बुधवार, 24 अप्रैल 2013

सुरेश सर्वेद की कहानी - बिना शीर्षक

नवजात शिशु के जन्म लेने के साथ ही परिवार में उसके नामकरण को लेकर तरह - तरह के नाम सुझाये जाते हैं। अंत में निर्णय होता है और नवजात शिशु के नाम को अंतिम रूप दे दिया जाता है। खिलावन के यहां भी नवजात शिशु ने जन्म लिया। पहले जिज्ञासा जागी कि वह लड़का है या लड़की। जब लोगों को ज्ञात हो गया कि नवजात शिशु लड़का है तो उसके नाम क्या रखा जाए इस पर चर्चा चल पड़ी। सबने अपनी - अपनी ओर से नाम सुझाये। किसी ने कुछ कहा तो किसी ने कुछ। अंतत: निर्णय हुआ कि नवजात शिशु का जन्म बुधवार को हुआ है तो उसका नाम क्यों न बुधराम रख दिया जाए। इस पर एक राय बनी और उस नवजात शिशु का नाम बुधराम रख दिया गया।

बुधराम अभी पांच बरस का नहीं हुआ था कि उसके नाम के साथ खिलवाड़ होना शुरू हो गया। उसके अच्छे - खासे नाम को बिगाड़ दिया गया। अब वह बुधराम की जगह बुद्धु के नाम से पुकारा जाने लगा। बुद्धु उर्फ बुधराम बचपन से शांत स्वभाव का व्यक्ति निकला। बुद्धु की न किसी से दुश्मनी थी और न ही किसी से बहुत अधिक दोस्ती। जब बुधराम के नाम को बिगाड़ कर बुद्धु संबोधित किया जाने लगा तब बुधराम को जरा भी दुख नहीं हुआ और न कभी किसी से गिला - सिकवा किया। उसके नाम में परिवर्तन आ जाने से उसके आदत - व्यवहार में तो परिवर्तन नहीं आ गया था। उसकी शक्ल - सूरत वही थी। उसमें शारीरिक परिवर्तन भी नहीं आया।

नाम को संक्षिप्त रूप देने का उसे जरा भी पीड़ा नहीं थी। पीड़ा थी तो इस बात की कि उसका जन्म ऐसे परिवार में क्यों हुआ जहां बचपन से लेकर बूढ़ापे तक छोटे वर्ग होने का ढप्पा लगा रहे। वह व्यवहार कुशल था। कभी किसी को पीड़ा पहुंचाने का साहस नहीं किया। यदि शुरू से उसमें यह अवगुण आता तो कम से कम उसके नाम बिगाडऩे का साहस तो कोई नहीं कर पाता। उसे कभी - कभी पीड़ा होती कि अच्छे खासे नामधारी लोग सभ्य कहलाने का दंभ तो भरते हैं मगर उससे घृणित व्यक्ति कोई दिखता ही नहीं। सभ्य होने का लिबास ओढ़ कर मानवता को विस्मृत कर गये हैं। कई बार बुधराम ने भी अपने स्वभाव में परिवर्तन लाने का विचार किया पर वह सफल नहीं हो सका। बचपन से जिस स्वभाव को उसने ग्रहण किया था उसे पृथक करने का साहस नहीं कर पा रहा था बुधराम। नासमझ भी अपने को समझदार समझते और बुधराम के बहुत अच्छे विचारों को भी हंसी में उड़ा देते। बुधराम में इतनी समझ तो थी ही कि जो व्यक्ति स्वयं को समझदार समझ कर डिंग हॉक रहा है वह किस स्तर के विचार का व्यक्ति है। उसमें कितनी वैचारिक शक्ति है। पीडि़त को प्रताडि़त करना और असहाय को उपेक्षित करना कितना उचित है यह विचारणीय तथ्य है।

