शनिवार, 27 अप्रैल 2013

रामवृक्ष सिंह का व्यंग्य - शहर में साँड़

व्यंग्य

शहर में साँड़

डॉ. रामवृक्ष सिंह

इधर हमारे शहर में साँड़ों की संख्या बेतहाशा बढ़ गई है। और साँड़ से हमें अभिधा वाला अर्थ ही अभिप्रेत है, लक्षणा या व्यंजना वाला नहीं। यानी गाय का पुल्लिंगी, चौपाया पशु। इसलिए फिलहाल हम उसी पर चर्चा करना चाहते हैं। शहर में साँड़ का क्या काम? काम चाहे न हो, किन्तु वास्तविकता तो यही है कि हमारे शहरो में साँड़ों की संख्या में बहुत वृद्धि हो गई है। हम महानगरों की बात नहीं कर रहे। वहाँ साँड़ों की कमी मानव-प्रजाति के दो-पाए ही पूरी कर देते हैं। दरअसल हुआ यह है कि अब देश के कृषि-कार्यों में बैल की दरकार रही नहीं। लोग बैलों को हल में नाँधकर अपने खेत अब नहीं जोतते। जुताई का काम निजी अथवा भाड़े पर लिए गए ट्रैक्टरों से होने लगा है। यह किफायती, कम समय-साध्य और सुविधा-प्रद है। इस वजह से बैल हमारे खेती-बाड़ी के काम के लिए अप्रासंगिक हो गए। बैल-गाड़ियाँ भी अब इक्का-दुक्का ही दिखती हैं। गायें जब बछिया को जन्म देती हैं तो किसान लोग उन्हें पाल लेते हैं, क्योंकि बछिया वयःप्राप्ति के बाद ब्याएगी और दूध देगी। लेकिन यदि गैया बछड़ा ब्याती है तो लोग उसे कुछ दिन पालने के बाद घर से बेदखल कर देते हैं। लावारिस बछड़ा यदि गाँव में रहे तो अपनी माँ का दूध पी जाएगा, लोगों की फसलें खाएगा और मारा-कूटा जाएगा। इसलिए धीरे-धीरे उसे खदेड़कर शहर की और खिसका दिया जाता है। हमारे लिए जो कुछ भी आर्थिक दृष्टि से बेकार हो चुकता है, उसका प्रायः यही हश्र हम करते हैं। दुःख की बात है कि कई बार इस सूची में हमारे बूढ़े माँ-बाप, विक्षिप्त अथवा विकलांग परिजन भी शामिल हो जाते हैं। तो शहर में पहुँचा साँड़ कहीं न कहीं हमारी उसी स्वार्थपरता का प्रतीक है, जिसके शिकार हमारे रक्त संबंधी भी हो जाते हैं।

साँड़ और बैल में बुनियादी अंतर है। साँड़ गो-वंश का वह नर प्राणी है, जो प्रजनन-क्षमता की दृष्टि से अपनी नैसर्गिक अवस्था में होता है। बैल को यह सुविधा प्राप्त नहीं। उसके अंड-कोशों को कम उम्र में ही दबाकर ऐसा कर दिया जाता है कि वह प्रजनन में अक्षम हो जाता है। और फिर धीरे-धीरे उसे कृषि कार्यों का प्रशिक्षण दिया जाता है। साँड़ से आप खेती का काम नहीं ले सकते, क्योंकि वह आपकी कोई बात नहीं सुनेगा और ज्यादा सताएंगे तो आपको उठा के पटक देगा, हो सकता है मार ही डाले। इस प्रकार साँड़ निरंकुशता, स्वेच्छाचारिता और मस्ती का प्रतीक है। इसके विपरीत बैल कर्मठता, नियम को आँख मूँद कर मानने और परिश्रम-पूर्वक अपना काम करते जाने वाले जीव का प्रतीक है। इसीलिए ऐसे मनुष्य को कोल्हू का बैल कहते हैं, जबकि बेफिक्र और निर्द्वन्द्व घूमनेवालों को छुट्टा साँड़ कहा जाता है।

