मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

महावीर सरन जैन का आलेख - भारतीय भाषा परिवार

भारोपीय भाषा परिवार :

प्रोफेसर महावीर सरन जैन

(मैंने इधर कुछ विद्वानों के आलेख पढ़े हैं जिनमें यूरोपीय भाषाओं के अनेक शब्दों की व्युत्पत्ति को संस्कृत से खोजने का प्रयास किया गया है। उन पर कोई टिप्पणी न करके, यहाँ मैं 'भारोपीय भाषा परिवार' के बारे में टिप्पण प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसके अवलोकन के बाद अध्येता स्वयं अपना अभिमत, धारणा अथवा नजरिया स्थापित कर सकें।)

भारत-यूरोपीय भाषा परिवार का महत्व जनसंख्या, क्षेत्र-विस्तार, साहित्य, सभ्यता, संस्कृति, वैज्ञानिक प्रगति, राजनीति एवं भाषा विज्ञान- इन सभी दृष्टियों से निर्विवाद है।

नामकरणः

भारत-यूरोपीय परिवार को विभिन्न नामों से अभिहित किया गया है। आरम्भ में भाषा विज्ञान के क्षेत्र में जर्मन विद्वानों ने उल्लेखनीय कार्य किया और उन्होंने इस परिवार का नाम 'इंडो-जर्मनिक' रखा। यूरोप के इंगलैण्ड, इटली, फ्रांस, स्पेन, पुर्तगाल, रोमानिया, रूस, पोलैण्ड आदि अन्य देशों में भी इसी परिवार की भाषाएँ बोली जाती हैं, पर वे न तो भारतीय शाखा के अन्तर्गत आती हैं और न जर्मनिक शाखा के। यूरोप के अन्य देशों के विद्वानों को यह नाम इसी कारण स्वीकृत नहीं हुआ। इसका एक और कारण था। प्रथम महायुद्ध के बाद जर्मनी के प्रति यूरोप के देशों की जो द्वेष-भावना थी, उसने भी इस नाम को ग्रहण करने में बाधा पहुँचाई। इस भाषा-परिवार के साथ जर्मनी का नाम संपृक्त करना यूरोप के अन्य देशों के विद्वानों को स्वीकार्य नहीं हुआ। जर्मन विद्वान आज भी इस परिवार को इंडो-जर्मनिक ही कहते हैं।

कुछ विद्वानों ने इस परिवार को आर्य परिवार कहा तथा कुछ विद्वानों ने इस परिवार के लिए भारत-हित्ती (इंडो-हित्ताइत) नाम सुझाया। सन् 1893 ई0 में एशिया माइनर के बोगाज़कोई (तुर्की में) नामक स्थान की पुरातात्विक खुदाई के प्रसंग में मिट्टी की पट्टियों पर कीलाक्षर लिपि में अंकित कुछ लेख मिले। सन् 1906 से 1912 के बीच ह्युगो विंकलर एवं थियोडोर मेकरीडी के प्रयत्नों के फलस्वरूप लगभग 10000 कीलाक्षरों में अंकित पट्टियाँ प्राप्त हुईं जिन्हें 1915 - 1917 में चेक विद्वान होज़्नी ने पढ़कर यह स्थापना की कि हित्ती भारत-यूरोपीय परिवार से संबद्ध भाषा है। हित्ती के सम्बन्ध में एक और मान्यता भी है कि वह 'आदि भारत-यूरोपीय भाषा' से संस्कृत, ग्रीक, लातिन की तरह उत्पन्न नहीं हुई बल्कि वह उसके समानान्तर बोली जाती थी। इस मान्यता के कारण वह 'आदि भारत-यूरोपीय भाषा' की पुत्री नहीं है अपितु उसकी बहन है। इसीलिए इस परिवार का नाम भारत-हित्ती रखने का प्रस्ताव आया।

'इंडो-जर्मेनिक' एवं 'भारत-हित्ती' - ये दोनों नाम चल नहीं पाए। विद्वानों को ये नाम स्वीकार न हो सके।

भारत-यूरोपीय (इंडो-यूरोपीयन) नाम का प्रयोग पहले-पहले फ्रांसीसियों ने किया। भारत-यूरोपीय नाम इस परिवार की भाषाओं के भौगोलिक विस्तार को अधिक स्पष्टता से व्यक्त करता है । यद्यपि यह भी सर्वथा निर्दोष नहीं है। इस वर्ग की भाषाएँ न तो समस्त भारत में बोली जाती हैं और न समस्त यूरोप में। भारत एवं यूरोप में अन्य भाषा परिवारों की भाषाएँ भी बोली जाती हैं। यह नाम अन्य नामों की अपेक्षा अधिक मान्य एवं प्रचलित हो गया है तथा भारत से लेकर यूरोप तक इस परिवार की भाषाएँ प्रमुख रूप से बोली जाती हैं, इन्हीं कारणों से इस नाम को स्वीकार किया जा सकता है।

