रविवार, 21 अप्रैल 2013

डाक्टर चंद जैन "अंकुर " की कविताएँ

माँ का श्रृंगार
जब धरती की छाती सूख  गये  हो
जल की बूंदे बादल से रूठ गये  हो
बादल  नभ से कही दूर ठहर गये
जब किसान की आंखे बरसे ओंठ पिये आंसू
मानवतन  कंकाल बने मन दर्द का दावानल
तब कोई गीत लिखे ,श्रृंगार लिखे
सूखे बादल लगे ,घने केशराशि प्रेयसी के
बोझिल अम्बर लगे ,गहरे नीले नयनों का दर्पण
रात अमावस लगे पूर्णिमा ,पूनम की चाँद प्रेयसी
वो कवी नहीं पागल प्रेमी है, ये रस श्रृंगार नहीं
तब कोई गीत लिखे धरती का और करे हिमगिरी से द्वंदयुद्ध
बजे डम डम  डमरू महादेव ,हर शब्द बनें भागीरथी प्रेरणा
बन गंगाधर  का जटाशीश,बन जा धनुर्धर एकलव्य सा
गांडीव भरे टंकार ,और नभ में हो दावानल
तब आग बने जल की बूंदे ,और बूंद बूंद बरखा बनकर
और उमड़ घुमड़़ सावन बरसे ,धरती माँ की प्यास बुझे
कोयल कूके हर मधुबन में ,हर जीवन में खुशियाँ  चहके
दाने दाने " अंकुर" फूटे ,हर खेतों में सोना चमके
ये है कवि तेरा सच्चा श्रृंगार ,करता है कर नमस्कार ।
                 

--

शहनशाह हो गये

इन काँटों को क्या छू लिया गुलाब हो गये

शोला थे अब हम आब हो गये

वीरान थे ख्वाबों के शहर में आ गये

न जाने क्या ढूंढ़ते थे और क्या पा गये

जख्म से भरे थे मरहम मिल गया

अश्कों की नदी आँचल में थम गया

भटकते थे अब एक आसरा मिला

तूफां से घिरे थे खामोश हो गये

आग थी दुनिया मेरी गुलिस्तान हो गये

इन काँटों को क्या छू लिया गुलाब हो गये

चाँदी ने चाहा हमसे प्यार करेंगे

सोने ने पुकारा क्यूँ कहाँ चल दिये

आ पास आ हम हीरे जड़े हुये

पर ये सब शख्स थे कीमत लिखे हुये

चाहत थी मेरी इससे भी कीमती

“अंकुर” ने लिख दिया पत्थर के स्याह से

माँ मिली सबकुछ मिला हम शहनशाह हो गये

इन काँटों को क्या छू लिया गुलाब हो गये

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डाक्टर चंद जैन "अंकुर "
                   रायपुर छ ग
                mob 9826116946

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