हमारे समाज की बहुत भारी विडंबना यह है कि उसमें नवोन्मेषिता का सर्वथा अभाव है। कोई सफेद या पीली चमड़ी वाला आकर बताएगा, तब हमारे दीदे खुल जाते हैं कि अरे यार, ऐसा हमें क्यों नहीं सूझा! इस समस्या का समाधान तो हमारे पास ही था। हमारे खेतों में बैल का काम नहीं बचा तो हमने बछड़ों को छोड़ दिया और वे साँड़ बन गए। साँड़ों से हमारी फसलों को नुकसान का अंदेशा था तो हमने उन्हें खदेड़कर शहरों की ओर ठेल दिया कि जाओ, शहर में रहकर अपने मानव-संस्करणों के साथ सत्ता में हिस्सेदारी करो। इसी का नतीजा है कि हर चौराहे, हर सड़क, हर डिवाइडर, हर सब्जी मंडी में हमें इफरात में सॉँड़ देखने को मिल जाते हैं। और यदि वहाँ कोई गाय भी आ जाए तो कहना ही क्या! उसके पीछे-पीछे तरह-तरह की मुद्राएँ बनाते कई-कई दिन तक ये भाई लोग घूमेंगे। वर्चस्व की लड़ाई लड़ेंगे, घायल होंगे, लंगड़े हो जाएँगे। फिर भी लड़-लड़कर पूरे वातावरण को अखाड़े में तबदील किए रहेंगे। यदि इस दौरान कोई वक्त का मारा इन्सान उनके लपेटे में आ गया तो उसकी जान बचने की कोई गारंटी नहीं। साँड़ों द्वारा इन्सानों के अपनी जान से हाथ धोने के कितने ही किस्से रोज अखबारों में छपते हैं।

शहर की सड़कों पर कुछ-कुछ दूरी पर आपको दो-दो, चार-चार के समूह में साँड़ और गायें बैठी दिख जाएंगी। गायें तो घूम-फिरकर सुबह-शाम अपने मालिक के घर पहुँच भी जाती हैं, क्योंकि वहाँ उनकी बछिया या बछड़ा बँधा होता है, जिसके बहाने उनका मालिक उन्हें बाँधकर दूध दुहता है और फिर छोड़ देता है। किन्तु साँड़ बेचारे लावारिस हैं। उनका कोई घर नहीं, कोई माई-बाप नहीं, कोई पूछनेवाला नहीं। इसलिए वे रात-दिन सड़क पर ही जमे और रमे रहते हैं।

आप वाहन लेकर निकलें तो पहला साबका इन साँड़ों से ही पड़ता है। वे सड़कों पर प्राकृतिक डिवाइडर और स्पीड-ब्रेकर का काम करते हैं। कई बार तो हमें लगता है कि लोक निर्माण विभाग और विभिन्न नगर पालिकाएं बेकार में ही सड़कों पर डिवाइडर तथा स्पीड ब्रेकर बनवाती हैं। ये काम तो साँड़ों से ही बखूबी लिया जा सकता है। और चूंकि साँड़ सचल होते हैं, इसलिए जहाँ जरूरत हो, वहाँ उन्हें हाँककर ले जाया जाए। ईंट-पत्थर और सीमेंट के डिवाइडर व ब्रेकर में सचलता की सुविधा की कल्पना भी नहीं की जा सकती।

चूंकि गो-धन की संख्या हमारे देश में बहुत ज्यादा है और प्राकृतिक रूप से गायें बछड़ों को जन्म देती ही रहती हैं, इसलिए सड़क के डिवाइडर व ब्रेकर के रूप में इस्तेमाल करने के बाद भी साँड़ों की काफी बड़ी संख्या ऐसी बच रहेगी, जिसके लिए हमारे पास पर्याप्त काम नहीं होगा। इस समस्या का समाधान यह हो सकता है कि इस तरह के साँड़ों को वहाँ भेज दिया जाए, जहाँ उनकी माँग है।

