शनिवार, 27 अप्रैल 2013

बच्चन पाठक 'सलिल' की ऐतिहासिक कहानी - नियति चक्र

नियति चक्र

-डॉ बच्चन पाठक 'सलिल 

 

मगध साम्राज्य के राज वैद्य आचार्य जीवक को उस रात  नींद नहीं आरही थी अपने प्रसाद में ,अपने पर्यंक पर लेटे लेटे वे विचारों में मग्न थे .उन्हें आश्चर्य हो रहा था कि नियमित दिनचर्या वाले होने पर भी उन्हें रात के तृतीय प्रहार में अनिद्रा का भार क्यों वहन करना पड़  रहा है . 

आचार्य जीवक ख्याति प्राप्त वैद्य थे ,सम्राट बिम्बसार ने उन्हें राज वैद्य नियुक्त किया था .सुंदर ,भवन दास दासियाँ ,गएँ और आने जाने के लिए सुंदर रथ -सब कुछ उन्हें उपलब्ध था .वे सप्ताह में एक दिन जाकर राजघराने के सदस्यों के स्वास्थ्य की जाँच कर आते थे ,इसके बाद उन्हें कोई राजकीय दायित्व नहीं था .पर वे प्रतिदिन प्रातः चार पांच घंटे अपने आम्रकुंज स्थित भवन में बैठ कर जन  साधारण की चिकित्सा करते थे कभी कभी कनिष्ठ वैद्य आकर उनका निदान देखते और आवश्यक परामर्श लेते ...

आचार्य जीवक की ख्याति सम्पूर्ण आर्यावर्त में व्याप्त थी ,उन्होंने बिम्बसार की अनुमति से भगवान बुद्ध और अवन्ती नरेश चन्द्र्प्र्द्योत की चिकित्सा की थी .इससे बिम्बसार अत्यंत प्रसन्न रहते थे .आचार्य जीवक कभी किसी से कोई शुल्क नहीं लेते थे ... राजगृह ,वाराणसी ,एवं वैशाली के कई कोटि पति उनकी चिकित्सा से स्वस्थ हो चुके थे ..वे जीवक को सहस्रों स्वर्ण मुद्राएँ दान स्वरूप देना चाहते थे किन्तु जीवक विनम्रता पूर्वक उन्हें अस्वीकार कर देते थे ,वे कहते --''मै अकेला हूँ ,सम्राट ने आवश्यकता की सभी सामग्रियां दे राखी हैं .प्रतिवर्ष एक चीनांशुक उत्तरीय और एक सहस्र स्वर्ण मुद्राएँ भी देते हैं,मै और लेकर क्या करूँगा ?..आप इस राशी से किसी अनाथ या विपत्ति ग्रस्त की सेवा कर दें और इसका प्रचार भी नहीं करें ,मुझे संतोष होगा ,कि मेरी सेवा का पुरस्कार मिल गया है ''

उस दिन आचार्य जीवक करवटें बदलते हुए सोच रहे थे --''मै आयुर्वेद का विद्यार्थी हूँ ,दर्शन का मैंने विधिवत अध्ययन नहीं किया ,इस लिए जीवन क्या है इसकी कोई परिभाषा नहीं दे सकता --पर मेरा अपना जीवन ही इस तर्क का साक्षी है कि मानव जीवन सरल रेखा में गमन नहीं करता ..अपनी प्रतिभा और पुरुषार्थ का जहाँ महत्व है वहां नियति के परिहास से भी अस्वीकृति नहीं प्रकट की जा सकती ''

उस शाम भोजन के बाद सेवक रजत पात्र में गो-दुग्ध दे गया था ,जीवक ने परिहास के लिए पूछा --''चन्दन तुम्हारी घरवाली का कुछ पता चला ?''

चन्दन ने दार्शनिक मुद्रा में कहा --''स्त्री का चरित्र ब्रह्मा भगवन भी नहीं जानते ,मेरी घरवाली पश्चिम से आये श्रेष्ठिन के साथ भाग गई ,मुझे इसका पता तब चला जब वे मगध की सीमा पार कर गए थे ...उसके जाने का मुझे दुःख नहीं है ...वह पांच साल की एक पुत्री छोड़ गई है -अब उसका पालन पोषण कैसे होगा ?मुझे यही चिंता है ''..

