मंगलवार, 9 अप्रैल 2013

दीपक शर्मा 'सार्थक' का आलेख - दिल,दिमाग और वैचारिक ओवरफ्लो

दिल,दिमाग और वैचारिक ओवरफ्लो


'दिल' के बारे में विचार करते ही मानसिक पटल पर पान के पत्ते के आकार जैसी एक संरचना उभर कर सामने आती है, जिससे लगभग सभी परिचित होते हैं परन्तु इसका आकार और कार्य दोनों ही शोध का विषय है


जहाँ तक आकार का विषय है तो प्राणिशास्त्री इसे सामान्यता 250-300 ग्राम भार का एक पिंड मानते हैं वहीँ आशिकों की नज़रों में उनके दिल का आकार असीमित है, जिसके अन्दर उनकी प्रेमिका स्वच्छंद विचरण कर सकती है और 5 स्टार होटलों से भी ज्यादा सुविधाओं का उपभोग कर सकती है।


दिल के कार्यों के बारे में कहें तो आदिकाल से ही यह अनेक कार्यों का निष्पादन करता चला आ रहा है, जिसमे शरीर में रक्त संचार करने के अलावा प्रेम संहिता में वर्णित प्रोटोकॉल के तहत दो प्रेमियों के बीच प्रेम प्रसंग इसी(दिल) के विनिमय के बाद प्रारंभ हो सकता है।


परन्तु समय बदलने के साथ-साथ इसके कार्यों में वृद्धि होती जा रही है आज के परिप्रेक्ष्य में इसका एक महत्त्वपूर्ण कार्य हर 'बात' को अपने ऊपर लेना है। ये रक्त संचार के अपने महत्त्वपूर्ण कार्य को तो भूल सकता है पर 'बात' को अपने ऊपर लेना नहीं भूल सकता।


यदि कोई वक्ता चतुराई से कोई ऐसी बात कहे जो दिल पर ना लगे तो हर बात को अपने दिल पर लेने का आदी ये समाज बाकायदा अन्वेषण और शोध करके उसकी बात से कुछ ऐसे अंश ज़रूर ढूंढ लेता है जिसे वो अपने दिल पर ले सके। अगर कभी ऐसा भी हुआ कि कोई 'बात' दिल तक पहुचने में असमर्थ है तो कुछ अति उत्सुक व्यक्ति अपना दिल ही उठाकर बात पर दे मारते हैं।


दिलों से दबी कुचली और सहमी 'बात' की स्थिति कुछ-कुछ कुरु सभा में द्रौपदी के चीरहरण जैसी हो जाती है, जिसे वस्त्र विहीन देखने के लिए हजारों दु:शासन सक्रिय हो जाते हैं और वही सरकार धृतराष्ट्र की भूमिका अदा करती नज़र आती है।
और सरकार करे भी क्या क्योंकि ये बातें कभी किसी की 'निजता का हनन' कर देती हैं तो कभी किसी की 'नीचता का हनन' कर देती हैं। कभी किसी की 'स्वायत्तता का हनन' हो जाता है तो कभी किसी की 'स्वार्थपरता का हनन' हो जाता है, कहीं 'शोहदागीरी' तो कहीं 'गबन करने के अधिकारों' का हनन हो जाता है और जिनके पास कुछ हनन कराने के लिए नहीं होता है, वे शिकायत करते हैं कि उनकी निष्क्रियता और उदासीनता का हनन हो गया है।


इनको संरक्षण प्रदान करने में सरकार इतनी व्यग्रता दिखाती है जितनी व्यग्रता तो नव दंपत्ति के मन में अपने प्रथम मिलन की रात को लेकर भी नहीं होती है।
इन सबके बीच बेचारा वक्ता अपने आप को उस फार्मी मुर्गे के सामान पाता है जिसे कभी भी रोस्टेड चिकन बनाने के लिए हलाल किया जा सकता है । उसकी सृजनशील ग्रंथियों से रिसाव होने लगता है, जिसमें माचिस की तीली फेंक कर उसके अन्तः करण को जलाकर भस्म कर देने के लिए हजारों दिल धड़कने लगते हैं अपने विचारों के 'ओवरफ्लो' से परेशान वो उस क्षण को कोसता है जब उसने अपने विचार व्यक्त किये थे। उसकी रचना शीलता और चप्पल के तल्ले दोनों ही कोर्ट में अपनी जमानत के लिए दौड़ते- दौड़ते घिस जाते हैं।


कुछ वक्ता तो आजीवन अज्ञात वास पर ही चले जाते हैं और उस नक्षत्र के इंतज़ार में अपना बाकी जीवन बिता देते हैं, जब वे अपने बिलों से बाहर आ सकें।
शायद इसी परेशानी से हमारे पूर्वज भी गुजरे थे तभी तो उन्होंने 'मौन' को जीवन का आधार बताया था क्योंकि उनको पता था कि जुबां तो अपना काम करके अन्दर हो जाएगी पर इसका खामियाज़ा सिर जूते चप्पल खाकर भुगतेगा।


अभी हाल ही में इससे पीड़ित एक वक्ता से मेरी मुलाक़ात हुई जिन्होंने मुझे कुछ अजीब तरह के दो वर्गों से परिचित करवाया। जोश में भाषण देते हुए उन्होंने मुझे बताया कि ये दुनिया दो वर्गों में बँटी है, पहला वो बहुसंख्यक वर्ग जो दिल से सोचता है तथा दूसरा वह अल्पसंख्यक वर्ग जो दिमाग से सोचता है। दिल से सोचने वाला बहुसंख्यक वर्ग दिमाग से सोचने वाले अल्पसंख्यक वर्ग का शोषण कर रहा है। अतः अल्पसंख्यक वर्ग को संगठित होकर इसका विरोध करना चाहिए।


अपना विचार व्यक्त करके और मुझे सोचता छोड़कर वे पतली गली से निकल गए .....मान गए इतने दुत्कारे जाने के बाद भी ये वक्ता अपनी 'बात' कहने से बाज नहीं आएंगे।


----दीपक शर्मा 'सार्थक'

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