भाषा परिवार का महत्वः

1 ़ विश्व की अधिकांश महत्वपूर्ण भाषाएँ इसी परिवार की हैं। ये भाषाएँ विश्व के विभिन्न महत्वपूर्ण देशों की राजभाषा/सह-राजभाषा हैं तथा अकादमिक, तकनीकी एवं प्रशासनिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। उदाहरणार्थ : अंग्रेजी, हिन्दी-उर्दू, स्पेनी, फ्रेंच, जर्मन, रूसी, बंगला।

2 ़ विश्व की आधी से अधिक आबादी भारोपीय परिवार में से किसी एक भाषा का व्यवहार करती है। यह व्यवहार मातृभाषा/प्रयोजनमूलक भाषा के रूप में होता है।

3 ़पूर्व में इसका उल्लेख किया जा चुका है कि संसार में 10 करोड़ (100 मिलियन) से अधिक व्यक्तियों द्वारा बोली जाने वाली मातृभाषाओं की संख्या 10 है। इन 10 भाषाओं में से चीनी, अरबी एवं जापानी के अतिरिक्त शेष 7 भाषाएँ भारोपीय परिवार की हैं : 1. हिन्दी 2. अंग्रेजी 3. स्पेनी 4. बंगला 5. पुर्तगाली 6. रूसी 7. जर्मन।

4 ़ धर्म, दर्शन, संस्कृति एवं विज्ञान सम्बन्धी चिन्तन जिन शास्त्रीय भाषाओं में मिलता है उनमें से अधिकांश भाषाएँ इसी परिवार की हैं। यथा : संस्कृत, पालि, प्राकृत, लैटिन, ग्रीक, अवेस्ता (परशियन)।

5 ़ भारोपीय परिवार की भाषाएँ अमेरिका से लेकर भारत तक बहुत बड़े भूभाग में बोली जाती हैं।

भारत-यूरोपीय भाषा परिवार की शाखाएँ / उपपरिवार

1 ़ केल्टिक - मध्य यूरोप के केल्टिक भाषी लगभग दो हजार वर्ष पूर्व ब्रिटेन के भू-भाग में स्थानान्तरित हुए थे। जर्मेनिक ऐंग्लो सेक्सन लोगों के आने के कारण ये केल्टिक भाषी वेल्स, आयरलैंड, स्काटलैंड चले गए।

2 ़जर्मेनिक - अंग्रेजी, डच, फ्लेमिश, जर्मन, डेनिश, स्वीडिश, नार्वेजियन

3 ़लैटिन / रोमन / इताली - फ्रांसीसी, इतालवी, रोमानियन, पुर्तगाली, स्पेनी

4 ़स्लाविक -रूसी, पोलिश, सोरबियन, स्लोवाक, बलगारियन

5 ़बाल्तिकः - प्राचीन प्रशन, लिथुआनीय, लातवी

6. हेलेनिक - ग्रीक

7. अलबानी - इलीरी

8. प्रोचियन -आर्मेनी

9. भारत-ईरानी : इस परिवार को भाषावैज्ञानिक तीन वर्गों में विभक्त करते हैं। 'दरद' के अलावा इसके निम्न वर्ग हैंः

(क) ईरानी - परशियन, अवेस्ता , फारसी, कुर्दिश, पश्तो, ब्लूची

(ख)भारतीय आर्य भाषाएँ--संस्कृत, पालि, प्राकृत, अपभ्रंश, हिन्दी, बंगला, मराठी, गुजराती, पंजाबी, सिंधी, असमिया, ओड़िशा आदि। इनका विवरण आगे अलग से प्रस्तुत किया जाएगा।

10 ़तोखारी- इस भाषा के सन् 1904 ई0 में मध्य एशिया के तुर्किस्तान के तुर्फान प्रदेश में कुछ हस्तलिखित पुस्तकें एवं पत्र मिले जिन्हें पढ़कर प्रोफेसर सीग की यह मान्यता है कि यह भाषा भारत-यूरोपीय परिवार के केंतुम् वर्ग की भाषा है।

