मंगलवार, 2 अप्रैल 2013

एस. के. पाण्डेय की लघुकथा - बुराई

बुराई

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रजनी ने राजीव से कहा कि जब देखो तब तुम हमारी बुराई ही करते रहते हो कभी प्रशंसा नहीं करते। राजीव बोला यह तुम्हारा भ्रम है। मैं तुम्हारी बुराई क्यों करूँगा ? सत्य और बुराई में अंतर होता है। तुम सत्य को पहचानने लगोगी तो तुम्हें ऐसा बिल्कुल नहीं लगेगा कि मैं तुम्हारी बुराई करता हूँ।

रजनी बोली औरत बहुत मूर्ख होती है। उसके रूप और उसकी रसोई की प्रशंसा कर दिया जाय तो वह इतने में ही खुश हो जाती है। उसे बहुत कुछ मिल जाता है। लेकिन तुमसे इतना भी नहीं होता। बुराई देखने की तुम्हारी आदत हो गई है।

राजीव रजनी को समझाते हुए बोला कि कल दाल में नमक कम हो गया था तो जब तुमने पूछा कि खाना कैसा बना है तो हमने कह दिया कि दाल में नमक कम है। और आज जब तुमने पूछा कि खाना कैसा है तो हमने बता दिया कि दाल में नमक ज्यादा हो गया है। अभी तुम खाओगी तो तुम्हें भी लगेगा कि नमक ज्यादा है। यह सत्य है, बुराई नहीं है।

रजनी बोली मैं कुछ भी बना कर रख दूँ तुम कुछ न कुछ कमी निकाल देते हो। सारी मेहनत पर पानी फेर देते हो। भोजन बनाने को मेरा मन ही नहीं करता। राजीव ने भोजन छोड़ दिया और बोला तुम समझती क्यों नहीं हो कि मैं कमी नहीं निकाल रहा हूँ। यह बुराई नहीं है।

राजीव रसोई से बाहर जाने लगा। जाते-जाते उसने सुना रजनी कह रही थी यह बुराई नहीं तो और क्या है ?

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डॉ. एस. के. पाण्डेय,

समशापुर (उ.प्र.)।
ब्लॉग: श्रीराम प्रभु कृपा: मानो या न मानो

URL1: http://sites.google.com/site/skpvinyavali/

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