मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

भारती पंडित की कहानी - गुरु दक्षिणा

भारती पंडित 

कहानी :                                     गुरु दक्षिणा

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    "अरे मास्टरजी... आप?  आइए.. आइए.." इतने वर्षों के बाद मास्टरजी को अचानक अपने सामने पा कर मैं चौंक ही गया था | मास्टरजी... कहने को तो गाँव के जरा से मिडिल स्कूल के हेडमास्टर.. मगर मेरे आदर्श शिक्षक ,जिनकी सहायता और मार्गदर्शन  की बदौलत ही उन्नति की अनगिनत सीढियां चढ़कर मैं इस पद पर आसीन हो पाया था | बीस साल पहले की स्मृतियाँ अचानक लहराने लगी थी आँखों के सामने... तब और अब में कैसा जमीन -आसमान का फर्क था... कल का दबंग-कसरती शरीर अब जर्जर - झुर्रीदार हो चला था | आँखों पर मोटे फ्रेम की ऐनक, हाथ में लाठी जो उनके पांवों के कंपन को रोकने में लगभग असफल थी | मैली सी धोती, उस पर लगे असंख्य पैबंद छुपाने को ओढी गई सस्ती सी शाल... मेरा मन द्रवित हो गया था | भाव अभिभूत होकर मैंने मास्टर जी के पाँव छू लिए | मास्टर जी के साथ आए दोनों व्यक्ति चकित थे.. मुझ जैसे बड़े अधिकारी को मास्टर जी के पाँव छूते देख और साथ ही एक अनोखी चमक आ गई  थी उनके मुख पर  कि  मास्टर जी को साथ लाकर उन्होंने गलती नहीं की है | मास्टर जी के चेहरे पर विवशता लहराने लगी थी , जैसे मेरा पाँव छूना उन्हें अपराध बोध से ग्रस्त किए दे रहा हो |

            "कहिए , मैं आपके लिए क्या कर सकता हूँ? " क्या आदेश है मेरे लिए? " अपने चपरासी को चाय- नाश्ते का आर्डर देकर मैं उनसे मुखातिब हुआ |

"जी.., वो कल आपसे बात हुई थी ना..." मास्टर जी के साथ आए व्यक्ति ने मुझे याद दिलाया .." ये रविंदर है, मास्टर जी का पोता .. इसी की नौकरी के सिलसिले में ...

             मुझे अचानक याद आ गया था | यह व्यक्ति दो- तीन महीने से मेरे विभाग के चक्कर काट रहा  था | मेरे विभाग से संबंधित पदों की भर्ती के लिए परीक्षा आयोजित की गई  थी | इस व्यक्ति का बेटा रविंदर भी उस परीक्षा में सम्मिलित हुआ था और अब वह चाहता था कि कैसे भी करके इसके बेटे को नियुक्ति मिल जाये | मैंने रविंदर का रिकॉर्ड जांचा था, अंक काफी कम थे ... मैंने उन्हें समझाया थी कि मैं उसूलों का पक्का अधिकारी हूँ, योग्य व्यक्ति  को ही नियुक्ति दूंगा | अब पता नहीं कहाँ से उन्हें ये मालूम हो गया था कि मैं मास्टरजी की बहुत इज्ज़त करता हूँ..... सचमुच ताड़ने वाले क़यामत की नज़र रखते हैं | उनके साथ मास्टर जी का आना मेरी समझ में आ गया था | हालात आदमी को कितना विवश बना देते है... यहीं मास्टर जी जो एक ज़माने में उसूलों के पक्के थे... हमेशा कहते थे, " अपने काम को इतनी निपुणता से करो कि सामने वाले को तुम्हें गलत साबित करने का मौका ही न मिल पाए" .... उन्हीं के उसूल तो मैंने अपनी जिन्दगी में उतर लिए थे और.. आज वे ही मास्टर जी मेरे सामने खड़े थे ,, एक अदनी सी नौकरी के लिए सिफारिश लेकर ? अचानक मेरे मन में मास्टर जी के लिए इज्ज़त का पलड़ा जरा सा हल्का हो गया |

                       "ठीक है, मैं ध्यान रखूंगा... वैसे भी मास्टर जी साथ आए है , तो और कुछ कहने की जरुरत है ही नहीं .." मेरे शब्दों  में न चाहते हुए भी व्यंग्य का पुट उभर आया था  जिसे मास्टर जी ने  समझ लिया था और उनकी हालत और भी दयनीय हो गए थी, इसके विपरीत उनके साथ आए दोनों व्यक्तियों ने ' काम हो गया ' इस आशा में ' ही.. ही.. ही.' करके खीसें निपोर दी थी | चाय - नाश्ते के बाद वे विदा होने लगे तो मैंने अपना कार्ड निकाल कर मास्टर जी के हाथ में थमा दिया .." अभी शहर में है, तो घर जरूर आइए मास्टर जी " 

