मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

पद्मा मिश्रा की कहानी - वंशबेल

-वंशबेल --

इंदु भाभी आज बहुत खुश दिखाई दे रही थीं ,सुबह से उनके शांत एवं सुन्दर मुखमंडल पर छाई उदासी की प्रेतछाया ने पूरे घर को ग्रस लिया था. पिछले कुछ दिनों तक तो पूरा परिवार खुशियों में झूमता रहा था ,-घर का वारिस जो आने वाला है ..दो दो बेटियों के जन्म का अपराधबोध एवं मानसिक यंत्रणा का दंश झेलती हुई इंदु भाभी के मन में भी कहीं पुत्र होने की एक क्षीण सी आशा ने अनजाने ही जन्म ले लिया था ,पर क्षण भर बाद ही एक माँ का दायित्व बोध स्मरण आते ही वे तटस्थ हो गईं ...अपनी प्रतिभाशाली ,मासूम सी बेटियों का सहारा ही उनके जीवन की अमूल्य विरासत थी ,जिनके लिए वह अपने ..इस अनचाहे गर्भ के लिए भी तैयार नहीं थीं एक बार उन्होंने पति विपिन को भी समझाया था --''आधुनिकता के इस दौर में ..बेटा हो या बेटी .क्या फर्क पड़ता है ?क्यों न हम एक अनाथ बच्चे को गोद लेकर उसे एक सुन्दर भविष्य प्रदान करें ..तो हमारा वंश भी चलेगा और हमे एक बेटा भी मिल जायेगा ''----

विपिन कुछ देर सोचते रहे ,फिर कहा --''ऐसा इस परिवार में नहीं चलेगा इंदु !''......और वही हुआ मानो भूचाल सा आ गया था पूरे परिवार में ..पर इस बार जिस यातना से वह बचना चाहती थी उसे न चाहते हुए भी उस कठिन दौर से गुजरना पड़ा ,उनके ददिया ससुर के कहने पर उनके पति ने शहर ले जाकर उनका परीक्षण करवाया ,क्लिनिक में बैठे बैठे -हर्ष विषाद के झूले में झूलते इंदु भाभी का मन न जाने क्यों घबरा रहा था .घंटो प्रतीक्षा के बाद जब वे अंदर गईं तो परीक्षण का परिणाम जानने की उन्हें जरा भी उत्सुकता नहीं थी ,पर उनके पति ने परिणाम जानकर सिर पकड़ लिया .फिर बेटी का आगमन होने वाला था .वे बिलकुल शांत थीं ..पति के पास पहुँच कर जब सांत्वना भरा हाथ उनके कंधे पर रखा --तो उन नीरव ..बेजान आँखों के सूनेपन ने उन्हें भीतर तक हिल दिया वे सोचने लगीं कि --''क्या वंशबेल को बढ़ाने वाले पुत्र का मोह इतना प्रबल होता है कि अपनी ही अजन्मी पुत्री का स्वागत उसका पिता दुर्भाग्य मान  कर करता है ?''''

इंदु भाभी का सरल सहज मन यह कदापि स्वीकार नहीं कर पा रहा था  ...वे शिक्षिता थीं ..उनके पिता ने अपनी इकलौती सन्तान इंदु भाभी को खूब पढाया लिखाया था ,और अच्छे संस्कार भी दिए थे अतः इस वक्त अपने पति की विषादपूर्ण मुख मुद्रा उन्हें विचलित कर गई .वे भींगे स्वरों में बोल उठी --''हमारी इस बेटी ने क्या अपराध किया है ?..यदि हम उसे इस दुनिया में ला  रहे हैं ,तो वह  भी हमारी ममता एवं वात्सल्य का ही एक अंग है .और प्यार तथा सरंक्षण की अधिकारी भी ...उठिए !..निराशा छोड़ दीजिये ''

पर विपिन उन्हें वहीं रुकने को कह कर पुनः डाक्टर के केबिन में चले गए आधे घंटे तक न जाने क्या मन्त्रणा कर लौटे और फिर इंदु भाभी के साथ गाँव लौट गए .किसी ने उनसे कुछ नहीं कहा .पर एक अव्यक्त रहस्यपूर्ण ख़ामोशी छाई रही घर के वातावरण में ,..इंदु .भाभी का मन आशंकित था ,कि  न जाने क्या होने वाला है ..कोई उनसे बोलता भी नहीं ,और न पहले की तरह ही उनकी देखभाल हो रही थी .लगातार चिंतित रहने के कारण वे रक्ताल्पता से ग्रस्त हो गईं थीं -इस बार उनका नियमित परीक्षण करने विपिन नहीं ..पड़ोस की दिदिया गई थीं .डाक्टर ने भाभी को अपना विशेष ध्यान रखने की सलाह दी ..साथ ही आश्वस्त भी किया --''चिंता मत करो ..मैं तुम्हारे साथ हूँ ''-----भाभी ने यद्यपि उस समय तो कुछ नहीं कहा पर डाक्टर की बात पर चिन्तन चलता रहा ...