बुद्धु में एक आदत थी - वह सब जान समझकर भी अनजान बना रहता। अनजान बने रहने में ही उसकी भलाई थी। उसने न कभी किसी के सामने अपनी बड़ाई हाकी न ही अपने आपको होशियार होने का दावा पेश किया। लोग नाम के अनुरूप उसे बुद्धु ही समझते थे, एकदम नासमझ। उससे जो जैसा चाहता व्यवहार करता। अभद्र व्यवहार का भी वह प्रतिकार नहीं करता था। उसकी आदत में यह सब सुमार हो चुका था। उसके जीवन की यदि कोई पीड़ा थी तो वह अंजलि की पीड़ा। वही अंजलि जो भरी जवानी में विधवा हो गयी। उसने अपनी आँखों के सामने अंजलि को खेलती बढ़ती, ब्याहती, गौना जाते देखा था। वह अब भी उस अंजलि को नहीं भूल पाया था जिसने बचपने में चोरी छिपे उसे कुछ न कुछ खाने को लाकर दे देती थी और हंसकर भाग जाती थी। अंजलि और बुद्धु का ऐसा एक भी दिन नहीं जाता था जब उनकी मुलाकांत नहीं होती रही हो। समय का तगाजा आया और अंजलि बचपने से युवास्वथा की ओर कदम रखने लगी। अंजलि की बढ़ती उम्र के साथ उस पर प्रतिबंध का भी शिकंजा कसना शुरू हो गया। अब उसके माता - पिता को यह कतई पसंद नहीं था कि अंजलि की मुलाकात बुद्धु से हो पर दुनियादारी से अनभिज्ञ अंजलि बुद्धु से मिलती रही और उनकी मित्रता में किसी भी प्रकार से दुराव नहीं आया।

बुद्धु उर्फ बुधराम उस मेले को भी अब तक नहीं भूल पाया है जहां दोनों पहुंचकर झूला, झूला करते थे। मेले में घूम - घूम कर खिलौने खरीदते। जो मन में आता खाते और संध्या होतेे - होते अपने - अपने घर पहुंच जाते। यह तो थी बचपन की बात। तब अंजलि की कोई सहेली नहीं थी पर समय के साथ सहेलियाँ भी बनने लगी और अब वह सहेलियों के साथ मेले जाने लगी। एक बार वह मेले में चूडिय़ाँ खरीद रही थी कि बुधराम आ धमका। बुधराम ने कहा - अंजलि, तुम्हारी कलाई में हरी - हरी चूडिय़ाँ खूब जमेगी ....। ज्ज्

- सुना अंजलि, तुम्हारे बुद्धु की बात ? यह तुम्हारे मन की बात जानता है ....।

एक सहेली ने कहा और खिलखिलाकर हंस पड़ी। तब अंजलि ने झेपते हुए कहा था - बुद्धु मेरे बचपन का मित्र है। वह मेरी पसंद नापसंद जानेगा ही।

अंजलि की इस बात पर बुद्धु को गर्व हुआ था। उसका सीना तन गया था। उसे अंजलि का ऐसा कहना अच्छा ही नहीं, बल्कि बहुत ही अच्छा लगा था। तब बुद्धु ने कहा था - अब तो अंजलि ब्याह कर चली जायेगी, तुम लोगों को दूसरी सहेलियाँ मिल जायेंगी पर मैं तो अंजलि के ससुराल जाने के बाद सब कुछ खो दूंगा, अकेला रह जाऊंगा न ...। ज्ज्

- अंजलि का बस चले तो वह तेरे नाम की चूडिय़ाँ पहन ले पर क्या करे बेचारी ...। ज्ज् एक सहेली ने कहा और सभी सहेलियाँ हंस पड़ी।

बुद्धु को बुरा लगा। उसने कहा - तुम लोग ऐसी बात करके हमें हंसंी का पात्र बनाना चाहती हो यह ठीक नहीं ....।