11 ़एनातोलिया -एनाातोलिया भाषाओं के अंतर्गत भारोपीय परिवार की ऐसी लुप्त भाषाओं को समाहित किया जाता है जो वर्तमान तुर्की के एशिया वाले भाग के पश्चिमी भूभाग में, जिसे एनातोलिया एवं एशिया माइनर के नामों से भी जाना जाता है, बोलीं जाती थीं। यह क्षेत्र प्रायद्वीप है जिसके उत्तर में काला सागर, उत्तर-पूर्व में जोर्जिया, पूर्व में आर्मेनिया, दक्षिण-पूर्व में मेसोपोटामिया तथा दक्षिण में भूमध्यसागर है। इन भाषाओं में हित्ती, लूवीय, पलायीय तथा लाइडन भाषाओं के नामों का उल्लेख तो मिलता है मगर भाषिक सामग्री केवल हित्ती की ही मिलती है। यही कारण है कि इस परिवार को केवल हित्ती के नाम से भी अभिहित किया जाता है। इस भाषा के बारे में सबसे पहले लाइसन ने सन् 1821 में उल्लेख किया। सन् 1893 ई0 में एशिया माइनर के बोगाज़कोई (तुर्की में) नामक स्थान की पुरातात्विक खुदाई के प्रसंग में मिट्टी की पट्टियों पर कीलाक्षर लिपि में अंकित कुछ लेख मिले। सन् 1906 से 1912 के बीच ह्युगो विंकलर एवं थियोडोर मेकरीडी के प्रयत्नों के फलस्वरूप लगभग 10000 कीलाक्षरों में अंकित पट्टियाँ प्राप्त हुईं जिन्हें 1915 - 1917 में चेक विद्वान होज़्नी ने पढ़कर यह स्थापना की कि हित्ती भारत-यूरोपीय परिवार से संबद्ध भाषा है।

आदि / आद्य भारत-यूरोपीय भाषा के सिद्धान्त की उद्भावना एवं भारोपीय भाषाओं का तुलनात्मक अध्ययनः

भारोपीय भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन की शुरुआत सन् 1767 में फ्रांसीसी पादरी कोर्डो ने संस्कृत के कुछ शब्दों की तुलना लैटिन के शब्दों से की। इसके बाद ऑक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी में बोडन-चेयर के प्रोफेसर, संस्कृत व्याकरण, संस्कृत-अंग्रेजी कोश, अंग्रेजी-संस्कृत कोश आदि विश्वविख्यात रचनाओं के प्रणेता सर मोनियर विलियम्स जोंस ने जनवरी,1784 में 'द एशियाटिक सोसायटी' की नींव डालते हुए संस्कृत के महत्व को रेखांकित किया तथा प्रतिपादित किया कि भाषिक संरचना की दृष्टि से संस्कृत, ग्रीक एवं लैटिन सजातीय हैं। सन् 1786 में इन्होंने इस विचार को आगे बढ़ाया तथा स्थापना की कि यूरोप की अधिकांश भाषायें तथा भारत के बड़े हिस्से तथा शेष एशिया के एक भूभाग में बोली लाने वाली भाषाओं के उद्भव का मूल स्रोत समान है। इस स्थापना से आदि भारोपीय भाषा के सिद्धांत की उद्भावना हुर्ई। जर्मन भाषावैज्ञानिक फ्रेंज बॉप की सन् 1816 में संस्कृत के क्रिया रूपों की व्यवस्था पर फ्रेंच में पुस्तक प्रकाशित हुई जिसमें इन्होंने संस्कृत, परशियन, ग्रीक, लैटिन एवं जर्मन के समान उद्भव के कार्य को प्रशस्त किया तथा सन् 1820 में इन्होंने अपनी अध्ययन परिधि में क्रिया रूपों के अतिरिक्त व्याकरणिक शब्द भेदों को समाहित किया। इनका संस्कृत, ज़ेंद, ग्रीक, लैटिन, लिथुआनियन, प्राचीन स्लाविक, गॉथिक तथा जर्मन भाषाओं के तुलनात्मक व्याकरण का ग्रंथ (1833-1852) प्रकाशित हुआ जिसमें विभिन्न भाषाओं की शब्दगत रचना के आधार पर इनकी आदि भाषा के अस्तित्व के विचार की पुष्टि की गई है। डेनिश भाषी रैज्मस रैस्क ने सन् 1811 में आइसलैंड की भाषा तथा सन् 1814 में प्राचीन नार्स भाषा पर अपने कार्यों में यह प्रतिपादित किया कि भाषा के अध्ययन में शब्दावली से अधिक महत्व स्वन(ध्वनि) एवं व्याकरण का है।

