रविवार, 28 अप्रैल 2013

सुरेश सर्वेद की कहानी - परिवर्तन

संध्या होते होते अमृतपाल शराब के नशे में चूर हो जाता. कोई दिन ऐसा नहीं गया कि वह बिना शराब पिये घर पहुंचा हो। वह दिन भर रिक्शा खींचता और जो कमाई होती उसे शराब में उड़ा देता.उसकी पत्नी ने समझाने का बहुत प्रयास किया मगर वह असफल रही हार कर उसने समझाना छोड़ दिया. आलम यह था कि कई कई दिनों तक उसके घर चूल्हा नहीं जलता था पूरे परिवार को भूखे सोना पड़ता था. उसकी पत्नी रमशीला बच्चों को समझा - बुझा कर सुला देती थी. शराब के नशे में मदमस्त अमृतपाल आता और घर में धमाचौकड़ी मचाता सो बच्चे नींद से जाग जाते और घर का महाभारत देखते.

अमृतपाल की इस आदत से बच्चे सहम गये थे और स्थिति यहां तक निर्मित होती कि उन्हें भूख रहती पर भूख न लगने की बात कह देते.

आज भी अमृतपाल ने इतनी शराब पी ली थी कि उससे रिक्शे का हेंडिल सम्हाले नहीं जा रहा था मगर वह रिक्शे को ओटे जा रहा था.सड़क सूनी थी वरना दुर्घटना की संभावना बनती ही थी.घर के पास पहुंच कर उसने रिक्शा रोका. डगमगाते पैरों से घर के पास गया.वह कुंडी खटखटाना चाहा कि भीतर से उभर रही आवाज ने उसे क्षण भर के लिए रोक दिया.उसका बड़ा लड़का जीवेश अपनी मां से कह रहा था - मां, बाबू जी कब आयेंगे. जोर से भूख लगी है.आज खाना बनेगा न ?४

- हां - हां, क्यों नहीं ? आते ही होगें तुम्हारे बाबू जी, वे सामान लायेगे. मैं भोजन तैयार करुंगी.तुम सो जाओ. मैं भोजन बनने के बाद तुम्हें उठा लूंगी. ४

मां ने बच्चों का दिल रखना चाहा.

- कल भी तो तुमने यही कहा था, पर नहीं उठाया.मां मुझे कहीं से भी खाना लाकर दो न ? ४ यह था छोटा पुत्र अनय.

- मैं क्या कह रही हूं समझ नहीं आ रहा है क्या ? भूख- भूख - भूख ..... एक दिन नहीं खाओगे तो मर तो नहीं जाओगे....। ४

मां बच्चों पर बिफर पड़ी.बच्चे रोने लगे.अमृतपाल ने कुंडी खटखटा दी.रमशीला ने दरवाजा खोलकर देखा- सामने अमृतपाल खड़ा था. अमृतपाल के आगमन का भान बच्चों को हो गया.वे सहम गये.वे अच्छी तरह जानते थे कि यदि उन्होंने जरा सी भी उजर की तो अमृतपाल उनके साथ मां की पिटाई करेंगे.मगर आज अमृतपाल क ी आत्मा को बच्चों के वाक्यों ने छू लिया था.वह बच्चों की ओर बढ़ा.बच्चे भयभीत सा दिखने लगे.अमृतपाल ने अनय के सिर पर हाथ रखा.लड़खड़ाते शब्दों से कहा - क्यों बेटे, तुम्हें भूख लगी है न.... जोरों की भूख.....? ४

घबराया अनय मां की ओर सरका.अमृतपाल खाट तक आया.उस पर चित्त पड़ गया.कुछ क्षण वह स्वयं बड़बड़ाता रहा.बड़बड़ाते ही उसकी आंख लग गयी.

अर्धरात्रि में ही अमृतपाल की नींद उजड़ गई थी . शराब का नशा उतर चुका था. उसके कानों में बच्चों और पत्नी के वे शब्द फिर से गुंजने लगे.जो उसके आगमन पर उनके द्वारा कह गया था.अमृतपाल अपनी खाट से उतर कर बच्चों तक आया.बच्चें नींद में थे. उनके मासूम चेहरे को देख कर अमृतपाल का प्यार मचलने लगा.बच्चों को उठाकर वह सीने से लगा लेना चाहता था पर ऐसा कर नहीं सका.

