सोमवार, 8 अप्रैल 2013

उमेश मौर्य की कहानी - आत्मनिर्भरता

आत्‍मनिर्भरता

दो पौधे थे। दोनों की ही उम्र समान थी। मगर भाग्‍यवश एक बड़े से मकान के हाते में और दूसरा मकान के बाहर, सड़क के किनारे से गुजरती नाली के बगल। मकान एक बड़े सेठ का था और सेठ को उस पौधे से बहुत लगाव था। जिसके कारण उस मकान के पौधे को बहुत अहंकार हो गया था। कि उसकी कितनी सेवा होती है। समय-समय पर स्‍वच्‍छ पानी, तीव्रता से बढ़ने के लिए उर्वरक, रसायन एवं टॉनिक आदि भी मिलते थे। तेज हवाओं के कारण गिरने से बचने के लिए एक बड़ा सा बांस भी बॉध रखा था। जिसके कारण घर का पौधा बहुत तेजी से विकाश करने लगा और देखते ही देखते कुछ ही वर्षों में बांस के सहारे-सहारे बहुत लम्‍बा हो गया।

वह ऊपर से ही बाहर के पौधे को तिरछी नजर से देखता और ताने देता रहता। ''देख मेरा मालिक तो मेरी कितनी सेवा करता है। मुझे कितना सहारा देता है। मैं तुम्‍हारे साथ-साथ ही पैदा हुआ लेकिन कितना बड़ा हो गया।'' दूसरा पौधा चुपचाप सुनता रहता। क्‍या कर सकता था। परिस्‍थितियाँ ही उसकी मालिक और शिक्षक थी। हवाओं के थपेड़े खा खा कर कभी इधर गिरता, कभी उधर गिरता। बरसात की नमी से ही अपना काम चलाता और धीरे-धीरे ही आगे बढ़ता रहा। गिर जाता फिर खड़ा हो जाता। जाड़ा-गर्मी, बरसात सभी मौसम में जीने की समझ उसमें विकसित हो गई थी। हमेशा खुश रहता। कई वर्ष लग गये उसे पौधे से वृक्ष बनने में। लेकिन चारों तरफ उसका संतुलन बराबर बना रहा। अब भी मकान का पेड़ उसे देखता और कटाक्ष करता।- ''देख तू हमेशा मुझसे छोटा ही रहेगा। तेरी देख रेख करने वाला कोई भी नहीं है न। तू कभी भी मेरी बराबरी नहीं कर सकता। मुझे देख मुझे !''

छोटा वृक्ष सब सुन लेता। और ढालियों पे बैठी चिड़ियों को झूला झुलाने लगता, पत्‍तियों से तान छेड़कर गानों में खो जाता। बड़े वृक्ष की बातों का बुरा न मानता और उसकी सद्‌बुद्धि के लिए ईश्‍वर से प्रार्थना करता। अपने लिए सोचता हम जैसे हैं आत्‍मनिर्भर है। हमें इसी की आत्‍मसंतुष्‍टि है। उसे एक दिन महल का पानी नहीं मिलता तो मुंह लटक जाता है। भगवान जो भी करता है अच्‍छा ही करता है कोई भी परिस्‍थिति हमें मजबूत बनाने के लिए ही आती है। इससे हम चिर स्‍थायी बने रह सकते है। इसी तरह के विचारों से वो अपने आपको समझा लेता।

दिन बीतते गये। एक दिन अचानक बड़ी तेज ऑधी आयी। बड़े पेड़ पर लगा सहारे के लिए बॉस उखड़ कर दूर जा गिरा। और वह पेड़ ऊपर से नीचे तक लड़खड़ाने लगा। सम्‍भलने की बहुत कोशिश की लेकिन उसमें परिस्‍थितियों से लड़ने का अनुभव व मजबूती न थी। अभी तक वह हमेशा दूसरों के सहारे ही खड़ा होकर इतराता रहा। इससे पहले कि वह सम्‍भलने के लिए उठा ही था कि सॉय-सॉय करती एक तेज हवा ने उसको तोड़ दिया। और वह सामने के वृक्ष के ऊपर जा गिरा। वृक्ष ने उसे सहारा दिया। बडे़ पेड़ को आज अपनी भूल का अन्‍तिम एहसास हो गया। और कराहते हुए बोला-''भाई मुझे क्षमा करना। मैंने दूसरों का सहारा लेकर बड़ी गलती की। तुम्‍हारी आत्‍मनिर्भरता ने तुम्‍हें जीवन दिया और हर तरह की परिस्‍थितियों से लड़ने की शक्‍ति भी प्रदान की। जिसके कारण कितने सारे लोग आज तुम्‍हारे नीचे सुरक्षित हैं। खुशी का एहसास कर रहें है। तुम सचमुच बहुत बड़े हो। तुम युगों-युगों तक जीवित रहो।'' इतना कहकर हवा के तीव्र प्रवाह के साथ जमीन पे आ गिरा।

इसी प्रकार चाहे कोई व्‍यक्‍ति या देश हो जो अपनी समस्‍याओं से निकलने के लिए हमेशा दूसरों पर पूर्ण निर्भर रहते हैं। वे कहीं न कहीं से अपनी प्रतिभाओं को खत्‍म कर रहे हैं। अपंग बना रहें है। आत्‍मनिर्भरता ही व्‍यक्‍ति एवं देश के लिए सबसे बड़ी पहिचान है। जो उसे युगों-युगों तक जीवित रख सकती है।

-उमेश मौर्य

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