सोमवार, 15 अप्रैल 2013

गिरिराज भण्डारी की ग़ज़लें

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( 1 )

हमारे नाम की भी रौशनी कहीं पर है

हमारे नाम की भी रौशनी कहीं पर है

तल्ख़ि ए ज़िन्दगी में चाशनी कहीं पर है

लाख छाये रहे अब्र आसमाँ में , मगर

मैं खोज लूंगा, छिपी चांदनी कहीं पर है

मिले हैं यूँ तो रोज़ दोस्त की तरह,लेकिन

छिपी नीयत में अभी दुश्मनी कहीं पर है

पता लिखायें क्या ? पूछते जो हैं हमसे

दिन कहीं, और रात,  काटनी कहीं पर है

ये खुशी मैं जो पिटारे में ले के आया हूँ

कोई  मेरी नहीं ,सब बांटनी कहीं पर है

बहुत उदासियाँ बांटो न अपने गीतों से

वहीं सुरों में, सुख की रागिनी कहीं पर है

हमेशा खींच तान चादरों में करते रहे

इधर खुल्ली किये, कि ढापनी कहीं पर है

 

 

( 2 )

सामने पूरब के शर्मीली हुई

-----------------------------

ज़ुबां ठोकरों से नुकीली हुई

बोले ही थे कि बज़्म ज़हरीली हुई

सूरतें जो सुबह थी खिलती हुई

शाम आते आते वो पीली हुई

खर्च कमरबन्द का भी जोड लें

महंगाई से पैंट सब ढीली हुई

आप,वतन की सोचते हैं इसलिये

आपकी राहें भी पथरीली हुई

जेब तक तो हाथ पहुंचे ही नही

आंख जाने किस तरह गीली हुई

कार्यवाही मे कहां परिणित हुई

भावनायें लगती हैं सीली हुई

रात गरीबों के लिये ठंड थी

धूप दोपहर की चिलचिली हुई

सूरतें मिले न मिले आपकी

सीरतें लेकिन लगी मिली हुई

पच्छिमी सभ्यता कुछ सोच के

सामने पूरब के शर्मीली हुई

*************

 

 

( 3 )

हमारे संस्कार रोक लेते हैं

************************

हादसे हों तो चौंक लेते हैं

मन मे कुछ दिन का शोक लेते हैं

आप ही भौंकिये कुत्तों की तरह

आप अच्छा जो भौंक लेते हैं

गालियां देना कुछ मुश्किल तो नहीं

हमारे संस्कार रोक लेते हैं

माने न माने ये मर्ज़ी उनकी

गलत दिखे तो टोक लेते हैं

ज़ख्म कितने हैं मत गिनो,हम तो

जो भी लेते हैं, थोक लेते हैं

क्या करें,बस मे हमारे क्या है

चलो सब माथा ठोक लेते हैं

अपने गुस्से को उलीचें तो सही

चलो पत्थर ही फेंक लेते हैं

********

 

 

( 4 )

तो पूरा हो बह लें

*************

आओ कुछ कर लें,

या तो हम सह लें।

मन भारी है तो

थोड़ा कुछ कह लें।

काम कुछ बाकी है,

कुछ दिन तो रह लें।

अंजुरी जितनी है,

उतनी ही गह लें ।

अन्दर कुछ पिघले,

तो पूरा हो बह लें।

दुनिया को छोड़े,

दिल में जगह लें।

पंगा फिर पंगा है,

जिस भी तरह लें।

अधूरी नही अब

पूरी फतह लें

*************

गिरिराज भण्डारी

5 blogger-facebook:

  1. गिरिराज जी, बहुत सुंदर ग़जल लगी |

    उत्तर देंहटाएं
  2. गिरिराज जी,
    बहुत अच्छी गज़ल लगी| अंतिम गज़ल की अंतिम पंक्ति बहुत बढ़िया लगी |

    ज़ख्म कितने हैं मत गिनो,हम तो

    जो भी लेते हैं, थोक लेते हैं
    ------
    अधूरी नही अब

    पूरी फतह लें

    धन्यवाद जी

    उत्तर देंहटाएं
  3. धन्यवाद, उमेश भाई ।

    उत्तर देंहटाएं

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