्ति पृथक प्रतीत होते हैं। चिदंश शिव भाव और आनन्दांश शक्ति भाव तत्वतः परस्पर मिले हुए हैं; अभिन्न हैं।(आदिनाथं महासिद्धं शक्तियुक्तं जगद् गुरुम्।)।

इस लेख का समापन आदि गुरू शंकराचार्य द्वारा रचित शिवाष्टक से करना समीचीन होगाः
तस्मै नम: परमकारणकारणाय , दिप्तोज्ज्वलज्ज्वलित पिङ्गललोचनाय ।
नागेन्द्रहारकृतकुण्डलभूषणाय , ब्रह्मेन्द्रविष्णुवरदाय नम: शिवाय ॥ 1 ॥
कारणों के भी परम कारण हैं। अति दीप्त, उज्ज्वल एवं पिङ्गल नेत्रोंवाले हैं। सर्पों के हार-कुण्डल आदि से भूषित हैं। ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्रादि को भी वर देने वालें हैं। ऐसे शिव जी को नमस्कार।
श्रीमत्प्रसन्नशशिपन्नगभूषणाय , शैलेन्द्रजावदनचुम्बितलोचनाय ।
कैलासमन्दरमहेन्द्रनिकेतनाय , लोकत्रयार्तिहरणाय नम: शिवाय ॥ 2 ॥

निर्मल चन्द्र कला तथा सर्पों द्वारा भूषित एवं शोभायमान हैं। पार्वती अपने मुख से उनके लोचनों का चुम्बन करती हैं। कैलास एवं महेन्द्रगिरि उनका निवासस्थान है। त्रिलोक के दु:ख को दूर करनेवाले हैं। ऐसे शिव जी को नमस्कार।
पद्मावदातमणिकुण्डलगोवृषाय , कृष्णागरुप्रचुरचन्दनचर्चिताय ।
भस्मानुषक्तविकचोत्पलमल्लिकाय , नीलाब्जकण्ठसदृशाय नम: शिवाय ॥ 3 ॥

स्वच्छ पद्मराग मणि के कुण्डलों से किरणों की वर्षा करने वाले हैं। अगरू तथा चन्दन से चर्चित हैं। भस्म, प्रफुल्लित कमल और जूही से सुशोभित हैं। ऐसे नीलकमल के समान कण्ठवाले शिव को नमस्कार ।
लम्बत्स पिङ्गल जटा मुकुटोत्कटाय , दंष्ट्राकरालविकटोत्कटभैरवाय ।
व्याघ्राजिनाम्बरधराय मनोहराय , त्रिलोकनाथनमिताय नम: शिवाय ॥ 4 ॥
लटकती हुई पिङ्गवर्ण जटाओं के मुकुट को धारण करने से उत्कट जान पड़ते हैं। तीक्ष्ण दाँतों के कारण अति विकट और भयानक प्रतीत होते हैं। व्याघ्र की खाल धारण किए हुए हैं। अति मनोहर हैं। तीनों लोकों के अधिश्वर उनके चरणों में झुकते हैं। ऐसे शिव जी को नमस्कार। दक्षप्रजापतिमहाखनाशनाय , क्षिप्रं महात्रिपुरदानवघातनाय ।
ब्रह्मोर्जितोर्ध्वगक्रोटिनिकृंतनाय , योगाय योगनमिताय नम: शिवाय ॥ 5 ॥

दक्षप्रजापति के महायज्ञ को ध्वंस कर दिया। परम् विकट त्रिपुरासुर का तत्काल अन्त कर दिया। दर्पयुक्त ब्रह्मा के ऊर्ध्वमुख को काट दिया। ऐसे शिव जी को नमस्कार।
संसारसृष्टिघटनापरिवर्तनाय , रक्ष: पिशाचगणसिद्धसमाकुलाय ।
सिद्धोरगग्रहगणेन्द्रनिषेविताय , शार्दूलचर्मवसनाय नम: शिवाय ॥ 6 ॥
संसार मे घटित होने वाली समस्त घटनाओं में परिवर्तन करने में सक्षम हैं। पिशाच एवं सिद्ध सभी गणों की रक्षा करते हैं। सिद्ध, सर्प, ग्रह एवं इन्द्रादि इनकी सेवा करते हैं। व्याघ्र की खाल धारण करते हैं। ऐसे शिव जी को नमस्कार।
भस्माङ्गरागकृतरूपमनोहराय , सौम्यावदातवनमाश्रितमाश्रिताय ।
गौरीकटाक्षनयनार्धनिरीक्षणाय , गोक्षीरधारधवलाय नम: शिवाय ॥ 7 ॥
अपने अंगों पर भस्म लेप के कारण मनोहर रूपवाले हैं। सौम्य एवं सुन्दर वन का आश्रय करने वाले इनके आश्रित हैं। श्री पार्वतीजी कटाक्ष नेत्रों द्वारा इनका निरीक्षण करती हैं। गाय के दूध की धारा के समान धवल हैं। ऐसे शिव जी को नमस्कार।
आदित्य सोम वरुणानिलसेविताय , यज्ञाग्निहोत्रवरधूमनिकेतनाय ।
ऋक्सामवेदमुनिभि: स्तुतिसंयुताय , गोपाय गोपनमिताय नम: शिवाय ॥ 8 ॥

सूर्य, चन्द्र, वरूण और पवन इनकी सेवा करते हैं। यज्ञ एवं अग्निहोत्र धूममें इनका निवास है। ऋक-सामादि वेद तथा मुनिजन इनकी स्तुति करते हैं। गायों की रक्षा करते हैं। ऐसे शिव जी को नमस्कार।

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(सेवा-निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारत सरकार, आगरा)

123, हरि एन्कलेव, चाँदपुर रोड

बुलन्द शहर (उत्तर प्रदेश) पिन- 203001

mahavirsaranjain@gmail.com



 

Professor Mahavir Saran Jain                                 
( Retired Director, Central Institute Of Hindi )
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  1. अति गहन अध्ययन का परिणाम प्रसाद है यह रचना मननीय

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