ग्रिम नियमः

रैस्क से प्रभावित होकर जर्मन भाषी जेकब ग्रिम ने अध्ययन परम्परा को आगे बढ़ाया। सन् 1818 से 1837 के बीच इनका जर्मन व्याकरण से संबंधित ग्रंथ चार भागों में प्रकाशित हुआ। इसमें इन्होंने विभिन्न युगों में विवेच्य भाषाओं के शब्दों में होने वाले स्वनिक-परिवर्तन अथवा स्वन-परिवृत्ति के नियमों का प्रतिपादन किया जो ऐतिहासिक भाषाविज्ञान में 'ग्रिम नियम' से जाने जाते हैं। इन नियमों के आधार पर इन्होंने यह निष्कर्ष निकाला कि विभिन्न युगों में भाषाओं में होने वाले स्वन-परिवर्तनों की नियमित प्रक्रिया होती है।

ग्रैसमेन नियमः

जर्मन भाषावैज्ञानिक हेरमन ग्रैसमेन ने 'ग्रिम नियम' के अपवादों को स्पष्ट किया तथा प्राचीन ग्रीक एवं संस्कृत के स्वनिम प्रक्रम की असमानता को 'ग्रैसमेन नियम' से स्पष्ट किया। उनके दो नियम प्रसिद्ध हैं। पहला आदि भारोपीय एवं संस्कृत तथा प्राचीन ग्रीक से संबंधित है। आदि भारोपीय के शब्दों के पहले अक्षर के महाप्राण व्यंजन के बाद यदि दूसरे अक्षर में भी महाप्राण व्यंजन हो तो इन भाषाओं में प्रथम अक्षर का महाप्राण व्यंजन अल्पप्राण में बदल जाता है। दूसरे नियम के अनुसार आदि भारोपीय भाषा के शब्दों में प्रयुक्त 'स्' का ग्रीक में 'ह्' में परिवर्तित होना है; अन्य भाषाओं में यह परिवर्तन नहीं होता। ग्रैसमेन के नियम भी निरपवाद नहीं हैं।

केन्तुम् वर्ग और सतम् वर्ग की भारत-यूरोपीय भाषाएँः

अस्कोली नामक भाषाविज्ञानी ने 1870 ई0 में इन भाषाओं को दो वर्गों में बाँटा। इन भाषाओं की ध्वनियों की तुलना के बाद वह इस निष्कर्ष पर पहुँचा कि आदि भारत-यूरोपीय भाषा की कंठ्य ध्वनियॉ कुछ शाखाओं में कंठ्य ही रह गईं और कुछ में संघर्षी (श स ज़) हो गईं। इस प्रवृत्ति की प्रतिनिधि भाषा के रूप में उसने लातिन और अवेस्ता को लिया और सौ के वाचक शब्दो की सहायता से अपने निष्कर्ष को प्रमाणित किया। लातिन में सौ को केन्तुम् कहते हैं और अवेस्ता में सतम्। इसीलिए उसने केन्तुम् और सतम् वर्गों में समस्त भारत-यूरोपीय भाषाओं को विभाजित किया।

 

सतम्‌ वर्ग                       केन्‍तुम्‌ वर्ग

1 ़ भारतीय - शतम्‌      1 ़ लातिन - केन्‍तुम्‌

2 ़ ईरानी - सतम्‌           2 ़ ग्रीक - हेकातोन

3 ़ बाल्‍तिक - ज़िम्‍तस            3 ़ जर्मेनिक - हुन्‍द

4 ़ स्‍लाविक - स्‍तो               4 ़ केल्‍टिक - केत्‌

5 ़ तोखारी - कन्‍ध

आदि भारत-यूरोपीय भाषा की भाषिक स्थिति :

1.प्राचीन भाषाओं के तुलनात्मक अध्ययन से यह पता चलता है कि आदि भारत-यूरोपीय भाषा संश्लेषात्मक थी।

2. इस भाषा में विभक्ति-प्रत्ययों की बहुलता थी। वाक्य में शब्दों का नहीं अपितु पदों का प्रयोग होता था।

3. मुख्यतः धातुओं से शब्द निष्पन्न होते थे।

4. उपसगरें का सम्भवतः अभाव था। उपसर्गों के बदले पूर्ण शब्दों का प्रयोग होता था जो बाद में घिसते घिसते परिवर्तित हो गए और स्वतन्त्र रूप से प्रयुक्त होने की क्षमता खोकर उपसर्ग कहलाने लगे।

5. इस भाषा में संज्ञा पदों में तीन लिंग - पुंल्लिंग, स्त्रीलिंग, नपुंसकलिंग तथा तीन वचन - एकवचन, द्विववचन, बहुवचन थे।