इस पर अंजलि ने कहा - ठीक ही तो कह रही है मेरी सहेलियाँ ...।

इतना कहकर अंजलि सहेलियों के साथ वहां से खिसक ली। एक क्षण तो बुद्धु को समझ ही नहीं आया कि अंजलि सच कह गयी या मजाक। उसे तो बस इतना समझ आया था कि अंजलि को भी हरी - हरी चूडिय़ाँ पसंद है। उसने दर्जन भर हरी - हरी चूडिय़ाँ खरीद लिया। रास्ते भर वह खुश था। उसके मन में कोई पाप तो था नहीं अपितु उसे खुशी थी कि वह अंजलि के पसंद की चीज ले जा रहा है और चूडिय़ों को देखकर अंजलि फूली नहीं समायेगी। वह चूडिय़ाँ लेकर अंजलि के घर जा धमका। सामने अंजलि मिल गयी। उसने चूडिय़ाँ निकाली कहा - लाओ अंजलि, हाथ बढ़ाओ, मैं तुम्हारी पसंद की चूडिय़ाँ खरीद लाया हूं। तुम्हारी कलाइयों में डाल देता हूं ....।ज्ज्

चूडिय़ाँ अभी खनकी नहीं थी। बुद्धु की आवाज घर के भीतर बैठे अंजलि के पिता के कान से जा टकरायी। वे तडफ़ड़ा गये। क्षण भर गंवाये बगैर वे उस दिशा को दौड़े जहां से बुद्धु की आवाज उभर रही थी। बुद्धु अंजलि की कलाई में चूडिय़ाँ चढ़ाने ही वाला था कि अंजलि के पिता दीनानाथ वहां पहुंच गये। बुद्धु को दूर धकेलते हुए उन्होंने कहा - नासमझ बन मेरे घर डांका डालना चाहता है .....। ज्ज् और उन्होंने दो - तीन तमाचे बुद्धु के गाल में जड़ दिए। बुद्धु को कुछ समझ नहीं आया। दीनानाथ ने आगे कहा - अब कभी अंजलि के आसपास भी दिखा तो तेरे हाथ - पैर तोड़ दूंगा ...।

और दीनानाथ अंजलि को ढकेलते हुए भीतर ले गया। बुद्धु को कुछ समझ नहीं आया था। वह मार खाकर, चूडिय़ाँ को सम्हालकर चुपचाप अंजलि के घर से निकल गया। फिर उस दिन के बाद से उसने कभी अंजलि के घर की ओर देखने की हिम्मत नहीं की। उसने अंजलि की सगाई होने, ब्याह होने और गौना होने की खबरें किसी के मुंह से सुनीं। इसी बीच उसने अंजलि के पिता के बीमार होने और उनकी मृत्यु होने की भी खबर सुनी पर उसे कोई फर्क नहीं पड़ा। उसे एक जबर्दस्त झटका उस दिन लगा जब किसी ने बताया कि अंजलि के पति का निधन हो गया और अंजलि विधवा हो गयी। उस दिन जो पीड़ा बुद्धु को हुई थी ऐसी पीड़ा उसने कभी महसूस नहीं किया था। उसके नाम को संक्षिप्त किया तब भी उसे यह पीड़ा नहीं हुई थी। उसने एक दिन सुना कि अंजलि अब गांव आ गयी है और अब वह मायका में ही रहेगी अपने भाई - भाभी के साथ।

अंजलि जब बच्ची थी तभी उसकी माता चल बसी थी। अब उसके पास भाई - भाभी के पास सिर छिपाने के अलावा कोई चारा नहीं था। अंजलि के भाई तो बहन को चाहता था पर भाभी उसे पसंद नहीं करती थी। अंजलि के सामने पूरा जीवन पड़ा था और वह दिन सरकने के साथ समझने लगी थी कि वह पीडि़त जीवन ही व्यतीत करेगी। भाभी की तानें सुनकर भी वह चुप रहती। कभी किसी के सामने यह प्रदर्शित करने का प्रयास ही नहीं किया कि वह कितनी पीडि़त है। उसने तो सदैव सबके सामने यह बताने का ही प्रयास किया कि उससे सुखी इस दुनियाँ में और कोई है ही नहीं। पर सच्चाई चार दीवारी में कैद करने से कैद हो सकती है ? धीरे - धीरे अंजलि पर हो रहे अत्याचार एक कान से दूसरे कान तक पहुंचने लगा। यह तो गॉंव था। एक न एक दिन खबर बुद्धु तक पहुंचनी ही थी। बुद्धु ने सुना तो पीड़ा से तड़प उठा। वह कर भी क्या सकता था। अंजलि की घूंटन भरी जिंदगी की कहानी बुद्धु के मन में अंजलि के प्रति सहानुभूति जागृत करती चली गयी। एक बार और सिर्फ एक बार वह अंजलि से मिलना चाहता था। बचपन का अपनापन उसे अंजलि की ओर खींचने बाध्य कर रहा था पर लोक लाज के भय के कारण वह चाह कर भी अंजलि से नहीं मिल पा रहा था।

