शुक्रवार, 19 अप्रैल 2013

देवेन्द्र कुमार पाठक के दोहत्थड़-दोहे

                                          

मदरीले दृग खोलती,     
भोर-वधू निँदियार;

ललछौँही छवि सोहती, 
सेँदुर भरे लिलार.               

छोड़ गाँव-घर चल पड़े,
चैतहरोँ के पाँव;            

जहाँ हाथ को काम है,           
वहाँ ठिकाना-ठाँव

टेसू हुए दिवालिए,   
मदिराए महुहार;   

खलिहानोँ के सिर टँगी,  
कर्ज़ोँ की तलवार.           

रात रही जब पहर भर,   
तब जागा महुहार;         

फूल झरे मदरस भरे,     
बीनेँ बीननहार.          

जीवन बारह-बाट हो,   
भटका मिली न राह;       

चैत -चित्त-चिंता जले, 
धुँधुआ  रही निग़ाह.     

दिन-दिन दूबर हो रहे ,   
नद-नदियोँ के अंग;       

धूप-पसीने मेँ उड़े,      
फागुन के सुख-रंग.               

~  ~  ~  ~

2 blogger-facebook:

  1. देवेन्द्र कुमार जी , बेहतरीन दोहे हैं, मज़ा आ गया

    उत्तर देंहटाएं
  2. dharmendra tripathi5:38 pm

    behatreen dohe hain.

    उत्तर देंहटाएं

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