6. तीन पुरुष थे- उत्तम, मध्यम, अन्य ।

7. आठ कारक थे। बाद में ग्रीक एवं लैटिन में कुछ कारकों की विभक्तियाँ छँट गईं।

8. क्रिया में फल का भोक्ता कौन है इस आधार पर आत्मनेपद और परस्मैपद होते थे। यदि फल का भोक्ता स्वयं है तो आत्मनेपद का प्रयोग होता था और यदि दूसरा है तो परस्मैपद का प्रयोग होता था।

9. क्रिया के रूपों में वर्तमान काल था। क्रिया की निष्पन्नता पूर्ण हुई अथवा नहीं - इसको लेकर सामान्य, असम्पन्न एवं सम्पन्न भेद थे।

10. समास इस भाषा की विशेषता थी।

11. भाषा अनुतानात्मक थी । अनुतान से अर्थ में अन्तर हो जाता था। भाषा संगीतात्मक थी इसलिए उदात्त आदि स्वरों के प्रयोग से अर्थ बोध में सहायता ली जाती थी। वैदिक मंत्र इसके उदाहरण हैं जिनके उच्चारण में उदात्त, अनुदात्त, स्वरित का प्रयोग आवश्यक माना जाता है। प्राचीन ग्रीक में भी स्वरों का उपयोग होता था। बाद में चलकर अनुतान का स्थान बलाघात ने ले लिया।

भारोपीय परिवार की भाषाओं की विशेषताएँः

(1) आरम्भ में इस परिवार की भाषाएँ संश्लेषात्मक थीं किन्तु अब इनमें कई विश्लेषणात्मक हो गई हैं। संस्कृत और हिन्दी के निम्नलिखित रूपों की तुलना से यह बात स्पष्ट हो जाएगीः

संस्कृत                   हिन्दी

देवम्                       देव को

देवेन                         देव से

देवाय                     देव के लिए

देवात्                         देव से

देवस्य                      देव का

देवे                          देव में

(2) शब्दों की रचना उपसर्ग, धातु और प्रत्यय के योग से होती है। आरम्भ में उपसर्ग स्वतंत्र सार्थक शब्द थे किन्तु आगे चलकर वे स्वयं स्वतंत्र रूप से प्रयुक्त होने में असमर्थ हो गए।

(3) वाक्य-रचना शब्दों से नहीं पदों से होती है अर्थात् शब्दों में विभक्तियाँ लगाकर पदों की रूप सिद्धि की जाती है और विभक्तियों के द्वारा ही पदों का पारस्परिक अन्वय सिद्ध होता है। शब्द में विभक्ति लगे बिना वाक्य नहीं बनता।

(4) आदि / आद्य भारत-यूरोपीय भाषा में समास बनाने की जो प्रवृत्ति थी, वह भारत -- यूरोपीय भाषाओं में भी रही।

(5) आदि / आद्य भारत-यूरोपीय भाषा में तथा लैटिन एवं वैदिक संस्कृत आदि में अनुतान की स्थिति मिलती है। बाद में अनुतान का स्थान बलाघात ने ले लिया।

(6) भारत-यूरोपीय परिवार की भाषाओं में प्रत्ययों की अधिकता है।

( 1 .P. Baldi (1983). An Introduction to the Indo-European Languages 2. S. K. Chatterji (2d ed. 1960) Indo-Aryan and Hindi 3. A. M. Ghatage (2d ed. 1960) Historical Linguistics and Indo-Aryan Languages 4. C. P. Masica, The Indo-Aryan Languages (1989))

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प्रोफेसर महावीर सरन जैन

सेवा निवृत्त निदेशक, केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, भारत सरकार

123, हरि एन्कलेव, बुलन्द शहर - 203001

mahavirsaranjain@gmail.com <mailto:mahavirsaranjain@gmail.com>

3 blogger-facebook:

  1. ज्ञान वर्द्धक आलेख.

    उत्तर देंहटाएं
  2. आपकी सम्मति के लिए आभार

    उत्तर देंहटाएं
  3. विस्तृत व ज्ञान वर्धक आलेख ...... इस आलेख के तत्वत भाव से मैं यह कयास लगाता हूँ कि वस्तुतः भारोपीय भाषा ...प्रथम विक्सित 'वैदिक संस्कृति' थी जो मानव के अपने जन्म मूल-स्थान ..भारत से समस्त योरोप एशिया , अफ्रीका, में फ़ैलने व पुनः पुनः आवागमन के साथ यूरेशिया आदि में फ़ैली ....अन्धकार काल के पश्चात नव-जागरण काल में विद्वानों द्वारा ..भारोपीय भाषा कही गयी .....

    उत्तर देंहटाएं

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