सोमवार, 15 अप्रैल 2013

उमेश मौर्य की लघुकथाएँ

दाग अच्‍छे हैं

दिमाग खराब है क्‍या ? स्‍कूल से आया नहीं कि मिट्‌टी में खेलना शुरू। होम वर्क पूरा किया कि नहीं ? इतना बड़ा हो गया लेकिन कीचड़ में खेलने की आदत नहीं गई। पिन्‍टू के पिता जी उस चार साल के बच्‍चे को डांटते रहे थे। इंगलिश मीडियम में डाल दिया। लेकिन सेहत पे रत्‍ती भर सुधार नहीं। वही गावड़ी बच्‍चों की तरह खेलना। पुष्‍पा को देखकर उस पर भी बरस पड़े - तुम भी कुछ ध्‍यान नहीं दे सकती। बस टीवी खोलकर लगी रहो इस लाड़ले को लेकर। कहती हो बच्‍चा है। पांच साल का होने वाला है। लेकिन पता भी नहीं लगता। जब अभी से ये हाल है तो आगे चलकर क्‍या करेगा ? बड़बड़ाते हुए घर में चले गये।

शाम हो गई सभी लोग खाना खाते समय टीवी देख रहे थे। कि बच्‍चा अचानक सर्फ एक्‍सेल का प्रचार देखकर उछल पड़ा। मानो उसे सबूत मिल गया हो। कीचड़ में खेलने का - पापा पापा देखो इसमें रोज दिखाता है। दाग अच्‍छे, दाग अच्‍छे हैं। और आप तो डांटते हो। अब उन्‍हें एहसास हुआ कि टीवी तो बहुत कुछ दिखाता है। अच्‍छाई भी बुराई भी, पात्र भी होते है कुपात्र भी होते हैं। लेकिन हर व्‍यक्‍ति उसे अपनी झमताओं के अनुरूप ही ग्रहण करता है। चाहे वो बच्‍चा हो, बूढा हो, या फिर जवान।

 

खुले विचार

व्‍यक्‍ति के विचार उसके रहन सहन एवं आहर विहार को प्रभावित करते है। और इसके विपरीत हमारे रहन सहन और वातावरण भी हमारे विचारों पर अपना प्रभाव डाले बिना नहीं रहते। हमारे वस्‍त्राभूषण हमारी जीवन शैली, बातचीत का तरीका, पसंद-नापसंद, हमारी अन्‍तरनिहित सूक्ष्‍म विचारों का ही बाहरी रूप है।

एक बार कुछ नये मॉडल के मित्र मेरे कमरे पे आये। उनके साथ पश्‍चिम देशों की पोशाक में उनकी गर्लफैन्‍ड भी साथ थी। मेरी आदत थी की अक्‍सर मैं घर पे चढ्‌ढी और बनियान में ही रहता था। अचानक मुझे इस रूप में देखकर उन लोगों को बहुत आश्‍चर्य हुआ। लेकिन लड़कियों को कोई खास असर न हुआ। वो सामान्‍य सी बनी रही। मेरे मित्र लोग जिनके शरीर से कपड़े नहाते समय ही शायद निकलते होंगे। उन्‍होंने मुझसे कहा कि-आप ऐसे कैसे रहते हो ? इतने कम कपड़ों में। मैंने शरमाते हुए कहा- देखो जी मैं बहुत खुले विचारों का हूं।

-उमेश मौर्य

4 blogger-facebook:

  1. बेनामी5:31 pm

    लघुकथा 'दाग अच्छे हैं' यथार्थपरक रचना है ।हम लोग समझ नहीं पाते और बच्चे बहुत कुछ टीवी जैसे संचार माध्यम से सीख चुके होते हैं ।

    उत्तर देंहटाएं
  2. उमेश भाई, दोनो लघुकथा बढ़िया है, दोनो मे एक छिपा हुआ संदेश पाठक तक पहुंचाने मे आप सफल रहे।

    उत्तर देंहटाएं
  3. बेनामी जी, गिरिराज जी,
    रचनाकार के माध्यम से आप लोगों ने हमें पढ़ा इसका बहुत बहुत आभार| पाठकों की टिप्पणी लेखक का मार्गदर्शन, उत्साहवर्धन, एवं प्रेरित करती है|

    सधन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  4. dono laghukathaye apna sandesh dene me safal rahi ...badhai..

    उत्तर देंहटाएं

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