सोमवार, 15 अप्रैल 2013

सुरेन्द्र कुमार पटेल की दो लघुकथाएँ

॰सॉफ्टवेयर॰
स्कूल में कम्प्यूटर आएगा तो छोटे-छोटे कामों के लिए दुकान में कतार नहीं
लगानी पड़ेगी । स्कूल के सारे काम आसानी से हो जाया करेंगे । स्कूल में
कम्प्यूटर खरीदने की चर्चा है । स्टाफ में कम्पयूटर का ज्ञान सिर्फ
त्रिपाठी सर को है । सब जानते हैं , कम्प्यूटर क्रय करने में उनका
परामर्श अवश्य लिया जाएगा । यह ठीक भी है क्योंकि जानकार व्यक्ति साथ
होगा तो कम्प्यूटर के उपयोगी फीचर्स का लाभ उठाया जा सकेगा ।

वर्ष भर बाद आज मैं किसी काम से उसी स्कूल में आया हूँ । कम्प्यूटर कक्ष
में कम्प्यूटर टेबल के ठीक सामने खड़ा हूँ ।मॉनीटर सुबक रहा है । सीपीयू
औंधे मुँह गिरा है ।की-बोर्ड के सारे बटन वास्तविक स्थिति के विपरीत धरती
माँ की गोद तलाश रहे हैं । मॉनीटर की तरफ मैंने ज्यों दृष्टि डाली , वह
फफककर रो पड़ा । दीनता के स्वर में बोला,
'देखा वर्मा जी ! इन लोगों ने हमें कैसा बीमार बना दिया ?' की-बोर्ड को
ठीक स्थिति में लाकर मैने उस पर उँगली धरी तो वह कराह उठा । 'क्या हुआ ?
तुम सबने सर्वांग भभूती क्यों लपेट रखी है ? और उस पर ये रोनी सूरत !'
मैंने पूछा । 'हम क्या करते ? हम स्कूल के काम के लायक हैं ही नहीं ।
त्रिपाठी सर ने प्राचार्य महोदय से कई दफा कहा कि हममें जो सॉफ्टवेयर हैं
,उनका स्कूल में कोई काम नहीं है और जो स्कूल के लिए जरूरी हैं वे
सॉफ्टवेयर हैं ही नहीं । उस पर प्राचार्य महोदय ने उन्हें झिड़ककर कह दिया
, त्रिपाठी जी ! जो जैसा है , वैसा रहने दीजिए ।हमारे काम में अपना
सॉफ्टवेयर घुसेड़ने की कोशिश मत कीजिए ।तब से उन्होंने भी हमारी ओर से मुख
मोड़ लिया है ।तभी से हमारी ये हालत है ।' यह जानकारी स्कूल के प्यून ने
दी थी । पर मुझे लग रहा था यह सब कम्प्यूटर खुद ब खुद बयान कर रहा है ।
'. . . लेकिन त्रिपाठी सर तो स्वयं क्रय समिति में थे । फिर ये बात
उन्होंने पहले क्यों नहीं देख ली ?' मैंने अपना जवाब प्रविष्ट किया । उधर
से मॉनीटर पर फिर एक जवाब उभरा , ' जी , नहीं ! त्रिपाठी सर के अलावा
बाकी सब क्रय समिति में थे । प्राचार्य महोदय को मालूम था कि उनके होते
दाम में सवाई-ड्योढ़ा करते न बनेगा ।इसलिए उन्होंने त्रिपाठी सर को जानबूझ
कर क्रय समिति से दूर रखा ।'

स्कूल के निर्जीव पड़े कम्प्यूटर कक्ष से बाहर आया तो लगा सारे दफ्तरों का
यही सॉफ्टवेयर है ।


2.॰डिस्काउण्ट॰
दूकान में खिच-खिच न हो और कोई वस्तु खरीदने से रह न जाए इसलिए रतन ने घर
से ही एक सूची तैयार कर ली थी ।उसने उसी अनुमान से पॉकेट में कुछ रुपए रख
लिए थे ।दूकानदार ने उसका ध्यान खींचा ,"आपने दो साबुन लिखे हैं , तीन
लेंगे तो चौथा मुफ्त मिलेगा ।" रतन ने उसे हाँ कर दी ।दूकानदार ने एक -दो
वस्तुएँ और निकाली और फिर से उसका ध्यान अपनी ओर खींचा ," आपने
डिटर्जेण्ट के दो पैकेट लिखे हैं ,तीन लेंगे तो चौथा मुफ्त मिलेगा ।"
उसने उसे भी हाँ कर दी ।इस तरह उसे कम से कम आधी वस्तुओं पर डिस्काउण्ट
मिला हुआ था ।वह काफी खुश था ।बिल तैयार हुआ ।उसने बिल हाथ में ली ।एक
दृष्टि पॉकेट पर डाली ।मासिक वेतन और खर्चे का अनुमान किया ।हाथ जोड़कर
दूकानदार से क्षमा मांगी और डिस्काउण्ट वाली सारी वस्तुएँ दूकान की केबिन
पर छोड़कर चला आया ।

॰ सुरेन्द्र कुमार पटेल
email: surendrasanju.02@gmail.com

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