         मास्टर जी ने कांपते हाथों से कार्ड थाम लिया था | उनके  जाने के बाद मैं बड़ा अस्वस्थ महसूस करता रहा | घर जाकर पत्नी से भी इस बात का जिक्र किया मगर मेरे अंदर जो कुछ टूटा था ,उसकी चटक वह भी नहीं सुन पाई थी | सहज होने की कोशिश में एक पत्रिका उलटने  लगा कि दरबान ने आकर बताया , " साहब, कोई  आपसे मिलने आये हैं |"

" उन्हें ड्राइंग रूम में बिठाओ , मैं आता हूँ " कहकर मैं हाउस कोट पहनकर बाहर आया .. एक  आश्चर्य मिश्रित धचका सा लगा.. "अरे मास्टर जी , आप? आइए ना.. " 

             "  नहीं बेटा , ज्यादा वक्त नहीं लूंगा तुम्हारा " मास्टर जी की आवाज में कम्पन मौजूद था | "सुबह उन लोगों के साथ मुझे देखकर तुम्हारे दिल पर क्या गुज़री होगी, मैं समझ सकता हूँ | मेरे ही द्वारा दी गई शिक्षा को मैं ही झुठलाने लगूं तो यह सचमुच गुनाह है बेटा,, पर क्या करता , मजबूरी बांध लाई मेरे पैर यहाँ तक .... रविंदर का बाप मेरा दूर रिश्ते का भतीजा  है | मेरे बच्चों ने आलस - आवारगी में सारे जमीन- जायदाद गँवा दी | मेरे अकेले की पेंशन पर क्या घर चलता ? उस पर पत्नी की बीमारी.. ढेरों रुपये का कर्जादार हो गया मैं ... मकान भी गिरवी पडा है | ब्याज देने के तो पैसे नहीं, असल कहाँ से देता ? तभी रविंदर का बाप बोला कि यदि उसका जरा सा काम कर दूं तो मेरा मकान छुडा देगा ... कम से कम रहने का ठौर हो जायेगा, यहीं लालच यहाँ खींच लाया बेटा ...पर तुम्हें देखकर मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ | कुछ मसले ऐसे होते हैं जो समझौते के लायक नहीं होते | उनकी गरिमा कायम रहनी ही चाहिए | बेटा, तुम रविंदर को मेरे कहने से नौकरी मत देना | अगर ठीक समझो, तभी उसे रखना |" कहकर मास्टर जी बाहर को चल पड़े थे.. मैं बुत बना खड़ा रह गया था |

       मेरा मन द्रवित हो गया था... मास्टरजी की अन्तर्दशा और बहिर्दशा दोनों पर....  रविंदर को नौकरी देने या न देने के मसाले पर तो मैंने विचार नहीं किया था मगर मास्टर जी की गुरु दक्षिणा चुकाने का उपाय मैंने सोच लिया था .. उनके लड़कों को किसी रोजगार योजना के अंतर्गत किसी धंधे में लगवाकर उनके पेट की व्यवस्था कर सकता हूँ मैं ... फिर शायद मास्टर जी को ऐसी ग्लानि का सामना न करना पड़े... और मेरे जैसे किसी शिष्य को भी अपने आदर्श शिक्षक को ऐसी दयनीय स्थिति में न देखना पड़े....

कविता

कल रात फिर एक सुसाइड नोट 

न्यूज पेपर की हेडिंग बन गया 

एक मासूम बच्चा

अनचाही मौत मर गया 

हर  तरफ था बस एक ही सवाल 

उससे ऐसे कदम की नहीं थी आस 

वो था होनहार समझदार बड़ा 

फिर कैसे मौत के द्वार हुआ जा खडा 

रुदन विलाप सवाल अनवरत 

सत्य खुलता परत दर परत                         

हर सवाल का जवाब बस यही 

असफलता का सामना कर सका नहीं 

दीवारें बोल सकती तो कर देती बयां 

कि  उसे दिया गया सपनों  का अनंत आसमान 

उड़ न सका तो बेचारा डर गया

वो मासूम माता-पिता की अपेक्षाओं की बलि चढ़ गया 

--

भारती पंडित 

ए.बी. रोड , इंदौर

 

--

(चित्र - जितेन्द्र वेगड़, इंदौर की कलाकृति)

2 blogger-facebook:

  1. उसे दिया गया सपनों का अनंत आसमान

    उड़ न सका तो बेचारा डर गया

    वो मासूम माता-पिता की अपेक्षाओं की बलि चढ़ गया

    --

    paristhitiyon ka kavita ke roop me sahi chitran par kai bar kuch aur bhi factor kaam karta hai .......

    उत्तर देंहटाएं
  2. टपक गया आँख से पानी ....पढ़ते ही ये कहानी ...सचमें, सच और ईमानदारी के रास्ते पर चलने का मज़ा ही कुछ अलग है ...कही भी नज़र झुकने का कोई खौफ नहीं ,

    उत्तर देंहटाएं

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