इंदु भाभी पूरे गाँव में पढ़ी लिखी समझदार बहू मानी जाती थीं ..यों कहें कि सभी उनको प्यार भी करते थे और आदर भी -अतः उनके तीसरी बार माँ बनाने की खबर भी छुपी न रही उस छोटे से गाँव में ..सभी इस बार पुत्र के ही जन्म होने और उसके बाद होने वाले उत्सव की मधुर कल्पना में डूबे हुए थे .फलस्वरूप एक अव्यक्त तनाव की मनःस्थिति से इंदु और विपिन के साथ साथ पूरा परिवार भी गुजर रहा था .....भाभी की तबियत लगातार ख़राब होती जा रही थी ,वे अत्यंत कमजोर हो गईं तब डाक्टर ने उन्हें भर्ती  होने की सलाह दी।।वे भर्ती तो हो गईं पर रह रह कर उनका मन किसी अंजन आशंका से काँप भी रहा था .विपिन उन्हें सांत्वना देते ,कुछ देर उनके पास बैठते और चले जाते ...इसी हताशा और निराशा के बीच उनकी सोच को एक विराम लग गया और वे स्वतः कह उठीं ----''ये क्या हो गया हो गया है मुझे ?..अरे ,मैं बी ए.पास पढ़ी लिखी  हूँ ..मेरे मन में ऐसे नकारात्मक विचार क्यों ?,मेरी  बेटी मेरे शारीर ,मेरी आत्माका एक अंश है ,मैं उसे अपना सारा प्यार और मान -सम्मान दूंगी ..मैं हारूंगी नहीं '' 

अभी पांचवा महीना चल रहा था और डाक्टर ने एक बार फिर नए परीक्षण के लिए बुलाया था ,विपिन साथ आये थे  परन्तु इस बार परिणाम चौंकाने वाला था --वे जुड़वां बच्चों की माँ बनाने वाली थीं ''यह बात इस तरह अचानक सामने आई थी कि सहसा वे विश्वास ही नहीं कर पाई थीं --दो और बेटियां ?...

प्रसव का समय भी निकट आ रहा था ,पीड़ा से छटपटाती इंदु भाभी ने आंसुओं की परत के पीछे से पति को निहारा -विपिन मुस्करा रहे थे .भाभी को लगा कि  शायद उनका मन रखने के लिए वे झूठी मुस्कराहट ओढ़े हुए थे .फिर वे शांत और आश्वस्त होकर आपरेशन थियेटर की ओर बढ़ गईं .--जब उनकी आँख खुली तो चारों ओर चहकते चेहरे नजर आये ..दादाजी, अम्मा जी ,सभी ने उन्हें बधाई दी --''बधाई हो इंदु ..बेटा ,हुआ है साथ में लक्ष्मी भी आई हैं ''

वे पागलों की तरह अम्मा जी का मुंह देखती रह गई .-यह कैसे हो गया ?.....जब सब चले तो गये एकांत में विपिन ने दो दो बच्चों को लिए हुए प्रवेश किया --''हैरान न हो इंदु !...तुमने केवल बेटी को ही जन्म दिया है -यह हमारा गोद लिया हुआ बेटा है तुम भी तो ऐसा ही चाहती थी न ?..इससे हमारी मान्यताओं और सोच का नया विकाश हुआ है इसी लिए हम इसे 'विकास 'बुलाएँगे ..उस दिन जब मैं डाक्टर से मिला तो तुम्हें अनावश्यक परेशानी से बचने के लिए गर्भपात कराना  चाहता था ,पर डाक्टर ने तुम्हारी जान जोखिम में पड़ जाने की बात बताई ,साथ ही हमारी समस्या का हल भी सुझाया --अस्पताल की चैरिटी से चलने वाले अनाथालय से किसी नवजात बालक को गोद लेने की सलाह दी ....इस बात को हम रहस्य ही रखेंगे जब तक अम्मा जी का मन परिवर्तन नहीं कर लेते और हम ऐसा कर पाएंगे ..है न ?''...............और वे दोनों खिलखिला कर हंस पड़े .--''बाद में हम दोनों मिलकर समाज और परिवार की इस गलत सोच को बदलने का प्रयास करेंगे और जरुर सफल होंगे ''

इंदु भाभी को अपने जीवनसाथी पर गर्व हो आया ,बेटी की प्राण रक्षा के साथ साथ बेटे की माँ बनाने का काम भी किया था विपिन ने ..वे प्यार से दोनों  बच्चों को सहलाने लगीं --आज उन्हें पूर्ण मातृत्व का अनुभव हो रहा था .

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  1. Padma ji punah ek vatsalya sikt kahani ke liye dhanyavad! Aapki kahaniyan kafi sangvedanshil hoti hain aur bhawpurn bhi. Nutan ki aas me
    Manoj 'Aajiz'

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