उस दिन सुहागन महिलाएं वट सावित्री उपवास थी। वे पूजा करने मंदिर जा रही थी। बुद्धु सुहागन महिलाओं को देखते खड़ा था। अचानक दो महिलाएं चर्चा कर रही थी उधर ही बुद्धु का ध्यान गया। एक महिला ने कहा - लो देखो, कैसे सज - संवर कर आ रही है, अंजलि। पति के मरने का जरा भी पीड़ा नहीं।

दूसरी महिला ने कहा - मैं तो कहती हूं बहना, किसी शुभ कार्य पर जाते वक्त ऐसी बदनसीबों का दर्शन ही न हो, ऐसे लोगों का मुंह देखकर जाना भी पाप है पाप। बनते काम बिगड़ जाता है।

- हां बहन हां, एक साल भी तो नहीं रही और खा गयी अच्छे साखे जवान पति को ...।

बुद्धु ने देखा - अंजलि को उस दिन बहुत दिनों बाद। महिलाओं की आवाज अंजलि तक पहुंच चुकी थी। वह पीडि़त हो गयी। मगर जितनी पीड़ा अंजलि को हुई थी उससे कहीं अधिक पीड़ा बुद्धु को हुई थी। अंजलि सब सुनकर भी चुपचाप आगे बढऩे लगी। तभी पहली महिला ने कहा - ऐसी ही महिलाओं को कुलक्षणी कहा जाता है। ऐसी महिलाओं के कदम जहां भी पड़े , समझो उस घर की बर्बादी शुरू ...।

अब अंजलि के लिए असहनीय हो गया। वह उल्टे पांव अपने घर की ओर दौड़ पड़ी। एक क्षण तो बुद्धु को कुछ समझ नहीं आया कि वह करे तो करे क्या, पर दूसरे ही क्षण वह अपने घर गया। उसने उन चूडिय़ों को सहेज कर रखा था जिन्हें उसने मेला में अंजलि के लिए खरीदा था। उन चूडिय़ों के साथ चुटकी भर सिंदूर लेकर अंजलि के घर जा पहुंचा। अंजलि सिर झुकाकर रो रही थी। बुद्धु ने उसकी सूनी मांग में सिंदूर भर दिया। किसी के स्पर्श पाकर अंजलि हड़बड़ा गयी। सामने बुद्धु को देखकर वह और भी हड़बड़ा गयी। बुद्धु ने उसके हाथ को पकड़ उसकी कलाईयों में चूडिय़ाँ डाल दी। बुद्धु के इस कृत्य को दूर खड़ा अंजलि के भाई देख रहा था। वह उन दोनों के पास आया तब तक और कई लोग वहां पहुंच चुके थे। वे दोनों महिलाएं भी वहां पहुंच चुकी थी जिनने उसे ताने दिये थे। सामने अपने भइया को देखकर अंजलि डर के मारे कांपने लगी। बुद्धु चुपचाप शांत खड़ा रहा। अंजलि ने कांपती आवाज से कहा - भइया, मुझे मालूम नहीं था, बुद्धु ऐसा करेगा ...।

बहन को एक बार फिर से सुहागन देखकर उसके भाई का मन गदगद हो गया। उसने अंजलि से कुछ न कह कर बुद्धु की ओर आशा भरी स्नेह की नजर डाली। बुद्धु को उसकी आँखों की भाषा पढऩे में देर न लगी। उसने अंजलि के हाथ को थामा और उसे अपने घर की ओर ले चला। सारा गाँव नजारा देखता ही रह गया ....

सुरेश सर्वेद

साईं मंदिर के पीछे, वार्ड नं 16,

तुलसीपुर, राजनांदगांव

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