साँड़ों की माँग दो प्रकार से है- गो-भक्षक मनुष्यों के दस्तरखान पर और हिंस्र, माँसाहारी जीवों के नैसर्गिक पर्यावास में। चुनाव हमें करना है। पहले विकल्प पर चर्चा नहीं करते, वह स्वतः स्पष्ट है। दूसरे पर कर लेते हैं, क्योंकि वह हमारे धर्म-भीरु समाज में निरापद है। हम अकसर देखते-सुनते और पढ़ते हैं कि अमुक-अमुक जगह पर बाघ, चीते आदि माँसाहारी जीव जंगल की सीमा से बाहर मानव-बस्तियों में घुस आए और उन्होंने मवेशियों अथवा इन्सानों पर आक्रमण कर दिया। ऐसा इसलिए होता है, क्योंकि उन जीवों को जंगल में पर्याप्त आहार नहीं मिल पाता। आहार की खोज में वे जंगल के आस-पास के गाँवों की और चले आते हैं।

तो क्या यह उचित नहीं होगा कि हम बछड़ों और साँड़ों को जंगल में छोड़ आएँ? जंगल में रहने से उनके लिए खाने की पर्याप्त वनस्पति उपलब्ध होगी, शहरी सड़कों पर स्पीड ब्रेकर और डिवाइडर की भूमिका निभाने में उन्हें जो पीड़ा झेलनी पड़ती है, उससे सदा के लिए मुक्ति मिलेगी और माँस-भक्षी वन्य जीवों को शिकार की तलाश में गाँव-गाँव भटकने की जरूरत नहीं रह जाएगी। अकसर हम देखते हैं साँड़ें, गायें, कुत्ते और सूअर शहर के कूड़ा घरों में अपने-अपने काम की आहार-सामग्री खोज रहे होते हैं। शहर के कूड़ा-घर एक प्रकार के आधुनिक चरागाह हैं, जहाँ इन जीवों के लिए खाद्य-सामग्री मिल जाया करती है। उसी में कई बार कुछ दो-पाए भी कूड़ा-कबाड़ छाँटते-बीनते नज़र आ जाते हैं। यदि साँड़ों को ले जाकर जंगल में छोड़ा जा सके तो बाकी के प्रतिस्पर्धियों के कलेजे को कुछ ठंडक मिलेगी और साँड़ों को भी कचरा खाकर गुजारा करने की जिल्लत से मुक्ति मिल जाएगी।

कुछ लोगों को लग सकता है कि अरे, हमारे शहर भी जंगल ही बन गए हैं। हममें से बहुत से लोग तो अपने व्यवहार व आचरण में जंगली जानवरों को भी मात देते हैं। इसलिए साँड़ को जंगल भेजने की क्या जरूरत है! यह बिलकुल सच है कि हम इन्सानों ने अपने नगरों को जंगल बना दिया है किन्तु चौपाए साँड़ के साथ सबसे बड़ी दिक्कत यह है कि उस बेचारे को अपनी सुविधा के अनुरूप जंगल बनाना नहीं आता। इसलिए वह सड़कों, पार्कों, कूड़ा-घरों, चौराहों आदि पर पडा रहता है। दोपाए साँड़ को हर जगह मन-चाहा जंगल बनाने की सुविधा और काबिलियत उपलब्ध है। वह जहाँ चाहता है, जंगल रच लेता है, जहाँ उसका मन करता है वहीं जंगल-राज चला लेता है। शहर में आ बसे दोपाए साँड़ों पर तो हमारा वश चलने वाला नहीं है, किन्तु चौपाए साँड़ों का तो उपाय निश्चय ही किया जा सकता है। पिछले करीब ढाई हजार वर्षों से गो-वंश की पूजा करते आ रहे भारतीय समाज को इस विषय में गहराई से सोचना चाहिए।

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आर.वी.सिंह/R.V. Singh
ईमेल/email-rvsingh@sidbi.in

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  1. बहुत प्रासंगिक लेख

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  2. अरे दद्दा सोचे कौंन जिन्होंने सोचना था वे ही तो हैं...

    उत्तर देंहटाएं

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