जीवक ने कुछ सोच कर कहा --''एक दासी रख लो -वह लालन पालन करेगी ,सारा व्यय मेरी ओर से वहन होगा ;''

चंदन संतुष्ट मुद्रा में चला गया था .आचार्य जीवक सोच रहे थे की चंदन ने श्लोक का एक भाग ही सुना है --त्रिया चरित्रम पुरुषस्य भाग्यम -देवो न जानती कुतो मनुष्यः ''और वे अपने जीवन पर दृष्टिपात करने लगे .उनके अज्ञात माता पिता ने उनके जन्म के बाद तत्काल उन्हें घूरे पर फेंक दिया था .श्वेतकेतु नामक एक सहृदय ब्राह्मण ने उनका पालन किया था ...पलक पिता श्वेतकेतु एवं माँ पंचमी देवी के असीम स्नेह से ही वे बड़े हुए ...पिता ने उन्हें सुशिक्षित करने का पूर्ण प्रयत्न किया -यज्ञोपवीत कराया -घर पर ही शिक्षा दी -,वे उन्हें कर्मकांड या ज्योतिष पढ़ना चाहते थे पर उनकी रूचि आयुर्वेद की ओर थी ,पिता सहृदय थे ,उन्होंने अन्यथा नहीं लिया ,और मगध के एक प्रसिद्द वैद्य के पास जीवक को रखा .वैद्य जी लालची थे ,वे रोगियों को अधिक दिनों तक लटकाए रखते ,और    धन संग्रह करते ..एक बार वैद्य जी  काशी गए ,जीवक को प्रभार दे गए ,जीवक ने अल्पकाल में  काफी ज्ञान  कर लिया  उन्होंने ऐसी ओषधियाँ दीं -निदान के बाद ठीक पथ्य बतलाया कि साल साल भर  से आने    रोगी एक महीने  में ठीक हो गए .

वैद्य जी  लौटे और जीवक पर  नाराज हुए बोले ,--  तुमने मेरा व्यापर चौपट कर ,दिया हजारों स्वर्णमुद्राओं की हानि कर दी ,मेरे घर से निकल जाओ ''...भग्न ह्रदय जीवक  वापस लौटे .

पिता श्वेतकेतु भी नहीं रहे ,जीवक पुनः एकाकी रह गये .एक दिन वह राजगृह के वन मी अकेले बैठे थे ,आत्महत्या करने की इच्छा हो रही थी ,अचानक एक ओर से कोलाहल सुनाई  पड़ा ,सेनापति का एकलौता पुत्र मित्रों के साथ मृगया के लिए आया था ,यहाँ उसे सांप ने काट किया ...उसकी हालत अत्यंत चिंतनीय थी .घोड़े पर लेजाकर राजगृह जाना सम्भव नहीं था .जीवक ने उन लोगों से धैर्य  धारण करने के लिए कहा ,कटार से घाव चीर कर विषाक्त रक्त बहा दिया और एक जड़ी का लेप लगा दिया -----उस युवक की चेतना वापस आने लगी ,उसने पानी माँगा ---जीवक ने मना कर दिया और कुछ पत्तियों का रस उसकी जीभ पर टपका दिया ---एक घटिका में युवक स्वस्थ हो गया और अश्वारोहण कर वापस आ गया .

दुसरे दिन जीवक के दरवाजे पर स्वयम सेनापति उपस्थित थे ,बोले --''ब्राह्मण  !..तुमने पुत्र की जान बचा कर मुझे जीवन दान दिया है।।।बोलो क्या चाहिए ?''

जीवक ने विनम्र स्वर में कहा --''मुझे कुछ नहीं चाहिए ,एक अनाथ को इतना सम्मान दिया ,मेरे लिए यही बहुत है ''

सेनापति ने इस घटना की चर्चा महाराज बिम्बसार से की -जीवक को दरबार में बुलाया गया ,महाराज ने --पूछा ''तुम  ओषधालय में काम करोगे ?तुम्हे प्रतिदिन एक स्वर्ण मुद्रा दी जाएगी ''

जीवक ने हाथ जोड़ कर कहा --''महाराज की जय हो ,मै आयुर्वेद का विधिवत अध्ययन करना चाहता हूँ ,मेरी इच्छा है कि तक्षशिला जाऊं और आयुर्वेद का अध्ययन करूँ ,पुनः वापस  आकर मगध की सेवा करूँ ''....महाराज प्रसन्न हो गए --इस युवक के तक्षशिला जाने का प्रबंध किया जाये ,...तक्षशिला में सबका प्रवेश नहीं होता ,उस विश्वविद्यालय में द्वारपडित  परीक्षा लेते हैं ..मगध के कई वैद्य निराश हो चुके हैं ''

जीवक ने कहा --''महाराज निश्चिन्त रहें ..मै मगध हूँ ,मगध और राज्य की प्रतिष्ठा बढाकर वापस  आऊंगा ''

तक्षशिला में जीवक का प्रवेश हुआ ,उन्होंने परिश्रम और योग्यता से पढाई की ,विश्वविद्यालय की एक घास अनुपयोगी समझ कर ,काट कर फेंक दी जाती थी ,अनुसन्धान द्वारा जीवक ने बताया कि वह चरम रोग दूर करने की ओषधि है --परीक्षणों के बाद उनका शोध सही पाया गया ,उन्जे आयुर्वेद महारथी ''की उपाधि मिली .