सूर्य चढ़ा नहीं था कि अमृतपाल रिक्शा चलाने निकल पड़ा.संध्या होते - होते वह वापस होने लगा.बीच रास्ते में शराब की दूकान पड़ी.हां, यह वही शराब की दूकान थी जहां वह हर दिन दिन भर की कमाई उड़ेल देता था.अमृतपाल आज किसी भी कीमत पर मेहनत की कमाई को शराब में फूंकना नहीं चाहता था.शराब की दूकान के पास पहुंचते - पहुंचते उसकी आत्मा एक बार अवश्य डगमगाई थी.इच्छा हुई थी कि एक पाव खींच ले.मगर उसने शराब की दूकान को ऐसी हिकारत की द्य्ष्टि से देखी मानों उस दूकान ने उसका जीवन बर्बाद कर दिया हो. उसकी सुख - शान्ति छीन ली हो.एक प्रकार से उसे उस दूकान से घृणा सी हो गई.

अमृतपाल ने शराब दूकान के बजाय राशन दूकान के सामने रिक्शा रोका.वहां से जरुरी वस्तुएं खरीदी और अपने घर की ओर चल पड़ा.वह रिक्शा ओटते सोच रहा था - बच्चें जाग रहे होंगे.वे भोजन मांग रहे होंगे और रमशीला उन्हें धैर्य बंधा रही होगी......। इन्हीं विचारों मे खोया वह घर तक पहुंचा.रिक्शा सामने रोक कर उसने कुंडी खटखटायी.रमशीला ने दरवाजा खोला.अमृतपाल भीतर गया. उसने देखा बच्चें नींद में डूबे हैं.

अमृतपाल ने सामान नीचे रखा.कहा - क्या बच्चे बिना खाये सो गये ....? ४

- हां...। ४ रमशीला का संक्षिप्त उत्तर था.वह आश्चर्यचकित थी कि आज अमृतपाल के मुंह से शराब की दुर्गंध कैसे नहीं आ रही है.रमशीला ने अमृतपाल द्वारा लाये थैले को खोल कर देखा.उसमें चांवल दाल और सब्जियां थीं.अमृतपाल ने कहा - चलो, जल्दी भोजन तैयार करो...। ४

रमशीला भोजन तैयार करने जुट गयी.अमृतपाल बच्चों के पास आया तो बच्चें गहरी नींद में थे.उससे रहा नहीं गया.वह बच्चों के सिर पर हाथ फेरने लगा.स्पर्श से बच्चों की नींद टूट गई.सामने अमृतपाल को देख वे घबरा गये.अमृतपाल ने छोटे पुत्र अनय को गोद में उठा लिया.देवेश सहमकर उठ बैठा था.अमृतपाल ने अनय के सिर पर स्नेह से हाथ फेरते हुए कहा - आज के भोजन में बड़ा मजा आयेगा ,क्यों बेटा आयेगा न....? ४

अनय चुप रहा.अमृतपाल ने जीवेश के सिर पर हाथ फेरा.कहा - क्यों जीवेश, जोर की भूख लगी है न ? ४

- नहीं , हमें भूख नहीं है. एक दिन नहीं खाने से आदमी मर नहीं जाता.४

जीवेश के शब्द से अमृतपाल दहल गया.कहा - नहीं बेटे, ऐसा नहीं कहते...? ४

भोजन तैयार हो चुका था.सब्जी की सुगंध बच्चों के नाक को तर गयी थी.भूख से उनकी लार टपक पड़ी.रमशीला ने भोजन परोसा.बच्चे भोजन पर ऐसे टूटे मानो बरसों बाद उन्हें स्वादिष्ट भोजन करने को मिला हो और शायद भविष्य में कभी नहीं मिलेगा.अमृतपाल को लगा कि वह अब तक गलत राह पर था.घर में कलह उसके कारण ही उत्पन्न हुई थी.उसने मन ही मन द्य्ढ़ निश्चय किया कि अब कभी वह शराब को हाथ भी नहीं लगायेगा.घर में दरिद्रता प्रवेश करने नहीं देगा..... कभी नहीं.....।

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साईं मंदिर के पीछे,

वार्ड नं. 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव - छग

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