आचार्य जीवक वापस आये -राजवैद्य नियुक्त किये गए ,उनकी ख्याति देश -विदेश में फ़ैल रही थी .कई ब्राह्मण अपनी कन्याओं के प्रस्ताव लेकर आये पर जीवक न तो अपने अनुकूल पत्नी पा सके और न कभी विवाह की उत्सुकता ही उनमे जगी -संघर्षों ने ऊनकी रागात्मक वृत्ति को मानो सुख दिया था .

मगध की शाल्व्सी की उन्होंने चिकित्सा की थी ,शाल्व्सी उनके सौम्य व्यक्तित्व से आकर्षित हुई ,उसने निवेदन किया --''मै  आपसे विवाह करना चाहती हूँ ,मेरे पास कोटि स्वर्ण मुद्राएँ हैं ,मै सब आपको समर्पित कर दूंगी .मै कला प्रदर्शन भी छोड़ दूंगी ,;;

संकोची जीवक ने कहा था --'',देवी कला ईश्वरीय दें है ,इससे आप लोक रंजन करें ,मै वैद्य हूँ ..मुझे सेवा करने दें ,स्वर्ण और सूरा में मेरी कोई आसक्ति नहीं है ''

बाद में मालूम हुआ कि मगध के एक सेनापति की दृष्टि शालवसी पर थी ,उससे घनिष्ठता के कारण सेनापति ने एक सामंत की हत्या करवा दी थी .महाराज बिम्बसार की अनुमति से जीवक अवन्ती गये एवं महाराज चंद्रप्रद्योत को स्वस्थ किया .राजकुमारी वासवदत्ता भी उनके सम्पर्क में आई ..राजकुमारी ने प्रकारांतर से अपना प्रणय निवेदन किया -राजकुमारी के रूप और गुण पर जीवक प्रभावित थे पर उन्हें तक्षशिला के आचार्य का कथन याद आया ---'वैद्य को संयमी होना चाहिए ,उसे राजनीति और राजपुरुषों से मोह नहीं रखना चाहिए यही उसके और प्रजा के हित में होता है ''बादमे वासवदत्ता का विवाह कोशाम्बी के रजा सम्राट उदयन से हुआ .

जीवक सोच रहे थे --मेरा जीवन क्या है ?..घटनाओं की श्रृंखला है ,बचपन में ही कूड़े के ढेर पर मर गया होता या राजगृह के वन में आत्महत्या कर ली होती ..सुन्दरियों के प्रणय जाल में राजकोप का भागी हो सकता था ...पर अभी तक परमात्मा ने मुझे जीवित रखा है --शायद वह मुझे लोकसेवा के लिए ही जीवित रखना चाहता है .

उनका सिर भरी हो रहा था ,जीवक उठे ,शीतल -जल पान किया ...और आंवला उठाकर कूटने लगे ....!

4 blogger-facebook:

  1. अति सुंदर रचना। आदरणीय सलिल जी को बधाई। बहुत अच्छे कैनवस पर बडी कुशलता से बुनी हुई रचना के माध्यम से चिकित्सकीय पेशे से जुडे व्यक्तियों के लिए एक आदर्श रचनाहै। अति आनंदित हुआ।
    सादर

    उत्तर देंहटाएं
  2. इतिहास की ये कहानी बहुत ही रोचक लगी ऐसा मन जाता है कि जीवक बिम्बिसार के ही पुत्र थे जो दासी से पैदा हुए थे

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  3. कहानी भले ही काफ़ी पुरानी है, पर वह अपना प्रभाव मन-मस्तिस्क पर छोडने में समर्थ है. सवाल यह नहीं है कि वह काफ़ी पुरानी है,बल्कि आज के परिवेश को देखते हुए ऎसी कहानियां आनी चाहिए ताकि वह इस भटक चुकी पीढी का मार्गदर्शन कर सके.

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  4. बेनामी10:23 am

    Etni sunder etehasik ktha ki prastuti ke lie saliljee ko dhnyabad.

    ek Aaditya poor ka purana nivashi mai bhi hun.

    उत्तर देंहटाएं

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